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छत्तीसगढ़ी के प्रथम नाटक के रचयिता : पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय

छत्तीसगढ़ के मनीषी साहित्यकारों में बहुमुखी प्रतिभा के धनी पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय का नाम प्रथम पंक्ति में अमिट अक्षरों में अंकित है। हिंदी और छत्तीसगढ़ी साहित्य को उनके अवदान का उल्लेख किए बिना प्रदेश का साहित्यिक इतिहास अपूर्ण ही माना जाएगा।

कवि, कहानीकार, इतिहासकार और पुरातत्वविद तो वह थे ही, उन्हें छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला नाट्य लेखक भी माना जाता है। आज से लगभग 117 साल पहले उनका लिखा छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला नाटक ‘कलि काल वर्ष 1905 में छपा था। आज उनकी जयंती है।

लोचन प्रसाद जी का जन्म बिलासपुर राजस्व संभाग में महानदी के किनारे ग्राम बालपुर में 4 जनवरी 1887 को हुआ था। निधन 8 नवम्बर 1959 को हुआ। यह गाँव पहले बिलासपुर जिले में था । अब जांजगीर -चाम्पा जिले के अंतर्गत है। उनका गाँव बालपुर जिला मुख्यालय रायगढ़ के समीप है।

पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय, आधुनिक हिन्दी काव्य जगत में छायावाद के प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध और पद्मश्री सम्मानित स्वर्गीय मुकुटधर पाण्डेय के बड़े भाई थे। साहित्य के क्षेत्र में रायगढ़ और छत्तीसगढ़ का नाम रौशन करने में पांडेय बंधुओं का ऐतिहासिक योगदान रहा है।

लोचनप्रसाद पांडेय आठ भाइयों और चार बहनों के विशाल परिवार में अपने पिता पंडित चिंतामणि पांडेय के चौथे सुपुत्र थे। आधुनिक हिन्दी साहित्य का वह उद्भव काल था, जब लोचनप्रसाद पाण्डेय और उनके छोटे भाई मुकुटधर पाण्डेय की रचनाएं देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपने लगी थीं।

लोचन प्रसाद जी हिन्दी, छत्तीसगढ़ी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी और ओड़िया भाषाओं के विद्वान थे। वर्ष 1905 में प्रकाशित उनके छत्तीसगढ़ी नाटक ‘कलि -काल’ को छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला नाटक माना जाता है।

डॉ. विनय कुमार पाठक ने वर्ष 1971 से 1977 के बीच तीन संस्करणों में छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित अपने लघु शोध ग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार’ में छत्तीसगढ़ी नाट्य और एकांकी साहित्य की भी चर्चा की है।

उन्होंने लिखा है – सन 1905 के पंडित लोचन प्रसाद पांडेय के ‘कलिकाल’ पहिली नाटक माने जा सकत हे, जेखर भासा म लरिया के छाप हे।” उल्लेखनीय है कि ‘लरिया ‘ छत्तीसगढ़ी की एक उप बोली है, जो ओड़िशा से लगे हुए छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों में प्रचलित है।

पांडेय जी का जन्म ग्राम बालपुर और उनकी कर्मभूमि रायगढ़ भी ओड़िशा के सरहदी इलाके में स्थित है। इसलिए उनके लिखे इस छत्तीसगढ़ी नाटक की भाषा में में ‘लरिया ‘का असर होना बहुत स्वाभाविक है।

उनका हिन्दी उपन्यास ‘दो मित्र’ वर्ष 1906 में प्रकाशित हुआ। उनकी अन्य पुस्तकों में वर्ष 1910 में प्रकाशित ओड़िया काव्य संग्रह ‘महानदी’ भी उल्लेखनीय है। इन्हें मिलाकर विभिन्न साहित्यिक विधाओं में उनकी लगभग 40 पुस्तकों का प्रकाशन हुआ।

इनमें तीन ओड़िया भाषा की और चार अंग्रेजी भाषा की किताबें भी शामिल हैं। लोचन प्रसाद जी इतिहास और पुरातत्व के भी विद्वान थे। उन्होंने वर्ष 1923 में छत्तीसगढ़ गौरव प्रचारक मण्डली की भी स्थापना की थी, जो आगे चलकर ‘महाकौशल इतिहास परिषद’ बनी।

लोचनप्रसाद जी ने छत्तीसगढ़ के इतिहास और पुरातत्व को देश और दुनिया के सामने लाने के लिए भी अथक परिश्रम किया। अपने गहन अध्ययन और अपनी खोजी नज़र से उन्होंने कई प्राचीन ताम्रपत्र और शिलालेख आदि ढूँढ़ निकाले। उन्होंने रायगढ़ जिले में सिंघनपुर और करमागढ़ की पहाड़ी गुफाओं में आदि मानवों द्वारा हजारों वर्ष पहले उकेरे गए शैल चित्रों का भी गहन अध्ययन किया था।

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध पत्रकार और दैनिक ‘रायगढ़ संदेश’ के संस्थापक और सम्पादक रहे स्वर्गीय गुरुदेव काश्यप ने अपने एक आलेख में लिखा है –“सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता और पुरातत्वज्ञ (स्व.) पं. लोचन प्रसाद पांडेय ने विष्णु यज्ञ स्मारक ग्रंथ, रतनपुर में संकलित अपने लेख में दावे के साथ कहा है कि वर्तमान छत्तीसगढ़ अर्थात महाकौशल मनुष्य जाति की सभ्यता का जन्म स्थान है।आर्य और द्रविड़ों की संस्कृति का प्रसार होने के पूर्व यह अंचल कोल, निषाद सभ्यता का एक प्रमुख केन्द्र रहा है।”

पंडित लोचन प्रसाद पांडेय को वर्ष 1948 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा अपने मेरठ अधिवेशन में ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से सम्मानित किया था। इसके पहले ओड़िशा की तत्कालीन बामुंडा रियासत के नरेश ने उन्हें वर्ष 1912 में ‘काव्य विनोद’ की उपाधि से विभूषित किया। प्रांतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन गोंदिया में उन्हें ‘रजत मंजूषा’ सम्मान से अलंकृत किया गया।

आलेख

श्री स्वराज करुण,
वरिष्ठ साहित्यकार एवं ब्लॉगर रायपुर, छत्तीसगढ़

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