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बस्तर की जनजाति का अभिन्न अंग शृंगार

मनुष्य में सौन्दर्य बोध होना एक स्वभाविक गुण है। वह जब भी किसी शृंगारित सुन्दर एवं कलात्मक चीज को देखता है, तो वह उसकी तरफ आकर्षित होता है और तारीफ किये बिना नहीं रहता। हर समय मनुश्य अपने को दूसरे से सुन्दर और श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास करता है। व्यक्ति के रंग, रूप, स्वभाव एवं गुण से व्यक्तित्व का निर्माण होता है, मगर इसे और अधिक सुन्दर बनाने के लिये शृंगार आवश्यक है। शृंगार से आदमी के व्यक्तित्व में निखार आता है।

आदमी जब अपने घर से निकलता है पूरे सज-धज के निकलता है। समाज में उसकी यही पहचान होती है। समाज में पद धारित व्यक्ति की कल्पना उसके पद के अनुरूप की जाती है। पुलिस की कल्पना खाकी वर्दी में ही की जायेगी। समाज के मुखिया की कल्पना एक सभ्रान्त व्यक्ति के रूप में ही की जायेगी, जो स्वभाव से गम्भीर हो हर समय साफ-सुथरे कपड़े पहना हो और सबसे अलग दिखाई देता हो।

इसी तरह समाज में अलग दिखने के लिये शृंगार आवश्यक है। महिलायें शृंगार के प्रति काफी सजग रहती हैं। घर में साधारण सी दिखने वाली महिला जब शृंगार करके निकलती है, तो उसकी सुन्दरता देखते ही बनती है।

बस्तर का जनजातीय समाज शृंगार प्रिय है। समाज के लड़के-लड़कियाँ हर समय शृंगार किये रहते हैं। शृंगार करना इनका शौक है या यह कहना उपयुक्त होगा कि शृंगार करना इनके स्वभाव में होता है। प्रकृति के गोद में निवासरत जनजाति समाज में सौन्दर्य बोध होना स्वभाविक है।

हर ऋतु में प्रकृति अपना अलग-अलग शृंगार करती है। जनजातीय समाज भी प्रकृति का एक अंग है, वह भी प्रकृति के अनुरूप अपने आप को ढाल लेने की कला जानता है। प्रकृति में होने वाले परिवर्तन के साथ रंग की सुन्दरता उसे भी प्रभावित करती है। वह प्रकृति के तरह ही शृंगार करता है।

जनजातीय समाज का व्यक्ति वैसे तो सादगी पसन्द होता है, वह अनावश्यक आडम्बर में पड़ना नहीं चाहता, मगर नवजवान पीढ़ी सजना-संवरना ज्यादा ही पसन्द करती है। नवजवान पीढ़ी के सजने के पीछे आम धारण है कि वे अपने प्रेयसी को रिझाने के लिये शृंगार करते हैं, पर ऐसा नहीं है। वे आम तौर पर सज-धज के रहना पसन्द करते है। लड़के-लड़कियों का एक दूसरे के प्रति आकर्षित होना सहज स्वभाविक है पर इसका सजने से कोई सम्बन्ध नहीं है।

जनजातीय समाज का व्यक्ति अपनी शादी के 8-10 साल बाद शृंगार करना धीर-धीरे छोड़ देता है, इसका कारण है कि इस समय वह समाज का अंग हो जाता है। वह जनजातीय समाज के अन्य लोगों की तरह साधारण वेश-भूषा में रहता है। सिर पर पगड़ी, खुले बदन की जगह शर्ट या बनियान, लंगोटी की जगह लूंगी या धोती, हाथ में ठोस चाँदी का खाड़ू (कड़ा), कान में सोने की बारी (बाली) आदि पहनता है। यह एक साधारण वनवासी व्यक्ति का पहनावा है।

