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प्रदक्षिणा की संस्कृति : राजिम की पंचकोशी यात्रा

जीवन के लिए गति आवश्यक है। गति से ऊर्जा मिलती है। केवल मनुष्य ही नही, अपितु प्रकृति के लिए यह आवश्यक है। ग्रह-उपग्रह, नक्षत्र सब गतिमान हैं। इनकी यह गतिमानता जीव-जन्तुओं व प्रकृति के अन्य उपादानों में ऊर्जा भरती है। समूची सृष्टि गति के अधीन है। गति भी कैसी? रैखिक नही, वृत्ताकार है। गति रूक जाये, तो प्रकृति रूक जाये। प्रकृति रूक जाये, तो जीवन रूक जाये। गति की जो वृत्ताकार स्थिति है, यही प्रदक्षिणा है।

भारतीय जीवन और सनातन संस्कृति में प्रदक्षिणा की परंपरा प्राचीनकाल से विद्यमान है। अध्यात्म, धर्म और दर्शन में जहाँ इसकी महत्ता सार्वकालीक है, वहीं हमारे लौकिक जीवन में भी प्रदक्षिणा की सार्वभौमिकता के दर्शन होते हैं। जीवन की सभी अवस्थाओं से जुड़ी हुई यह प्रदक्षिणा की परम्परा हमें बालपन में ही दिखाई पड़ती है। बच्चे जब विभिन्न तरह के खेल खेलते हैं, तो प्रदक्षिणा वहाँ उपस्थित रहती है। बच्चे जानते हैं कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। प्रकृति की गतिशीलता का यह सबसे पुष्ट प्रमाण है। छत्तीसगढ़ी लोक खेलों में रौंदस बाल, घोड़ा हे बदाम छाई जैसे अनेक खेलों में यह दिखाई पड़ती है। खेलने वाले बहुत सारे बच्चे जब वृत्ताकार बैठ जाते हैं। तब दाँव देने वाला बच्चा किसी पुराने कपड़े को ठोस रूप देकर उनके पीछे यह कहते हुए चक्कर लगाता है- ष्घोड़ा हे बदाम छाई।ष् तब बैठे हुए सारे बच्चे कहते हैं- ष्भूले-चूके मार खाई।ष् इसी तरह घानी-मुनी खेल में बच्चे ष्घानी-मुनी घोर दे, पानी दमोर देष् कहकर वृत्ताकार अपने स्थान पर घूमते हैं। विवाह संस्कार में भी अग्नि की प्रदक्षिणा लेकर ही सात फेरे पड़़ते हैं। तीज-त्यौहारों में तुलसी, ऑंवला, बरगद, पीपल आदि वृक्षों की प्रदक्षिणा की जाती है। आखा नवमी, वट सावित्री आदि त्यौहार इसके प्रमाण हैं। देव स्थलों की प्रदक्षिणा तो मोक्ष का माध्यम है। केवल जीवन के रहते ही नहीं, अपितु मृत्यु संस्कार में भी प्रदक्षिणा की जाती है। मृतक के दाह-संस्कार के समय चिता की प्रदक्षिणा कर मुखाग्नि दी जाती है। यह तो सभी जानते हैं कि गणेश जी माता-पिता की प्रदक्षिणा कर देंवताओं में प्रथम पूज्य बनकर गणपति, गणराज कहलाये। आज भी प्रदक्षिणा की यह सनातन परम्परा हमारे समाज व समुदायों में शाश्वत है।

आखिर यह प्रदक्षिणा है क्या ? इसका अभिप्राय क्या है ? इस पर विचार करें तो यह ज्ञात होता है कि किसी देवता, देव स्थल (मंदिर), इष्टदेव या जो हमारे लिए पूज्य हैं की चारो ओर इस तरह वृत्ताकार में घूमना कि जिसमें देव या पूज्य स्थल अपने दक्षिण भाग में रहे, प्रदक्षिणा कहलाता है। यह करबद्ध नमस्कार की स्थिति में सम्पन्न होता है। इसे परिक्रमा भी कहा जाता है। इसीलिए मंदिरों में परिक्रमा पथ बना रहता है। छत्तीसगढ़ में परिक्रमा को ष्परकम्माष् कहा जाता है। जैसे ज्यादा भ्रमण शील व्यक्ति के लिए कहा जाता है- आगेस परकम्मा करके। प्रदक्षिणा के लिए केवल मंदिर या देव स्थल ही नहीं, अपितु वृक्षों, पर्वतों व नंदियों की भी प्रदक्षिणा की जाती है। प्रदक्षिणा के पथ निश्चित होते हैं। जिन्हें परंपराओं के साथ पूरा किया जाता है। इसके पीछे मनौतियाँ और लोक मान्यताएं प्रमुख होती हैं। पैदल प्रदक्षिणा के साथ-साथ शयन कर साष्टांग लेटकर भी प्रदक्षिणा की जाती है। चित्रकूट में कामदगिरि, बृज में चौरासी यात्रा, गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा, नर्मदा नदी की प्रदक्षिणा, छत्तीसगढ़ में राजिम की पंचकोशी यात्रा ये प्रमुख प्रदक्षिणा पथ हैं।

छत्तीसगढ़ की धरती खनिज संपदाओं और वन संपदाओं से जितनी परिपूर्ण है, उससे कहीं अधिक यह कला साहित्य, संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व व धर्म की दृष्टि से आज भी समुन्नत है। प्राचीनकाल में इसे दक्षिण कोशल कहा जाता था। दण्डकारण्य भी इसी का प्राचीन नाम है। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम वनवास के समय लगभग दस बारह वर्ष दण्डकारण्य में बिताये। छत्तीसगढ़ को राम का ननिहाल माना जाता है। लवकुश का जन्म छत्तीसगढ़ के ही तुरतुरिया में हुआ ऐसा माना जाता है। तुरतुरिया में ही बाल्मिकि का आश्रम था। पूरा छत्तीसगढ़ वर्तमान में भी राममय है। यहाँ के लोगों के आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान, तीज-त्यौहार सभी राममय है। कौशिल्या दक्षिण कोशल के राजा भानुमंत की बेटी थी, इसलिए राम छत्तीसगढ़ के भांजा हुए। आज भी छत्तीसगढ़ का लोक मानस अपने भांजा को राम का रूप मानकर उसका चरण स्पर्श करता है। राजिम का राजीव लोचन मंदिर, शिवरीनारायण का शबरी मंदिर, सिरपुर का लक्ष्मणेश्वर व रामचंद्र मंदिर आज भी इसकी प्राचीनता को प्रतिपादित करते है। राजिम की पंचकोशी यात्रा तो सर्वविदित है।

