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संगीत और नृत्य का संगम प्रो. कल्याणदास महंत

नृत्य सम्राट प्रो. कल्याणदास, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय नियुक्त बड़ी हस्तियों में थे। वे छुट्टी के दिनों में बराबर अपने निवास स्थान रायगढ़ आते थे, जहाँ उनका स्वयं का मकान है। परिवार उस समय यहीं था। उन दिनों हम लोगों की चक्रधर कला परिषद हुआ कल्याण दास महन्त लेखक के साथ करती थी । वहाँ साप्ताहिक गोष्ठियां हुआ करती थी। कभी संगीत की तो कभी साहित्य की, और दूर-दूर से साहित्यकार, संगीतकार आ कर इसमें भाग लेते थे।

कल्याण दास जी भी आते थे। अक्सर संचालन का भार तब मेरे ऊपर होता था। इसी बीच कल्याण दास जी से मेरा परिचय हुआ। मैं उनकी कला से अभिभूत हुआ। कभी मैं उनके निवास में मिलने जाता था, कभी स्वयं वे मेरे यहाँ पधारते थे। आचार-विचार की कई समानता के कारण पिता-पुत्र की उम्र होने के बावजूद मैत्री सी हो गई। हम दोनों कभी राजा ललित कुमार सिंह के दर्शन करने जाते तो कभी राजपरिवार के अन्य सदस्यों के यहाँ तो कभी महावीर अग्रवाल के यहाँ ।

एक बार सारंगढ़ में एक विराट संगीत सम्मेलन हुआ, जिसमें कल्याण दास जी, रामलाल, राममूर्ति, भीखम सिंह, वेदमणि सिंह ठाकुर, तिमोथी साहब, महेन्द्र सिंह ठाकुर, बसन्ती, कलकत्ता से आई नृत्यांगना मधुमिता राय आदि प्रमुख थे। संचालन मैं ही कर रहा था। खासी भीड़ थी । वहाँ संचालन करते मुझे बसंती नाम थोड़ा खटका। मेरे मुँह से अकस्मात वासंती वैष्णव नाम पुकारा गया। पहले तो सभी को अटपटा लगा, लेकिन बाद में यही नाम चल पड़ा। अखबारों में भी मैंने उसका नाम वासन्ती वैष्णव ही रखा।

कल्याण दास जी ने वहाँ अपनी नृत्य कला का अद्भुत प्रदर्शन किया। रात भर कार्यक्रम चलता रहा। करीब-करीब घंटे भर राजा साहब की बंदिशों पर थिरकते रहे जिसमें तीर, कमान, तलवार, खंजर, भाला का उन्होंने वीर रस के अंतर्गत जो निकास किया उससे युद्ध का दृश्य सामने नजर आता था । कल्याण दास जी नृत्य करते-करते वक्तव्य देना भी नहीं भूलते थे।

उन्होंने कहा – सारंगढ़ दरबार का ही एक कलाकार हूं। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तब चन्द्रपुर के कुमार दुष्यंत सिंह से वे जहाँ वे ठहरे थे, मिलने गए। कुमार साहब बहुत बिगड़े, बोले अच्छा तो आप सारंगढ़ दरबार के हैं ? उनके तेवर देख बेचारे महन्त जी का चेहरा उतर गया। बात यह थी कि उनका गाँव चन्द्रपुर के पास ही है और वह चन्द्रपुर जमींदारी के अन्तर्गत था । महन्त जी का आना-जाना दुष्यंत जी के यहाँ बचपन से लगा हुआ था। मैंने उनके भाव की रक्षा करते हुए कहा, ठीक है कुमार साहब, हम लोग आपके यहाँ शीघ्र पहुंचते हैं।

चन्द्रपुर में जमींदारी का महल तो खंडहर हो चुका है। परिसर काफी लम्बा चौडा है। उनका निवास पत्थरों की बाऊंड्रीवाल से घिरा हुआ है। भीतर एक चबूतरे पर मंडप है। वहीं चमेली की बहुत पुरानी लता थी, जो अब मोटी गठानों के कारण झाड़ी के रूप में बदल गई थी। शरद की चांदनी रात थी। मीठा जाड़ा शुरू हो रहा था । चमेली एक-एक कर खिलती हुई वातावरण को गमका रही थी । ऐसे ही वातावरण में दुष्यंत सिंह ने तबले पर गर्जना करते हुए कल्याण दास को भाव – नृत्य के लिए आमंत्रित किया।

