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स्वतंत्रता के बाद समाज-संस्कृति प्रतिष्ठा का संघर्ष : उद्धवदास जी मेहता

20 फरवरी 1986 सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पुण्यतिथि

भाई उद्धवदास जी मेहता देश के उन विरले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में एक हैं जो दस वर्ष की बालवय में स्वाधीनता संघर्ष केलिये सामने आये और पन्द्रह वर्ष की आयु में बंदी बनाये गये। उनका सारा जीवन समाज, संस्कृति और राष्ट्र की सेवा और संघर्ष में बीता।

स्वाधीनता के पूर्व जहाँ उनकी जेल यात्राएँ मानों घर आँगन हो गयीं थीं तो स्वाधीनता के बाद उनका जीवन समाज के संगठन, और संस्कृति की प्रतिष्ठापना के लिये समर्पित रहा। वे अपने जीवन में 1926 से 1949 के बीच कुल नौ बार गिरफ्तार हुये, कम आयु के कारण दो बार जंगल में छोड़ा गया और सात बार जेल भेजा गया।

स्थानीय प्रशासन उनसे कितना रुष्ट था इस बात का अनुमान केवल इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उन्हें उनकी बेटी के विवाह में कन्यादान करने के लिये पेरोल भी न मिला था वे हथकड़ी और बेड़ी में लाये गये और उसी अवस्था में भाई जी ने अपनी बेटी का कन्यादान किया।

स्वाधीनता की अग्नि को प्रज्जवलित रखना उन्हें विरासत में मिला था। राष्ट्र की सेवा में उनकी अनेक पीढ़ियों का बलिदान हुआ था। संस्कृत और आयुर्वेद के विद्वान उनके दादा टीकाराम जी ने 1857 की क्राँति का अलख जगाने के लिये पूरे मालवा क्षेत्र में गाँव गाँव की यात्रा की थी।

यह परिवार भोपाल आया और यहीं 9 अगस्त 1911 को भाई उद्धवदास जी मेहता का जन्म हुआ। पिता बूलचंद जी भी आयुर्वेद चिकित्सक और संस्कृत के आचार्य थे। माता गेंदा बाई भी संस्कृतविद् और आयुर्वेद की जानकार थीं। जब भाई जी केवल सात वर्ष के थे तब 1918 में पिता का निधन हो गया। परिवार संचालन का दायित्व माता के कंधे पर आया उन्होंने अपने पति का औषधालय स्थावत रखा और बालक उद्धव दास को बालवय में ही परिपक्वता का बोध होने लगा।

भोपाल में तब का सामाजिक वातावरण तब दोहरे दबाव का था। भोपाल राज्य की जनता नबाब के आधीन थी और नबाब अंग्रेजों का। भोपाल रियासत इस्लाम केलिये बहुत कट्टर थी। अंग्रेजों का पोलिटिकल एजेन्ट सीहोर में रहता था। नबाब के माध्यम से अंग्रेजों के जुल्म से त्रस्त थी जनता।

लेकिन गैर इस्लामिक समाज पर नबाब और उसके कारिन्दों का अतिरिक्त दबाव था। जिन दिनों भाई जी होश संभाल रहे थे उन दिनों देश के बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि अनेक स्थानो में स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ने लगा था।

महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर स्वाधीनता के लिए अहिसंक आँदोलन का सूत्रपात कर चुके थे। गाँधी जी के अहिंसक आंदोलन का प्रभाव भोपाल में भी आया। यहाँ उस समय की पीढ़ी सक्रिय हो गयी थी, लेकिन खुलकर सामने आने में संकोच हो रहा था। फिर भी सीहोर रायसेन आदि क्षेत्रों में प्रभात फेरियाँ निकलने लगी थीं लेकिन भोपाल नगर में दबाव अधिक था।

