Home / संस्कृति / लोक संस्कृति / कोल जनजाति का देवलोक

कोल जनजाति का देवलोक

भारतीय समाज और संस्कृति इंद्रधनुष की तरह विविध रंगी है। जिसमें जनजाति समुदायों के सांस्कृतिक छवि की पृथक ही पहचान है। उन जनजातियों में ‘कोल‘ प्रमुख है। कोल जनजाति भारत की प्राचीन जनजाति है और देश के विभिन्न भागों में यह निवास करती है।

कोल जनजाति के नामकरण को लेकर विद्धानों में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्धानों का मत है कि कोल मुण्डा समूह की एक अत्यन्त प्राचीन जाति है। कोल या मुण्डा अपनी बोली में अपने सदस्यों को हर, होर, हो तथा कोरो नाम से पुकारते हैं। इन शब्दों का अर्थ मानव होता है। ऐसी संभावना है कि आर्य भाषा-भाषियों ने जब होर या कोरो शब्द सुना हो तो उन्होंने उन लोगों को कोल नाम दे दिया हो।

कोल छोटा नागपुर पठार की प्रमुख जनजाति है, जिसका विस्तार मध्यप्रदेश के बुंदेलखण्ड, बघेलखण्ड और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती अंचल तक है। कोल जन जाति छत्तीसगढ़ के कोरिया, सूरजपुर, कोरबा, गौरेला-पेड्रा-मरवाही, मुंगेली, कबीरधाम, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, बलौदाबाजार-भाठापारा रायपुर में निवास करती है। कोंडागाँव, सुकमा, जगदलपुर, कांकेर, दंतेवाड़ा तथा बीजापुर में भी कुछ कोल परिवार निवासरत हैं। भारत की जनगणना 2011 के अनुसार छत्तीसगढ़ में कोल जनजाति की जनसंख्या 20873 है। जिसमें पुरूष की जनसंख्या 10433 एवं महिला जनसंख्या 10440 है। भारत सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य हेतु घोषित 42 अनुसूचित जनजातियो में से अनुक्रमांक 24 पर कोल जनजाति अधिसूचित है।

पौराणिक आख्यानों में कोल, भील, किरात जाति का उल्लेख मिलता है। रामचरित मानस में तुलसी दास जी ने लिखा है कि जब भगवान रामचंद्र जी को 14 वर्ष का वनवास हुआ, तो उनकी भेट जंगल में निवास करने वाली कोल-किरात जातियों से हुई। भगवान से मिलने के लिए देवता गण भी कोल-किरात का ही रूप धारण कर आए। कोल-किरातों ने ही भगवान के लिए पर्ण कुटी बनाई।
कोल किरात भेष सब आए, रजे परन सदन सुहाये।
बरनि जन जाहि मंजु दुई साला, एक ललित लघु एक बिसाला।
यह सुधि कोल किरातन्ह पाई, हरषे जनु नव निधि घर आई।
कंद-मूल फल-भरी-भरी दोना, चले रंक जमु लूटन सोना।
करहिं जोहारू भेंट धरि आगे, प्रभु बिलोक हिं अति अनुरागे।
चित्र लिखे जनु तहँ-तहँ ठाढ़े, पुलक शरीर नयन जल बाढ़े।
हम सब भाँति करव सेवकाई, करे के हरि मृग बाघ बराई।
बन बहेड़ गिरि कंदर खोहा, सब हमार प्रभु पग-पग जोहा।
तहँ-तहँ तुम्हहिं अहेर खेलाउब, सर निरझर जल ठाँऊ दिखाउब।
हम सेवक परिवार समेता, नाथ न सकुच ब आयसु देता।

कोल अपना संबंध रामायण कालीन माता शबरी से भी जोड़ते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि श्री राम ने बनवास के समय शबरी से उनके जूठे बेर खाये थे। छत्तीसगढ़ में यह स्थान आज शबरी नारायण के रूप में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। महाभारत में भी कोल जाति का उल्लेख मिलता है। कोल जाति का उल्लेख इतिहास में भी मिलता है। इस लेख में छत्तीसगढ़ में निवासरत कोल जनजाति के देवी-देवताओं और उनके अनुष्ठानिक आयोजनों पर प्रमुख रूप से प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। इसके लिए कोल समाज के व्यक्तियों के साथ कोटा, बेलगहना जिला बिलासपुर के विभिन्न ग्रामों व मुंगेली जिला के ग्राम डिंडौरी की यात्रा की गई। जहाँ पर समाज प्रमुखों से चर्चा कर देवलोक की जानकारी लेखबद्ध की गई है।

कोल जनजातीय देवलोक अध्ययन के लिए मैने ग्राम पांडातराई जिला कबीर धाम के शिक्षक साथी भाई देवचरन धुरी से चर्चा की, वे यात्रा पर चलने के लिए सहर्ष तैयार हो गए। कोल जनजातीय के निवास स्थल की खोज करते हम मुंगेली पहुँचे। ब्रिटिश काल में बने प्रसिद्ध खुड़िया बांध की चौड़ी नहर के पार से होते हुए हम ग्राम डिंडौरी गए। यहीं रहते हैं श्री रामकुमार कोलाम। जब उनके घर पहुँचे तब घर में रामकुमार जी भोजन बना रहे थे। उन्होंने दुखी मन से बताया कि उनकी बहू की तबियत खराब है। उसके इलाज के लिए परिवार वाले शहर गए हैं। चूँकि उनसे पूर्व में चर्चा हो चुकी थी कि हम ‘‘कोल जनजातीय देवलोक पर‘‘ जानकारी चाहते हैं। लेकिन परिस्थितिवश हम कुछ नही कह पाए। फिर भी उन्होंने हमारे आने का उद्देश्य जानकर कोल जनजाति के संबंध में जानकारी दी। रामकुमार कोलाम जी कुशल पेंटर हैं। तीस साल तक शासकीय नौकरी भी की है। किन्ही कारणों से नौकरी छूट गई। अब घर पर ही रहते हैं।

