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गोवा मुक्ति संग्राम में छत्तीसगढ़ की भूमिका एवं योगदान

कैसी विडेबना रही कि स्वतंत्र भारत के 14 वर्षों तक एक बड़ा भू-भाग पुर्तगाल के अधीन रहा। 19 दिसंबर 1961 का वह दिन था जब पणजी में तिरंगा लहराया। उससे पहले स्थानीय निवासियों पर अनेक तरह के प्रतिबंध थे, सेंसरशिप का आलम तो यह था कि विवाह के निमंत्रण पत्रों की भी कड़ी पड़ताल होती थी, इस डर से कि उसमें विद्रोह के संदेश गुप्त रूप से तो नहीं दिए जा रहे हैं। 1946 में डॉ. राममनोहर लोहिया गोवा आए। प्रतिबंधों को ठोकर मार कर उन्होंने सभा कर पुर्तगाल सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत कर दी। डॉ. लोहिया को गिरफ्तार कर मडगांव जेल में डाल दिया गया। इस घटना से गोवा की आजादी के संघर्ष को तीव्रता मिली। देश भर में आवाजें उठने लगी। तत्कालीन भारत सरकार ने भी कुछ कड़े कदम उठाए। पर, आज सवाल लाजिमी है कि आखिर 14 वर्षों तक नेहरू सरकार किन कारणों से हाथ बांधे बैठी थी? क्यों गुलाम गोवा का दर्द उन्हें महसूस नहीं हो रहा था?

बहरहाल, बातचीत से बात नहीं बनी तब 17-18 दिसंबर 1961 की मध्य रात्रि भारतीय सेना गोवा पहुंची। मात्र 40 घंटे के ‘ऑपरेशन विजय’ के बाद पणजी में 2 सिख इंफेंट्री ने तिरंगा फहरा दिया। पुर्तगालियों ने घुटने टेकते हुए वास्को के आत्मसमर्पण कर दिया। पुर्तगाली गवर्नर मैनुएल वसेलो ई सिल्वा ने दस्तावेजों पर दस्तखत किए। भारत की तरफ से ब्रिगेडियर एस. एस. ढिल्लों ने उनका आत्मसमर्पण स्वीकार किया था। उस अभियान में भारत के 35 जवान शहीद हुए और 55 घायल। अगुड़ा किले पर कब्जा करते हुए मेजर एस. एस. संधू ने भी बलिदान दिया। भारतीय सेना के 40 घंटे के युद्ध ने गोवा पर 450 साल से चले आ रहे पुर्तगाली शासन का खात्मा कर दिया और गोवा भारतीय गणतंत्र का अंग बन गया। 1962 में वहां चुनाव हुए। 20 दिसम्बर 1962 को दयानंद भंडारकर पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। इस बीच गोवा के महाराष्ट्र में विलय की भी चर्चा चली। 1967 में जनमत संग्रह हुआ तब गोवा के लोगों ने केंद्र शासित प्रदेश के रूप में रहना पसंद किया। 30 मई 1987 को गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। इस तरह गोवा भारतीय गणराज्य का 25वां राज्य बना।

छत्तीसगढ़ की भूमिका

स्वाधीनता संग्राम में छत्तीसगढ़ की भूमिका रेखांकित किए जाने योग्य रही है। 1857 से पहले भी यहां के निवासियों ने मातृभूमि पर विदेशी हस्तक्षेप का तीव्र विरोध किया था। विशेष रूप से आदिवासियों ने अपनी अस्मिता और स्वाभिमान की रक्षाके लिए कड़ा संघर्ष मराठों और अंग्रेजों के विरुद्ध किया था। जिनमें सरगुजा के अजित सिंह, संग्राम सिंह, गैंद सिंह, नारायण सिंह, गुण्डा धूर के नाम सम्मान के साथ स्मरण किए जाते हैं। ऐसे पूर्वजों की संतानों ने संघर्ष को तब तक ज्वलंत बनाए रखा जब तक कि देश स्वतंत्र न हो गया। ऐसे स्वाधीनता संग्राम सेनानियों को यह कैसे मंजूर होता कि देश का एक अंग पराधीनता की बेडिय़ों में जकड़ा रहे। डॉ. राममनोहर लोहिया के आह्वान के बाद गोवा-मुक्ति संग्राम में हिस्सा लेने के लिए देश भर से सत्याग्रही उमडऩे लगे।

