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छत्तीसगढ़ों में से एक गढ़ : बिन्द्रानवागढ़

राजाओं के शासन काल में दक्षिण कोसल में बहुत सारी जमीदारियाँ थी। बस्तर से सरगुजा तक अगर दृष्टिपात करें तो लगभग एक सैकड़ा जमीदारियाँ होंगी, जहाँ विभिन्न जाति एवं वर्ग के जमींदार शासन करते थे। वर्तमान में यह सब इतिहास की बातें हो गई परन्तु इनकी कहानियों में रहस्य, रोमांच एवं इतिहास के साथ अतीत का वैभव छिपा हुआ है।

ऐसी ही एक जमींदारी है बिंद्रानवागढ़। इस जमींदारी का इतिहास शुरु होता है लांजीगढ के राजकुमार सिंघलशाह के छुरा में आकर बसने से। तब यहां भुंजिया जाति के एक राजा चिंडा भुंजिया का शासन था। यहां की जमींदारी मरदा जमींदारी कहलाती थी।

राजकुमार सिंघलशाह चूंकि एक राजपुत्र था इसलिए उसके छुरा में आकर बसने से चिंडा भुंजिया को अपना साम्राज्य छिन जाने का भय हुआ इसलिए उसने युक्तिपूर्वक एक दिन राजकुमार को भोजन के लिए आमंत्रित किया और उसको धोखे से विष दे दिया।

राजकुमार सिंघलशाह की मृत्यु हो गई। जब इस घटना की जानकारी उसकी पत्नी को हुई तो वह अपने गर्भस्थ शिशु की प्राण रक्षा के लिए ओडिशा के पटनागढ राज्य में चली गई। वहां एक ब्राम्हण के यहां आश्रय लिया और अपनी पहचान छुपाकर रहने लगी।

ब्राम्हण ने रानी को असहाय गर्भवती नारी समझकर उसको पुत्रीवत स्नेह दिया और उसका लालन पालन करने लगा। समय आने पर रानी ने एक परम तेजस्वी बालक को जन्म दिया। जिसका नाम रखा गया-कचना धुरवा। तब पटनागढ में राजा रमई देव का शासन था। शनै:शनै:बालक बढता गया और उसने अपने अप्रतीम शौर्य और वीरता के कारण राजा की सेना में पहले एक सैनिक और बाद में सेनापति का पद प्राप्त किया।

इस दौरान उसकी माता कचनाधुरवा को उनके अतीत के बारे में जानकारी देती रही। कचना धुरवा राजा का विश्वास जीतता रहा और राजा का प्रिय बनता गया। राजा उसकी बहादुरी पर मुग्ध था। उसके सेवा के बदले में वह कचना धुरवा को कोई बड़ा ईनाम देना चाहता था। तब समय पाकर कचना धुरवा ने राजा से मरदा की जमींदारी मांगी। राजा ने उसकी बात मान ली और उसको मरदा की जमींदारी दे दी।

कचना धुरवा मरदा आ गया और चिंडा भुंजिया को मारकर अपनी पिता की मृत्यु का बदला लिया। साथ ही एक नई जमींदारी की नींव रखी-नवागढ जमींदारी। चूंकि ये जमींदारी वनबाहुल्य क्षेत्र में स्थित था और बंदरों से प्रभावित था इसलिए कालांतर में इसका नाम नवागढ़ से बेंदरानवागढ (बिन्द्रानवागढ़) प्रचलित हो गया।

बिंद्रानवागढ वैसे एक गांव का नाम है जो आज भी मौजूद है। इसी के नाम पर राज्य का विधानसभा क्षेत्र भी है। जैसे बस्तर नाम के एक छोटे से गांव के नाम पर बस्तर जिला है वैसे ही बिन्द्रानवागढ़ के नाम पर एक विशाल विधानसभा क्षेत्र है।

रायपुर गजेटियर के अनुसार इस जमींदारी के अंतर्गत कुल 446 गांव आते थे और यह 1559 वर्गमील तक विस्तारित भी। सन् 1901 में यहां की कुल जनसंख्या 61174 थी और गरियाबंद इस जमींदारी का सबसे बड़ा गांव था। इस जमींदारी में ज्यादातर गोंड और कमार जनजाति के लोग ही निवासी थे। अन्य जाति वर्ग के लोग काफी बाद में आए। कमार जनजाति के लोग बीहड़ वनों में रहना अधिक पसंद करते थे। इस जमींदारी के लगभग 970 वर्गमील में घना जंगल हुआ करता था, जिसमें सरई और सागौन के वृक्ष बहुतायत में मिलते थे।