भोपाल में आर्यसमाज अस्तित्व में आ गया था। जो सामाजिक जाग्रति और सांस्कृतिक मूल्यों के लिये काम कर रहा था। तब एक योजना बनी कि बच्चों की प्रभात फेरी निकाली जाये। यह काम बालक उद्धव दास मेहता को सौंपा गया। सब लोगों ने माता गेंदाबाई से बात की फिर बालक उद्धव दास मेहता को समझाया। यह बात 1921 की है।

तब भाई उद्धवदास जी मेहता मात्र दस वर्ष के थे और छठवीं कक्षा के विद्यार्थी। कक्षा और विद्यालय के सभी विद्यार्थियों को निकाल कर प्रभात फेरी निकालने की योजना बनी। भाई उद्धवदास जी मेहता ने यह काम बड़ी खूबी से किया। उनकी पहल पर विद्यालय के अधिकांश विद्यार्थी सम्मिलित हुये।

यह समाचार आग की भाँति पूरे क्षेत्र में फैला और सूचना गाँधी जी को भी भेजी गयी। इससे परिवार पर बहुत दबाब बना। परिवार को धमकियाँ मिलने लगीं। प्रशासन और नबाब समर्थकों की नजर में बालक उद्धव खटकने लगा। माता को चिंता हुईं। जैसे तैसे छठवीं कक्षा उत्तीर्ण की और माता ने पढ़ने के लिये बनारस भेज दिया।

वे बनारस में चार वर्ष रहे। इन चार वर्षों में जहाँ उन्होंने संस्कृत के आचार्य और आयुर्वेद आचार्य दोनों परीक्षा उत्तीर्ण की नहीं की अपितु राष्ट्रभाव से संबंधित पाठ भी वहीं पढ़े। वे अवकाश के दिनों में चार साल बाद 1926 में भोपाल लौटे। इसी वर्ष उनका विवाह शकुन्तला देवी से हुआ।

शकुन्तला देवी के पिता पं हजारीलाल जी मेहता भी संस्कृत और आयुर्वेद की पृष्ठभूमि के थे। यह संस्कार शकुन्तला देवी में भी थे। इस कारण भाई जी को पूरा सहयोग मिला और समाज सेवा के लिये वे अपना समय निकाल सके। जिन दिनों भाई जी बनारस में थे उन चार वर्षों में भोपाल के वातावरण में बड़ा परिवर्तन आया। भोपाल नबाब ने अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति पर अमल करते हुये हिन्दु और मुसलमानों को लड़ाना आरंभ कर दिया।

कुछ लोगों को बाहर से लाकर बसाया जाने लगा तथा गुंडागर्दी के नाम पर कुछ लोगों को छूट दी गयी। इसके मुकावले के लिये भाईजी ने नौजवानों की एक टोली तैयार की जो इस तरह के असमाजिक तत्वों से सामना कर सके। इस टोली ने 1926 भोपाल स्टेशन पहुँच कर ट्रेन में गाँधी जी एक पत्र दिया जिसमें भोपाल के हालात का वर्णन था।

गाँधी जी की सलाह पर भाई जी के नेतृत्व नौजवानों ने एक ज्ञापन उस समय के अपराध नियंत्रक मोहम्मद अली को सौंपा। मोहम्मद अली ने बात सुनने और समझने की बजाय गिरफ्तार करने के आदेश दे दिये। पाँच नौजवान पकड़े गये। दो दिन कैद में भूखा रखा और फिर जंगल में छोड़ दिया गया। यह भाई जी की पहली गिरफ्तारी थी तब उनकी आयु केवल पन्द्रह वर्ष थी।

घटना से माताजी चिंतित हुईं और उन्होंने अवकाश के दिन शेष रहने के बाद भी वापस बनारस भेज दिया। इस बार भाईजी ने अपनी पढ़ाई के साथ मन स्वाधीनता संघर्ष का संकल्प लिया और ऐसा साहित्य संकलन आरंभ किया जिससे उनकी संकल्पशक्ति और सशक्त बने। इनमें स्वामी दयानंद, विवेकानंद, तिलकजी, सावरकर जी और मदनमोहन मालवीय जैसे महामनाओं साहित्य था।