गोवा की आजादी के लिए छटपटाहट छत्तीसगढ़ में भी थी। रायपुर से 5 अगस्त 1955 को ठाकुर हरिनारायण सिंह (हरि ठाकुर), रामाधार तिवारी, राजेश्वर गिरी, रामदयाल (पहलवान), प्रतापचंद जैन, रामनारायण गुप्ता, श्यामलाल पराशर और घनश्याम ठाकुर (राजिम) सहित रायपुर जिले से 8 सत्याग्रही शाम की ट्रेन से नागपुर रवाना हुए। उन्हें तत्कालीन विधायक द्वय डॉ. खूबचंद बघेल और ठाकुर रामकृष्ण सिंह, कमलनारायण शर्मा, नारायण दास राठौर ने विदा किया, जो रायपुर की गंज मंडी परिसर से जुलूस के रूप में स्टेशन पहुंचा। दुर्ग से इस दल के साथ केयूर भूषण, माधव राव तामस्कर, शरद रायजादा भी शामिल हो गए। रायपुर का यह दल 9 अगस्त की सुबह वर्धा, धामनगांव, यवतमाल होते 10 अगस्त को अमरावती पहुंचा। तारीख 11 को वे अमरावती से शेगांव रवाना हुए। 12 को पूना, 13 को बेलगांव पहुंच गए। अगला पड़ाव 15 अगस्त को गोवा था। गोवा जाने वालों में दुर्ग के गांधीराम साहू और बालाराम जोशी भी थे।

15 अगस्त गोवा में

 15 अगस्त की सुबह 8.30 बजे सिवनी के विधायक और दल के नेता अब्दुल रहमान फारूकी ने जत्थे के चुने हुए सत्याग्रहियों की गुप्त बैठक बुलाई। इस बैठक में छत्तीसगढ़ की ओर से हरि ठाकुर को भी बुलाया गया था। हरि ठाकुर सहित 15 लोगे जत्थे के अग्रिम पंक्ति में तैनात किए गए। 15 अगस्त को लगभग 10 बजे वे भारत के अंतिम गांव कणकुंभी में तिरंगे को सलामी देकर गोवा की ओर रवाना हुए। नदी के उस पार था गोवा का पहला गांव सुरल। नदी पार कर कुछ ही आगे कदम बढऩे पर पोर्तुगीज फौज ने गोलियों की बौछार शुरू कर दी। दस मिनट तक पोर्तुगीज बंदूकें गोलियां बरसाती रहीं। जत्थे के 7 लोगों को गोलियां लगीं। फायरिंग बंद होने के पश्चात दल फिर गांव की ओर बढ़ा। गांव के अंदर घुसते ही बंदूकधारी फौजियों ने सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें पीटते हुए पुलिस चौकी के सामने के छोटे मैदान में ले जाकर बैठाया गया। इस बीच अनवरत वर्षा जोरों से हो रही थी। बारिश और ठंड के कारण सब कांप रहे थे। उनके सामान छिन लिए गए। शरीर पर सिर्फ एक कपड़ा ही छोड़ा गया। पिटाई में कईयों की हड्डियां टूट गई थीं। जमीन में कीचड़ था, वहीं आंदोलनकारियों को 9 बजे रात्रि तक बरसते पानी में बैठे रहना पड़ा। कोर्ट मार्शल की कार्यवाही के बाद सभी को एक छोटे से जर्जर चर्च में भेड़-बकरियों की तरह ठूंस कर खिड़की और दरवाजे को बंद कर दिए गए। थोड़ी ही देर के बाद बंदियों का दम घुटने लगा, कई तो बेहोश भी हो गए। जमीन पर तिल धरने की जगह नहीं थी इसलिए 15-20 सत्याग्रही म्याल को पकड़ कर लटके हुए थे। बोझ से म्याल भी टूट गया। उन लोगों के गिरने से कई सत्याग्रहियों के कंधे टूटे और बहुतों के गर्दन में गंभीर चोट लगी। इसी चर्च में वे लोग भी थे जिन्हें गोलियों लगी थीं। आखिरकार 5-6 घंटे के बाद सत्याग्रहियों को बाहर निकाला गया। सुबह से रात तक तमाम सत्याग्रही भूखे तो थे ही उन्हें पानी की एक बूंद भी नहीं दी गई।