राजिम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से दक्षिण दिशा में लगभग 45 किमी. दूर स्थित है। यह छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा महानदी के किनारे पर स्थित है। राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है। क्योंकि यहाँ महानदी, पैरी और सोंढूर तीन नदियों का पवित्र संगम है। इसलिए इसे ष्त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। यहाँ पर पिण्डदान और अस्थि विसर्जन किये जाते हैं। यहाँ के मंदिरों में राजीव लोचन मंदिर और कुलेश्वर महादेव का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। कुलेश्वर मंदिर त्रिवेणी संगम पर ही नदी के भीतर ऊंचे अधिष्ठान पर स्थित है। यहाँ के सभी मंदिरों की धार्मिक महत्ता के साथ-साथ उनका ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व भी है। यहाँ जो पंचकोशी यात्रा संपन्न होती है। वे सभी शिवधाम हैं और राजिम से लगभग पाँच-पाँच कोस की दूरी पर चारों दिशाओं में स्थित हैं। इसलिए इन्हें पंचकोशी कहा जाता है। कोश अर्थात खजाना के अर्थ में ये सभी देव स्थल हमारे सनातन धर्म व संस्कृति के कोश हैं। जहाँ पर हर साल हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए पैदल यात्रा कर जीवन धन्य करते हैं।

महानदी सिहावा पर्वत से निकलकर छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की धरती को सिंचती हुई, यहाँ के जन जीवन को समृद्धि और खुशियाँ बाँटती हुई उड़ीसा में समुद्र में जाकर मिलती है। महानदी को चित्रोत्पला गंगा जी भी कहा जाता है। राजीव लोचन का मंदिर महानदी के दायें तट पर स्थित है। यहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक 15 दिनों का विशाल मेला भरता है। इस मेले में छत्तीसगढ़ के अलावा देश के अन्य प्रदेशों से भी साधु संत और श्रद्धालु जन राजीव लोचन व कुलेश्वर महादेव के दर्शन के लिए आते हैं। महानदी के पवित्र जल में स्नानकर पुण्य का भागी बनते हैं। चूंकि राजिम शैव और वैष्णव का संगम स्थल है। इसलिए इसे हरिहर क्षेत्र कहा जाता है। इसे कमल क्षेत्र या पद्मक्षेत्र भी कहा जाता है। राजिम पंचकोशी यात्रा के संदर्भ में एक किवदन्ती प्रचलित है। जो जनमानस में व्याप्त है।

कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु ने बैकुंठ लोक से धरती पर निवास करने के उद्देश्य से विश्वकर्मा जी को धरती पर एक मंदिर निर्माण करने के लिए कहा। पर शर्त रखी कि जगह ऐसी हो जहाँ पर कोई शव न जला हो। विश्वकर्मा जी धरती पर आये, चारों ओर ऐसी जगह की तलाश की, जहाँ शव न जला हो। पर उन्हें ऐसा कोई स्थान नहीं मिला। वे विष्णु जी के पास गये और बोले की प्रभु धरती पर तो ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ शव न जला हो। तब विष्णु जी ने एक कमल का फूल अपने हाथ से नीचे छोड़ा और कहा कि जहाँ यह कमल गिरेगा, वहीं पर हमारे लिए मंदिर का निर्माण करना। विश्वकर्मा जी ने ऐसा ही किया। अतः कमलफूल के केन्द्र अर्थात पराग वाले स्थान पर राजीव लोचन जी का मंदिर राजिम में है और पंखुड़ियों पर कुलेश्वर महादेव (त्रिवेणी संगम), चम्पेश्वर महादेव (चम्पारण्य), पटेश्वरनाथ महादेव (पटेवा), ब्रम्हकेश्वर महादेव (बह्मनी), फणीकेश्वर महादेव (फिंगेश्वर) व कोपेश्वरनाथ महादेव (कोपरा) में है।

मेरे राजिम पहुंचने पर सभी मित्र श्री तुकाराम कंसारी, संतोष सोनकर, राजेन्द्र सिंह ठाकुर और जितेन्द्र कुमार राजीव लोचन मंदिर में मिले। काफी दिनों के बाद मिलना हुआ, जब मैंने अपने आने का उद्देश्य बताया तो वे बड़े प्रसन्न हुए, फिर तो चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। हम सब ने मिलकर भगवान राजीव लोचन के दर्शन किए। सावन का महीना और रविवार का दिन होने के कारण मंदिर में बहुत भीड़ थी। राजेन्द्र मनु जी राजीव लोचन मंदिर के पुजारी, मंदिर के सदस्य और अन्न भंडार के कोठारी हैं। इसलिए मंदिर दर्शन में कोई असुविधा नहीं हुई। उन्होंने मंदिर के संबंध में अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ यहाँ के पुरातत्व, इतिहास, कला, संस्कृति और पंचकोशी यात्रा के संबंध में दी। तुकाराम कंसारी और संतोष सोनकर जी साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता में भी रूचि रखते हैं। जितेन्द्र कुमार जी साहित्यिक अभिरूचि के शिक्षक हैं। उन्होंने मुझे जानकारी दी कि आपकी दो किताबे (1) छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कति और (2) छत्तीसगढ़ का जनजीवन और रामकथा हमारे हायर सेकेण्डरी स्कूल में शासकीय खरीदी के अंतर्गत पुस्तकालय में उपलब्ध हुई हैं। यह जानकर मुझे भी अच्छा लगा।

सुबह जब 7 बजे मैं घर से निकला तो तेज बारिश हो रही थी। बस से यात्रा कर रायपुर होते हुए राजिम पहुँचा, तब तक वर्षा जारी थी। रास्ते में हरे-भरे खेत, छोटे-छोटे लहराते धान के पौधे मन को आनंदित कर रहे थे। तेज बारिश के कारण नदी-नालों में बाढ़ की स्थिति थी। लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की यात्रा कर राजिम के समीप पहुँचा, तो कुर्रा गाँव के पास बस रूकी। तब एक सज्जन् चढ़े। मैंने उन्हें पास बैठा लिया। सामान्य चर्चा के बाद मैंने नाम व गाँव पूछा, तो उन्होंने नाम बीरबल और गाँव बजरंगपुर बताया। मैंने अपना परिचय देकर आने का उद्देश्य बताया और पंचकोशी यात्रा के बारे में पूछा, तो वे प्रसन्न हुए और संक्षिप्त में पंचकोशी यात्रा की महत्वपूर्ण जानकारी दी। मुझे लगा कि मेरी यात्रा की सफलता का यह शुभ संकेत है।