इसी तरह महिलायें भी शादी होने के कुछ समय बाद शृंगार करना कम कर देती हैं। सुहागिन महिलायें हमेशा रंगीन साड़ी पहनती हैं। ब्लाउज का रंग साड़ी से मेल नहीं खाता। साड़ी वे घुटने के नीचे तक बान्धती हैं। हाथ में अँयड़ी और रंगीन काँच की चूड़ी पहनती है। बाँह में बाहटा पहनने का भी चलन है। पैर में पयँड़ी और पैर की उगँलियों में बिछिया पहनती हैं। कान में चाँन्दी या सोने की झुमका पहनती है। नाक मे फूल्ली पहनती है। बाल को करीने से संवारकर पीछे जुड़ा बाँधती हैं और जंगली फूल का गुच्छा अवश्य खोंचती हैं। सुहागिन महिला सूता अवश्य पहनती हैं। सूता एक ठोस चान्दी का गोल बड़ा छल्ला होता है। जो जनजातीय महिलाओं के सुहाग का प्रतीक होता है।

जनजातीय समाज के लोगों का शृंगार करना, सजना-धजना स्वाभाविक गुण है। लड़के-लड़कियाँ अन्य लोगों को दिखाने के लिये नहीं, बल्कि अपने साथियों को रिझाने के लिये शृंगार करते हैं। वे चाहते हैं कि उसका साथी शृंगार से निखरे रूप की प्रशंसा करे। इसी प्रकार अपने शृंगार के दम पर अपने साथियों को रिझाने के लिये शृंगार किया जाता है।

जनजातीय समाज में मनोरंजन के लिये नृत्य किया जाता है। आदिम संस्कृति में नृत्य का पहला स्थान है। ये लोग अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिये नृत्य करते हैं। नृत्य का पहला भाग शृंगार होता है। जिस प्रकार अपने कला के प्रदर्शन के पहले कलाकार आवश्यक तैयारी करता है, उसी प्रकार जनजातीय नवयुवक और नवयुवतियाँ कला प्रदर्षन के पहले अपना शृंगार करते हैं।

लोक नृत्य का शृंगार एक आवश्यक अंग है। जब भी युवक-युवतियों को नृत्य करना होता है। वे पूरी तैयारी के साथ नृत्य स्थान पर आते हैं और नृत्य करने के पहले एक-दो घन्टे तक अपना शृंगार करते हैं। नव युवतियों को शृंगार प्रिय माना जाता है। जनजातीय युवतियाँ तो अपना शृंगार करती ही है, परन्तु समाज के नव युवक भी नृत्य से पहले बड़े मनायोग से अपना शृंगार करते हैं। वैसे दोना पक्ष हर समय श्रृंगार करके रहना पसन्द करते हैं।

लड़कों के शृंगार -: जनजातीय समाज के लड़कों का पहनावा उन्हें अन्य समाज के लोगों से पृथक करता है। सामान्यतः जनजातीय समाज के लड़के सिर में पगड़ी बाँधते हैं। इसे गोंडी में “पागा” कहा जाता है। यह सफेद गमछा होता है या घोती को दो भाग करके उसकी पगड़ी बाँधी जाती है। पगड़ी बाँधने के पहले अपने माथे पर मनिहारी की छोटी-छोटी गुँथी हुई माला की दो-तीन लर को करीने से सजाते हैं, फिर पगड़ी बाँधते है। इन मोतियों की माला का फून्दड़ा दोनो आँख के पास झूलता रहता है, जो देखने में बहुत ही खूबसूरत लगता है। इन मोतियों की माला को “तला कासरा” कहा जाता है।

नृत्य के समय पगड़ी के बीचो-बीच एक कलंगी खोंचते है, जो एक जंगली पक्षी के पँख से बना होता है। इस पक्षी को भृंगराज कहा जाता है। इस पक्षी के दस से बारह पँख को एक लकड़ी में गुँथा जाता है और लकड़ी वाले भाग को मयूर के पँख से सजाया जाता है। भृंगराज पक्षी के पँख, को “जलींग” कहा जाता है। जो गोल घेरे में झूलता है तोे बहुत ही सुन्दर दिखता है। इस कलंगी को “पिड़िया” कहा जाता है।