इस साहित्य से जहाँ उन्हें संकल्प शक्ति मिली वहीं गाँधी जी का अहिंसा पर अडिग रहकर काम करने का मार्ग अपनाया। भाई जी ने भोपाल में घटी घटनाओं का विवरण तैयार किया और पत्र भेजकर काँग्रेस आर्य समाज तथा अन्य प्रमुख लोगों को अवगत कराया। एक वर्ष पश्चात 1927 में अवकाश के दिनों में पुनः भोपाल आये। अपनी इस यात्रा में भोपाल के उन पीड़ितों से मिले जिन्हें नबाब के धार्मिक कानून के बहाने असामाजिक तत्व उत्पीड़ित किया करते थे।

भाई जी ने इस कानून का विवरण और पीड़ितों के नाम गाँधी जी को भेजे। 1928 में वे तीसरी बार अवकाश पर भोपाल आये और आर्यसमाज के सहयोग से उन पाँच स्त्रियों का शुद्धिकरण किया जिनका अपहरण और बलात्कार हुआ था। इस घटना के कारण वे पुनः गिरफ्तार कर लिये उनके आचरण को धर्म विरोधी माना गया। तथा ईशनिंदा कानून की धारा लगी।

उनके साथ गिरफ्तार होने वालों में मास्टर लाल सिंह, शिवनारायण जी वैद्य, विट्ठल दास, मूलचंद ललवानी, भाऊलाल, भगवान दीन, राजेन्द्र वर्मा आदि कुल बारह लोग थे। भाई जी को आयु का लाभ मिला उन्हे छोड़ दिया गया अन्य सभी छै माह बाद ही जेल से छूट सके।

1929 में गाँधी जी की भोपाल यात्रा हुई। बेनजीर मैदान में सभा हुई और वे लोगों से भी मिले। भाई उद्धवदास जी मेहता सहित एक प्रतिनिधि मंडल ने गाँधी जी से भेंट की और उस ईशनिंदा कानून से अवगत कराया जिसके बहाने भोपाल में गैर मुस्लिम समाज पर अत्यचार होने लगे थे।

गाँधी जी सहमत हुये उन्होंने भोपाल नबाब को समझाया और लेख भी लिखा। गाँधी जी सलाह पर नबाब ने वह कानून बदला। इस तरह भाई उद्धवदास जी मेहता की रणनीति और संघर्ष के चलते नबाब को ईशनिंदा कानून बदलना पड़ा।

1931 में भाई जी अपनी पढ़ाई पूरी करके बनारस से भोपाल में लौटे। उन्होंने अपने पूर्वजों की विरासत अपना औषधालय तो संभाला ही साथ ही सामाजिक जाग्रति अभियान भी छेड़ दिया। उन्होंने शिवनारायण जी वैद्य के साथ मिलकर एक संस्था हिन्दु सेवा संघ का गठन किया और एक सामाजिक समरसता सम्मेलन आयोजित किया जिसमें सभी वर्गों, उपवर्गो और जातियों के प्रतिनिधियों को बुलाया और हर मोहल्ले में व्यायाम शालाएँ स्थापित करने का अभियान छेड़ा ताकि असामाजिक तत्वों के हमलों पर स्वयं की सुरक्षा की जा सके। इसी वर्ष भाई जी और कुछ अन्य प्रमुख जनों ने मुम्बई जाकर सावरकर जी भेंट की और भोपाल लौटकर हिन्दु महासभा की इकाई का गठन किया, जिसके मंत्री भाई उद्धवदास जी मेहता बने।