राजिम पहुँकर मैंने राजेन्द्र सिंह मनु को फोन किया उन्होंने फोन रिसिव्ह नहीं किया, शायद किसी कार्य में व्यस्त रहे होंगे। मैं सीधे उनके निवास पहुंच गया, जो ठीक राजीव लोचन मंदिर से लगा हुआ है। इनसे हमारा आत्मीय संबंध है। हमारे गाँव की बेटी ममता इनके लिए व्याही गयी है। आत्मीयता के साथ-साथ पारिवारिकता भी है। कुछ देर बाद मनु जी घर आए। तब तक मेरा यथेष्ट स्वागत-सत्कार हो चुका था। मैंने कुलेश्वर महादेव चलने की बात कही। तक बारिश बंद हो चुकी थी। अतः मनु जी ने कहा कि कुलेश्वर महादेव का दर्शन तो रात में किया जा सकता है। मौसम को देखते हुए हम पटेश्वर महादेव व चम्पेश्वर महादेव के दर्शन कर आएँ। हम दोनो मोटर सायकल से निकले। जैसे ही महानदी पार किए, जोरदार बारिश शुरू हो गयी। चूँकि मौसम के अनूकुल हमारी तैयारी थी। हमने बरसाती पहन ली और भरी बरसात में कुछ बचते, कुछ भींगते पटेवा पटेश्वर नाथ धाम पहुँचे। बड़ा मनोरम दृश्य। एक विशाल सरोवर के किनारे पटेश्वर नाथ शिवधाम स्थित है। सरोवर लगभग 18 एकड़ में फैला हुआ है। ऐसा ग्रामीणों ने बताया। मंदिर का पट बंद था। कुछ बच्चे बारिश का मजा ले रहे थे। हमने ताले की चाबी के बारे में पूछा तो एक बच्चा पास ही पुजारी के पास से चाबी लाकर पट खोल दिया। पटेश्वरधाम पंचकोशी यात्रा का प्रथम पड़ाव है। पंचकोशी यात्रा कार्तिक माह से प्रारंभ होकर महाशिवरात्रि तक चलते रहती है। यात्री अपनी सुविधानुसार बाजे-गाजे के साथ पैदल निकलते हैं। पंचकोशी यात्रा का प्रारंभ कुलेश्वर महादेव से होकर कुलेश्वर महादेव में ही समापन होता है। ग्राम पटेवा राजिम से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर बसा है। पटेवा का प्राचीन नाम पट्टनापुरी था। पटेवा में विराजित महादेव स्द्योजात शिवलिंग है। जिनके ऊपर ताँबे का नाग फन फैलाए हुए है। इस मंदिर में विष्णु व लक्ष्मी जी की संगमरमर की भी मूर्तियाँ है, जो अर्वाचिन है। लेकिन पटेश्वर महादेव का शिवलिंग अत्यंत प्राचीन है। जिनकी अर्धांगिनी अन्नपूर्णा है। इस प्रकार यह मंदिर अन्नकोश का प्रतीक है। यह भी उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ को ष्धान का कटोरा कहा जाता है। यहाँ धान की पैदावारी अधिक होती है। अन्न को अन्नपूर्णा कहा जाता है, जो कि पार्वती का ही एक रूप है। पंचकोशी यात्रा में आने वाले यात्री अपने साथ दाल-चाँवल, सब्जी, लकड़ी व बर्तन लेकर चलते है। अपनी-अपनी टोली के अनुसार भोजन बनाते हैं। तालाब में स्नान कर पंचकोशी धाम पटेश्वर नाथ के दर्शन व पूजन पश्चात् चम्पेश्वर महादेव के दर्शन के लिए चम्पारण की ओर प्रस्थान करते हैं। बीच में पड़ने वाले गाँवों के लोग पंचकोशी यात्रियों का स्वागत करते हैं। उनके लिए जल आदि की व्यवस्था कर स्वयं पुण्य के भागी बनते हैं। सावन होने के कारण शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ अधिक थी।

पटेश्वर धाम से हम राजेन्द्र मनु के साथ मोटर सायकल से निकले, तो बारिश बंद हो गयी थी। किन्तु दो-चार किलोमीटर ही आगे जा पाए थे कि बरखा रानी ने अपना तेज रूप दिखाना शुरू कर दिया। घनघोर बारिश शुरू हो गयी। ऐसी बारिश जिसे छत्तीसगढ़ी में ष्ठढ़बूँदियाष् पानी कहते हैं। तेज बारिश के कारण विवश होकर हमें पारा गाँव के पास नवागाँव में घण्टा भर रूकना पड़ा। फिर आगे बढ़े तो जौंधी गाँव में रूके। बरसाती के बाद भी हम ष्चोरो-बोरोष् भींग गये। पर हमारे उत्साह में कोई कमी नहीं थी। यहाँ भी हम भींगते, भागते चम्पारण पहुंच ही गये। चम्पेश्वर महादेव की डेहरी पर पहुँचकर हृदय को बड़ी शांति मिली। यहाँ भी श्रद्धालुओं की भीड़ थी। पंचकोशी यात्रा का दूसरा पड़ाव है चम्पारण। पहले इसका नाम चम्पाझर था। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहाँ पहले चम्पा (चम्पक) फूल के पेड़ बहुत थे। जो जंगल के समान दिखाई पड़ता था। चम्पेश्वर महादेव को तत्पुरूष महादेव कहा जाता है। यहाँ इनकी अर्धांगिनी कालिका है। जो पार्वती का ही एक रूप है। चम्पेश्वर महादेव का जो शिवलिंग है, उसमें पार्वती व गणेश जी के रूप की आकृति के भी दर्शन होते हैं। यह शिवलिंग स्वयंभू है। इस संबंध में बड़ी रोचक कथा प्रचलित है-

कहा जाता है कि लगभग आठ सौ साल पहले की बात है। तब यहाँ घनघोर जंगल था। गाँव का ग्वाला गायों को लेकर रोज चराने के लिए जंगल जाता। मनमोहक बंशी बजाता। गायों को चराता, नदी में पानी पिलाता। फिर शाम को गायों को लेकर वापस गाँव आता। उन्हीं गायों में एक बंझली (बांझ) गाय थी। वह गाय रोज शाम को घर आने के बजाय वापस जंगल की ओर लौट जाती। एक दिन ग्वाला उसके पीछे-पीछे गया। देखा तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा। समी पेड़ के नीचे गाय खड़ी है। उसके थन से दूध की धार एक पत्थर पर गिर रही है। ग्वाले ने आकर गांव वालों को बताया। पर किसी को भी उसकी बातों पर भरोसा न हुआ। ग्वालें ने उन्हें सच दिखाना चाहा।