हमारा प्रश्न था कोल जनजति की उत्पत्ति के बारे में कुछ बताइये ? तब उन्होंने घर से बिरसा मुंडा का चित्र लाकर सगर्व दिखाया और कहा कि हम इन्हीं के वंशज हैं। जातीय गौरव की इस झलक ने हमें भी गौरवान्वित किया। फिर उन्होंने अपने देवी-देवताओं के दर्शन कराए। न कोई ईंट-पत्थर की दीवार, न कोई पत्थर की मूर्ति। केवल मिट्टी की चौरी। यही है, कोल जनजाति का देवलोक। आँगन के एक कोने में डीह के देवता, आंगन में ही ब्रह्मदेव, कमरे के प्रवेश द्वार और भीतर में कलि कंकाली। ये सब मिट्टी की चौरी में स्थापित हैं। मिट्टी रूप में ही। द्वार पर जो स्थापित है उसमें लाल, काले और सफेद रंग के ध्वज लगे हैं। इन्हें कलि कंकाली, महामाया और शीतला का रूप बताया। भीतर भी माटी की चौरी में दीपक, हूम दान और पीढे़ पर नारियल रखे हुए हैं। यही इनकी आस्था का केन्द्र है। उन्होंने बताया कि उनके देवी-देवता रक्ताही हैं, अर्थात् इन्हें बलि दी जाती है। तीनसला पूजा होती है। नारियल अगरबत्ती, हूम-धूप, फूल-पान आदि भी चढ़ाया जाता है। दशहरे में नवाखाई त्यौहार मानते हैं। नए धान से चावल निकाल कर नेऊज चढ़ाते हैं। उनकी माता जी दुकलहिन बाई कोल से भी भेट हुई। उन्होंने अपना मायका ‘बीजा‘ गाँव में बताया। रामकुमार जी ने जानकारी दी कि बीजा में कोल जनजाति के करीब 70 परिवार निवास करते हैं। वहाँ कोलो की आबादी लगभग 500 होगी। बीजा जाने की हमारी उत्सुकता बढ़ी। लेकिन रामकुमार जी की बहू की अस्वस्थता के चलते संभव नही हो पाया। उन्होंने यह भी बताया कि डिंडोरी के आसपास खुड़िया व नवरंगपुर में भी कोल जनजाति निवास करती है। किसी ने बताया कि बीच जंगल में मलकछरा गाँव है। वहाँ भी कोल जाति की बस्ती है। वहाँ जाने पर पता चला कि वह बैगा जनजति की बस्ती है। बैगा लोगों से उनकी जीवन शैली व देवलोक की चर्चा कर हम वापस घर आ गए।

पारिवारिक व्यस्तता व गाँवों में विवाह की धूम होने के कारण कोल बस्ती जाना संभव नहीं हो पाया। कोल भाईयों से सपर्क करने पर वे भी किसी न किसी रूप में अपने व्यस्त होने की बात कहते। इधर मन में बड़ी छटपटाहट थी कि कोल जनजाति के देवलोक पर काम कब पूरा होगा? बिलासपुर जिले के बेलगहना गाँव में हमारे साहित्यकार भाई रहते हैं,- राजेश चौहान, छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवि हैं। उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि उनके गाँव के आसपास काफी संख्या में कोल बस्ती है। जहाँ कोल जनजाति की बहुलता है। मन में आशा की एक किरण जागी।

इस बार साथी थे लोक साहित्य के अध्येयता व संस्कृति कर्मी शिक्षक भाई रामकुमार वर्मा। वर्षो से हम दोनों पूर्व परिचित हैं और एक-दूसरे के सहयोगी हैं। बेलगहना आने पर पता चला कि श्री विजय कोल जो ग्राम पंचायत बस्ती बहरा के सरंपच हैं, वे सिद्ध आश्रम में बेलगहना के प्रमुख संत के साथ जम्मू प्रवास पर हैं। इस बीच राजेश चौहान के अनुज बृजभान चौहान ने हमार खूब सहयोग किया। हम उनके घर ही ठहरे। भोजन व आवास की व्यवस्था की। ग्राम बीजा निवासी विजेन्द्र कोल जो बेलगहना पुलिस चौकी में आरक्षक के पद पर कार्यरत हैं। उनसे चर्चा हुई तो वे साथ चलने के लिए तैयार हो गए। मन प्रसन्नता से भर गया।

बेलगहना का सिद्ध मंदिर बड़ा प्रसिद्ध है। यहाँ बड़ा मेला भरता है। ऊँची पहाड़ी पर 40-50 वर्षो से अनवरत जलती धुनी है। अनेक देवी-देवताओं के मंदिर और आश्रम हैं। भाई बृज चौहान ने हमें वहाँ ले जाकर दर्शन कराया। मन आनंदित हो गया। फिर पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार हमें बृजभान जी विजय कोल सरपंच के पिता जी से मिलवाने ग्राम बस्ती बाहरा ले गए। लेकिन वे नहीं मिले। मन में निराशा हुई। पर पीछे नहीं हटे। पूछने पर पता चला कि सरपंच जी के दादा जी हैं। पुराने घर में रहते हैं। तब तक विजयेन्द्र कोल भी आ गए। घर पहुँचे तो दादा जी हाथ में कुछ रोटियाँ लेकर निकल रहे थे। पूछने पर बताया कि वे अपने भाई के घर जा रहे हैं। हम भी पीछे-पीछे उनके साथ चले। उन्होंने अपना नाम तीरथराम और भाई का नाम परसराम बताया। दोनों अपने-अपने घर में अकेले रहते हैं। दोनों की पत्नी स्वर्ग सिधार चुकी हैं। वृद्धावस्था में दोनों भाईयों का प्रेम देखकर मन विह्वल हो गया। छोटा भाई भूखा न रहे, इसका ख्याल है, बडे़ भाई को। ऐसा दृश्य अब कभी-कभार ही देखने को मिलता है। हम सब वापस तीरथराम कोल के घर आए। मिट्टी का घर जो मिट्टी के कवेलू से छाया हुआ है।

घने जंगल के बीच बस्ती बहरा गाँव। पश्चिम में चंदेला पहाड़, पूर्व में सिद्ध बाबा का पहाड़, बीच में दो तालाब जिसे बंधी कहा जाता है। छोटे बंधी-बड़े बंधी। जंगल में सरई, साजा, धँवरा, सलिहा, मोंदे व बांस के लहलहाते वृक्ष मन को सुकुन दे रहे थे। यहीं कुछ कच्चे और कुछ पक्के घर। जैसे ही हमने तीरथराम जी के घर प्रवेश किया देवलोक के दर्शन हुए। आंगन में मुहाटी पर चबुतरे में चौरी बनी हुई है। एक छोटा बांस गड़ा हुआ है और बाँस के ऊपर लाल ध्वज लहरा रहा है। पास ही काली चूड़ियाँ लटकी हुई हैं। तीरथराम जी ने बताया कि ये ‘‘महामाया देवी‘‘ हैं, और उनसे लगी हुई चौरी ‘‘बराईन देवी‘‘ की है। यह भी उल्लेखनीय है कि महामाया देवी का प्राचीन मंदिर बिलासपुर जिले के रतनपुर में है। यहाँ महामाया की बड़ी मान्यता है। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में महामाया के अनेकों मंदिर हैं। बरइन देवी के संबंध में पूछने पर तीरथराम जी ने बताया कि उसने जब अपनी पत्नी को गवन कराके लाया, तभी से बरइन देवी यहाँ विराजित हैं। इन देवियों की पूजा बलि देकर की जाती है। प्रत्येक नवरात्रि में अठवाही (अष्टमी) के दिन तीन मुर्गियों की बलि दी जाती है। कोठा (गोशाला) में ‘बधेसुर‘ देवता हैं। खूँटा जिसमें पशुओं को बांधा जाता है, वहाँ पर प्रत्येक तीन वर्ष में कर्रा मुर्गा की बलि देने की परंपरा है। इससे पशुधन की रक्षा होती है। तीरथराम जी ने अपना गोत्र रऊतेल बताया। उनके माई घर (मुख्य कमरा) की चौरी में त्रिशुल गड़ा हुआ है। जिसमें काली चुड़ी टंगी है। पास ही एक छोटी मूर्ति है जिसकी पहचान नहीं हुई। त्रिशुल व मूर्ति में बंदन लगा हुआ है। इसे इन्होंने महाकाली का रूप बताया।

