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नागों का उद्भव एवं प्राचीन सभ्यताओं पर प्रभाव

नागपंचमी विशेष आलेख

प्राचीनकाल में नागों की सत्ता पूरी दुनिया पर थी, जिसके प्रमाण हमें आज भी मिलते हैं। भूगोल की शायद ऐसी कोई संस्कृति या सभ्यता न हो जहाँ नागों का वर्चस्व या प्रभाव न दिखाई देता हो। चाहे भारतीय संस्कृति/सभ्यता हो, चाहे माया सभ्यता हो चाहे मिश्र की सभ्यता हो, नागों का मान सभी सभी सभ्यताओं में दिखाई देता है। इसे हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि गंगा की सभ्यता, नील नदी की सभ्यता एवं अमेजन नदी की सभ्यता हो, नागों की उपस्थिति बराबर दृष्टिगोचर होती है।

पाठशालाओं में नाग पंचमी पूजा

नाग सभी कालखंडों में चाहे सर्प के रुप में हो या मनुष्य के नागवंश के रुप में पाये जाते हैं। नागों का जिक्र आते ही सामने साक्षात मृत्यु दिखाई देती है, क्यों न दिखाई दे, नाग हैं ही काल के बोधक। लेकिन सृष्टि में नागों एवं मनुष्यों का साथ सृष्टि के प्रारंभ से ही रहा है। यह भी सत्य है कि पृथ्वी के जिस भूखंड पर भी मनुष्य ने अपना निवास बनाया, वहाँ नागों का ही बसेरा रहा है।

सृष्टि में बहुत सारे जीव जन्तु हैं किन्तु गाय के बाद सर्प ही एक ऐसा जीव है जिसका हिन्दू धर्म में ऊंचा स्थान है। लोक में जिस भूमि पर भी घर बनाया जाता है, उसे पूजने की परम्परा है। इसे भूमि- पूजन कहा जाता है। भूमि पूजन में लोग चांदी के नाग बनवाकर भूमि में दबाते हैं। इसका कारण अनिष्ट की आशंका एवं भूमि के पूर्व स्वामी के प्रति आदर व्यक्त करना है।

नागों की उत्पत्ति एवं भारतीय संस्कृति सभ्यता पर प्रभाव

नागों के संबंध में पौराणिक ग्रंथों में बहुत लिखा गया है तथा नागों के उद्भव के विषय में शास्त्रों में वर्णन हुआ है। पुराणों के अनुसार महर्षि कश्यप को दूसरा ब्रह्मा माना जाता है क्योंकि उनके द्वारा अनेकानेक योनियों की सृष्टि हुई मानी जाती है। उनकी कद्रु नामक पत्नी से सर्पों की उत्पत्ति हुई और विनता नामक पत्नी से पक्षियों की उत्पत्ति हुई।

कश्यप ॠषि एवं कद्रु की संतान अनन्त, वासुकि, तक्षक, ककेटिक, पद्म, महापद्म, शंख तथा कुलिक नाग अष्टकुली कहलाते हैं। अथर्ववेद में कुछ अन्य नागों का नाम भी मिलता है। जिनमे श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नागों में चित्ती कोबरा (पृश्चि), करैत, घास के रंग का – उपतृण्य, पीला -ब्रम, असिता रंग रहित-अलीक, दासी, दुहित, असति, तगात, अमोक और तवस्तु आदि का उल्लेख है।

नागों का उत्पात पृथ्वी पर बढने लगा तो उनके विष दंश से मनुष्यों के प्राण जाने लगे। तब प्रजा व्याकुल होकर ब्रह्मा जी की शरण में गई। ब्रह्मा जी ने वासुकि आदि बड़े नागों को बुलाकर शाप दिया कि वैवस्वत मन्वन्तर में सोमवंशी राजा जनमेजय के नाग यज्ञ से तुम्हारा विनाश होगा और गरुड़ तुम्हारा भक्षण करेंगे।

स्थापत्य कला में नागवल्लरी अंकन

ब्रह्मा ने उनसे यह भी कहा कि तुम्हारे रहने के लिए मैने सुतल, वितल और तलातल का राज्य दे दिया है, पाताल तक तुम लोगों का ही स्थान रहेगा। इस संदर्भ में महाभारत की राजा परीक्षित एवं जनमेजय के नाग यज्ञ की कथा प्रसिद्ध है।