दूसरे दिन फिर शाम को बंझली गाय जंगल की ओर लौटने लगी, तब ग्वाले के साथ गांव वाले भी उसके पीछे पीछे वहां पहुंचें। गाँव वालों ने देखा तो सब की आँखे खुली की खुली रह गयी ग्वाला ने जो कहा था, वह सच निकला। गाँव वालों ने उस जगह की साफ सफाई की देखा तो वहां शिवलिंग है। जिसमें शिव जी के संग पार्वती व गणेश जी की छबि है। सबने मिल-जुल कर वहाँ मंदिर बनवाया। यही चम्पेश्वर महादेव हैं। यहाँ शिवरात्रि के समय विशाल मेला भरता है।

चम्पारण चम्पेश्वर महादेव के लिए तो प्राचीनकाल से प्रसिद्ध है। यह महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म स्थान भी है। उनका यहाँ बहुत ही सुन्दर और भव्य मंदिर बना हुआ है। यह वल्लभ संप्रदाय के पुष्टि मार्ग का बड़ा तीर्थ स्थान है। इस संबंध में यह कथा प्रचलित है कि दक्षिण भारत में अगस्त्य मुनि के वंशज कुंभकर हुए। बाद में वे काकखण्ड में आकर बस गये। फिर सपरिवार तीर्थयात्रा पर निकले। प्रयाग होते हुए काशी पहुँचे।

काशी में कुछ अशांति थी। इस कारण वे गाँव की ओर लौट पड़े। रास्ते में राजिम के पास चम्पाझर पड़ता है। वे यहाँ चम्पेश्पर महादेव के दर्शन के लिए पहुँचे। यहीं उनकी पत्नि वल्लमागारू ने रात में एक बालक को जन्म दिया। यह घटना संवत पन्द्रह सौ पैंतीस बैसाख कृष्ण पक्ष एकादशी (ई.सन्1479) की है। बालक बड़ा कमजोर था। उसके जीने की आशा कम थी। इसलिए उन्होंने बालक को समी पेड़ के कोटर में छोड़ दिया और दुखी मन से आगे निकल गये। चलते-चलते रास्ते में देववाणी हुई कि बालक जीवित है। वे तुरन्त लौटे। देखा तो सचमुच बालक धरती की गोद में मचल रहा है। बालक के चारांे ओर आग का गोल घेरा हैै।

यह चमत्कार देख माता पिता का मन आनंद से भर गया। यही बालक आगे चलकर महाप्रभु वल्लभाचार्य हुए। वल्लभ बचपन से होशियार थे। उन्हें बाल सरस्वती कहा गया। गुरूओं से वेदों की शिक्षा पायी। वे कृष्ण के परम भक्त थे। चम्पारण में कृष्ण भगवान के बाल रूप की पूजा की जाती है। बारहों महिने वल्लभ सम्प्रदाय पुष्टि मार्ग के अनुयायी देश-विदेश से यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। उनका जन्म दिवस हर साल बैसाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को धूमधाम से मनाया जाता है। तब भी यहाँ बड़ा मेला भरता है। चम्पारण की दूरी राजिम से लगभग 15 किमी. है। चम्पेश्वर महादेव के दर्शन के पश्चात श्रद्धालुओं की पंचकोशी यात्रा की टोलियां बह्मनी गाँव के लिए प्रस्थान करती है।

बह्मनी गाँव में ब्रह्मकेश्वर महादेव का मंदिर है। चम्पारण से इसकी दूरी उत्तर पूर्व की ओर लगभग 10 किमी. है। बह्मनी नदी के किनारे स्थित है। बह्मकेश्वर महादेव में भगवान शिव की अघोर वाली मूर्ति है। यहाँ उमा इनकी शक्ति है। यहाँ महादेव आनंदमय स्वरूप में पूजे जाते हैं। जो लोग इस आनंदमय स्वरूप का एक बार दर्शन कर लेते हैं, उनका जीवन धन्य और आनंदमय हो जाता है। उन्हें न किसी का भय होता है और न किसी का त्रास। बह्मनी नदी के किनारे एक जलकुंड है, जिसके उत्तरी छोर पर ब्रह्मकेश्वर महादेव का मंदिर है। इस कुंड में जल का स्रोत अनवरत रूप से प्रवाहित होते रहता है। जिसे स्थानीय लोग सेतगंगा कहकर पूजा करते हैं। यहाँ का जल पवित्र माना जाता है। ब्रह्मकेश्वर महादेव का मंदिर महासमुंद जिला में स्थित है। बह्मनी का ब्रह्मकेश्वर महादेव पंचकोशी यात्रा का तीसरा पड़ाव है। भक्तगण रात्रि में यहाँ विश्राम कर फिंगेश्वर के लिए प्रस्थान करते हैं, जहाँ पर फणिकेश्वर महादेव विराजमान हैं।