विजयेन्द्र कोल ग्राम बीजा के रहने वाले हैं और बेलगहना पुलिस चौकी में आरक्षक के पर पर कार्यरत हैं। बड़े उत्साही और संस्कृति प्रेमी युवक हैं। युवा कोल समाज के अध्यक्ष हैं। कोल जनजाति की कला, संस्कृति और परंपरा के संरक्षण और समाज के विकास के लिए प्रयासरत हैं। इन्होंने बताया की कोल समाज में घरों के आंगन में महादेव, दरवाजे पर बघर्रादेव और घर के भीतर दुल्हादेव, दुल्हिन दाई व ठाकुराईन दाई का निवास होता है। अनुष्ठानों में गौरी-गौरा और जँवारा प्रमुख हैं। कोरबा जिले के शंकरनार, लाफागढ़ कोल जनजाति की सामाजिक राजधानी है। बरपाली, बिटकुली, पहाड़ बछला, केंदागढ़ आदि स्थानों में भी कोल बस्ती है। जिन्हें कोलटोला या कोल्हान कहते हैं।

विजयेन्द्र कोल के साथ हम बेलगहना से करीब 12 कि.मी दूर पेन्ड्रा मार्ग से भीतर नवाडीह गाँव पहुँचे। वहाँ एक कोल भाई मिले। उन्होंने अपना नाम राजाराम बताया। वह लोक कलाकार हैं और साई बाबा से प्रभावित हैं। उनके आंगन में चंदन पेड़ के नीचे कुछ अनगढ़ मूर्तियाँ दिखी। जिसे उन्होंने ठाकुरईन दाई व शीतला माता कहा। एक छोटी नारी प्रतिमा भी दिखाई पड़ी, जिसे वह दार सागर गाँव से लाकर रखा है। उन्होंने चंडी भवानी, छड़ीदार, मरही माता व चितावर पाठ देवता की जानकारी दी। चितावर पाठ में काली मुर्गी के साथ ही दारू व चुड़ी-फुंदरी चढ़ाई जाती है। पशुधन को रोग राई से बचाने के लिए, सवनाही पूजा की जाती है। राजाराम ने बताया कि वह रऊतेल गोत्र का है और रऊतेल गोत्र वाले कोल कथरी (गुदड़ी) का उपयोग नहीं करते है। जो कथरी का उपयोग करते है उनसे रोटी-बेटी का संबंध नही करते।

राजाराम, कोल जनजाति पर हमारे खोज कार्य से प्रभावित हुए और हमारे साथ हो लिए। नवाडीह गाँव में जब हम शिवशंकर कोल के घर पहुँचे, तो वहाँ महिलाएँ थीं। वे अपने गृह कार्य में संलग्न थीं। लिपा-पुता घर। फर्श की लिपाई गोबर के बजाय काले रंग की मिट्टी से हुई थी। पूछने पर महिलाओं ने बताया कि पुआल को जलाकर वे यह रंग तैयार करती हैं। परछी में ढेकी थी। ढेकी से धान कुटा जाता है। प्राचीन और पारंपरिक साधन है यह, धान से चावल निकालने का। कोने में पत्थर की चक्की थी, जिसमें गेहू पीसा जाता है। इन पारंपरिक साधनों को देखकर हम बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने ढेकी में चावल छरकर दिखाया भी।

शिवशंकर कोल ने बताया कि मुख्य देव दुल्हादेव हैं, जो घर के भीतर रहते हैं। इन्हें लाल मुर्गा चढ़ाया जाता है। जब विवाह के समय दुल्हन आती है तो ‘डोला परछन‘ के समय भी बलि दी जाती है। बाहर ठाकुरईन दाई को काली चूड़ी चढ़ाई जाती है। कोठा में (गौशाला) में गोरइयाँ पाठ देव की बड़ी मान्यता है। इन्हें कर्रा मुर्गा की बली दी जाती है। इसका प्रसाद महिलाओं को नहीं दिया जाता । मिरचुक देवता को नारियल चढ़ाया जाता है। इसी बीच घर की महिलाएं कमला बाई कोल, रेवती बाई कोल, परमिला और राजकुमारी कोल ने शिक्षा के क्षेत्र में उनके बच्चों को सरकार द्वारा सुविधाएं नहीं दिए जाने की बात कही। इसका कारण यह बताया गया कि जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए इनसे मिसल रिकार्ड मांगा जाता है। इनके मिसल रिकार्ड में पुरखों ने दहाईत लिखाया है। जबकि ये कोल ही हैं। कोल शब्द अब विलोपित कर दिया गया है। इसमें सुधार के लिए इनके समाज प्रमुख प्रयासरत हैं। पर सफलता नहीं मिल रही है। सुविधा नहीं मिलने के कारण कोल समाज में बड़ा असंतोष है। कमलाबाई ने बताया कि ये नवरतहा हैं। अर्थात् जँवारा बोते हैं।
जब हम देव दर्शन कराने की बात कही, तो वे सहर्ष तैयार हो गए। आंगन में मिट्टी का छोटा चबुतरा बना हुआ है। जिसमें बाँस की लाठी में लाल ध्वज लहरा रहा है। पास नांगर का जुड़ा रखा हुआ है। उन्होंने बताया कि लाल ध्वज महामाया का प्रतीक है। घर भीतर एक कोने में मिट्टी के चबुतरे पर ही त्रिशूलनुमा बाना गड़ा हुआ है। बाने में नीबू व काली चूड़ी लगी है। तीन नारियल रखे हुए हैं। उन्होंने इसे महामाया कहकर संबोधित किया।