कश्यप ॠषि की भूमि कश्मीर

पुराणों के अनुसार कश्यप ॠषि की भूमि कश्मीर है और नाग कश्यप ॠषि एवं कद्रू की संतान होने के प्रमाण वहां के नगरों के नामो से मिलता है। अनंतनाग, शेषनाग इत्यादि स्थानवाचक नाम कश्मीर में मिलते हैं। अनंतनाग इलाका अनंतनागों का गढ़ था। इस तरह कश्मीर के अन्य क्षेत्र भी कश्यप पुत्रों के अधीन थे।

हिन्दू धर्म के अनुसार शिव जी ने नाग को गले में धारण किया तथा वैष्णव मत के आधार पर शेष नाग विष्णु जी की शैय्या बने। जैन धर्म में भी पार्श्वनाथ एवं सुपार्श्वनाथ के छत्र के रुप में नाग दिखाई देते हैं। गीता में भगवान कृष्ण भी कहते हैं कि नागों अनंत (शेषनाग) हूँ। गर्ग संहिता के अनुसार पृथ्वी का भार शेष नाग ही वहन करते हैं एवं लक्ष्मण एवं बलराम शेष नाग के ही अवतार माने जाते हैं।

काली नाग की कथा भी कई शास्त्रों एवं पुराणों में मिलती है। गरुड़ के भय से काली नाग रमणक द्वीप से भागकर सौमरि मुनि के श्राप से गरुड़ संरक्षित ब्रज भूमि ले एक दह में आकर रहने लगा। इसी के नाम पर यमुना तट पर कालीदह नामक स्थान प्रसिद्ध है। बलराम के कहने पर कृष्ण ने काली नाग को वहाँ से भगा दिया।

नाग कन्या का उल्लेख

नाग कन्या का उल्लेख मिलता है, कुंती पुत्र अर्जुन ने पाताल लोक की एक उलुपी नामक नाग कन्या से विवाह किया था। उलुपी के गर्भ से इरावान नामक पुत्र पैदा हुआ। तमिलनाडु के कई हिस्सों में बड़ी संख्‍या में भगवान इरावन के मंदिर बने हैं। भीम के पुत्र घटोत्कच्छ का विवाह भी एक नाग कन्या से हुआ, जिसका नाम अहिलवती था और उससे वीर एवं योद्धा पुत्र बर्बरीक पैदा हुआ।

भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण तक नाग पूजा की जाती है। मंदिरों के स्थापत्य में इसे प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। भारत में नागपंचमी का त्यौहार प्रमुखता से मनाया जाता है। इसे दक्षिण में नागर पंचमी कहा जाता है। भविष्य पुराण में उल्लेख है कि – श्रवणे मासे पंचभ्यां शुक्ल पक्ष नराधिप। द्वारस्यो भयतो लेख्या गोभयेन विषोल्गवा:। यह त्यौहार श्रावण शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है। नाग पंचमी के दिन नाग की प्रतिमा या चित्र की पूजा करके उस पर दुग्ध अर्पण किया जाता है। दक्षिण भारत में इस दिन बांबीयों की पूजा की जाती है तथा पुष्प एवं सुगंध चढ़ाते है तथा वृक्षों के नीचे रखी हुई सर्प प्रतिमाओं के दर्शन किये जाते हैं।

सर्प पूजनीय इसलिए माना जाता है कि इसे लोकधर्म का देवता माना गया है। सर्प तीव्रगति, मार्ग की कठिनाई का सूचक है। सर्प का केचुंली छोड़ना आत्मा का बंधन त्यागने का प्रतीक है। इसे गुप्त वैभव का भी प्रतीक माना जाता है। नाग गड़े हुए धन के रक्षक माने जाते हैं ऐसी लोक मान्यता है। नाग पाश सांसारिक मोहमाया का भी प्रतीक माना जाता है। नाग के सहस्त्र फ़न मानवीय अवचेतन की सह्स्त्रेच्छाओं के प्रतीक हैं।

