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डॉ. आम्बेडकर का राष्ट्रवाद

भारतीय संविधान के निर्माता कहे जाने वाले डॉ. भीमराव आम्बेडकर के बारे में बहुत सी भ्रातियां हैं। जैसे वह सवर्ण हिन्दुओं के विरोधी थे, वह मात्र अनुसूचित जातियों के बारे में सोचते थे और उनकी ही चिंता करते थे। पर सच्चाई इससे कोसो दूर है।

असलियत यह है कि उन्होंने स्वतः कहा था कि मैं ब्राह्मण जाति के खिलाफ नहीं हूं बल्कि उस मानसिकता के विरूद्ध हूं, जो विषमता एवं भेदभाव की पक्षधर है। इसीलिए वह जाति को राष्ट्र-विरोधी मानते थे, वह जाति को मिटाना चाहते थे।

वह मानते थे कि जाति मिटे बिना हिन्दू एक नहीं हो सकते। उनकी यह सोच सच्चाई के बहुत करीब थी, क्योंकि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी जाति व्यवस्था के चलते ही हिन्दू एकता अब भी दूर की कौड़ी है, जो समस्त राष्ट्रीय समस्याओं और व्याधियों का कारण है।

डॉ. आम्बेडकर का बहुत स्पष्ट रूप से मानना था कि भारत हिन्दू राष्ट्र है, उनका यह भी मानना था कि इस्लाम कभी दूसरे पंथ या मजहब के साथ सह-अस्तित्व को नहीं स्वीकार करता, विशेष रूप से हिन्दू के साथ तो कतई नहीं। त

भी तो इस्लाम के 800 वर्ष के शासन में हिन्दुओं को जितना आत्याचार और उत्पीड़न झेलना पड़ा, उसका उदाहरण इतिहास में शायद ही कहीं मिले। डॉ. आम्बेडकर ने यह भी कहा था कि यदि चीन ने देश पर हमला किया तो पूरा देश चीन के विरूद्ध लड़ेगा, पर यदि पाकिस्तान या अन्य किसी मुस्लिम देश ने भारत पर हमला किया तो क्या सब मुसलमान साथ देंगे?

इससे यह भी पता चलता है कि सरदार पटेल और तत्कालीन सरसंघचालक श्री गोलवलकर की तरह डॉ. आम्बेडकर ने भी चीन के रवैए को बहुत पहले भांप लिया था। इसका तात्पर्य जो दूर-दृष्टि एक राजनेता मे होनी चाहिए, वह डॉ. आम्बेडकर में भरपूर थी।

इसी दूर-दृष्टि के चलते डॉ. आम्बेडकर ने देश विभाजन के समय साफ तौर पर यह कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच हिन्दुओं और मुसलमानों की आबादी का पूरी तरह से अदला-बदली होनी चाहिए, नहीं तो यह समस्या सदैव के लिए बनी रहेगी।

डॉ. आम्बेडकर की हुए सोच के परिप्रेक्ष्य में हम देख सकते हैं कि भारत में मुस्लिम समस्या क्यों इतनी उलझ गई है। भाजपा और एकाध अन्य राजनीतिक दलों को छोड़कर दूसरे सभी धर्म निरपेक्ष कहे जानेवाले दल मुस्लिम तुष्टिकरण में सदैव लगे रहते हैं। जिसका परिणाम देश में भयावह जिहादी आतंकवाद है, बांग्लादेशियों की घुसपैठ हैं।

जनसंख्या का असंतुलन है। असम, बंगाल और बिहार के कई सीमावती जिले मुस्लिम बहुल हो गए हैं, जिससें हिन्दुओं का सम्मान और जीवन कठिनाई में पड़ गया है। यहाँ तक कि हरियाणा के मुस्लिम-बहुल मेवात क्षेत्र तक में यही स्थिति है।

इससे यह पता चलता है कि डॉ. आम्बेडकर की निगाहें आसमान की ओर नहीं, बल्कि ठोस धरातल और यथार्थ की भित्ति पर टिकी थी। 18 सदी में फ्रेंच दार्शनिक आगस्टस कोने में कहा था, “जातियों की जनसंख्या राष्ट्रों की नियति होती है”, पर सत्ता के अंधमोह में हमारे अधिकांश राजनीतिज्ञ इसे सुनने को तैयार नहीं हैं।

डॉ. आम्बेडकर भारतमाता के सच्चे सपूत थे। उनका स्पष्ट कहना था- मेरी विचारधारा से बड़ा राष्ट्र है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि यदि हम लड़ते रहे तो स्वतंत्रता हमेशा के लिए चली जाएगी। उनकी मानना था कि एक राष्ट्र की कसौटी यह है कि सभी लोगों में बन्धु-भाव हो।

यथार्थ-परक सोच के चलते डॉ. आम्बेडकर का गांधीजी से कई बातों में मतभेद था, पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका कोई मतभेद नहीं था। क्योंकि संघ के राष्ट्रीय अधिष्ठान के अलावा डॉ. आम्बेडकर को यह पता था, कि संघ जातिवाद पर विश्वास नहीं करता और न उसके यहाँ ऐसी कोई अवधारणा ही है। इसी के चलते उन्होंने सांस्कृतिक मूल्यों से कोई समझौता नहीं किया।  

डॉ. आम्बेडकर इतने जिम्मेदार राजनेता थे। उन्होंने इस्लाम या ईसाइयत के बजाय बौद्ध धर्म अपनाया, क्योंकि बौद्ध धर्म हिन्दुत्व के वटवृक्ष की ही एक शाखा है इस तरह से उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त बुराइयों यथा भेदभाव, ऊँच-नीच, छुआछूत के प्रति अपना विरोध जताया ताकि इसमें सुधार हो सके, जैसा कि बुद्ध, महावीर, कबीर, रामानन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया था।

वस्तुतः डॉ. आम्बेडकर की दृष्टि और सोच राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत थी। डॉ. आम्बेडकर को बहुत कुछ प्रताड़ना और छुआछूत का दंश झेलना पड़ा, पर वह कभी भी प्रतिक्रियावादी नहीं बने। बल्कि वह देश की परम्परा और विरासत से पूरी तरह जुड़ें रहे। तभी तो उन्होंने आर्य-द्रविण संघर्ष को नकारा और यह बताया कि यदि ऐसा होता तो वेदों और हिन्दुओं के दूसरे ग्रंथों में इसका उल्लेख अवश्य होता। इसी तरह से छुआछूत के संबंध में उनका कहना था कि वेदों में इसका कोई कोई उल्लेख नहीं है।

कहने का आशय यह कि वह सामाजिक समरसता के शिल्पी तो थे ही देश को एक करने वाली सांस्कृतिक दृष्टि भी उनके पास थी। यदि हम समाज मे पूरी तरह समाजिक समरसता ला सके, और राष्ट्रीय समाज सभी भेदभाव भूलकर संगठित हो सके तो भारतमाता के उस महान पुत्र के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

आलेख

वीरेन्द्र सिंह परिहार,
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

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