अब बारिश थम सी गयी थी। शाम के 5 बज रहे थे। अतः हमने फिंगेश्वर जाने के बजाय राजिम वापस लौटना उचित समझा। यह भी योजना बनी कि अभी शाम को कुलेश्वर महादेव का दर्शन कर लिया जाय। अतः हम राजेन्द्र मनु जी के साथ चम्पेश्वर मूंदिर चम्पारण से नवापारा शहर आ गये। नवापारा से लोमश ऋषि आश्रम होते हुए कुलेश्वर महादेव जाना उचित प्रतीत हुआ। इसी कुलेश्वर महादेव से पंचकोशी यात्रा का प्रारंभ और समापन होता है। नवापारा से होते हुए हम महानदी का पुल पार करते हुए बेलाही गाँव पहुँचे। इसी बेलाही गाँव में लोमश ऋषि का आश्रम है, जहाँ पर हर समय श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। कुलेश्वर महादेव महानदी के तट पर स्थित है। जहाँ पर पैरी, सोंढुर और महानदी का त्रिवेणी संगम है। बताते हैं कि पहले इस स्थान पर बेल के पेड़ अधिक थे। इसलिए इस स्थान का नाम ष्बेलाहीष् पड़ा। बेल के पेड़ आज भी दिखाई पड़ते हैं। बेल पत्र भगवान भोलेनाथ अर्थात कुलेश्वर महादेव को चढ़ाया जाता है। चॅंूकि राजेन्द्र मनु जी स्वयं पुजारी हैं मंदिर समिति के सदस्य हैं। इसलिए कुलेश्वर महादेव के पुजारियों व साधु-संतो से इनका आत्मीय लगाव है। इसका लाभ हमें इस सर्वेक्षण यात्रा में बराबर मिलता रहा। राजिम और नयापारा बस्ती के बीचों बीच महानदी प्रवाहित होती है। इस समय महानदी में बाढ़ की स्थिति थी। कुलेश्वर महादेव में आने-जाने के लिए अब लक्ष्मण झूला बन गया है। जो बहुत ही आकर्षक और मनोरंजक है। जब लक्षमण झूला नहीं था, तब कुलेश्वर महादेव तक पहुँचने के लिए नवापारा बेलाही मार्ग ही उपयुक्त था। राजिम से कुलेश्वर महादेव तक जाने के लिए महानदी को पार करना पड़ता था। जो बारिश के दिनों में संभव ही नहीं था। महानदी में पानी कम होने पर ही रेत व पानी में चलकर यहाँ आना पड़ता था। लक्षमण झूला बनने से अब दोनों ओर से आना-जाना हर मौसम में सुगम हो गया है। यह तो सर्वविदित है कि कुलेश्वर महादेव का मंदिर त्रिवेणी संगम में स्थित है। यह मंदिर नदी के बीच ऊंचे अधिष्ठान पर निर्मित है। जो भीषण बाढ़़ की स्थिति में भी वर्षाे से सुरक्षित है। कुलेश्वर महादेव के संबंध में यह लोक मान्यता है कि जब भगवान श्री राम-सीता और लक्ष्मण बनवास के समय दण्डकारण्य आये थे, तब माता सीता ने अपने हाथों रेत से शिवलिंग का निर्माण कर अपने कुल की रक्षा के लिए महादेव की पूजा की थी। तब से ये यही विराजित हैं और इसीलिए इन्हें कुलेश्वर महादेव के नाम से पूजा जाता है। इन्हें उत्पलेश्वर महादेव भी कहा जाता है। शिवलिंग के स्वरूप में आज भी रेत नजर आते हैं। मंदिर के पृष्ठ भाग में विशाल पीपल का वृक्ष है। नदी तल से अधिष्ठान की ऊंचाई लगभग 20-25 फीट होगी। कुलेश्वर महादेव में अनेक पुरातात्विक महत्व की प्राचीन मूर्तियां हैं। मंदिर में एक प्राचीन शिलालेख भी संरक्षित है। निर्माण की दृष्टि से अष्टकोणीय यह मंदिर जल धाराओं के बीच निर्मित है जो बड़ा अद्वितीय और सुदृढ़ स्थिति में है। लक्ष्मण झूला से आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ कुलेश्वर महादेव के प्रति उनकी आस्था और भक्ति को प्रकटित करती है। कुलेश्वर महादेव के दर्शन कर हम लक्ष्मण झूला से होकर राजिम पहुंच सकते थे, किन्तु हमारी यात्रा मोटर सायकल से हो रही थी। अतः यह संभव नही था। वापस हम लोमश ऋषि के आश्रम से बेलाही नवापारा आ गये। जहाँ पर तुकाराम कंसारी जी और संतोष सोनकर जी हमारी प्रतिक्षा में थे। हम चारों की मित्र मंडली भाई तुकाराम कंसारी के घर जमी। मैं संतोष सोनकर और तुकाराम कंसारी से पंचकोशी यात्रा के संबंध में उनके अनुभवों को सुनकर गदगद हो गया। श्री राजेन्द्र सिंह मनु ने तो इस लंबी यात्रा में अपने अनुभवों से मुझे धन्य किया था। भाई राजेन्द्र मनु ने अनुरोध किया कि अब हम पुनः राजीव लोचन मंदिर चले और राजिम के महात्म्य से परिचित हों। अतः हम सभी मित्र राजिम आ गये।

राजीवलोचन मंदिर में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ थी। इसका कारण सावन का महीना और रविवार का दिन है। पर्व विशेष और अवकाश के दिनों में धार्मिक व दर्शनीय स्थलों में भीड़ होना सहज व स्वाभाविक होता है। राजीव लोचन भगवान के दर्शन पश्चात परिसर में स्थित राज राजेश्वर महादेव, दान दानेश्वर महादेव, राजिम तेलीन माता मंदिर, जगन्नाथ मंदिर के साथ ही महानदी किनारे स्थित भूतेश्वर महादेव व पंचेश्वर महादेव के दर्शन कर मन को बड़ी शांति मिली। राजिम की पंचकोशी यात्रा को प्रारंभ करने के पूर्व श्रद्धालु यात्री उपरोक्त मंदिरों में पूजन अर्चन व दर्शन कर पुण्य के भागी बनते हैं।

श्री राजेन्द्र मनु जी राजीव लोचन मंदिर के पुजारी और कर्ता-धर्ता हैं। उन्होंने राजिम के धार्मिक, सांस्कृतिक व पुरातात्विक महत्व की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि- राजिम की प्रसिद्धि प्राचीन काल से रही है धर्म, संस्कृति, पुरातत्व और कला की दृष्टि से यह छत्तीसगढ़ ही नहीं, अपितु पूरे देश में प्रसिद्ध है। महानदी की पावन धाराएँ तरंगित होकर इसकी महिमा का बखान करती हैं। राजीव लोचन मंदिर चतुष्कोणीय आकार में निर्मित है। उत्तर और दक्षिण दोनों ओर मंदिर का प्रवेश द्वार है। राजीव लोचन अर्थात् जिनके नेत्र कमल के समान हैं, ऐसे भगवान विष्णु की सुंदर काले प्रस्तर से निर्मित चतुर्भुजी प्रतिमा यहाँ विराजित है। जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं। यह मंदिर पूर्वाभिमुखी है। महामंडप में करबद्ध गरूड़ जी की मूर्ति हैं। गर्भ गृह का प्रवेश द्वार विशेष अलंकृत है। जिसमें सर्पाकार मानवी आकृतियों का अकंन है। महामंडप में बारह प्रस्तर स्तंभ जिनमें गंगा, यमुना, तथा विष्णु के दशावतारों से जुड़ी वामनावतार, बराहावतार, नरसिंह अवतार आदि की भव्य व विशाल मूर्तियाँ हैं। एक ओर प्राचीन शिला लेख का हिन्दी अनुवाद जिसे बाद में लगाया गया है। इसी मंदिर परिसर में अनेक शिवालय हैं। इसीलिए इसे हरि हर क्षेत्र कहा जाता है। भगवान विष्णु और शिव दोनों ही यहाँ विराजित हैं, और प्राचीन काल से पूजित हैं।

