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पुन्नी मेला अब पुन: राजिम कुंभ

माघ पूर्णिमा को मेले तो बहुत सारे भरते हैं, परन्तु राजिम मेले का अलग ही महत्व है। राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है, यहाँ पैरी, सोंढूर एवं महानदी मिलकर त्रिवेणी संगम का निर्माण करती हैं। भारतीय संस्कृति में जहाँ तीन नदियों का संगम होता वह स्थान तीर्थ की लोक मान्यता पा जाता है। जहाँ विभिन्न पर्वों पर जनमानस स्नान एवं पिंडदान जैसे कार्यों को सम्पन्न करता है।

राजिम का पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक महत्व है। राजधानी रायपुर से 45 किमी की दूरी पर यह स्थान दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है। यहाँ बहुत सारे प्राचीन मंदिर हैं तथा वर्तमान में नवापारा नगर इस क्षेत्र का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र भी है।

पौराणिक महत्व
इतिहासकार स्व: डॉ विष्णु सिंह ठाकुर के अनुसार राजीव लोचन क्षेत्र को पद्मक्षेत्र कहा जाता है, यहाँ भगवान विष्णु की नाभि स्थित कमल की पांच पंखुड़ियाँ गिरी थी, इसलिए इस क्षेत्र की पौराणिक मान्यता बहुत अधिक है। चंपा्झर, बम्हनी, फ़िंगेश्वर, कोपरा एवं पटेवा नामक स्थानों पर कमल की पंखुड़ियों का पात हुआ, इसलिए इन स्थानों पर चंपेश्वर, बम्हनेश्वर, फ़णीकेश्वर, कोपेश्वर तथा पाटेश्वर नामक महादेव विराजते हैं तथा पंचकोशी यात्रा होती है।

इस स्थान पर राजीव लोचन के नाम से भगवान विष्णु विराजते हैं तथा त्रिवेणी संगम पर कुलेश्वर (उत्पलेश्वर) महादेव विराजते हैं। नदी तट पर लोग अपने पुरखों का पिंडदान करते हैं तथा यहाँ के निवासी मालवीय ब्राह्मणों से कर्मकांड सम्पन्न करवाते हैं। लोग दूर-दूर से मृतक की अस्थियों का विसर्जन भी पुण्य सलिला चित्रोत्पला गंगा (महानदी) में करने आते हैं।

ऐतिहासिक महत्व
राजिम के राजीव लोचन मंदिर में दो शिलालेख जड़े हुए हैं, जिनमें से एक नलवंशी शासक विलासतुंग एवं दूसरा कलचुरियों के सामंत जगपाल का है।

जगपाल ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था तथा कहते हैं कि विलासतुंग ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। परन्तु कुछ विद्वानों का मत है कि यह मंदिर विलासतुंग से भी पूर्व का है तथा उसने भी जीर्णोद्धार ही कराया था। वैसे यह निर्माण आठवीं सदी ईस्वीं का माना जाता है।

इस क्षेत्र से दक्षिण कोसल का इतिहास जुड़ा हुआ है। यहाँ प्राप्त शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों से इस स्थल की प्राचीनता प्रकट होती है। राजिम नाम राजीव का अपभ्रंश माना जाता है, इसके पीछे एक मान्यता यह भी है कि यह नाम राजिम नामक तेलीन के नाम पर रुढ़ हुआ। यहाँ राजीव लोचन का मंदिर पंचायतन शैली का है, जिसमें मुख्य मंदिर के साथ चारों कोणो में वराह, नरसिंह, बद्रीनाथ तथा वामन भी स्थापित हैं।

इनके अतिरिक्त इस परिसर में जगन्नाथ भगवान, राजेश्वर एवं दानेश्वर नामक महादेव भी स्थापित हैं। राजेश्वर एवं दानेश्वर मंदिर शैव हैं, बाकी वैष्णव मंदिर हैं। इसके साथ ही राजिम में कुलेश्वर महादेव तथा राम मंदिर नामक प्राचीन मंदिर हैं। राम मंदिर के स्तंभों पर कामकेलि का अंकन भी दिखाई देता है, जो राजीव लोचन मंदिर परिसर में नहीं है।

पुरातात्विक महत्व
राजिम नगर का पुरातात्विक महत्व भी वर्तमान के उत्खन्न से प्रकट हुआ है। यहाँ सीता बाड़ी में उत्खनन के पश्चात प्राचीन शिवालय, जैन प्रतिमा, कुंआ, शंख की चूड़ी बनाने का कारखाना तथा सिरेमिक की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इससे ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में यह स्थान अत्यंत समृद्ध था।

महानदी के तट पर ही सिरकट्टी में बंदरगाह के अवशेष प्राप्त हुए हैं, लेट्राइट की गोदियों को देखने के बाद विद्वान इसके पांच हजार वर्ष प्राचीन होने का अनुमान लगाते हैं। इसके समीप ही सिरक्ट्टी नामक स्थान है, जहाँ शीश विहीन प्रतिमाएं प्राप्त होती हैं।