पुर्तगाल फौज की कैद से रिहा होकर सत्याग्रही 20 अगस्त को नागपुर पहुंचा, वहां एक दिन रुककर 21 अगस्त को शाम के तीन बजे मेल से रायपुर पहुंचे। गोवा मुक्ति सेनानियों के स्वागत के लिए रायपुर स्टेशन में अपार भीड़ थी। रास्ते भर उनका स्वागत होता रहा। स्टेशन से शाम 6 बजे जुलूस गांधी चौक मैदान पहुंचा। सभा रात के 9 बजे तक चलती रही। अगले दिन शहीद सत्याग्रहियों की अस्थियां लेकर रामाधार तिवारी राजिम गए। त्रिवेणी में अस्थि विसर्जन के बाद राजिम में सभा हुई। जिसमें रामाधार तिवारी, घनश्याम ठाकुर और राजेश्वर गिरी ने अपने संस्मरण सुनाए, डॉ. खूबचंद बघेल और कमलनारायण शर्मा ने सभा को संबोधित किया। पन्नालाल अग्रवाल ने सभा की अध्यक्षता की थी।

छत्तीसगढ़ के गोवा मुक्ति-योद्धा

गांधी राम साहू

दुर्ग जिले के ग्राम अण्डा में 20 जुलाई 1924 को गांधीराम साहू का एक किसान परिवार में जन्म हुआ। उन्होंने प्राथमिक तक शिक्षा प्राप्त की थी। वे महात्मा गांधी से प्रभावित होकर राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हुए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उनकी सक्रिय सहभागिता रही। 15 अगस्त 1955 को वे भी गोवा की स्वाधीनता के लिए गए दल में शामिल थे। वे आजीवन अखिल भारतीय गोवा सेनानी संघ के सदस्य रहे। गोवा की आजादी के बाद वे अपने पैतृक गांव सरेखा में बस गए। वे सामाजिक भेदभाव के प्रबल विरोधी और समतामूलक समाज के पक्षधर थे। उनका अधिकांश समय समाज सेवा में ही व्यतीत होता था। 15 मई 1992 को उनका देहावसान हुआ।

बालाराम जोशी

बालाराम जोशी का जन्म चैत्र बदी 12, विक्रम संवत 1880 (सन् 1924) को दुर्ग में हुआ। सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जोशी जी ने जन-जागरण के उद्देश्य से गांव-गांव कांग्रेस का प्रचार किया। वे शम्भूदयाल मिश्रा के साथ ग्राम अर्जुन्दा में हुए सत्याग्रह में भाग लिया। 12 अगस्त 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर रायपुर जेल भेज दिया गया। किन्तु एक दिन के बाद ही रिहा भी कर दिया गया। देश तो 1947 में आजाद हो गया था पर भारत का एक हिस्सा गोवा पुर्तगाल के कब्जे में था। 1955 में गोवा की आजादी का शंखनाद हो गया। बालाराम जोशी डॉ. पाटणकर, बच्छराज व्यास एवं महादेव प्रसाद तिवारी के साथ गोवा आंदोलन में भाग लिया। श्री जोशी के अनुसार गोव मुक्ति आंदोलन में 84 सत्याग्रही शहीद हुए और सैकड़ों विकलांग हो गए, अनेक लोगों की आंखें फोड़ दी गई। जोशी जी गोवा स्वतंत्रता सेनानी संघ (म. प्र.) के कार्यकारिणी के सदस्य रहे। वे अखिल भारतीय गोवा मुक्ति आंदोलन के महाराष्ट्र-म. प्र., छत्तीसगढ़ के महासचिव, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संघ, दुर्ग के सचिव, प्रांतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संघ के कार्यकारिणी के सदस्य और रायपुर के शहीद स्मारक भवन निर्माण के लिए गठित समिति के भी सदस्य रहे। 28 अगस्त 2012 को बालाराम जोशी का दुर्ग में देहावसान  हो गया।

