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नरोधी नर्मदा जहाँ झिरिया से बुलबुलों में निकलता है जल

लोक गाँवों में बसता है। इसलिए लोक जीवन में सरसता है। निरसता उससे कोसों दूर रहती है। लोक की इस सरसता का प्रमुख कारण, प्रकृति से उसका जुड़ाव है। लोक प्रकृति की पूजा करता है। आज भी गाँवों में जल को वह चाहे नदी हो, या तालाब का, किसी झरने का हो, या कुएँ का। जल को गंगा की संज्ञा दी जाती है। गंगा मइया कह कर पुकारा जाता है। पानी और जल में कोई अर्थगत भिन्नता नहीं है।

भावगत भिन्नता देखें तो पानी जीवन जीने का साधन है, जबकि जल पवित्रता का प्रतीक और जीवन को धन्य करने का पूज्य साधन है। इसलिए गंगा के पानी को पानी नहीं ‘जल’ कहा जाता है। गाँव के लोग आज भी इसी श्रद्धा भाव के साथ प्राकृतिक जल स्रोतों को गंगा कहकर सम्मान देते है।

छत्तीसगढ़ के अनेकानेक स्थानों पर प्राकृतिक जल स्रोत हैं, जहाँ पर झिरिया के रूप में पानी का बुलबुले की तरह निकलना निरंतर जारी रहता है। ऐसे प्राकृतिक जल स्रोतों को यहाँ नर्मदा (नरबदा) कहकर मान दिया जाता है।

राजनांदगांव जिले में गंडई के पास ऐसे ही दो प्राकृतिक जल स्त्रोत हैं। जिन्हे नर्मदा कहा जाता है। एक गंडई से दक्षिण दिशा में छः कि.मी की दूरी पर खैरा नर्मदा, यहाँ पर नर्मदा का पावन जल कुंड व मंदिर है। यहाँ माघ पूर्णिमा को तीन दिनों का विशाल मेला भरता है।

दूसरी नर्मदा गंडई से उत्तर दिशा में सात कि.मी. की दूरी पर नरोधी ग्राम में है। यहाँ भी प्राकृतिक रूप से जल धारा बुलबुलों के रूप में निकल कर निरंतर प्रवाहमान है। जो आगे जाकर सुरही नदी में समाहित हो जाती है।

ग्राम नरोधी पहले राजनांदगांव जिले में था। अब कबीरधाम जिले में है। यह कबीरधाम जिले का अंतिम गाँव यानी राजनांदगांव और कबीरधाम जिला की सीमा रेखा है। यहाँ बहने वाला नरोधी नाला, जहाँ पर उक्त जल स्रोत स्थित है। यह नाला लगभग पाँच-ंछः कि.मी. दूर नून छापर गाँव से निकला है।

ग्राम नरोधी जिला मुख्यालय कबीरधाम से दक्षिण दिशा में 35 कि.मी. दूर व जिला मुख्यालय राजनांदगांव से उत्तर दिशा में 80 कि.मी. दूर बसा है। यह राजनांदगांव-ंकवर्धा मुख्य मार्ग पर छोटा सा गांव है। यहाँ ग्रामवासियों का मुख्य कार्य खेती-ंकिसानी है।

प्राकृतिक रूप से नाले के भीतर उद्गमित यह जल स्रोत कब से निकल रहा है? पूछने पर गाँव के बड़े-ंबुजुर्ग इस संबंध में अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते हैं। वे निश्चत रूप से कुछ नहीं बताते। कहने का आशय यह है कि जल स्रोत बहुत ही प्राचीन है।

यहाँ पर कुछ प्राचीन मूर्तियों के खंड भी हैं। एक नंदी की प्रतिमा जो काले पत्थर की है। कलात्मक ढ़ंग से बनी हुई है, खंडित अवस्था में नाले के ऊपर गस्ती वृक्ष के नीचे रखी हुई है। मूल शिवलिंग नहीं है। इस नंदी प्रतिमा को देखकर लगता है कि यहाँ जरूर प्राचीन मंदिर रहा होगा।