राजा रानी मंदिर भुबनेश्वर की द्वार शाखा पर नाग नागिन अंकन

सर्प विषा महा पंचमी भी नाग पंचमी का शास्त्रीय नाम है। नाग के प्रति सम्मान के प्रमाण अनेक स्थानों से प्राप्त होते हैं, शिव जी ने नाग को गले में धारण किया है। मथुरा में नाग टीला है, यहा पूजन करने से सर्प दोष से मुक्ति की मान्यता है। इस टीले पर नाग बिहारी का मंदिर है। अजंता की गुफ़ाओं में भी नाग के चित्र हैं, मालाबार में नागों के लिए कुछ भूमि छोड़ी गई है, जिसे नागवन कहा जाता है।

छत्तीसगढ़ अंचल में नाग पंचमी

छत्तीसगढ़ अंचल में नाग पंचमी का विशेष महत्व है, हरियाली अमावस्या यानि हरेली के पाँचवे दिन नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन किसान अपने घरों और खेतों में नाग नागिन की पूजा करते हैं और उन्हें दूध लाई (लावा) का प्रसाद अर्पित करते हैं। खेतों में कीड़े मकोड़ों और चूहों को खाकर सर्प फसलों की रक्षा करते हैं। किसानों के मन में जीव जंतुओं के लिए भी आभार की उदात्त भावना है जिनसे उसे विष का भय रहता है। वे फसलों की सुरक्षा के साथ अपने परिवार को भी आपात भय से बचाए रखने की उनसे प्रार्थना करते हैं।

गुरु शिष्य परम्परा से सपहर मंत्र दीक्षा

नागपंचमी पर ग्रामीण अंचल में गुरु सर्प के मंत्र शिष्यों को बोलकर सिखाता है तथा इस दिन गुरु शिष्य को पाठ पीढ़ा याने शिष्यत्व प्रदान करता है। जांजगीर शहर की पुरानी बस्ती के कहरापारा में “नगमत” का आयोजन प्रतिवर्ष किया जाता है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ के बहुत से गांवों और कस्बों में अब भी जीवित है। इस दिन “सपहर” मंत्र की दीक्षा नए शिष्यों को नगमत गुरू प्रदान करते हैं। पीढ़े पर नाग नागिन और गुरू के चित्र को वर्तमान पीढ़ा गुरू लेकर बैठता है। यहाँ पीढ़ी या पीढ़ा से आशय पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परिपाटी से भी है इसलिए इसे पीढ़ा-पाठ कहा जाता है।

नगमतिया और साबर मंत्र

साबर मंत्र ही स्थानीय बोली बानी में सपहर मंत्र के रूप में प्रचलित है। चूंकि यह साँप से संबंधित है इसलिए इसे सपहर मंत्र भी कहा जाता है। यानि साँप के विष को हरने वाला मंत्र सपहर, जिसकी अबूझ रचना में इस तरह ध्वन्यात्मकता और प्रवाह है कि इसके रचयिता लोक गुरूओं की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ता है। सपहर मंत्र के दौरान झांझ और मांदर की उत्तेजक थाप के साथ लयबद्ध रूप से गुरू महिमा को बखान कर गाये जाते हैं। कई स्थानों पर गुरु बहुत ही कम मात्रा में शिष्यों को सर्प विष का सेवन भी कराते हैं।

नगमत की समाप्ति के बाद एक औषधि भी गुरू प्रसाद स्वरूप खिलाया जाता है जो वर्तमान गुरू अपने हाथों से अभिमंत्रित कर सबको प्रदान करता है। कहते हैं कि इसे खाने से साल भर विष का कोई प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता । इसे प्रसाद रूप में ग्रहण करने वाले बताते हैं कि यह इतना कड़ुवा होता है कि इसे मुँह में रखते ही थूकने को जी करता है । पर थूकने की सख्त मनाही होती है । कहा जाता है कि चबाकर निगल जाने पर ही इसका साल भर असर रहता है।

दलहा पहाड़ पर नाग पंचमी का मेला

छत्तीसगढ़ के अकलतरा से सात किमी दूरी पर दलहा पहाड़ स्थित है, यहाँ प्रतिवर्ष नागपंचमी का मेला भरता है। वर्ष में एक दिन नागपंचमी के दिन यहाँ जन सैलाब उमड़ पड़ता है, इनकी मंजिल दलहा पहाड़ होता है, दलहा पहाड़ के शीर्ष पर पहुंचने के लिए खड़ी चट्टानों से होकर लगभग चार किमी की चढ़ाई करनी पड़ती है। पहाड़ पर दलहा बाबा विराजमान हैं, शिखर पर कभी न सूखने वाला सूर्य कुंड एवं पवन कुंड है, इन कुंडों में बारहों महीने पानी रहता है।