अंग्रेजों ने नारायण सिंह को कसडोल की घटना के बाद दुश्मन मान लिया और उसके दमन के लिए अपनी सेना भेजी, नारायण सिंह के इस संघर्ष में अन्य जमीदारियों ने अंग्रेजों का सहयोग किया परन्तु संबलपुर के जमीदार सुरेन्द्र साय ने अंग्रेजों का साथ नहीं दिया।

इस घटना के बाद वीर सुरेंद्रसाय का अंग्रेज़ों के साथ गोरिल्ला युद्ध चलता ही रहा। सन् 1860 में जब वीर सुरेन्द्र साय को मानिकगढ से भगा दिया गया तब बिन्द्रानवागढ़ के राजा उमरशाह ने उसको अपने राज्य में शरण दी। उनके लिए रसद आदि की व्यवस्था की।

राजा उमरशाह अंग्रेजी शासन के विरोधी थे। वो अंग्रेजी शासन को टैक्स देने के भी खिलाफ थे। जब इस पर अंग्रेजी शासन ने उनको एक जनवरी 1861 को जवाब मांगा तो उन्होंने उसका जवाब चार महीने बाद भी नहीं दिया। जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने उन पर 1000 रू का जुर्माना ठोका था।

खरियार और बिंद्रानवागढ के जमींदार ब्रिटिश सरकार के घोर विरोधी थे। वीर सुरेन्द्र साय कभी अंग्रेजों के हाथ में नहीं आया। सन् 1862 में बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में उसने आत्मसमर्पण कर दिया और एक कैदी के रूप में असीरगढ़ के किले में सन् 1884 में उनकी मृत्यु हो गई।
संभवतः गरियाबंद क्षेत्र से जुडाव के कारण ही गरियाबंद के शासकीय कालेज का नामकरण अमर शहीद सुरेंद्र साय के नाम पर किया गया है। ठीक उसी प्रकार अंचल में देवता के रूप में पूजित वीर कचनाधुरवा के नाम पर छुरा के शासकीय कालेज का नामकरण किया गया है।

सन् 1880 में इस जमींदारी को जमींदार के नाबालिग होने के कारण कोर्ट लिया गया।। तत्कालीन जमींदार केवलशाह की कम आयु में ही मृत्यु हो गई। तब उसकी विधवा को इस जमींदारी का अधिकार दिया गया। सन् 1902 में उसकी भी मृत्यु हो गई। तब केवलशाह के भतीजे छत्रशाह को बिन्द्रानवागढ़ जमींदारी की जायदाद मिली।

जब जमींदारी कोरट अधीन थी तब मुख्यालय गरियाबंद को बनाया गया था। उस दौरान कोर्ट के द्वारा तीन लाख के खर्च में महल और सडक बनवाई गई थी। सन् 1924 के आसपास इस जमींदारी अंतर्गत कुल 6 मदरसे,7डाकखाने और 4 थाने क्रमशः देवभोग, नवागढ़, गरियाबंद और छुरा में थे।

ग्रामीण बताते हैं कि छुरा का भव्य महल राजा छत्रशाह के द्वारा ही बनवाया गया है। महल की वास्तुकला देखने लायक है। महल में अंकित फूलों और बेलबूटों का अंकन मन मोह लेता है। महल की बाहरी दीवार अत्यंत कलात्मक हैं। शीर्ष पर शेर की आकृति बनी हुई है। सामने की ओर जगह-जगह पर आले बने हुए हैं। बिजली की सुविधा नहीं होने के कारण इन आलों में दीपक जलाकर रौशनी की जाती रही।

कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि महल को बनाने के लिए बेल गूदा, गोंटा का चूर्ण, गुड़ आदि का प्रयोग हुआ था। छत पर सरई पेड़ के म्यार और लोहे की बड़ी बड़ी प्लेट लगी है। दरवाजे लकड़ियों से बनी हुई है और उसमें रंगीन शीशे लगे हुए हैं। अपने दौर में महल की भव्यता देखने लायक रही होगी। इस तरह बिन्द्रानवागढ़ की जमीदारी का वैभव एवं गौरव गाथा भग्नावशेषों में अब भी गुंजती है।

संदर्भ – रायपुर गजेटियर, अन्य स्थानीय स्रोत

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