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अयोध्या के राम लला एवं रामानंदी सम्प्रदाय

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने राम मंदिर में प्राणप्रतिष्ठा के बाद प्रतिदिन की पूजा सेवा, निमित्त उत्सवों आदि को रामानंदी पद्धति से करना तय किया है। यह संप्रदाय रामभक्ति की विभिन्न धाराओं व शाखाओं के बीच समन्वय, वर्ण-विद्वेष को दूरकर राममय होकर तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे छूआछूत, ऊंच-नीच और जात-पात, स्त्री-पुरुष भेद आदि का विरोध करने के लिए जाना जाता है।

रामानंदी सम्प्रदाय, बैरागियों के चार सम्प्रदायों में अत्यन्त प्राचीन सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय को बैरागी सम्प्रदाय, रामावत सम्प्रदाय और श्री सम्प्रदाय भी कहते हैं। इस सम्प्रदाय का सिद्धान्त विशिष्टाद्वैत कहलाता है। काशी में स्थित पंचगंगा घाट पर रामानंदी सम्प्रदाय का प्राचीन मठ बताया जाता है।

भारत में वैष्णव साधुओं व संन्यासियों के इस सबसे बड़े संप्रदाय को मध्यकाल में स्वामी रामानंद ने (जिन्हें उनके अनुयायी सम्मानपूर्वक स्वामी जगतगुरु श्रीरामानंदाचार्य कहते हैं) प्रवर्तित किया था। यह संप्रदाय ‘मुक्ति’ के विशिष्टाद्वैत सिद्धांत को (जिसे राममय जगत की भावधारा के तौर पर परिभाषित किया जाता है) स्वीकारता है।

यह सम्प्रदाय बैरागी साधुओं के चार प्राचीनतम संप्रदायों में से एक है और इसमें परमोपास्य द्विभुजराम को ब्रह्म तो ‘ओम रामाय नमः’ को मूलमंत्र माना जाता है। विष्णु के विभिन्न अवतारों के साथ उपासना तो सीता व हनुमान वगैरह की भी की जाती है। लेकिन मुक्ति के लिए राम व विष्णु दोनों की कृपा को अपरिहार्य माना जाता है।

मान्यता है कि इन दोनों के अलावा कोई और मुक्तिदाता नहीं है। अतएव इस संप्रदाय में कर्मकांड को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता जबकि अनुयायियों के उदार, सारग्राही और समन्वयी होने पर जोर दिया जाता है।

संप्रदाय के अनेक अनुयायी रामानंद को राम का अवतार भी मानते और कहते हैं: ‘रामानंद स्वयं रामः प्रादुर्भूतो महीतले’. हालांकि रामानंद के जन्म की तिथि और काल को लेकर विद्वानों में गंभीर मतभेद हैं। कहा जाता है कि प्रयागराज में उनका जन्म 1299 हुआ, धर्म परायण माता-पिता ने उन्हें होश संभालते ही धर्मग्रंथों के अध्ययन के लिए काशी के स्वामी राघवानंद के पंचगंगाघाट स्थित श्रीमठ भेज दिया। वहां संत राघवानंद के शिष्यत्व में अध्ययन व साधना का चक्र पूरा करने के बाद वे तीर्थाटन पर चले गए थे।

जब देश के विभिन्न तीर्थों से ज्ञान व अनुभव से समृद्ध होकर श्रीमठ लौटे तो उनका एक बड़ी ही अप्रिय स्थिति से सामना हुआ। उनके कई गुरुभाइयों ने यह कहकर उनके साथ या उनकी पंगत में भोजन ग्रहण करने से इनकार कर दिया कि क्या पता, तीर्थाटन के दौरान वे किसका-किसका छुआ या पकाया, खाद्य अथवा अखाद्य भोजन ग्रहण करके लौटे हैं।

बात इतनी बढ़ गई कि गुरु राघवानंद ने रामानंद को आज्ञा दी कि वे अपनी मति के अनुसार नए संप्रदाय का प्रवर्तन कर लें। कई लोगों के मतानुसार गुरु की यह आज्ञा रामानंद के लिए दंडस्वरूप थी, अन्यथा वे गुरुभाइयों को मनाकर उनके अपने साथ भोजन करने के लिए सहमत कर लेते। लेकिन यह बात सही नहीं लगती, क्योंकि अनेक मायनों में संत राघवानंद भी समतावादी संत ही थे और सभी जातियों के छात्रों को शिक्षा देते थे।

जो भी हो, रामानंद ने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर ली तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। रामानंदी संप्रदाय का प्रवर्तन किया तो गुरुभाइयों द्वारा उनसे बरती गई छुआछूत के प्रतिकारस्वरूप भक्ति का द्वार सबके लिए खोल दिया। इस सामाजिक क्रांति का मूलमंत्र रहा, ‘जाति पाँति पूछे नहि कोई हरि को भजे सो हरि का होई।’ जिसके अनुसार भगवान की शरणागति का मार्ग सबके लिए खुला है और किसी भी जाति या वर्ण का व्यक्ति उनसे राम-मंत्र ले सकता है। कबीर की वाणी ने इस मन्त्र में जान फूंक दी थी।

राम के प्रति विशेष भक्ति की परंपरा की नींव उत्तर भारत में रामानंद जी ने रखी थी। दक्षिण भारत में तब राम भक्ति की परंपरा प्रबल थी, लेकिन उत्तर भारत में इस भक्ति को लाने का श्रेय रामानंद जी को ही दिया जाता है।