दलहा पहाड़ की तलहटी में नाग नागिन, अर्धनारीश्वर मंदिर, श्री कृष्ण मंदिर और सिद्धमुनि आश्रम स्थित है। श्रद्धालु यहाँ आकर देव दर्शन का लाभ उठाते हैं। दलहा पहाड़ की चढ़ाई दुर्गम है, तथा चढ़ने वाले की शारीरिक क्षमता एवं बल का परीक्षण हो जाता है। शिखर पर स्थित दोनों जल कुंडो को चमत्कारिक माना जाता है, मान्यता है कि सूर्य कुंड का जलपान करने से लोग वर्ष भर स्वस्थ रहते हैं।

विख्यात नाग मंदिर एवं पूजा

नागचंद्रेश्वर का मंदिर मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर परिसर में स्थित है। यह मंदिर साल में सिर्फ एक बार नागपंचमी के दिन ही भक्तों के दर्शन के लिए खोला जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान नागचंद्रेश्वर का दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भविष्य में सर्प से कोई भय नहीं रहता है। वह सर्पदोष से मुक्त हो जाता है। इस दिन यहां पर कालसर्प दोष दूर करने के लिए लोग विशेष पूजा करते हैं।

नाग देवता की पूजा के लिए केरल के अलेप्पी जिले में स्थित मंदिर दुनिया भर में प्रसिद्ध है क्योंकि इस मंदिर में नागों की हजारों प्रतिमाएं स्थापित हैं। लोग इसे स्नेक टेम्पल के नाम से भी जानते हैं. केरल के अलेप्पी जिले से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर हरे–भरे जंगलों से घिरा हुआ है। नागों के इस महातीर्थ स्थान के बारे में मान्यता है कि यदि यहां पर पूजा करने से लोगों की सूनी गोद भर जाती है और स्वस्थ सुंदर संतान की प्राप्ति होती है।

नाग कुल नाम धारक शासक

छत्तीसगढ़ में कुछ जनजातियां तथा जातीय समुदाय नागवंशी तथा नाग कुलनाम धारण करते हैं। शासकों के वंश भी नागों से चले हैं तथा नागवंशी शासक भी हुए हैं, फ़णी नागवंशी एवं छिंदक नागवंशी शासक प्रसिद्ध हुए हैं। इसके साथ ही मंदिरों के द्वार शाखा एवं भित्तियों पर अधिकतर नाग-नागिन का अंकन मिलता है। वासुकि नाग एवं पद्मा नागिन का पाताल लोक के राजा-रानी के रुप में वर्णन मिलता है।

स्थापत्य में नागांकन

मंदिर स्थापत्य में नागों को एक दूसरे से गुंथित या नाग-वल्लरी के रुप में दिखाया जाता जाता है भारतीय शिल्पकला में इन्हें देवों के रुप में प्रधानता से स्थान दिया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि मंदिर के प्रवेश के समय इनके दर्शन करना शुभ एवं सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। प्रागैतिहासिक शैलचित्र कला में नाग का चित्रण, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा से प्राप्त मुद्राओं पर नागों का अंकन हुआ है, जो नागपूजा का प्राचीनतम प्रमाण माना जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि मानव प्राचीन काल से नागपूजा कर रहा है।

राजीव लोचन मंदिर राजिम के द्वार ललाट बिंब पर शेष शैय्या में भगवान विष्णु

नाग का भारतीय धर्म एवं कला से घनिष्ठ संबंध रहा है। कहा जाए तो नागपूजा हड़प्पा काल से लेकर वर्तमान काल तक चली आ रही है। इसके पुरातात्विक एवं साहित्य प्रमाण प्रचुरता में मिलते हैं। मंदिरों की द्वार शाखाओं पर नागाकृतियों का उत्कीर्ण किया जाना, विष्णु की शैय्या के रुप में, शिव के गले में, बलराम एवं लक्ष्मण को शेषावतार के रुप में प्रदर्शित किया जाना। वासुकिनाग का समुद्र मंथन के साथ उल्लेख, वराहावतार का प्रतिमा के साथ नाग का आबद्ध होना, भारतीय संस्कृति में नागपूजा एवं उसके महत्व को प्रदर्शित करता है।