राजीव लोचन मंदिर के साथ एक विचित्रता भी जुड़ी हुई है, इस मंदिर के पुजारी ब्राह्मण न होकर क्षत्रिय हैं। रायपुर गजेटियर के अनुसार इनके पास एक ताम्र शासन भी है, जिसमें पाण्डववंशी राजा तीवरदेव ने पिंपरोपद्रक नामक गांव किसी ब्राह्मण को दान में देने का उल्लेख है। यह ग्राम अभनपुर-राजिम मार्ग पर स्थित पिपरोद हो सकता है। राजा जगपाल के शिलालेख में शाल्मलि गांव नैवेद्य के लिए देने का उल्लेख है, जो सेमरडीह है।

नदी के इस पार नवापारा नगर है, जो वर्तमान में प्रमुख व्यावसायिक नगर बन गया है, जो शासकीय अभिलेखों में गोबरा नवापारा के नाम से दर्ज है। रायपुर गजेटियर के अनुसार पहले यह राजिम का ही छोटा पारा था। जिसे राजा बिम्बाजी भोसला ने राजिम के मंदिर की गोबरी अर्थात कण्डों के लिए दिया था इसी लिए यह गोबरा कहलाता है।

सांस्कृतिक महत्व
छत्तीसगढ़ में राजिम का सांस्कृति महत्व भी उल्लेखनीय है। यहाँ प्रति वर्ष माघ पूर्णिमा से लेकर शिवरात्रि माघी पुन्नी मेला भरता है। वैसे तो माघ पूर्णिमा पर कुदूरमाल (कोरबा) दामखेड़ा (सिमगा) शिवरीनारायण-खरौद, सिरपुर, सेतगंगा, रतनपुर, बेलपान, लोदाम, बानबरद, झिरना, डोंगसियार (पांडा तराई), खड़सरा, सहसपुर, चकनार-नरमदा (गंडई), कंवर मड़ई, रुद्री मेला, देवपुर (धमतरी) आदि मेले भरते हैं परन्तु राजिम मेला इनसे अधिक प्रसिद्ध है।

यह मेला कब से भर रहा है इसके विषय में कोई ठोस जानकारी तो नहीं मिलती परन्तु रायपुर गजेटियर के अनुसार इसे माघसुदी अष्टमी से भरना बताया गया है, जो एक माह तक चलता था। वर्तमान में इसका समय घट कर चौदह दिन हो गया है। गजेटियर में उल्लेख है कि तत्कालीन समय में शिवरात्रि के दिन पचास सहस्त्र लोगों का जमावड़ा होता था।

मेले के समय हर प्रकार की वस्तु यहाँ बिकने आती थी, ढोर तक बिकने आते थे। सन 1896 के मेले में साढ़े चार लाख रुपये का माल बिक्री के लिए आया था जिसमें दो लाख का माल बिका तथा मेले में विभिन्न वस्तुओं की 900 दुकाने लगी थी।

स्व: गोपाल कृष्ण अवधिया बताते थे कि उनके पूर्वज मेले के पूर्व कांसे की पैरी साल भर बनाकर तैयार करते थे फ़िर रायपुर से बैलगाड़ी में सारा सामान लेकर राजिम पहुंचते और साल भर निर्मित की जाने वाली पैरी (पायल) एक महीने के मेले में बिक जाती थी। राजिम मेले में लोग अपने रिश्तेदारों से मिलते और कईयों के तो यहाँ शादी विवाह के संबंध भी तय हो जाते थे।

वर्तमान में मेले का रुप बदल गया है, एक महीने का मेला पन्द्रह दिन का हो गया है। पिछले पन्द्रह वर्षों में भाजपा सरकार ने इसे राजिम कुंभ का नाम देकर प्रचारित किया। यहाँ कुंभ के जैसे साधु संतों का जमावड़ा होने लगा तथा भजन प्रवचन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होने लगे। छत्तीसगढ़ का यह इकलौता पुन्नी मेला था जिसे राजिम कुंभ के नाम से प्रसिद्धि मिली।

कांग्रेस सरकार ने इसका नाम परिवर्तन कर पुन्नी मेला कर दिया, जो पहचान इन पन्द्रह वर्षों में राजिम कुंभ के नाम से स्थापित हो गई थी वह अब लोप हो गई थी। वर्तमान में भाजपा सरकार ने इसे पुन; राजिम कुंभ रुप में प्रारंभ किया है। अब पहले की तरह साधू संतों का आगमन हो रहा है तथा इनके दर्शन का लाभ मेले में आने वाले लोगों को मिलेगा।

नोट – राजिम कुंभ 24 फ़रवरी 2024 से शिवरात्रि 9 मार्च 2024 तक भरेगा/लगेगा।

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