रामानंद जी के समय भारत में बदलाव का दौर शुरू हो चुका था, यवनों का आक्रमण शुरू हो गया था। नफरत के सौदागर मंदिरों और मूर्तियों को तोडऩे में लगे थे। भारत पर इसलाम का प्रभाव शुरू हो चुका था, ऐसे समय में रामानंद ने देश को दिशा दी। प्रेम और भक्ति का मार्ग दिखाया।

भारत में संत तो बहुत हुए, लेकिन जितना व्यापक प्रभाव रामानंदाचार्य जी का रहा, उतना किसी और का नहीं रहा। शिष्यों की एक विशाल फौज उन्होंने खड़ी की। भगवान राम के प्रति भक्ति के दरवाजे उन्होंने सभी के लिए खोल दिए। जातियों में बंटे देश को मजबूत करने के लिए आह्वान किया – जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।

रामानंद ने उदार भक्ति का मार्ग प्रदर्शित किया। उनके शिष्यों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र और स्त्रियाँ भी थीं। भक्ति का द्वार सभी के लिए मुक्त था। उन्होंने वैरागी संप्रदाय की स्थापना इसी कारण की। उनके उपदेशों के फलस्वरूप दो विचारधारा जो परिवर्तन के विरुद्ध थी। दूसरी नवीन विचारधारा जो परिवर्तन करके हिंदू, मुसलमान सभी को सम्मिलित करने को उद्यत थी। प्रथम विचारधारा के महानतम व्यक्ति संत कबीर थे और दूसरी विचारधारा के प्रमुख व्यक्ति संत तुलसीदास थे।

लेकिन जिस एक सबसे बड़ी बात ने रामानंद को भक्ति आंदोलन के महानतम संतों में शामिल कराया, वह यह थी कि उन्होंने रामभक्ति को हिमालय की पवित्र ऊंचाइयों से उतारकर गरीबों की झोपड़ियों तक पहुंचाने में अथक परिश्रम किया। साथ ही उसकी रक्षा का धर्म निभाने के लिए बैरागी साधुओं को अस्त्र-शस्त्र से सज्जित कर सेना के रूप में संगठित किया और उनके अखाड़ों की स्थापना कराई।

एक ऐसी धारा बह निकली, जो द्रविड़ क्षेत्र यानी दक्षिण भारत में उपजी भक्ति को उत्तर भारत ले आई और उसे जन-जन तक पहुंचाया। इस सम्प्रदाय की व्यापक स्वीकार्यता की एक मिसाल उनके शिष्यों में राम के निर्गुणोपासक और सगुणोपासक भी थे। संत कबीर और रैदास इसकी अनूठी मिसाल हैं।

सोलहवीं शताब्दी में रामानंदी शिष्य परंपरा की चौथी पीढ़ी के संत अग्रदास ने रसिक संप्रदाय का प्रवर्तन किया तो भगवान राम की अयोध्या के कई संत-महंत उसके रंग में रंग गए। इस संप्रदाय के प्रमुख शिष्यों में से एक अनंतानंद भी थे, जिनके शिष्य कृष्णदास पयहारी आगे चलकर आमेर के राजा पृथ्वीराज की रानी बालाबाई के दीक्षागुरु बने। अग्रदास इन्हीं कृष्णदास पयहारी के शिष्य थे। इसलिए कई विद्वान उनके रसिक संप्रदाय को रामानंदी संप्रदाय की ही नई शाखा और सखी संप्रदाय के पर्याय के रूप में भी देखते हैं।

रामानन्द सम्प्रदाय का दार्शनिक सिद्धान्त –

रामानन्द सम्प्रदाय को जो श्री संप्रदाय भी कहलाता है उसमें ‘श्री’ शब्द का अर्थ लक्ष्मी के स्थान पर ‘सीता’ किया जाता है। इस संप्रदाय का दार्शनिक मत विशिष्टाद्वैत ही माना जाता है। विशिष्टाद्वैत शब्द का अर्थ इस प्रकार है – विशिष्टं चा विशिष्टं च विशिष्टे, विशिष्टयोरद्वैते विशिष्टाद्वैतम् अर्थात् सूक्ष्म चिदचित् विशिष्ट अथवा कारण ब्रह्म और स्थूल चिदचिद् विशिष्ट अथवा कार्य ब्रह्म में अभिन्नता स्थापित करना ही विशिष्टाद्वैत का उद्देश्य है। रामानंद संप्रदाय में राम को ही ब्रह्म कहा गया है और ‘सीताराम’ आराध्य माने गए हैं।

अयोध्या में रामलला की रामानंद संप्रदाय का पालन करते हुए पूजा की जाती है। रामलला के श्रंगार से लेकर उनका भोजन, स्नान, वस्त्र और देखभाल उसी तरह की जाती है, जैसे किसी बालक की जाती है। उन्हें हर दिन अलग-अलग रंग के वस्त्र धारण कराए जाते हैं। अयोध्या रामजन्म भूमि है और यहां के सभी मंदिरों में इसी पद्धति का पालन किया जाता है।

आलेख

संध्या शर्मा
फीचर एडिटर- न्यूज़ एक्सप्रेस
वरिष्ठ साहित्यकार, ब्लॉगर
नागपुर – महाराष्ट्र


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