इस स्थान को नरोधी नर्मदा के नाम से जानते हैं। इस नाले पर बना पुल ईट से बना हुआ है। जो लगभग डेढ़ सौ साल पुराना है और आज भी सुरक्षित है। नरोधी के इस प्राकृतिक जल स्त्रोत से मेरा परिचय सन् 1963 में हुआ, जब मैं कक्षा तीसरी का विद्यार्थी था। उस समय हमारे कक्षा शिक्षक थे, स्व. महेन्द्र दास वैष्णव जी, जो छुईखदान के निवासी थे। वे बेहद ही कुशल और नवाचारी शिक्षक थे।

श्री वैष्णव जी माह के अंतिम शनिवार को हमारी मासिक परीक्षा लेते थे। परीक्षा स्कूल में नहीं, कक्षा से बाहर किसी प्राकृतिक, धार्मिक या पुरातात्विक स्थल में बच्चों को ले जाते थे। वे हमें जंगल भी ले जाते थे। पिकनिक भी हो जाता और परीक्षा भी। इससे हम प्राकृतिक वातावरण से परिचित होकर नया ज्ञान प्राप्त करते थे। मंनोरंजन भी होता था।

वे छत्तीसगढ़ लोक कथाओं को बहुत ही मजेदार ढ़ंग से सुनाते, छत्तीसगढ़ी लोक गीत गाते। बच्चों को और क्या चाहिए ? कथा, कहानी, जनौला और गीत तो बच्चों को बाँध कर रखते हैं। मेरे विद्यार्थी जीवन में अनेक शिक्षकों ने मुझे प्रभावित किया, जिनमें महेन्द्र दास वैष्णव जी अग्रगण्य हैं। वे हमेशा मेरी स्मृतियों में समाए रहते हैं और उनका नवाचारी शिक्षण भी।

तब शिक्षा के क्षेत्र में शायद ‘नवाचार’ शब्द का प्रचलन ही न रहा हो। उनकी शिक्षा दीक्षा ही मेरी शिक्षकीय वृत्ति के मूल में प्रेरणा का कार्य करती रही हैं। इस तरह की शैक्षाणिक यात्रा बरसात बीतने के बाद ही होती थी।

एक शनिवार हम 10-ं12 बच्चे जो कक्षा तीसरी के विद्यार्थी थे, गुरूजी के साथ सुबह 8 बजे नरोधी नर्मदा के लिए निकल पड़े। गुरूजी की सायकल रखते थे, पर पैदल ही चलते। हम उनकी कहानियों व जनौलो का आनंद लेते, हँसते-ंहँसाते नरोधी पहुँचे।

उन्होंने वह प्राकृतिक जल स्रोत दिखाया, जहाँ से अनवरत पानी निकल रहा है बुलबुलों के साथ। देखकर हम बच्चों का मन आनंदति हो गया। कुछ मूर्तियाँ भी दिखायी और उनके महत्व को बताया। निर्मल जल देखकर हम बच्चों का मन नहाने को हुआ। गुरूजी ने अनुमति दे दी।

वहीं पर एक ग्रामीण स्नान कर रहे थे। उन्होंने कहा कि -ं‘‘जहाँ भीतर से पानी के बुलबुलों के साथ रेत के कण निकल रहे है, वहाँ मत जाना। क्योंकि वहाँ जाने पर पैर धँसने लगते हैं।’’ उन्होंने बुलबुलों के बीच उक्त स्थान पर जाकर दिखाया भी। सचमुच उस व्यक्ति के दोनों पैर नीचे धँसने लगे। थोड़ी देर बाद वे निकल भी आये।

उनका उद्देश्य बच्चों को डराना नहीं बल्कि सावधन करना था। हम बच्चे जो नहाने के लिए उत्सुक थे, वहीं किनारे पर कपड़ो को उतार कर झोले में रखी स्लेट पट्टी व साथ में रखी अंगाकर रोटी को रखकर नहाने में मशगुल हो गए।