इसी बीच खेत से काम करके घर प्रमुख सुकुत राम कोल लौटे। उनका देवलोक देखकर हम अचांभित रह गए। नीचे मिट्टी की चौरी में बाना, त्रिशूल और लोहे की छड़ी के साथ नारियल व अगरबत्ती रखे हुए थे। ऊपर दो सूप भी टंगे थे। जिनकी बनावट आम सूप से भिन्न थी। हमारे घर में प्रचलित सूप में पीछे दो कोने होते हैं। लेकिन इन सूपों में एक ही कोना था। ये उल्टे टंगे हुए थे। उनमें चाँवल के दाने थे। हमें लगा कि यह तंत्र-मंत्र का साधना स्थल है। हमने जिज्ञासा प्रकट की तो हमारा अनुमान सही निकला। सुकुतराम कोल तंत्र-मंत्र के बड़े जानकार हैं। उन्होंने अपनी साधना से अनेक लोगों को लाभ पहुँचाया है। उन्होंने सूपा को ‘‘बासिन कैना बैना‘‘ कहकर संबोधित किया और अपनी मंत्र साधना को हमें प्रत्यक्ष दिखाया। अगरबत्ती जलायी और दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना की। सूप को नीचे उतार कर अपने मंत्रों से हमारा साक्षात्कार कराया। हम आश्चर्य चकित थे। वे सूप में रखे चावल को अपनी हथेलियों से हिलाते और मंत्रोच्चारण करते जाते।

‘‘जय धरती गुरू धरती माता, कुल गुरू माया गुरू डंडा गुरू, गोपा गुरू सम्मत गुरू जटा धारी शंकर सिंघना अघोरी गुरू जय सिद्ध बाबा नमो काम पूरा करने वाले। ये आय तोर जघा अखाड़ा में। ये आकस वाले, बाकस वाले, घुनी वाले ढोल बजे नई जाने हाथ डोले पाँव डोल म बखरी म जात उतरे परसा कोट में चघे म। राजा के आसन। आके देख। बारा नंगर बारा घाट के छत्तीसगढ़ के भारत माता, भारत भर के अब्बड़ कइसे कहाँ के रोगिया जो आय है। ओखर नमोकाम रामकुमार वर्मा, पीसीलाल यादव, उनके नमोकाम भरपूर करो अउ आसीरवाद दव। जब ओ मन आरती उतार के भगवती तोर शरण में आय हवे। भगवती तुम्हारा नमोकाम पूरा करेगा। बाराभाटी के मंद पीयेगा। सोरा मुर्गा खायेगा जेऊर फरहार खीर मशान जोत भवाजी रक्षा करेगा।‘‘

हमारे पूछने पर कि क्या आप साँप का जहर उतारने का मंत्र जानते है? तो उन्होंने कहाँ कि नहीं साँप का जहर उतारने का मंत्र नहीं जानता। हाँ बिच्छू का जहर उतारता हूँ। हमारे आग्रह पर उन्होंने इस मंत्र का उच्चारण इस प्रकार किया-
‘‘सुरही गाय के गोबरी में बिच्छी बियाय छै कारी छै कोरी, छप्पन कोरी लाली बिच्छी। कारी बिच्छी इंरिग-बिरिंग भय। येला कोन झारे ? गुरू महादेव शंकर भगवान पार्वती, ओखर चेला मैं झारँव। मोर झारे जाता बाजे कुरूर-कुरूर, बिच्छी उतरे सुरूर-सुरूर। सात समुंदर सोला धार के पानी जुड़ागे थिरागे।

उनके मंत्रोच्चारण को सुनकर हम बड़े प्रभावित हुए। उनसे पुनः अनुरोध किया कि किसी बच्चे को बुरी नजर लग जाती है, तब क्या आप अपने मंत्रों से नजर उतारते हैं। उन्होंने हामी भरते हुए मंत्रोच्चारण किया-
‘‘टोना झारंव, भूत झारंव, रोनही झारंव, परेतीन झारंव। येरेर-गेरेर अउ छिंद बाहरी ओदे टंगाय हे। अइसे झारथँव। उतार-उतार रोना-टोना भागे। भूत चले जा। चारा पानी ल तोर खाबे, अगर टोना कर टोना पाबे। इंद्र जाल, भंँवर जाल में तोला फँसा दुहूँ मर जाबे, सर जाबे। नइते भाग जा।‘‘

निसन्देह श्री सुकुतराम जी के पास लोक ज्ञान की सम्पदा का अकूत भंडार है। उनकी बड़ी मान-प्रतिष्ठा है। इस कार्य हेतु उन्हें दूर-दूर से आमंत्रण मिलता है। उन्होंने बताया कि चिरमिरी, मनेन्द्रगढ़, सरगुजा, उड़ीसा, शिवरीनारायण तक उनके चाहने वाले हैं। उनके चेले भी हैं। जो अपने मंत्रोच्चारण झाड़-फूंक से लोगों के कष्ट दूर करते हैं। बासिन कैना बैना अर्थात् सूपा के माध्यम से चावल में हाथ फेर कर रोगी के कष्ट को जान जाते हैं, फिर उस रोग का ईलाज करते हैं। भूत-प्रेत बाधा को भगाने के लिए मंत्रोच्चारण का निवदेन किया, तो वे सहर्ष तैयार हो गए। इस मंत्र को उन्होंने जंजीरा कहा-
‘‘भूते ओढ़ना, भूते दसना, भूते करे अहार। नौ सौ भूत पाये ते दिन करे अहार। जे दिन नौ सौ भूत नई पाये ते दिन परे उपास। नंदलाल गुरू कबीरदास, सिद्ध बाबा, चिमटा वाले, जटा वाले छड़ी मार के भगा।‘‘

गाँवों में अक्सर गाय-गोरू में खुरहा-चपका, एक टंगी आदि बीमारी आ जाती है। तब सुकुत राम जी अपने मंत्रों से इसका भी इलाज करते हैं। खुरहा रोग में पशुओं के खुरों के बीच घाव हो जाता है। जिससे उनका चलना दूभर हो जाता है। तब सुकुतराम जी मंत्रोच्चारण कर इलाज करते हैं। वह मंत्र इस प्रकार है। उन्होंने इस मंत्र को पचिरा कहा-
‘‘रामचंद्र कनि पंडोबा नाम मिले तुम्ही लोग सुमरति वेद न की गावे। दुरपति मानव तामा सरग पुटंग स्वर्ण छुटे हनुमान। मंद मंगायेंव मंद के कारन अर्जुन पंथी बीत न जाये। संकट में सँवरी आप रूप नाम धराइस। सुमरत गरूवा उच्चार गोहड़िन के खुरी चिराइस। हे दाई नमस्कार।‘‘

कोल जनजाति के द्वारा किये जाने वाले नृत्य के संबंध में पूछने पर बताया कि कोल समाज के लोग ‘कोल दहका‘ नृत्य करते हैं। ऐसा कहकर सुकुतराम जी वृद्धावस्था में भी बच्चों की तरह ठुमकने लगे।
आओ दीदी आओ बहिनी
ये दे सबे झन आओ।
तब बहुत मजा आही।