शरद रायजादा

शरद रायजादा का जन्म दुर्ग में 2-10-1926 को हुआ। उन्होंने म्यूनिसिपल एंग्लो वर्नाकुलर मिडिल स्कूल से कक्षा 8वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद पढ़ाई पर विराम लग गया। 1943 में में शरद रायजादा का चयन नौसेना (15845) में हो गया। किन्तु उन्हें सन 1946 में सेवा से निकाल दिया गया। इसके मूल में उनका नौसेना विद्रोह में शामिल होना था। नौसैनिकों ने ‘आजाद हिन्दÓ नामक एक संघ की स्थापना कर की। एक दिसम्बर 1945 को नौसेना दिवस मनाया जाने वाला था उसी दिन को इन सैनिकों ने विद्रोह के लिए चुना और आगे चलकर सैनिकों को मिलने वाले खराब भोजन को लेकर हड़ताल, विरोध, संघर्ष और देश की स्वतंत्रता के नारों के साथ यह नारा भी लगाया कि ‘अंग्रेजों को मारो।’ नौ सैनिक क्रांति 18 फरवरी से प्रारंभ होकर 23 फरवरी 1946 तक चला। 22 फरवरी 1946 को सरदार पटेल ने सभी पक्षों से शांति की अपील की। संघर्ष तो शांत हो गया किन्तु नौसेना के अधिकांश सैनिक इस संघर्ष में शामिल होने के बहाने सेवा से अलग कर दिये गये। ऐसे ही सैनिकों में शरद रायजादा भी थे। 30 जनवरी 2007 को उनका देहांत हुआ।

रामाधार तिवारी

रायपुर के रामाधार तिवारी उन स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में रहे जिन्होंने न सिर्फ 1942 के आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत के नाक में दम कर रखा था बल्कि जब गोवा को पुर्तगालियों के पंजे से आजाद कराने के लिए संघर्ष प्रारंभ हुआ तब भी वे उसमें सम्मिलित हुए और अमानवीय यातनाओं का सामना किया था। उनका जन्म 16 अगस्त 1926 को वर्तमान अभनपुर तहसील के ग्राम पौंता में हुआ था। रामाधार तिवारी छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए थे। 1942 के आंदोलन में  किशोरवय के तिवारी जी के अनेक हमउम्र रोज चर्चिल का जनाजा बनाकर शहर भर में नारेबाजी करते हुए घुमाते थे। उनमें हरि ठाकुर, केयूर भूषण, पंकज तिवारी और डॉ. महादेव प्रसाद पांडेय प्रमुख थे। अव्वल तो ये लोग पकड़े नहीं जाते थे, अगर कभी पुलिस ने पकड़ा तो उन्हें लारियों में बैठाकर कुम्हारी या माना तक ले जा कर छोड़ दिया जाता था। तिवारी जी बढ़ती गतिविधियों से परेशान ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उन्हें 7 माह के कारावास की सजा हुई।

रामाधार तिवारी पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के प्रबल हिमायती थे। वे उन सौभाग्यशालियों में थे जो इस मांग की शुरूवात से ही सक्रिय थे और अपने सपने को साकार होते हुए भी देखा। स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के लिए क्रांति दिवस 9 अगस्त को राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा, डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, प्रतिभा देवी सिंह पाटील, और प्रणब मुखर्जी ने 2014 तक उन्हें सम्मानित किया। 28 अक्टूबर 2014 को उनका स्वर्गवास हुआ।