1932 में भाई जी ने मंदिर कमाली परिसर में हनुमान व्यायाम शाला आरंभ की। एक वर्ष के भीतर चार व्यायाम शालाओ की शुरुआत हो गयी, मंदिर कमाली के अतिरिक्त एक व्यायाम शाला बड़बाले महादेव मंदिर, एक लखेरापुरा और एक भोईपुरा में आरंभ हुई। तभी 1934 बीच सड़क से एक महिला के अपहरण और बलात्कार की घटना घटी। भाई जी ने सभाएं कीं आंदोलन शुरु किया। भाई जी सहित सभी व्यायाम शाला संचालक बंदी बना लिये गये। व्यायाम शालाएँ बंद हो गयीं। रिहाई 15 दिन बाद हो सकी।

रिहाई के बाद भाई जी ने तीन काम किये। एक तो पुनः व्यायाम शालायें आरंभ करवाई और दूसरा समाचार पत्र प्रकाशन आरंभ किया। जिसका नाम “प्रजा पुकार” था। भाई जी इसके प्रकाशक बने। इस समाचार पत्र में अंग्रेजों और नबाब शासन के अत्यचारो का समाचार छपते। तीसरा काम एक विशाल हिन्दू सम्मेलन आरंभ किया। वस्तुतः भाईजी की नीति या आंदोलन का रास्ता साम्प्रदायिक नहीं था लेकिन वे भोपाल शासक और अंग्रेजों के समान धार्भिक आधार पर भेदभाव बंद करने और सभी नागरिकों को समान अधिकार के लिये संघर्ष कर रहे थे।

भाई जी पुनः गिरफ्तार हुये और इस बार उन्हें जेल से छूटने में तीन माह लगे। 1936 में प्रजा पुकार में छपे एक समाचार के कारण पुनः गिरफ्तार हुये, इस बार सात दिन बाद जमानत पर रिहा हो सके। 1937 में सभी नागरिकों को समान अधिकार के लिये आंदोलन किया बंदी बनाये गये। इस बार जेल से बाहर आने में छै माह लगे। इस आँदोलन में पुलिस प्रताड़ना के चलते एक आँदोलन कारी भगवान दास राठी का जेल में ही निधन हो गया।

1937 में सामाजिक जागरण के लिये सार्वजनिक रूप से गणपति उत्सव मनाने का निर्णय हुआ लेकिन अनुमति न मिली। तब प्रतीक के तौर पर पीपल चौक में भाई जी ने एक निजी दुकान लेकर गणपति जी की स्थापना की। जिसमें भजन कीर्तन पर तो पाबंदी रही पर दर्शन खुले में होते। फिर 1938 में सार्वजनिक रूप से रंगपंचमी बनाने की तैयारी की गयी। भाई जी पुनः गिरफ्तार हुये और एक माह बाद रिहा हो सके।

1940 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की गई और भाईउद्धवदास जी मेहता नगर संघचालक बने। 1942 में गांधी जी के अव्हान पर सीहोर जाकर अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन का संयोजन किया। इस आँदोलन में सभी राजनैतिक दलों, मत मतान्तरो के लोग समम्लित हुये। गिरफ्तार किये गये।

1946 में मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन में हिन्दु समाज को हुये नुक्सान का व्यौरा तैयार किया और सरदार वल्लभभाई पटेल को सौंपा। इसका विवरण पं जवाहरलाल नेहरु को भी दिया। भाई जी की मुलाकात नेहरु जी न हो सकी विवरण ज्ञापन उनके सचिव को सौंपा। 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ पर भोपाल नबाब ने न केवल भोपाल को स्वतंत्र करने से इंकार कर दिया बल्कि भोपाल रियासत को पाकिस्तान में मिलाने की खुली घोषणा कर दी।

