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जानिए मूल निवासी दिवस क्या है और मनाने की परम्परा क्यों प्रारंभ हुई?

कुछ वर्षों से भारत में प्रतिवर्ष 9 अगस्त को मूल निवासी दिवस को आदिवासी दिवस के रूप में मनाने की परम्परा प्रारंभ होती दिखाई देती है, परंतु इस विषय पर जानकारी का विस्तार सामान्य जन के बीच पूर्ण रूप से नहीं है। ये क्या दिवस है ? यह दिवस क्यों मनाया जाता है? इसकी शुरूआत क्यों की गई? सभी के लिए यह जानना आवश्यक है।

विश्व इतिहास में इस दिवस के प्रार्दुभाव का विश्लेषण वर्ष 1453 से करने पर स्पष्ट हो सकेगा। इस वर्ष कुस्तुतुनिया को उस्मानी साम्राज्य के जीतने के पश्चात यूरोपीय देशों से भारत वर्ष का जमीनी मार्ग से संपर्क खत्म हो गया। जिससे यूरोपीय तटों से समुद्री मार्ग के तलाश में कई अभियान प्रारम्भ किये गये। इस क्रम में वर्ष 1498 में वास्कोडिगामा भारतीय नाविकों एवं व्यापारियों की मदद से अफ्रीका से होकर अरब सागर के द्वारा भारत वर्ष के पश्चिमी तट पर पहुँचने में सफल हुआ।

इसके पश्चात् विभिन्न यूरोपीय देश यथा ब्रिटिश, फ्रांस, स्वीडन, पूर्तगाल, स्पेन नीदरलैण्ड इत्यादि के नाविक व्यापारी भारतवर्ष में पहुँचने में कामयाब हो गये। भारतवर्ष से तात्पर्य पाकिस्तान, भारत, बंग्लादेश, म्यामार, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, फिलिपींस इत्यादि से है। यूरोपीय व्यापारी पाकिस्तान एवं पश्चिमी भारतीय तटों के ‘‘निकट भारत’’ एवं अन्य पूर्वी देशों में ‘‘दूरस्थ भारत’’ के नाम से सम्बोधित करते थे।

इसी तारतम्य में क्रिस्टोफर कोलम्बस मूल रूप से भारतवर्ष की यात्रा के लिये शुरूआत करने पर गलती से 1492 में अमेरिका पहुँच गया था। इसे उन्होंने नये महाद्वीप की खोज का नाम दिया। इस नये महाद्वीप के रास्ते का पता चलने के बाद विभिन्न यूरोपीय देश उस पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए लालायित हो उठे। इसके पश्चात् 1770 में जेम्स कुक आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर पहुँच गया एवं 1788 में अंग्रेजी टूकड़ी यहाँ आधिपत्य जमाने पहुंच गयी।

इस घटनाक्रम में यह इंगित करना महत्वपूर्ण है कि यूरोपीय देश के लोग जिस भी स्थान पर आधिपत्य जमाते थे, वहाँ के मूलनिवासियों को अपने से निचले दर्जे के मानव के रूप में प्रस्तुत करते थे एवं स्वयं को सुसभ्य एवं सांस्कृतिक रूप से उच्च मानते थे। साथ ही उनका व्यवहार मूलनिवासियों के प्रति दोयम दर्जे का रहता था।

उन्होंने मूलनिवासियों को किसी भी प्रकार से अपने समान स्वीकार नहीं किया एवं उनसे दास, गुलाम का व्यवहार कर निरंतर प्रताड़ना दी। इसके अतिरिक्त यूरोपीय नस्लों की बीमारियाँ यथा मौसमी बुखार, चेचक इत्यादि से लाखो मूल निवासियों की जान गयी। मूल निवासियों को बर्बरता के साथ विभिन्न लड़ाईयों में मार भी दिया गया।

मूल निवासियों से यूरोपीय लोगों के दोयम दर्जे के व्यवहार के कारण कई यूरोपीय संस्थाओं ने भारतवर्ष में बोर्ड लगाया था “कुत्तों एवं भारतीयों का प्रवेश निषेध है”। इसी बूरे बर्ताव के कारण मोहनदास करमचंद गांधी को ट्रेन के डिब्बे से दक्षिण अफ्रीका में बाहर फेक दिया गया। वाटसन होटल में जमशेदजी टाटा को प्रवेश नहीं दिया जिससे प्रेरित होकर उन्होंने ‘‘ताजमहल होटल’’ की मुंबई में स्थापना की।

यूरोपीय लोगो द्वारा आस्ट्रेलिया को 1901 में स्वतंत्र देश की मान्यता प्रदान की एवं प्रथम चुनाव 1901 में हुए, पर वहाँ के मूल निवासियों को मतदान की पात्रता 1984 में दी गई। इसी प्रकार संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता 1776 में प्रदान की गयी पर वहाँ मूल निवासियों को 1924 में पूर्व नागरिकता प्रदान की गयी।

इस प्रकार इन देशों में मूल निवासियों के प्रति भेदभाव को समाप्त करने के लिए 9 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र के कार्यदल की प्रथम बैठक मूलनिवासी लोगों के लिए आयोजित की गयी। इस प्रकार यह इस तथ्य को रेखांकित करना है कि 1982 तक रंगभेद के कारण मूलनिवासियों के मानव अधिकार का लगातार अतिक्रमण होता रहा है।

परंतु भारतवर्ष में ऐसी स्थिति नहीं थी, यहाँ 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र की स्थापना पर समस्त निवासियों को समान अधिकार प्रदान किया गया है इस गौरवपूर्ण तथ्य को समस्त देशवासियों द्वारा हृदयंम कर अपने को गौरवान्वित महसूस करना चाहिए कि भारत में सभी जन सहत्राब्दियों से मिलजुलकर रहते आए हैं। हम सब भारतवासी मूल निवासी।

आलेख

दीपाली पाटवडकर
लेखक एवं स्तंभकार पूना, महाराष्ट्र

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