‘मोहे छेड़ो न श्याम गुजरिया मैं तेरी’ की बंदिश पर जब महन्त जी ने अभिनय शुरू किया तो पहले खिंचे हुए दुष्यंत कुमार जी कल्याणदास की ओर ही खिंच गए। श्यामल काठी के कल्याणदास के मुख मंडल से लावण्य-सा फूटने लगा था। वे साक्षात राधा की प्रतिकृति से लगने लगे थे। दुष्यंत कुमार जी बराबरी की संगत कर रहे थे और सम पर आते आते एक दूसरे के लिए वाह वाह कर बैठते थे। मैत्री शुरू हुई और रात भर दोनों के बीच सवाल-जवाब चलता रहा। मैं उस रात की भाव-भंगिमा को आज तक नहीं भूल पाया हूं। क्योंकि श्रोता दर्शक मैं अकेला ही था ।

इस घटना के साल भर बाद शरद पूर्णिमा के अवसर पर हमारे गाँव नरियरा संगीत जलसा हुआ था। ठाकुर विश्वेश्वर सिंह तथा वल्लभ सिंह ने कलाकारों को आमंत्रण देने, लाने और पहुंचाने का भार मेरे ऊपर छोड़ दिया था। इस महोत्सव का रिपोर्ताज ‘नवभारत’ में हमने भेजा था। कल्याणदास जी के महत्व को रेखांकित करने के लिए उस रिपोर्ट के कुछ अंश यहाँ दिए जाते हैं रासलीला, शास्त्रीय संगीत, राधा वल्लभ मंदिर, सागर सरोवर, रथ यात्रा, दशहरा उत्सव और गन्ने की खेती के लिए प्रसिद्ध गाँव नरियरा में गत माह संगीत समिति के तत्वावधान में पंद्रह वर्षों बाद उच्च स्तरीय संगीत सम्मेलन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य नृत्य सम्राट कल्याण दास जी महन्त का सम्मान करना था।

प्रो. कल्याणदास जी महन्त और फिरतू महाराज दोनों ही यहाँ की रासलीला की तालीम से अपनी युवावस्था तक जुड़े रहे। कार्तिकराम जी के भी कई कार्यक्रम यहाँ हो चुके थे। अस्तु यहाँ के संगीत रसिक प्रो. कल्याण दास जी से परिचित थे। बीस-पच्चीस हजार की भीड़ भरी शाम होते ही मंदिर परिसर में जुड़ने लगी थी। बिलासपुर, चांपा, जांजगीर, अकलतरा, शिवरीनारायण और आस-पास के संगीत प्रेमियों का सैलाब सा उमड़ पड़ा था। बैठाने की व्यवस्था बार-बार बाधित हो रही थी।

लेकिन ज्योंही कवि रामप्रताप सिंह विमल ने लच्छेदार शब्दों में मंच पर महंत जी को आमंत्रित किया जहाँ था, उसी अवस्था में स्थिर हो गया। पिनड्रॉप साइलेंस । ठिगने कद, श्याम वर्ण की सौम्य मुखाकृति वाले कल्याणदास ने अपनी विशिष्ट अदाकारी के साथ जब मंच को सुशोभित किया तो तालियों की गड़गड़ाहट से रासमंडल (मंच) के छानी-छप्पर भी फड़फड़ाने, याने बजने लगे थे। वे लकदक धोती कुर्ते और घुंघरुओं से सुसज्जित थे।

प्रो. कल्याण दास महंत, जयलाल महाराज और अच्छन महाराज के श्रेष्ठ और प्रमुख शिष्यों में एक हैं। प्रो. कल्याण दास ने अपने इस सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इस गाँव से और उसके निवासियों से अपना घनिष्ठ संबंध व्यक्त किया। उन्होंने अपना कार्यक्रम कथक की विवेचना करते हुए प्रस्तुत किया। उनके साथ तबले पर श्री विवेक देशमुख ने और लहरा पर (हारमोनियम) श्री चक्रवर्ती ने संगत की। नृत्य की लय पर थिरकते हुए जब कल्याण दास जी ने थाट पर अपने को स्थिर किया तो पुनः तालियों की गड़गड़ाहट हुई। इ

सके बाद उन्होंने रायगढ़ घराने के बोल परण जो कि राजा चक्रधर सिंह द्वारा रचित है, प्रस्तुत किए। पढन्त के साथ वे गत भावों को घुंघरुओं से भी प्रदर्शित करते थे । उन्होंने सरस्वती वंदना, सिंहावलोकन, किलकिला परण, दल बादल, कड़क बिजली जैसे परणों को प्रस्तुत कर बादल- बिजली की गर्जना और तड़प जैसा वातावरण निर्मित कर दिया। पश्चात उन्होंने वीर रस की उद्भावना हेतु तीर, धनुष, गदा और तलवार से युद्ध परण को करके दिखाया।