भाई उद्धवदास जी मेहता ने इसके विरुद्ध सीहोर में एक बड़ी बैठक का आयोजन किया। बैठक गौरीशंकर जी समाधिया के निवास पर हुई। संघर्ष के लिये बनी सर्वदलीय समिति के संयोजक भाई उद्धवदास जी मेहता बनाये गये। 1948 में गाँधी जी की हत्या हुई। नबाब को बहाना मिला। फरवरी 1948 में पूरी रियासत में हिन्दु महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संघ से संबंधित लोगों की सामूहिक गिरफ्तारी हुई।

इससे विलीनीकरण आँदोलन में गतिरोध आया। भाई जी रिहाई छै माह बाद रिहा हो सकी। रिहाई के बाद भोपाल रियासत को भारतीय गणतंत्र में विलीन करने के आँदोलन में पुनः जुट गये। भाईजी ने अनशन किया। इस अनशन से चेतना जाग्रत हुई और पूरी रियासत में विलीनीकरण आंदोलन पुनः तीव्र हुआ। अंततः जून 1949 में भोपाल रियासत भारतीय गणतंत्र में विलीन हुई तब भाई जी ने पहली बार हिन्दु उत्सव समिति को व्यवस्थित रूप देकर पीपल के नीचे गणेशोत्सव मनाने की परंपरा आरंभ की और इसी वर्ष सार्वजनिक दशहरा उत्सव को भव्यता मिली।

1956 में मध्यप्रदेश का गठन हुआ तब भोपाल को राजधानी बनाने के लिए भाई जी ने अनशन किया और भाई जी के आग्रह पर डा शंकरदयाल शर्मा ने एक प्रतिनिधि मंडल के साथ नेहरूजी से भेंट की और भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी बना।

1962 में चीन आक्रमण के समय सामाजिक जाग्रति के लिये सर्वदलीय समिति बनी जिसके संयोजक भाई उद्धवदास जी मेहता बनाये गये। इस समिति में काँग्रेस जनसंघ, हिन्दु महासभा आदि सभी राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि थे। 1965 में पाकिस्तानी आक्रमण के समय भी पुनः सर्वदलीय समिति बनीं जिसके संयोजक भाई उद्धवदास जी मेहता ही बने।

1967 में भाईजी हिन्दु महासभा छोड़कर भारतीय जनसंघ के सदस्य बने। श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भोपाल आकर भाई जी को जनसंघ की सदस्यता दिलाई थी। 1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में उनका सम्मान किया। 1973 में महंगाई विरोधी आँदोलन के लिये गठित सर्वदलीय समिति के संयोजक भी भाई उद्धवदास बने।

1975 में आपातकाल लागू हुआ और भाई जी गिरफ्तार कर लिये गये। उन दिनों उनका स्वास्थ्य खराब था। उनकी गिरफ्तारी का समाचार मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी जी को मिला तो उन्होनें तुरन्त रिहा करने के आदेश दिये। भाईजी को गले के कैंसर ने जकड़ लिया था। जिस प्रकार उनका जीवन कभी जेल, तो कभी घर में बीता वैसे ही उनके जीवन का अंतिम समय कभी अस्पताल तो कभी घर में बीता।

1983 के बाद स्वास्थ्य में भारी गिरावट आई। उनका अधिकांश समय बिस्तर पर बीता। उन दिनों उनसे मिलने आने वालों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक बाला साहब देवरस जी, डा शंकरदयाल शर्मा, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी आदि प्रमुख थे और 20 फरवरी 1986 को उन्होने संसार से विदा ली।

भोपाल में भाई उद्धवदास मेहता अकेले ऐसे समाज सेवी थे जिनका आदर राजनैतिक सीमाओं से ऊपर था। हर छोटी बड़ी सामाजिक समस्या पर सभी प्रमुख लोग उन्ही से संपर्क रखते थे और उनकी राय अंतिम हुआ करती थी। ऐसे महान समाज सेवी और स्वाधीनता संग्राम सेनानी भाई जी साहब को शत शत नमन्।

आलेख

श्री रमेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल, मध्य प्रदे

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