पूर्वज कहाँ से आए? इस प्रश्न के उत्तर में सुकुतराम जी ने बताया कि उनके पूर्वज रजवाड़ा में रोजी-मजदूरी करते थे। एक बार दरोगा शाह कोल ने राजा के घोड़े को बरहा समझकर रात में मार दिया। क्योंकि उसके जोंधरा (भुट्टा) को घोड़ा आकर नुकसान पहुँचाता था। रात के अंधेरे में उसने समझा कि ये जंगली सुअर है। सुबह जब जानकारी हुई तो राजा नाराज हुआ और कोलों को राज्य छोड़ने का आदेश कर दिया। फलस्वरूप वे देहात में आ गए इसलिए उनके साथ दहाईत शब्द जुड़ गया। यही दहाइत शब्द आज इनके विकास और सरकारी सुविधा प्राप्त करने में अवरोधक बना है।

कोल महिलाएं जसगीत गाती हैं। हमारे आग्रह पर सभी गीत गाने के लिए तैयार हो गई।
मन के मंदिरवा म हो महामाया बिराजे
मन के मंदिरवा म हो
तन-मन के मैं मंडप बनायेंव
तोर सजायेंव सिंहासन माँ।
तोर जग म दिया-जोत जलायेंव
जग-मग, जग-मग हो
महामाया बिराजे मन के मंदिरवा म हो।

हारमोनियम पर संगत की राजाराम कोल व संतोष कोल ने, तथा ढोलक बजाया सुकुतराम व गणेश कोल ने। इस संगीत मंडली में बहुत सारे बच्चें भी शामिल थे। बच्चों के चेहरे की खुशी और मन की उमंग देखते ही बनती थी। विवाह गीत भी सुनाया।
विवाह गीतः-
एक तेल चढ़िगे एक तेल चढ़िगे,
ओ हरियर हरियर, ओ हरियर हरियर।
मड़वा म दुलरू तोर बदन कुम्हलाय,
मड़वा म दुलरू तोर बदन कुम्हलाय।
रामे ओ लखन के, रामे ओ लखन के दाई
तेल ओ चढ़त हे दाई तेल ओ चढ़त हे,
जहना के दियना मोर करे ओ अंजोर।
भड़ौनी गीतः-
दरबर-दरबर आइन बरतिया,
कोठा म ओलाईन ओ
कोठा के किरनी चाबे
खपरा धर खजुवाइन ओ।
‘नदियाँ‘ तीर के पटुवा भाजी
पट-पट करथे ओ।
आय हे बरातिया साले ,
मटमट-मटमट करथे ओ।
नंदिया तीर के पटवा भाजी।
उल्हवा-उल्हवा दिखथे ओ,
आय हे बरातिया साले,
बुढ़वा-बुढ़वा दिखथे ओ।

भोजन का समय हो रहा था। हम वापस बेलगहना आए। उसी समय विजयेन्द्र के लिए पुलिस चौकी से बुलावा आ गया। अब उनके स्थान पर सहयोग के लिए हमारे साथ विरेन्द्र कोल थे, जो मिट्ठू नवागाँव में छात्रावास अधीक्षक हैं। बेलगहना क्षेत्र में कोल जनजाति की हमारी देवलोक यात्रा कई मायने में अविस्मरणीय रही। विरेन्द्र कोल के मार्गदर्शन में जब हम बेलगहना से खोंगसरा, मिट्ठू नवागाँव के लिए निकले, तो ग्राम कोनचरा के पहले एक देवस्थान दिखा। जिसमें दो सीमेंट-कांक्रीट के स्तम्भ व एक काष्ठ स्तम्भ दिखाई पड़े। रामकुमार वर्मा जी की नजर पड़ी, तो हम सब रूक गए। मोबाईल से तस्वीर खींची। पक्के स्तम्भ में लाल ध्वज और लकड़ी के स्तम्भ में सफेद ध्वज लहरा रहे हैं। त्रिशूल और बाना के साथ ही खप्पर भी रखे हुए हैं। दो सरई के वृक्ष हैं। एक सरई के वृक्ष में पीपल का पेड़ भी लगा हुआ। दो लम्बे अनगढ़ पत्थर हैं। इस देवस्थल के संबंध में जानने की बड़ी इच्छा हो रही थी। संयोग से एक व्यक्ति आ रहा था। हमारे पूछने पर उन्होंने इस देवस्थल के बारे में बताया कि यह महामाया का स्थल है। एक बार दूल्हा-दुल्हन को डोला परछन के पहले परंपरानुसार यहाँ ठहराया गया था। क्योंकि दूल्हा जब दुल्हन को ब्याह कर लाता है, तो उसे घर ले जाने के पहले देवस्थल में ही रोका जाता है। यह परंपरा सभी समाज में है। पता नहीं उस दुल्हा-दुल्हन से क्या गलती हुई ? कि वे दोनों सरई वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो गए। जो आज भी लोक विश्वास की याद दिलाता है। यह देवस्थल लोक आस्था का केन्द्र है।

मिट्ठू नवागाँव पहुँचकर जब हम बरपाली के लिए निकले तो मिट्ठू नवागाँव में सभी देवी-देवताओं को एक स्थान पर देखा। पक्के चबुतरे में ऊँचा काष्ठ स्तंभ है। जिसमें लाल चमकीला कपड़ा लिपटा हुआ है। नीचे तुलसी के पौधे व दो बाना गड़े हैं। एक अनगढ़ पत्थर भी रखा हुआ है। विरेन्द्र कोल ने बताया कि यह महामाया देवी हैं। पास ही एक छोटे मंदिर में दो बाघ की मूर्तियाँ हैं। जहाँ सफेद ध्वज लगा हुआ है। यह बघर्रा देव है। यहीं नीम वृक्ष के नीचे एक और अनगढ़ देव प्रमिमा है। जो शीतला माता हैं। इस तरह लोक देवी-देवताओं को लोगों ने एक स्थान पर स्थापित कर दिया है।
हम विरेन्द्र कोल के साथ ग्राम बरपाली पहुँचने के लिए अरपा नदी को दो बार पार किए। अरपा नदी का सौन्दर्य मन को बार-बार अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। बरपाली में रामहित के घर पहुँचे। दो कोल भाईयों के गले में गोदना गुदे हुए थे। गले में गोदना हम लोगों ने पहली बार देखा। पूछने पर उन्होंने बताया कि गले में घेंघा रोग के लक्षण दिखाई देने पर बूढ़ी दाई (दादी) के कथनानुसार गोदना गुदवाया। जिससे घेंघा रोग दूर हो गया। गोदना केवल अंग आलेखन का माध्यम ही नहीं, बल्कि इसका शरीर में चिकित्सकीय प्रभाव भी परिलक्षित होता है। रामहित कोल ने देव दुलरवा, शिकारी देव, बावा महाराज की जानकारी दी। जब हम श्याम सिंह कोल के घर जा रहे थे, तब गाँव के मध्य एक पक्के चबुतरे पर काष्ठ खम्ब दिखाई पड़ा। पूछने पर उन्होंने बताया कि ये ‘‘कोलिहा दाऊ‘‘ हैं। यहाँ धान की नई फसल आने पर धान की बाली चढ़ा कर पूजा की जाती है। गाय-गोरू में एक टंगी, खुरहा, चपका रोग व किरनी आदि हो जाने पर पशुधन की रक्षा के लिए ‘छाहुर‘ बांधा जाता है। छाहुर में नारियल के अतिरिक्त छिंदपत्ता, पीपल, नीम व तेन्दू पत्ते के साथ हल्दी तथा गाय का दूध मिलाकर बांधा जाता है। इससे गाँव के पशुधन की रक्षा होती है। श्याम सिंह कोल गाँव के बैगा हैं। इन्हें यहाँ ‘बैगा डोकरा‘ कहकर सम्मान दिया जाता है। ये तंत्र-मंत्र के भी जानकार हैं। लोगो के भूत-प्रेत व अन्य शारीरिक व्याधियों को श्याम सिंह कोल सूपा की सहायता से मंत्रोच्चारण कर दूर करते हैं।