हरि ठाकुर

हरि ठाकुर का जन्म 16 अगस्त 1927 को रायपुर में हुआ था। उनका पूरा नाम ठा. हरिनारायण सिंह था। 1942 के आंदोलन में गवर्नमेंट स्कूल में झंडा फहराने के कारण हरि ठाकुर को गिरफ्तार कर कोतवाली में बैठा दिया गया, यद्यपि उन्हें शाम को रिहा भी कर दिया गया लेकिन उनकी गतिविधियां जारी रही। प्राचार्य सहगल ने दो-तीन बार शिकायत भी भेजी और आखिरकार स्कूल से नाम भी काट दिया। छुट्टियों में ब्राह्मणपारा की गलियों में चर्चिल के पुतले का जनाजा निकालते, पुतला जलाते और नारेबाजी करते। पुलिस के आते तक सारे किशोर गायब हो जाते थे। वे कभी पकड़े नहीं जा सके। 1956 में उन्होंने इतिहास के पन्नों से नारायण सिंह की खोज की और उन्हें 1857 के छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद के रूप में प्रतिष्ठित किया। 1967 में डॉ. खूबचंद बघेल ने छत्तीसगढ़ भ्रातृसंघ का गठन किया। संगठन में उन्हें महासचिव बनाया गया। 1992 में छत्तीसगढ़ राज्य के लिए पुन: संगठित होने के उद्देश्य से हरि ठाकुर के घर में आयोजित बैठक में सर्वदलीय मंच के गठन के लिए हरि ठाकुर को संयोजक बनाया गया। वे मंच के अध्यक्षीय मंडल में भी शामिल किए गए। हरि ठाकुर विख्यात साहित्यकार थे। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में उनकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें काव्य संग्रह और छत्तीसगढ़ से संबंधित शोध परक आलेख हैं। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर पीएचडी की उपाधियां दी गई हैं तथा एमए हिन्दी व इतिहास विभाग के छात्रों ने उन पर लघु शोध प्रबंध भी लिखे। 3 दिसंबर 2001 को उनका देहांत हुआ।

केयूर भूषण

केयूर भूषण का जन्म 1 मार्च 1928 को बेमेतरा जिले के जांता गांव में हुआ था। प्राइमरी की पढ़ाई के बाद वे रायपुर आ गए। केयूर भूषण के हमउम्र अनेक किशोर आंदोलन की गतिविधियों में संलग्न थे। जुलूस निकालना, चर्चिल का जनाजा निकाल कर जलाना जैसे कार्य रोज होते थे। केयूर भूषण भी उनके साथ शामिल होने लगे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे रोज 20-25 सहपाठियों के साथ ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा लगाते हुए जुलूस निकालते थे। इसी क्रम में एक दिन वे सिटी कोतवाली पहुंच गए, वहां एडीएम जे. डी. केरावाले से कहने लगे कि आप सरकारी नौकरी छोड़ दें। देश आजाद हो जाएगा तब आपको इससे भी अच्छी नौकरी मिल जाएगी। केरावाले ने केयूर भूषण को कोतवाली की कोठरी में बंद करवा दिया। थोड़ी देर बाद उन्हें नसीहतों के साथ घर भेज दिया। लेकिन एक दिन वे फिर जुलूस निकालते हुए पकड़े गए, इस बार उन्हें गिफ्तार कर 7 माह 15 दिन के लिए जेल भेज दिया गया। वे उस समय जेल जाने वाले सबसे कम उम्र के सेनानी थे।

1956 से ही वे छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए चले सभी आंदोलनों में शामिल रहे। वे सर्वोदय और अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ के रचनात्मक कार्यक्रमों के वे महत्वपूर्ण अंग थे। उनकी सक्रियता को सम्मान देते हुए कांग्रेस ने उन्हें रायपुर लोक सभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया। वे चुनाव में विजयी हुए। अगली बार भी वे ही कांग्रेस की टिकट पर रायपुर के सांसद निर्वाचित हुए।