फिर लोगों के आग्रह पर उन्होंने ही शृंगार की दो रचनाएं “बहियां न मरोड़ो श्याम” का प्रदर्शन किया, जिसमें छेड़-छाड़ के अतिरिक्त गली या पगडंडी को, मांग, कज्जल रेख, अंगुलियों की गतियों याने अनेक उपमाओं से दिखा कर दर्शकों को मुग्ध कर दिया। अंत में बैठकी भाव में एक ठुमरी, “अब के गए कब अइहो श्याम” दिखा कर विप्रलम्भ श्रृंगार को मूर्त कर दिया । कथक टुकड़े-टुकड़े में प्रदर्शित होता है। उसमें पढ़न्त का विशेष महत्व है। घुंघरू और तबले के साथ नोंक-झोंक (लड़न्त) से अद्भुत आनंद प्रदान करते हुए उन्होंने नृत्य का चरमोत्कर्ष एक घुंघरू की आवाज निकाल कर किया।

दरअसल घुंघरू जब बजते हुए एक लय में एकाकार हो जाते हैं और द्रुत में एक विराम देने, एक “खम” देने, पर जो खनक उठती है, तभी यह दुर्लभ क्षण आता है। इस अद्भुत दृश्य और घुंघरूओं के बोल से चमत्कृत हो कर दर्शक वाह-वाह कर उठे और तालियां बजती रहीं। तब तक प्रभाती का समय हो रहा था और ठाकुर विश्वेश्वर सिंह ने भैरवी की रचनाएं सुना कर वातावरण को पवित्र एवं उनींदी थकान से मुक्त कर दिया। यह दो महान कलाकारों का अंतिम मिलन था । और इसके बाद तो बाजा मास्टर अर्थात विश्वेश्वर सिंह महाप्रस्थान कर गए।

प्रो. कल्याण दास देश के महान कथक नर्तकों में थे । छत्तीसगढ़ की जनता उन्हें बेहद प्यार करती थी। ऐसे महान कलाकार का जन्म जांजगीर जिला के नवापारा गाँव जो चन्द्रपुर के पास है 10 अक्टूबर सन् 1921 को हुआ था। इनके पिता कुशल दास महन्त स्वयं संगीतज्ञ थे । वे इसराज, सारंगी आदि बजाने में प्रवीण थे। करमा और गम्मत (नाचा) के लिए भी वे कम प्रसिद्ध न थे । उन्होंने कल्याण दास जी को नाचा के लिए बचपन से ही नृत्य की शिक्षा दी थी। उनकी आवाज़ भी बड़ी मीठी थी। कल्याण दास जी अक्सर सारंगढ़ महल में ही रहते ।

हिज हाइनेस जवाहर सिंह की इकलौती पुत्री बसंत माला घुड़सवारी और नाटकों का शौक रखती थीं। स्वयं तो कृष्ण बनती थी और राधा का पार्ट अदा किया करते थे कल्याण दास जी महंत राजा जवाहर सिंह ने भी कल्याण दास जी को नृत्य की प्रारंभिक शिक्षा दिलाई थी। संयोग से एक बार राजा चक्रधर सिंह ने सारंगढ़ दरबार में साजो शृंगार के साथ बालक कल्याण दास को नाचते हुए देख लिया। वे उनके पद चालन एवं सुरीली आवाज़ से बड़े प्रभावित हुए और अपने श्वसुर से बालक कल्याण दास को मांग ही लिया, और शिष्य बना लिया ।

कल्याण दास जी दरबार में अनुज राम, कार्तिक राम और फिरतू महाराज के बाद आए कल्याण दास जी को कथक नृत्य की शिक्षा पंडित जयलाल महाराज, अच्छन महाराज (भाव) लच्छू महाराज (अभिनय), शंभू महाराज (तीन ताल एवं खूबसूरती), नारायण प्रसाद ( एकताल), आदि गुरुओं से मिली। इसी प्रकार उन्होंने हाजी मोहम्मद से गायन, ख्याल, टप्पा, ठुमरी, ग़ज़ल, कव्वाली की शिक्षा ‘ली। नत्थू खां जैसे उस्ताद से उन्होंने तबले की उच्च शिक्षा ली।

बाद में मुनीर खां, कादर बख्श और अहमद जान थिरकवा से भी तबले के कठिन कायदे सीखे। उनके अन्य गुरुओं में भाई लाल खां, मंगल दास आदि की भी गणना की जा सकती है। इन गुरुओं से कल्याणदास जी महंत ने दरबार में करीब चार वर्षों तक नृत्य संगीत की शिक्षा ली। वे बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे।