विरेन्द्र कोल ने बताया कि यहाँ से 8-10 कि.मी. की दूरी पर केंदागढ़ है जो छत्तीसगढ़ प्रदेश स्थित तंवरों के सतगढ़ों में से एक है। केंदागढ़ पहुँचे तो वहाँ बड़ी चहल-पहल थी। क्योंकि आज वहाँ का साप्ताहिक बाजार था। यहाँ बाजार सोमवार को लगता है। बाजार से पहले एक देवस्थल दिखाई दिया। पक्के अहाते के भीतर दुर्गा का मंदिर है। मंदिर के पहले नीम पेड़ के नीचे दो लकड़ी के खाम हैं, जिनमें ऊपर लाल कपड़े में नारियल बंधा है व नीचे बाना गड़ा हुआ है। अहाते से बाहर एक पक्के चबुतरे में बाना और लकड़ी का खम्भा गड़ा हुआ है। अहाते के भीतर एक देव गुड़ी बनी हुई है। देव गुड़ी में धुनी जल रही है। बीच में खड़ाऊ रखा हुआ है। आठ-दस लोग बैठे बातों में तल्लीन हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि यह सिद्ध आश्रम है। जो बेलगहना के सिद्ध आश्रम से संबंधित है। इसी तरह का आश्रम बरपाली में भी है। लोगों ने बताया की बेलगहना के सिद्ध आश्रम का इस क्षेत्र में बड़ा प्रभाव है। कोल जनजाति के अनेक लोग इस आश्रम से जुड़े हुए हैं। नीम पेड़ के नीचे देवस्थल के बारे में बताया की ये ‘डोकरी दाई‘ और शीतला माई हैं। बाहर देवस्थान ठकुरईन दाई का है। यहाँ चैत्र और कुँवार माह की नवरात्रि में जँवारा बोये जाते हैं। यह भी बताया कि बाजार से थोड़ी दूर पर ‘‘झगरा खाँड़‘‘ देव हैं। जहाँ पर पहले भैंसे की बलि दी जाती थी। अब बकरे की बलि दी जाती है। हमने उसे देखना चाहा, तो एक सज्जन हमें वहाँ लेकर गए। देखा तो इमली वृक्ष के नीचे एक छोटा मंदिर बना हुआ है। वहाँ खंडित जलहरी है, जो काले पत्थर से बनी है। ऊपर शिवलिंग नहीं है। उन्होंने बताया की यहाँ बकरे की बलि देने पर खून जलहरी के गड्डे में समा जाता है और पता भी नहीं चलता। यहाँ मक्खियाँ भी नहीं आती। उन्होंने एक पुरानी बात भी बतायी कि पहले यहाँ पशुओं का बड़ा बाजार लगता था। तब एक पाड़ा (भैंसा) घूम-फिर कर यहीं आता था। इसलिए लोगों ने उसकी यहीं बलि चढ़ा दी। तब से यहाँ बलि प्रथा चालू है। शिवलिंग के जलहरी पर बलि की परंपरा की यह अनोखी घटना है।

साप्ताहिक बाजार में चूड़ी पसरा में तुरकिन एक महिला को चूड़ी पहना रही थी। यह परंपरा अब गाँवों में यदा-कदा ही देखने को मिलती है। थोड़ा बाजार का आनंद लिये और हम पहुँच गए विरेन्द्र कोल के मौसा जी श्री रामचरन कोल के घर। देवलोक की चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि घर के भीतर दुल्हादेव, अंगार मोती और भानमोती देव है। जहाँ पर मुर्गी की बलि दी जाती है। तथा प्रत्येक पीढ़ी में बरहा की बलि देने की परंपरा है। द्वार पर द्वारपाल के रूप में अंधियारी, मसवासी देव हैं। आंगन में महामाया, भैरव, नारसिंह और घट बहरिन का निवास है। आंगन में लाट खाम है। यह घट बहरिन का निवास है। आंगन में ही चबुतरे पर थोड़ी दूर में ‘देशफीरी‘ देव हैं। देशफीरी देव के नामकरण के संबंध में पूछने पर रामचरन ने अनभिज्ञता प्रकट की और कहा कि हमारे पुरखा ने यही नाम बताया है। महामाया, भैरव, नारसिंह सभी ‘रक्ताही देवता‘ हैं। इनमें बलि चढ़ाई जाती है। रामचरन ने बताया कि केंदागढ़ के चारों तरफ पहाड़ है। पूर्व में ककरइल पहाड़, पश्चिम ने भोड़ा पहाड़, उत्तर में बंजारी पहाड़ और दक्षिण में चैतुरगढ़। चैतुर गढ़ में प्रसिद्ध किला व देवी का मंदिर है।

सांझ घिरने लगी थी। हमें वापस लौटना था, जंगली रास्ते से, पर केंदागढ़ के महल और किले को देखना शेष था। हम शीघ्रता से रामचरन जी से बिदा लेकर राजमहल पहुँचे। राजमहल खंडहर में तब्दिल हो चुका है। ये खंडहर अतीत की कहानी कह रहे हैं। कुछ हिस्सों में नया निर्माण कर परिवार जन रहे हैं। उनसे हमारी बातचीत भी हुई, बड़ी आवभगत भी की। हम सब वापस बेलगहना आ गए। भाई रामकुमार वर्मा को पेंड्रारोड जाना था। क्योंकि उनकी ट्रेन पेंड्रा रोड से ही थी। मैने अपनी टिकट केंसिल करवा ली थी। अतः मै विरेन्द्र कोल के साथ कोटा आ गया। रात को साढ़े आठ बज रहे थे। परिवार जनों से भेंटकर बहुत अच्छा लगा। परिवार, परिवार होता है। अपना हो या और किसी का। बच्चों की मीठी-मीठी बातें और परिवार जनों का प्यार-दुलार शारीरिक थकान मिटाकर मन को शांति प्रदान करते हैं। सुबह जल्दी उठना है यह सोचकर भोजन कर जल्दी सो गए। क्योंकि दूसरे दिन हमें कोल बहुल गाँव बीजा जाना था। बीजा की दूरी कोटा से 25 कि.मी. है।