भगवान राजीव लोचन की यह मूर्ति अपने आप में अद्भूत है। जिसमें गजराज को सूंड में कमल नाल पकड़े हुए दिखाया गया है। गज और ग्रह की लड़ाई में भगवान विष्णु ने अपने चक्र सुदर्शन से ग्रह को मारकर गज की रक्षा की थी। इस मंदिर का निर्माण काल 8वीं शताब्दी बताया गया है। इस अभिलेख के आधार पर इस मंदिर का निर्माण नलवंशी राजा विलासतुंग द्वारा कराने का वर्णन मिलता है। मंदिर परिसर में राज राजेश्वर महादेव व दान दानेश्वर महादेव के रूप में पश्चिमाभिमुखी दो शिव मंदिर है। इनके भी प्रवेश द्वार राजीव लोचन मंदिर की तरह अलंकृत हैं। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। बाहर मंदिर के निर्माणकर्ता राजा जगतपाल की आसनस्थ मूर्ति है। इन्ही मंदिरों से लगा हुआ राजिम तेलिन माता का मंदिर है। कहा जाता है कि इसी भक्त माता राजिम के नाम पर इस स्थान का नामकरण हुआ। इस संबंध में यह किवदंती प्रचलित है कि- बहुत पुरानी बात है। यहाँ एक तेली परिवार रहता था। यह परिवार तिल अन्न से अपने घानी द्वारा तेल निकाल निकालता और आसपास के गाँवों में बेचता। इस तरह अपने परिवार का भरण पोषण करता उसका एक बेटा था, जिसकी शादी हुई तो बहू के आने पर बहू भी तेल बेचने का कार्य करती। बहू एक दिन जब तेल बेचने जा रही थी तो रास्ते में पड़े पत्थर से टकरा कर गिर गई। जिससे सारा तेल उस पत्थर पर ही फैल गया। वह रोने लगी। सोचा कि यदि सास-ससुर जानेंगें तो नाराज होंगें। घर जाकर वह अपने सास-ससुर और पति से क्या कहेगी। वह सुबक-सुबक कर रोने लगी। इसी समय एक चमत्कार हुआ। रोना छोड़कर तेल के बर्तन को देखती है, तो बर्तन तेल से भरा हुआ है। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। वह तेल बेचने चली गई। इस घटना के पश्चात् बहु जब भी उस रास्ते से तेल बेचने जाती, सबसे पहले वह उसी पत्थर को अपना तेल चढ़ाती। इस घटना से उसके घर में सुख समृद्धि की वर्षा होने लगी। धन-धान्य से वे परिपूर्ण हो गए। एक दिन बहु ने उक्त घटना अपने सास-ससुर और पति से कही। सास-ससुर पति ने उक्त पत्थर को देखना चाहा। जा कर देखा और उसे पल्टाया तो वह चतुर्भुजी विष्णु की भव्य प्रतिमा थी। जिसे वे घर लाकर उसकी पूजा करने लगे। कुछ समय बाद दुर्ग के राजा जगत पाल ने उस मूर्ति को सविनय तेली परिवार से मांगकर मंदिर में स्थापित किया। कहते है कि उसी दिन से इस स्थान और मंदिर का नाम राजिम पड़ा।

राजिम तेलीन माता मंदिर में प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। राजिम माता की भी मूर्ति है, जो अर्वाचीन है। मंदिर के भीतर पूर्व दिशा में एक सती स्तभ है जिसमें चाँद-सूरज का अंकन है व नीचे तेल निकालने का देशी यंत्र घानी (कोल्हू) उत्कीर्ण है। घानी तेली जाति के व्यवसाय को प्रदर्शित करता है। यहाँ बसंत पंचमी का उत्सव घूमधाम से मनाया जाता है। श्री राजेन्द्र सिंह मनु द्वारा दी गई जानकारी बड़ी महत्वपूर्ण रही। चूँकि शाम हो रही थी और राजेन्द्र भाई को मंदिर की व्यवस्था में लगना था। संध्या आरती की तैयारी करनी थी। अतः वे चले गए। श्री संतोष सोनकर व जितेन्द्र सुकुमार कोे भी घर जाना था। वे भी चले गये। अब साथ श्री तुकाराम कंसारी थे। वे चाहते थे कि मैं पंडित सिद्धेश्वरानंद जी से भेंट करूँ। वे पंचकोशी यात्रा के मुख्य कर्ता-धर्ता हैं। उन्होंने पंचकोशी यात्रा को व्यवस्थित रूप दिया है। मैं सहर्ष तैयार हो गया। पंडित सिद्धेश्वरानंद जी लोमश ऋषि के आश्रम में रहते हैं। हम दोनो राजिम तट से लक्ष्मण झूला का आनंद लेते हुए जाने लगे शाम के 7 बज चुके थे। बिजली की रंगीन रोशनी से लक्ष्मण झूला और ज्यादा आनंददायक लग रहा था। लक्ष्मण झेला आने-जाने वाले श्रद्धालुओं के भार से झूले की तरह हिलता-डुलता था। किगों को बड़ा मजा आ रहा था। विशेष कर बच्चों को। महिलाएं तो डर रही थीं। सचमुच लक्ष्मण झूला राजिम यात्रा के आनंद को द्विगुणित करता है। यह मैंने भी अनुभव किया। यह लक्ष्मण झूला विगत वर्ष महाशिवरात्रि को प्रारंभ हुआ है। तब से दर्शनार्थियों की संख्या में वृद्धि हुई है। ऐसा भाई तुकाराम कंसारी ने बताया। लोमश आश्रम जाने पर पता चला कि पंडितजी अपने घर नयापारा चले गए हैं। हम पुनः लक्ष्मण झूला से वापस आकर पंडित जी के घर पहुँचे। उन्हें प्रणाम किया और आने का उद्देश्य बताया तो वे भी हर्षित हुए। उन्होंने हमारी प्रार्थना पर राजिम पंचकोशी यात्रा की महत्ता, उसकी महिमा की सविस्तार जानकारी दी।