केयूर भूषण जाने-माने साहित्यकार भी थे। उनके दर्जनभर से अधिक काव्य संग्रहों, उपन्यासों, कहनी संग्रहों का प्रकाशन हो चुका है। पत्रकार के रूप में उन्होंने उन्होंने साप्ताहिक छत्तीसगढ़, साप्ताहिक छत्तीसगढ़ संदेश, त्रैमासिक हरिजन सेवा (नई दिल्ली) और मासिक अन्त्योदय (इंदौर) का संपादन भी किया। 

मोजेस मूलचन्द

गोवा मुक्ति आंदोलन के प्रमुख सेनानी और मजदूर नेता कामरेड मोजेस मूलचंद का जन्म 1929 को टांका पारा वार्ड नंबर 15 राजनांदगांव में हुआ था। उन्होंने हाईस्कूल तक की शिक्षा प्राप्त की थी। श्री मोजेस मूलचन्द ने 2 अगस्त 1955 को गोवा मुक्ति आंदोलन में ठाकुर रंजीत सिंह के नेतृत्व में 100 सेनानियों के साथ सक्रियता के साथ भाग लिया था और लक्कड़कोट पुलिस चौकी में तिरंगा झंडा फहराया था।

21 सितंबर 1981 को श्री मोजेस राजनांदगांव से दल्ली राजहरा जा रहे थे। रास्ते में शिकारी टोला नाला उफान पर था। मोजेस ने बस चालक को कोई जोखिम न लेते हुए नाला पार न करने की सलाह दी। इसके बावजूद चालक ने बस को उफनते हुए नाले में उतार दिया। पानी के तेज बहाव के कारण बस हिचकोले खाने लगी। ऐसी विषम स्थिति में मोजेस ने अपनी जान की बाजी लगाकर बस को एक वृक्ष से बांध दिया और एक-एक कर 19 यात्रियों को बस से बाहर निकाला। इस बीच बस पलट गई और मोजेस उसके नीचे फंस गए। वे अपनी जान नहीं बचा पाए और शहीद हो गए।

1974 में मास्को कम्युनिस्ट पार्टी के आंमत्रण पर उन्होंने सोवियत संघ की यात्रा की। वे नगर पालिका परिषद राजनांदगांव टांका पारा वार्ड के प्रथम पार्षद भी निर्वाचित हुए थे।

नंदकुमार पाठक

नंद कुमार पाठक की गणना प्रदेश के प्रखर पत्रकारों में होती है। चूंकि वे अंग्रेजी समाचार पत्रों के संवाददाता और संपादकीय सहयोगी रहे इसलिए आम पाठक उनकी शोहरत से अपरिचित ही रह गए। 6 दिसंबर 1928 को उनका जन्म मंडला में हुआ था। वे छात्र जीवन में ही कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होकर दल के सदस्य बन गए थे। स्व. पाठक 1965 से 1973 तक नई दिल्ली के अखबार ‘पैट्रियाट’ के संवाददाता नियुक्त हुए। 1974 में उन्हें अंग्रेजी समाचार पत्र ‘एमपी क्रॉनिकल’ का सह संपादक नियुक्त किया गया।

1972 में राजनैतिक मतभेद के कारण उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गए। स्व. पाठक को 1978 में शहर जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। इसी वर्ष उन्हें फिर एमपी क्रानिकल से निमंत्रण आया, जिसे पाठक जी ने स्वीकार कर लिया। साल 1980 में उन्होंने अखबार से त्याग पत्र देकर रायपुर के मेयर का चुनाव लड़ा। दुर्भाग्य से वे केवल एक वोट से हार गए।

जब वे स्नातकोत्तर के छात्र थे, उसी समय 1955 में गोवा मुक्ति के लिए आंदोलन प्रारंभ हो गया। छात्र नंदकुमार पाठक जबलपुर के सत्याग्रहियों के दल में सम्मिलित हुए। वे मृत्यु पर्यंत एमपी क्रानिकल से जुड़े रहे। 24 मई 1989 को उनका देहावसान हो गया।

आलेख

श्री आशीष सिंह ठाकुर
वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार, रायपुर, छत्तीसगढ़

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