मुरिया समाज के ये नर्तक कान में सोने की बारी (बाली) पहनते हैं और हाथ में चान्दी का खाड़ू (कड़ा) पहनते हैं। ये लड़के अपने कमर में एक लर का चैन पहनते हैं, जो चान्दी से बना होता है। इसे “नन कौडांग” कहा जाता है। ये लोग गले में छोटी मनिहारी की गुँथी हुई माला पहनते है। यह माथे में सजायी हुई माला ही है, जिसे “तला कासरा” कहा जाता है। यह मनिहारी की माला बस्तर के हाट-बाजारों में मिलती है। इसे खरीदने के लिये ही हाट-बाजार इनके आकर्षण का केन्द्र होते हैं।

नृत्य करने के समय रंगीन बनियान पहनते हैं। साधारणतः इसे बन्डी कहा जाता है। कमर में रंगीन धोती या साड़ी को घाघरा की तरह पहनते हैं, जो मजबूत नाड़े से बाँधा जाता है। नृत्य करने वाले कुछ नर्तक अपने पैरों में घुघँरू पहनते हैं। इस प्रकार लड़के नृत्य करने से पहले अपना शृंगार करते हैं। इस प्रकार के शृंगार लड़के केवल “परांग एन्दना” के समय करते हैं। मांदर बजाकर नृत्य करने को परांग एन्दना कहा जाता है। परांग का अर्थ मांदर और एन्दना का अर्थ नृत्य होता है।

लड़कियों के शृंगार -: जनजातीय समाज की लड़कियाँ, लड़कों से ज्यादा अपना शृंगार करती हैं। वैसे भी लड़कियाँ शृंगार प्रिय होती हैं, पर इस समाज की लड़कियाँ हर समय शृंगारित रहना पसन्द करती हैं। ये मौसमी फूलों को जूड़े में लगाये रहती हैं। इन्हें छोटे मोती की माला बनाने में महारथ हासिल है। ये लोग अपने लिये तो माला बनाती ही हैं। साथ में लड़कों के लिये भी माला जिसे “तला कासरा” कहा जाता है, लड़कियाँ ही बनाती हैं।

लड़कियाँ बाल को करीने से संवारने के बाद अपने माथे पर दो-तीन लर तला कासरा का माला माथे पर सजाती हैं। इन मालाओं का फून्दड़ा दोनो आँखो के किनारे झूलता रहता है। जो इनकी सुन्दरता को दुगुनी कर देता है। बाल संवारने के बाद पीछे की ओर बालों जूड़ा का बनाती हैं आजकल उसमें झब्बा बाँधती हैं। इस जूड़े में लाल फीता का फूल बनाकर गजरा जैसा सजाती हैं।

जंगली फूलों की माला बनाकर गजरा लगाती हैं। इसे गोंडी में “कौडांग” कहा जाता है। आँख और कान के बीच में चाँदी का दोनो ओर क्लिप लगाती हैं। इसे गोंडी में “किलीपिंग” कहा जाता है। जूड़े के ऊपर छोटी कँघी खोंचती हैं; इसे हल्बी में “ककुआ” या “पनीया” और गोंडी में “पिड़िया” कहा जाता है। यह लकड़ी या जर्मन का होता है। लकड़ी की पिड़िया लड़कियों के लिये लड़के तला कासरा माला बनाने के एवज में बनाते हैं।

लड़कियाँ अपने कान में बाली पहनती हैं। इसे गोंडी में “नेड़” कहा जाता है। आजकल झूमका पहनने का भी चलन है। यह चाँदी या सोने का होता है। वैसे लड़कियाँ चाँदी के गहने ज्यादा पसन्द करती हैं। नाक में नथनी पहनती हैं। इसे हल्बी में “खिंलवाँ” और गोंडी में “डेमो” कहा जाता है। यह प्रायः सोने का ही होता है। गले में तला कासरा का माला पहनती हैं।