माया सभ्यता में नाग

अमेजन नदी घाटी की माया सभ्यता लैटिन अमेरिका के आधुनिक नगरों युकटान, क्विंटाना, कैम्पेचे, टबैस्को, चियापास, ग्वाटेमाला, बेलीज़, अल सल्वाडोर और होंडुरास में पाई जाती है। यह इन स्थानों पर पुष्पित पल्लवित हुई। माया सभ्यता की उत्पत्ति युकाटन प्रायद्वीप में हुई थी। इसे अपनी विशाल वास्तुकला, गणित और खगोल विज्ञान की उन्नत समझ के लिये जाना जाता है।
माया का उदय लगभग 250 ई० से शुरू हुआ और पुरातत्त्वविदों को माया संस्कृति के क्लासिक पीरियड के रूप में जाना जाता है जो लगभग 900 ई० तक चला। अपनी चरम स्थिति में माया सभ्यता में 40 से अधिक शहर शामिल थे, जिनमें से प्रत्येक की आबादी लगभग 5,000 से 50,000 के बीच थी। इस प्राचीन सभ्यता में स्नेक किंग का उल्लेख मिलता है, जो प्रसिद्ध राजा था।

माया सभ्यता का स्नेक किंग (नाग राजा)

लैटिन अमेरिका के सघन वन में प्राप्त माया सभ्यता में नाग शासकों के प्रमाण मिलते हैं, जिन्हें वहां के आर्कियोलऑजिस्ट “स्नेक किंग” संबोधित कर रहे हैं, वे भी नागवंशी राजा ही हैं। इससे भारतीय लोककथाओं में पाताल का राज नागों को दिये जाना सत्य प्रमाणित होता है। स्नेक किंग की जानकारी प्राप्त होने से ज्ञात होता है कि नागवंशी राजाओं का वर्चस्व पाताल लोक तक था। भारत का नागवंश लेटिन अमेरिका तक कैसे पहुंचा? यह शोध का विषय है।

मिश्र की सभ्यता में नाग

प्राचीन मिश्र के चौदहवें राजवंश के राजा ‘अपेपी और ग्रेटर हिक्सोस राजा अपोफिस के नाम से जाना जाता है। अपेप को एक विशाल सांप या सर्प के रूप में देखा गया था, जिसके कारण सर्प फ्रॉम द नाइल और एविल ड्रैगन जैसी उपाधियाँ प्राप्त हुई थीं। सी-वेयर बाउल (अब काहिरा में) पर एक सांप को रेगिस्तान और जलीय जानवरों के साथ मिलकर एक देवता के संभावित दुश्मन के रूप में चित्रित किया गया था। इस तरह मिश्र की प्रसिद्ध प्राचीन सभ्यता में नागों की उपस्थिति भी दिखाई देती है, यहाँ शेख हरेदी नामक सर्प की पूजा बड़ी धूमधाम से की जाती है। श्रद्धापूर्वक इस उत्सव को मनाया जाता है। तत्कालीन मिश्री लोग सर्प मुंह की बनी छड़ी धारण करते, इस छड़ी का मूठ सर्पाकृति हुआ करता था।

मिश्र की सभ्यता में नाग

इस तरह हमें दिखाई देता है कि भारत से लेकर विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में नाग (सर्प) किसी न किसी रुप में विद्यामान हैं। नाग ही ऐसा रहस्यमयी जीव है, जिसने विश्व की सभी सभ्यताओं को प्रभावित किया एवं अपना प्रभाव स्थाई रुप से छोड़ा। जो हमें वर्तमान में भी दिखाई दे रहा है। भारत में नाग पंचमी का त्यौहार उल्लासपूर्वक मनाया जाता है तथा इस दिन ग्रामों एवं नगरीय अखाड़ों में मल्लक्रीड़ा (कुश्ती) प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इस प्रतियोगिता में पहलवान अपनी जोर आजमाईश करते हैं। सर्प को किसानों का मित्र भी है, जो चूहों को अपना भोजन बनाकर फ़सल की रक्षा करता है इसलिए कृतज्ञता प्रकट करने के लिए भी इस त्यौहार को श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

आलेख

ललित शर्मा इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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2 comments

  1. जबरदस्त आलेख गुरुदेब। 🙏

  2. मनोज कुमार पाठक

    बेहतरीन आलेख सर, सादर प्रणाम🌹🙏 ❤

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