पंडित सिद्धेश्वरानंद जी ने बताया कि राजिम का मंदिर आठवीं शताब्दी का है और भगवान रामजी वनागमन के समय यहाँ आए थे। तब से इसकी प्रसिद्धि है। ऐसा कहा जाता है कि लोमश ऋषि जी प्रतिदिन पंचकोशी यात्रा करते थे। उन्हीं के द्वारा संचालित इस परंपरा को हम लोग बनाए हुए हैं। आज भी इस कलयुग में लोग हजारों की संख्या में पद यात्रा करते हैं। यात्रा में लोग अपनी टोली के लिए खुद भोजन बनाते हैं। एक समय भोजन करते हैं। एक साथ पड़ाव करते हैं। नहाने के लिए तेल-साबुन आदि का उपयोग नहीं करते। सबकी मनोकामना होती है। वे मनोकामना की पूर्ति के लिए एक नारियल लेकर यात्रा पर निकल पड़ते हैं। इससे हमारी धार्मिक आस्था बलवती होती है। हमारे सनातन धर्म का प्रचार होता है। पहले यात्रा का निश्चित समय नहीं होता था। इसे हमने व्यस्थित किया है। 12 जनवरी से यह यात्रा प्रारंभ होती है। जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। लोमश ऋषि आश्रम से प्रारंभ कर 18 जनवरी को यहीं समापन होता है। इस बीच पटेश्वर महादेव, चंपेश्वर महादेव, ब्रम्हानेश्वर महादेव, फणिकेश्वर महादेव, कोपेश्वर महादेव की यात्रा करते हुए पुनः कुलेश्वर महादेव पहुँचते हैं। उपरोक्त प्रत्येक शिव धाम में एक-एक दिन का पड़ाव होता है। इस पंचकोशी यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि यात्रा में बोल बम या हर-हर महादेव के जय घोष के स्थान पर राम नाम का संकीर्तन किया जाता है। चूँकि छत्तीसगढ़ राम मय है। इसलिए इस यात्रा की यही परंपरा है। महिला-पुरूष आबाल-वृद्ध सभी अपनी शक्ति अनुसार अपनी भक्ति से इस यात्रा में शामिल होते हैं। पंडित जी ने और भी अनेक जानकारियाँ दी। मैंने मामा-भाँचा की किवदंती की जानकारी चाही। चँूकि मैने अपने दादी से सुना था कि जब महानदी में बाढ़ आती है। जब कुलेश्वर मंदिर जल प्रवाह में डूबने लगता है, तब वहाँ से आवाज आती है कि- ’’ममा में बूड़त हव मोला बचा।’’ तब राजिम तट के मंदिर पंचेश्वर महादेव से आवाज आती है कि-’’तैं नई बूड़स भाँचा, चिंता झन कर, मैं हँव ना।’’ कहा जाता है कि इसके बाद बाढ़ का पानी उतरने लगता है। इस पर पंडित जी ने कहा कि हो सकता है, कि कभी ऐसा सच सामने आया हो ? और किवदंती प्रचलित हो गई है। रात काफी हो चुकी थी। अतः हम पंडित जी का धन्यवाद करते हुए, उन्हें प्रणाम कर राजिम के लिए निकले। मेरे आवास व भोजन की व्यवस्था राजेन्द्र मनु जी के घर थी।

रात्रि भोजन के पश्चात राजेन्द्र मनु जी ने एक और जानकारी दी। उन्होंने बताया की भगवान राजिव लोचन का प्रतिदिन श्रृंगार तीन रूपों में होता है। प्रातः काल बाल रूप, दोपहर युवा रूप में और संध्या वृ़द्ध रूप में। इसके अतिरिक्त पर्व व उत्सव के अनुसार जैसे दीपावली, होली, बसंत पंचमी, रक्षाबंधन, दशहरा, जेठवनी एकादशी, चैत्र व कुँवार नवरात्रि, माघ पूर्णिमा, अक्षय तृतीया व सावन महीना में पर्व अनुरूप विशेष श्रृंगार किया जाता है। ये श्रंृगार बड़े ही दर्शनीय होते हैं। इस तरह बातें करते यह तय हुआ कि अगले दिन सुबह मुझे फिंगेंश्वर व कोपरा गाँव जाकर फणिकेश्वर महादेव व कोपेश्वर महादेव के संबंध में जानकारी हासिल करनी है। चूँंकि सभी मित्रों की अपनी-अपनी व्यस्तता थी। इसलिए मुझे वहाँ अकेले ही जाना है।

जब हम घर से बाहर होते हैं और कोई जिम्मेदारी का कार्य सिर पर होता है, तो रात में ठीक से नींद नहीं आती। सुबह मेरी नींद जल्दी खुल गई और मैं जल्दी ही तैयार हो गया। और राजेन्द्र मनु जी के परिवार का आत्मीय आभार व्यक्त हुए गंतव्य के लिए निकला। मनु जी छोड़ने के लिए राजिम बस स्टैण्ड आए। संयोग से फिंगेश्वर महादेव जाने वाली बस खड़ी थी। बस में बैठा और रिमझिम वर्षा शुरू हो गई। सुबह के 7 बज रहे थे। रास्ते भर हरे-भरे धान के छोटे-छोटे पौधे झूम रहे थे। ग्रामीण महिलाएं खेतो में काम करने के लिए मोरा ओढ़े घरांे से निकल रही थीं। राजिम से फिंगेश्वर की दूरी 17 किलोमीटर है। आधा-पौन घण्टे में मैं फिंगेश्वर पहुँच गया। बस स्टैण्ड में मैंने मंदिर का रास्ता पूछा। छाता साथ था, इसलिए बरसते पानी में मंदिर पहुँच गया। सावन का प्रथम सोमवार होने के कारण श्रद्धालुओं की भीड़ थी। मंदिर समिति की ओर से प्रसादी वितरण की व्यवस्था चल रही थी।

फिंगेश्वर पुरानी जमींदारी रही हैं। यहाँ का फणिकेश्वर मंदिर 10 वी शताब्दी का है। पुरातत्व व शिल्प की दृष्टि से मंदिर सुदृढ़ और सुंदर है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण फणिनागवंशी राजाओं द्वारा किया गया है। इसलिए इसे फणिकेश्वर महादेव कहते हैं। गर्भगृह में शिवलिंग विराजमान है। फणिकेश्वर महादेव में शंकर की ष्ईशानष् नाम वाली मूर्ति है। इनकी अर्धांगिनी अंबिका है। फिगेश्वर पंचकोशी यात्रा का चौथा पड़ाव है। यहाँ गणेश जी व चामुण्डा की मूर्तियों हैं। मंदिर कलश विहिन है। कलश मंदिर के भीतर ही रखा हुआ है। मंदिर की वाह्य दिवारों में रामकथा व कृष्णा कथा से संबंधित अनेकों आकर्षक व सुंदर मूर्तियां हैं। दशावतारों से जुड़ी मनोहारी मूर्तियों के साथ अनेक मिथुन मूर्तियां हैं। इसी प्रांगण में पंचदेव मंदिर है, जो बहुत ही सुंदर है। इसे यहाँ के जमीदारों ने बनवाया है। पंचदेव मंदिर के सामने एक प्राचीन बावली है। मंदिर प्रांगण में राजपुरोहित मनीष तिवारी, पंडित नंदलाल प्रसाद शुक्ला, पुजारी देवानंद गोस्वामी, नगर पंचायत अध्यक्ष जगदीश यादव तथा नगर पंचायत फिंगेश्वर के सी.एम.ओ. प्रदीप मिश्रा जी से भेंट हुई। उन्होंने इस सर्वेक्षण कार्य को सराहते हुए कई जानकारियाँ दी।