आजकल मनिहारी मोती की माला कई रंगों में आने लगी है, जो इन्हें खूब भाती है। इससे कई तरह से माला बनाकर गले में पहनती हैं। दोनों हाथों में रंगबिरंगी काँच की चूड़ी पहनती हैं इसे गोंडी में “सूड़िंग” कहा जाता है। चूड़ी के ऊपर चाँदी का कड़ा पहनती हैं। इसे हल्बी में “अँयड़ी” और गोंडी में “अयड़िंग” कहा जाता है। हाथ की कोहनी के ऊपर बाजूबँध पहनती हैं। इसे हल्बी में “बांहटा” और गोंडी में “डांड बाहटांग” कहा जाता है। यह ठोस चाँदी का बना होता है।

लड़कियाँ साड़ी ब्लाउज पहनती हैं। साड़ी को घुटने तक बाँधती हैं और ब्लाउज सफेद, लाल या काले रंग का पहनती है। साड़ी का रंग लाल ही होता है। साड़ी को “लुगा” या “गतला” तथा ब्लाउज को “जम्फर” कहा जाता है। हाथ की छोटी उँगली को छोड़कर सभी उँगलियों में छल्ला पहनती हैं। यह चाँदी का होता है। जब इसे हाथ की उँगलियों में पहना जाता है, तब इसे “कैय मुंदांग” कहा जाता है।

मुरिया समाज की लड़कियाँ नृत्य के समय अपना नख से शिख तक शृंगार करती है। पैर में पायल पहनती हैं इसे हल्बी में “पँयड़ी” और गोंडी में “सूडांग” कहा जात है। सूडांग आम पायल या पाजेब की तरह नहीं होता, यह ठोस काँसे से बना होता है। इसे पायल पहनने की जगह से थोड़ा ऊपर पहना जाता है। पैर की छोटी उँगली को छोड़कर सभी उँगलियों में बिछिया पहनती हैं। जब इसे पैर में पहना जाता है, तब इसे “काल मुदांग” कहा जाता है। यह नृत्य करने के समय का शृंगार है।

इसके बाद भी युवतियाँ इसी प्रकार सज-धज के रहना पसन्द करती हैं। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि जनजातीय युवतियाँ ही शृंगार करती हैं। सुहागिन महिलायें शृंगार कम ही करती हैं या यह कहिये वे सादगी से रहती हैं। जिस प्रकार साहित्य और शास्त्रों में सोलह श्रृंगार का वर्णन है, उस तरह से सुहागिन महिलाये शृंगार नहीं करती। सोलह शृंगार में वर्णित शृंगार का सुहागिन महिलाओं के शृंगार से दूर-दूर तक सम्बन्ध नहीं है।

सोलह शृंगार में मंजन और स्नान को भी शृंगार का अंग माना गया है। स्नान से पूर्व किसी भी तरह का उबटन जनजातीय सुहागिन महिलायें नहीं लगाती हैं। साफ-सफाई से रहना प्रत्येक महिला का स्वभाव है। वे हर समय सफाई से रहती हैं। बिन्दिया और सिन्दूर सुहागिन महिलायें नहीं लगाती हैं।

जनजातीय समाज में दुल्हन का कोई खास परिधान होता नहीं है। सफेद रंग की साड़ी और किसी भी रंग के ब्लाउज में शादी सम्पन्न होती है। इसलिये सुहागिन महिलायें विवाह के बाद में रंगीन साड़ी ब्लाउज पहनती हैं। कान में झुमका पहनती हैं, यह सोने या चाँदी का होता है। नथनी की बजाय नाक में फुल्ली पहनती है। हार की जगह चाँदी का ठोस सुता पहनती हैं। यह सुहागिन महिलाओं की पहचान है।

चूड़ी भी सुहागिन महिलाये पहनती हैं। यह रंगीन चुड़ियाँ होती हैं और इनके साथ अँयड़ी जो ठोस चाँदी का होता है, पहनती हैं। सुहागिन महिलाये जिस प्रकार पाजेब पहनती हैं उसी प्रकार जनजातीय सुहागिन महिलाये पयँड़ी पहनती हैं। इसके अलावा जनजातीय सुहागिन महिलायें पैर की उँगलियों में बिछिया पहनती है।

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