विरेन्द्र कोल ने कोल जनजाति से संबंधित बहुत सारी सामग्री उपलब्ध करायी। वे समाज के विकास के लिए बड़े जागरूक हैं। पढ़ा-लिखा परिवार है। दो भाई शासकीय नौकरी में हैं, दो भाई पढ़-लिख कर तैयार हैं। पिता श्री मेलाराम कोल जिनकी उम्र लगभग 60 वर्ष है, कुशल बढ़ई हैं। इनकी कुशलता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि पहले ये ट्रक की बाडी बनाते थे। अब खेती किसानी करते है। मैंने कोल देवी-देवताओं के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वे ‘‘गौरी-गौरा‘‘ को मानते हैं। इसलिए भीतर महादेव और पार्वती जी हैं। दरवाजे पर बरम बाबा और आंगन में बघर्रा की पूजा करते हैं। इनका गोत्र रऊतेल है। ये अपने घर में ही दीपावली के दो दिन पहले ‘गौरी-गौरा‘ की स्थापना कर विधि-विधान से पूजा करते हैं। ‘गौरी-गौरा‘ अनुष्ठानिक पर्व है। ‘गौरी-गौरा‘ पार्वती व शिव का लोक रूप है। इस पर्व में गौरी-गौरा का विवाह किया जाता है, जो बड़ा दर्शनीय होता हैं।

मेवा लाल जी ने बताया कि ये नवा खाई का त्यौहार मनाते हैं। पहले धान के नये बालों की गुच्छी बनाकर अपने देव स्थल पर रखते हैं। फिर पूजा पाठ के बाद उन बालियों से चावल निकाल कर खीर बनाकर देवता को प्रसाद चढ़ाया जाता है। पुड़ी भी चढ़ाई जाती है। फिर प्रसाद को परिवार जन एक साथ ग्रहण करते हैं। मैं उनके देवस्थान को देखना चाहा, वे सहर्ष तैयार हो गए। घर के एक कोने में मिट्टी की चौरी है। जिसके ऊपर धनुष बाण और फरसा टंगा हुआ है। थोड़ी देर बाद उन्होंने धनुष बाण का संधान कर के भी दिखाया।

मेवालाल जी के बड़े पुत्र लोकेन्द्र कोल शिक्षक हैं, उन्होंने बताया कि उनके परिवार में पुजई की परंपरा है। ‘पुजई‘ बलि ही है। परिवार में शिशु जन्म होने पर पुजई परंपरा का निर्वाह किया जाता है। जब तक पुजई नहीं दी जाती, तब तक परिवार के सदस्यों द्वारा माँस-मछली खाना वर्जित रहता है। पुजई जब घर में साधन उपलब्ध हो जाता है, तब यह कार्य सम्पन्न होता है। इसमें एक बरही, एक बरहा, दो कर्री मुर्गी, दो कर्रा मुर्गा तथा दो सफेद मुर्गी व दो काला मुर्गा इस तरह दस जीवों की बलि दी जाती है। जाति समाज को निमंत्रित किया जाता है। पुजई कार्य में काफी खर्च होता है। सुबह के दस बज रहे थे। हमें कोटा के ही साहित्यकार मित्र भाई गया प्रसाद साहू जी का भोजन हेतु निमंत्रण था। अतः हम विरेन्द्र के साथ उनके घर चले गए। उनकी पूरी तैयारी थी। गुलाल लगाकर स्वागत किया। शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। अपनी नवप्रकाशित किताबें दी। मन आनंद से भर गया। सुस्वादु भोजन के साथ आत्मीयता के रस से आत्मा तृप्त हो गई। उन्हें भी अपनी ड्यूटी पर जाना था। अतः उनसे विदा लेकर वापस विरेन्द्र कोल के घर पहुँचे तो बहुओं ने भोजन के लिए कहा। हमने बहुओं को मना कर दिया। क्योंकि पेट-भोजन से तृप्त था और मन भावों से संतृप्त था। सभी परिवार जनों के साथ ग्रुप फोटो लेकर हम अपने गंतव्य ग्राम बीजा की ओर रवाना हुए।

विरेन्द्र कोल के साथ हम जब बीजा गाँव में मनीराम कोल के घर पहुँचे, तो उन्होंने बड़ी आवभगत की। उनकी माता जी इंदराबाई कोल ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए देवलोक की जानकारी दी। आँगन में महादेव पार्वती और गौरी-गौरा, दरवाजे पर रक्ताही माता, काली जिन्हें तीन साल में नवरात्री के समय मुर्गा व बकरे की बलि दी जाती है। भीतर घर में चुल्हा पाट में महादेव जिसकी सेत पूजा होती है। इनके घर में भी ज्योत-जँवारा की स्थापना होती है। नवाखाई के समय इन्होंने बताया कि रखिया लोवा (सफेद कुम्हड़ा के छोटे फल) में चार छोटी लकड़ी से चार पैर बनाकर उसे बकरा मानकर काटा जाता है। यह बलि का प्रतीकात्मक रूप है। धान के नए चाँवल से भोजन बनाया जाता है। घर के प्रवेश द्वार में दाईं ओर ‘छेवारी देवी‘ की पूजा की जाती है। ताकि प्रसव के समय गर्भवती माता का प्रसव भलीभाँति हो। इससे जच्चा-बच्चा को कोई हानि नहीं होती । ऐसा कोल समाज का दृढ़ विश्वास है।

जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि बीजा में कोलों के लगभग 65-70 परिवार हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 500 है। समाज यहाँ बड़ा संगठित हैं। हम 75 वर्षीय हिंछाराम कोल के घर पहुँचे तो उन्होने कहा हम भी इसी तरह कोल लोक देवी-देवताओं को पूजते हैं। बलि के समय मऊहा का दारू भी चढ़ाते हैं। इनके देव रक्त जीवि हैं, अर्थात् बलि से ही मानते हैं। बलि नहीं देने पर परिवार में परेशानियाँ पैदा होती है, या किसी सदस्य को शारीरिक तकलीफ होती है।