राजिम पंचकोशी यात्रा का पांचवाँ पड़ाव ग्राम कोपरा के कोपेश्वर महादेव हैं। जिन्हें कर्पूरेश्वर महादेव भी कहा जाता है। फिंगेश्वर से कोपरा जाने के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं हुआ। अतः मुझे पुनः राजिम आना पड़ा और कोपरा जाने के लिए बस की प्रतिक्षा करता रहा। इसी बीच मैने कोपरा निवासी अपने मित्र श्री मुन्नालाल देवदास को फोन किया। मेरा उद्देश्य था कि कोपरा पहुँचकर इस सर्वेक्षण कार्य में उनका सहयोग ले सकूँ। बात नहीं हो पायी। देवदास जी साहित्यिक अभिरूचि के शिक्षक हैं। रामायण के ज्ञाता व राष्ट्रपति से पुरस्कृत सम्मानित शिक्षक हैं। कोपरा मैं पहली बार जा रहा था। इसलिए आसरा जरूरी था। थोड़ी देर बात कोपरा के लिए बस आयी, मैं सवार हुआ। तभी देवदास जी का फोन आया। मन प्रसन्नता से खिल गया। मैंने कोपरा पहुँचने की बात कही, तो वे भी प्रसन्न हुए। किन्तु सहयोग नही कर पाने के लिए खेद व्यक्त किया। क्योंकि उनके स्कूल में मीटिंग थी और उनकी उपस्थिति जरूरी थी। इस स्थिति में उन्होंने कोपेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी को सहयोग करने के लिए कहने का आश्वसन दिया।

रिमझिम बारिस के साथ बस चलती रही। लगभग 12-15 किमी. की यात्रा कर मैं कोपरा पहुंचा तो बस स्टैण्ड पानी से लबालब भरा हुआ था। बस से उतरते ही एक महिला से मैंने मंदिर का रास्ता पूछा, तो उन्होंने कहा कि मैं उधर ही जा रही हूँ। मैं शिक्षिका हूँ। आप साथ चलिये मैं रास्ता बता दूँगी। उनकी आत्मीय बातों से मुझे अच्छा लगा मैनें बताया की मैं भी शिक्षक था। अब सेवानिवृत्त हो गया हूँ। अपने आने का उद्देश्य और नाम बताया, तो खुश होकर बोलीं-मैं तो आपकी छत्तीसगढ़ी कहानी, लेख और कविताएं जो हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में हैं उन्हें बच्चों को पढ़ाती हूँ। यह सुनकर मुझे अच्छा लगा। कोपरा बस स्टेण्ड से मंदिर लगभग 2 किमी. दूर है। मैडम का स्कूल सामने था। उन्होंने इशारे से बताया कि इस रास्ते से सीधा जाइये। तालाब के बीचों बीच महादेव जी का मंदिर है। मैं उन्हें धन्यवाद देकर आगे बढ़ा।

बड़ा मनभावन दृश्य। तालाबों के बीच मंदिर दूर से दिखाई दे रहा था। महिलाएं और नन्हीं बेटियाँ हाथों में बाल्टी में जल और पूजा की थाली लिये मंदिर की ओर जा रही थीं। कोपरा पंचकोशी यात्रा का पांचवा और अंतिम पड़ाव है। तीन तालाब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। पास ही श्मशान घाट है। पीपल के वृक्ष पर मृतक कर्म के लिए काली हंडियां लटक रही हैं। मुझे लगा कि भगवान शिव का यह सही स्थान है। जो अपने भूत-पिशाचों के साथ यहाँ निवास करते हैं। एक तालाब के गहरे पानी में निर्मित यह शिव मंदिर दूर से तालाब के जल में झिलमिला कर मनोरम दृश्य उत्पन्न कर रहा है। पूछने पर पता चला कि यह दलदली तालाब है। जिसे शंख सरोवर भी कहा जाता है। श्रद्धालुओं की भीड़ में महिलाओं की संख्या अधिक थी। मैंने पुजारी श्री मनोहर प्रसाद शर्मा को प्रणाम कर अपना परिचय दिया। उन्होंने प्रसन्न मुद्रा में आशीर्वाद दिया और बताया कि देवदास गुरूजी ने आपके आने की खबर दी है। मैंने मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश किया, तो शिवलिंग को देखकर आंखें चमत्कृत हो गयीं। क्योंकि अब तक मैंने पंचकोशी यात्रा के जितने भी मंदिरों में शिवलिंग की दर्शन किये उनका रंग काला या कत्थई था। किन्तु इस मंदिर में विराजित शिवलिंग के रंग संगमरमर की तरह धवल, किन्तु विशेष आभा लिये हुए कपूर की तरह चमकदार और उज्जवल है। तब मुझे स्मरण हो आया कि शायद इसी कारण इसे कर्पूरेश्वर महादेव कहा जाता है। पुजारी जी ने जानकारी दी कि कर्पूरेश्वर महादेव में वामदेव नाम की मूर्ति है, इनकी अर्धांगिनी भवानी है। ये आनंदमय कोश के प्रतीक हैं। ये अपने सभी भक्तों को आनंदित करते हैं। कोपरा गरियाबंद जिले का सबसे बड़ा और उन्नत गाँव है। सामाजिक सहभागिता और धार्मिक कायों के लिए दूर-दूर तक इसकी प्रसिद्धि है। कर्पूरेश्वर महादेव की कृपा यहाँ सदैव सब पर बरसती रहती है। कोपरा से पैदल चलकर पंचकोशी यात्री पुनः राजिम पहुँचते हैं। तब कुलेश्वर महादेव में ही यात्रा का समापन विधि-विधान से होता है। यह है राजिम की पंचकोशी यात्रा।

मुझे पंचकोशी यात्रा में शामिल होने का अवसर नही मिला, लेकिन अभी पंचकोशी पथ के सभी शिवलिंगों की यात्रा कर मुझे आत्मिक सुख मिला। मैं अपने सभी सहयोगियों को अपने इस शोध व सर्वेक्षण कार्य की सफलता में सहभागी बनने के लिए फोन से धन्यवाद देते हुए देर रात तक कोपरा से रायपुर और रायपुर से गंडई पहुँचा। मैंने यह अनुभव किया कि हमारी सनातनी परम्परायें केवल हमें ज्ञान ही नहीं देतीं बल्कि हमारे मनप्राण को ऊर्जा से भर देती हैं। कला, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व आदि से परिचित कराकर जीवन को गौरव से संपृक्त करती हैं।

आलेख

डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.)
मो. नं. 9424113122

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