कार्तिकराम जी बतलाते थे हम दोनों (कार्तिक – कल्याण) का अभ्यास करीब – 6-7 घंटे चलता था। भाई कल्याण दास मुझसे करीब दस साल छोटे हैं फिर भी हमेशा सख्य भाव बना रहता था। कॉम्पीटीशन की भावना हमारे में उस तरह से नहीं थी जिसमें कलाकारों में हीन भावना पैदा होती है। उसने मेरे साथ देश के महत्वपूर्ण सम्मेलनों में भाग लिया और हर कहीं पुरस्कृत भी हुआ। राजा साहब को हम दोनों पर अभिमान था। वे हमें एक क्षण के लिए भी दूर रखना नहीं चाहते थे। हमारे लालन-पालन से ले कर घर बसाने तक का उन्होंने ध्यान रखा ।

नृत्य सम्राट कल्याण दास को पहली बार 1936 में इलाहाबाद म्यूज़िक कान्फ्रेंस में उतारा गया, जहाँ उन्हें कार्तिकराम जैसी रातों रात प्रसिद्धि मिली। इसके बाद मेरठ, बरेली 1934, रायगढ़ 1942, दिल्ली 1944, खैरागढ़ आदि के अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों में उन्होंने भाग लिया, पुरस्कृत हुए और कथक की । चूंकि दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली। राजा साहब की मृत्यु के बाद उन्होंने उड़ीसा में नृत्य की शिक्षा दी। फिर कलापथक में भी सीनियर आर्टिस्ट रहे ।

कल्याण दास जी ने समय पर कोविद की परीक्षा पास कर ली, अस्तु 1964 में उन्हें इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में प्रोफेसरी मिल गई। सेवानिवृत्ति के बाद वे रायगढ़ लौट आए। कल्याण दास जी को भी मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग ने ‘शिखर सम्मान’ से विभूषित किया था। वे बहुत दिनों तक कला परिषद भोपाल के सदस्य भी रहे।

अंतिम दिनों में उन्होंने “भाव नृत्व” नाम का एक सुंदर ग्रंथ लिखा, जिसका प्रकाशन उनके देहपतन के बाद भी नहीं हो सका। प्रो. कल्याण दास जी ने उड़िया फिल्मों में भी नृत्य निर्देशन भी किया था। यों तो उन्होंने दर्जनों शिष्य तैयार किए हैं, लेकिन भगवान दास माणिक उनके प्रिय शिष्यों में से हैं। वे नृत्य संगीत में पी. एच. डी. की उपाधि से अलंकृत हैं और मध्य प्रदेश के शासकीय महाविद्यालय में संगीत विषय के प्रोफेसर हैं। कल्याण दास जी के अन्य प्रमुख शिष्यों में सीताराम झा, राजकुमुद ढोलिया, कृष्ण कुमार सिन्हा, ज्योति बख्शी, नीता चौहान, वंदना, मोहिनी माणिक प्रमुख हैं।
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प्रस्तुति
बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,पिन 496001

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One comment

  1. कथक नृत्य के महान कलाकार पंडित कल्याण दास जी महंत एक घरानेदार श्रेष्ठ कलाकार होने के साथ-साथ बहुत अच्छे मिलनसार इंसान थे । उस समय मैं छोटा था तब से मेरा‌ उनके साथ संबंध था। आप अकसर हमारे घर पिताजी से मिलने आया करते थे और मुझे नृत्य सीखने के लिए प्रेरित करते थे लेकिन मेरे पिताजी ने कहा कि मैं नृत्य के बजाय तबला सीखाना चाहता हूं फिर उन्हीं के कहने पर मुझे तबला सीखने के लिए इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में भर्ती कर दिया गया था। गुरुजी उच्च कोटि के कलाकार होने के साथ-साथ परिस्थितियों के अनुसार बोलो की ताल में रचना भी करते थे। गुरुजी लिखा पड़ी में थोड़े से कमजोर थे क्योंकि मैं तबले का विद्यार्थी था और थोड़ी बहुत लय ताल का मुझे ज्ञान था इसलिए अक्सर लिखा पड़ी का काम मुझे करवाते थे और बदले में स्नेह आशीष के साथ-साथ संतरे वाला पिपमेंट भी दिया करते थे। आज आपका लेख पढ़ के मेरी पुरानी यादें ताजा हो गई। गुरुजी पर लेखनी चलाने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद आभार।