गुरूजी किनारे ही बैठे थे। ठंड के दिन थे, किन्तु जल स्त्रोत से निकल रहा पानी गुनगुना था। गुनगुने पानी में नहाने में बड़ा मजा आ रहा था। हम बच्चे पानी के भीतर खेलने में तत्लीन हो गए। इस तत्लीनता में मुझे ग्रामीण व्याक्ति की बातों का ध्यान नहीं रहा। मैं रेत और बुलबुलों के बीच चला गया। मैं चिल्लाया बचाओं बचाओं।

वह ग्रामीण कपड़े बदल रहा था। वह मेरी ओर हँसते हुए दौड़े। बोला ‘‘डरो नही कुछ नहीं होगा। उसने मेरी बाँह पकड़ी और मुझे निकाल लिया। तब तक सारे बच्चे बाहर आकर रोने लगे थे। मैं भी रो रहा था। गुरूजी ने सबको चुप कराया। बाद में डाँट भी लगायी। उस डाँट में समझाइस थी, प्यार था और दुलार था।

हम बच्चों ने कपड़े बदले और पेड़ की छाँव में बैठ गए। अपने साथ लाई अंगाकर रोटियों और गुड़ को आपस में बाँटकर खाया। रोना-ंधोना, भय, घबराहट सब फुर्र। फिर फूलों की तरह हम खिल गए और पंछियों की तरह हम गाने लगे।

थोड़ी देर आराम किया, फिर मासिक परीक्षा शुरू हुई। कुछ मनगणित इमला और कुछ भूगोल से संबंधित प्रश्न। प्रकृति के बीच होने वाली यह परीक्षा हमें प्रकृति से जोड़ती थी। गुरूजी पेड़-ंपौधे, नदी-ंपहाड़, जल-ंजंगल और जंमीन से संबंधित महत्वपूर्ण मौखिक जानकारी देते थे, आज भी उक्त जानकारियाँ हमारे मनोमस्तिष्क में लिखित रूप से अंकित है। इस तरह मेरा परिचय नरोधी नर्मदा से हुआ।

मुख्य मार्ग में होने के कारण यह स्थान लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। नाले पर मजबूत पचरी बनाकर इस स्थान का सौंदर्यीकरण कर दिया गया है। एनीकट भी बना दिया गया है, जिससे जल स्तर गर्मी के दिनों में भी समान बना रहता है। एक सुंदर परकोटे का निर्माण किया गया है, जिसके अंदर शिव जी का एक पुराना मंदिर है।

झालिया वंश साहू समाज नरोधी द्वारा सुंदर राधाकृष्ण व करमा माता का मंदिर बनाया गया है, जो आधुनिक है। इसी मंदिर में भगवान श्री कृष्ण, बहन सुभद्रा और भईया बलराम की मूर्ति जगन्नाथ के रूप में विराजित है। जो दर्शानार्थियों में आस्था और विश्वास जगाती है।

मंदिर परिसर में पुजारी जी का कमरा है। पुजारी श्री शिवकुमार वैष्णव विगत 20 वर्षो से नरोधी नर्मदा मंदिर की सेवा में संलग्न हैं। पुजारी जी व उनका परिवार प्रकृति व पर्यावरण प्रेमी है। विभिन्न प्रकार के फूलों से सुसज्जित मंदिर परिसर में मन को बड़ी शांति मिलती है।

यहाँ नवरात्रि में भक्तों द्वारा मनोकामना जँवारा ज्योति प्रज्जवलित की जाती है। सामुदायिक भवन भी बने हुए हैं। घाट व मंदिर की साफ-ंसफाई अनुकरणीय है। माघ पूर्णिमा को छोटा मेला भी लगता है। नरोधी-ंनर्मदा छोटा, किन्तु बड़ा ही सुंदर व दर्शनीय स्थल है।

आलेख

डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.)

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One comment

  1. रुद्र माझी

    शानदार बहुत ही सुन्दर रचना

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