बीजा के ही कलाराम कोल ने बताया कि आंगन में काली माता विराजित हैं। जिसे तीन साल में नवरात्रि पक्ष के अठवाही के दिन बकरे की बलि दी जाती है। घर के भीतर बूढ़ी माई, अंधियारी, मसवासी व देशफीरी देव हैं। जहाँ काली मुर्गी की बलि चढ़ाई जाती है। खलिहान में ठकुराईन व बाम्हन-बाम्हनीन देव हैं, जिन्हें सूखा दाल-भात ही अर्पित किया जाता है। ठकुरईन में तमोनी चिया (बदरंग चूजे) की बलि दी जाती है। इन्होंने यह भी बताया कि नवा खाई के समय देवी-देवताओं में चढ़े धान की बाली से चावल निकालने का कार्य महिलाएं गीले कपड़े पहनकर करती हैं। गीले कपड़े पहनकर ही भोजन बनाती हैं। दूध में भात पकाया जाता है, अर्थात् खीर बनाते हैं। यहाँ उड़द दाल का भी बड़ा महत्व है। उड़द दाल से बड़ा बनाया जाता है। ‘बरा-सोहारी‘ मुख्य पकवान है। कलाराम जी के देवस्थान में एक फूल काँस (काँसा) का खुराही लोटा उल्टा रखा हुआ था। मैने पूछा-‘‘यह लोटा उल्टा क्यों रखा गया है?‘‘ तब उन्हांने बताया कि कुल देवता के समक्ष इसे गहना (गिरवी) रखा है। परिवार में किसी को अंग बाधा या देवता के रूठ जाने पर मनौती अनुरूप जँवारे बोएं जाते हैं। या मान्यता के अनुसार बलि दी जाती है। कोल जनजाति के देवलोक की हमारी यात्रा जारी थी। अंतिम पड़ाव करीब था। दस कि.मी. दूर ग्राम कोड़ासर जो बिलासपुर जिले के तखतपुर तहसील में स्थित है। ग्राम कोड़ासर विरेन्द्र कोल का ममियारो अर्थात् मामा गाँव है।

जब हम घर पहुँचे तो उसके मामा-मामी भोजन कर रहे थे। इसी बीच ग्राम सिलतरा से कोल समाज जिला-बिलासपुर के उपाध्यक्ष रामजी कोल और ग्राम कोड़ासर के ही रामरतन कोल भी आ गए। मेल-मिलाप परिचय के बाद मैंने अपनी यात्रा का उद्ेश्य बताया तो खुश हुए। मैंने कोल देवलोक की चर्चा की, तो उन्होंने भी लगभग वही जानकारियाँ दी। जो अब तक हमने प्राप्त की थी। काली कंकाली, दुल्हादेव, बघर्रा देव, गोर्रइया, अंधियारी, मसवासी, देशफीरी आदि। रविन्द्र कोल के मामा हिरउ कोल जिनकी उम्र लगभग 70 वर्ष होगी, उन्होंने कोठा में गुंगुर माई व परेतिन दाई की जानकारी दी, जिसका स्थान बेर का पेड़ होता है। परेतिन दाई अक्सर छोटे बच्चों को रूलाती है। तब काली चूड़ी, बाँस की चुरकी में चना-मुर्रा रख कर उसका मान किया जाता है। इससे बच्चा रोना बंद कर देता है। बघर्रा जिसे कहीं-कहीं बघेसुर भी कहा जाता की मान्यता के संबंध में पूछने पर उन्होंने बताया कि बघर्रा देव बाघ हैं और ये माता जी की सवारी हैं। जो बघर्रा देव की पूजा करते हैं। उसका मान-गान करते हैं। बाघ उनको कोई नुकसान नहीं पहुँचाता है। बच्चा पैदा होने पर पुजई देने की परंपरा है। लड़का पैदा होने पर दो लाल मुर्गा और लड़की पैदा होने पर एक मुर्गी की बलि दी जाती है।

श्री रामजी कोल ग्राम सिलतरा ने कोल बच्चों को सुविधाएं नहीं मिलने का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि-पढ़ाई-लिखाई के बावजूद जाति उल्लेख दहाइत होने के कारण बच्चों का जाति प्रमाण पत्र कोल नाम से नहीं बनता। जबकि उनकी जाति कोल है। मिसल रिकार्ड में कोल शब्द नहीं है। सन् 1959-60 से इसे विलुप्त कर दिया गया है। इसके लिए वे समाज की ओर से 2008 से प्रयासरत हैं कि कोल समाज की बच्चों का जाति प्रमाण पत्र बने। दरअसल कोल उनकी मूल जाति और दहाइत उनका सामाजिक पद है, जैसे गऊँटिया, दीवान या मंत्री। कोल जनजाति की यह समस्या जल्द ही सुलझेगी ऐसा हमारा विश्वास है।

दो दिनों की इस यात्रा में हमने विजयेन्द्र कोल और रविन्द्र कोल के साथ लगभग 07 गाँवों में 10-11 कोल परिवारों से भेंटकर उनके जातीय देवलोक को जाना और समझा। निसंदेह कोल जनजाति के देवलोक का स्वरूप बड़ा विराट है। जहाँ लोक मान्यताओं, लोक विश्वासों और आस्थाओं का बड़ा मान है। अनगढ़ रूप में ही सही, किन्तु इन लोक देवी-देवताओं का सुगढ़ स्वरूप प्रतीक रूप में कोल जन-मन में विराजित है। जहाँ गौरी-गौरा और जँवारा इनके अनुष्ठानिक पर्व हैं, वहीं नवा खाई और दशहरा में नवान्न का सम्मान और उसकी पूजा के बाद उसे भोजन में शामिल करना इनकी सांस्कृतिक पहचान है। विरेन्द्र कोल ने यह भी जानकारी दी कि बलोदाबाजार-भाठापारा जिले के ग्राम मोपकी में चाँदी की महामाया, कंकालिन व वीर हनुमान की मूर्ति उनके परिचित के घर है। जिसकी पूजा सेत रूप में की जाती हैं।

महामाया, बूढ़ी माई, काली-कंकालिन, शीतला माता, ठकुरईन दाई, अंगार मोती आदि इनकी रक्षक देवियाँ हैं। दुल्हादेव, ठाकुर देव, नारसिंह, चितावर, गोरईया, बघर्रा देव, बघेसुर आदि रक्षक देव हैं। बाना, त्रिशूल, चिमटा, धनुष बाण, फरसा, खप्पर, लाल-सफेद काले ध्वज ये प्रतीक रूप में लोक देवी-देवताओं के स्वरूप हैं। जिसे कोल जनजाति प्राचीन काल पूज रही है।

कोल जनजातियों के देवलोक की यह यात्रा प्रकृति को जानने-समझने और इन मेहनत कश लोगों के सामीप्य पाने की सुखद अनुभूति दे गई। मैं श्री राजेश चौहान, छोटे भाई बृजभान चौहान व विजय कोल सरपंच ग्राम पंचायत बस्ती-बहरा बेलगहना के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ। जिनके माध्यम से कोल समाज के युवा कर्ता-धर्ता विजयेन्द्र कोल आरक्षक पुलिस चौकी बेलगहना, विरेन्द्र कोल छात्रावास अधीक्षक मिट्ठू नवागाँव से परिचय हुआ। इनके साथ ही उन सभी कोल भाईयों और बहनों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ। जिनके सहयोग के बिना यह देवलोक यात्रा संभव नही थी। अभी देवलोक की यात्रा प्रारंभ हुई है। यह आगे भी जारी रहेगी। मेरा ऐसा दृढ़ विश्वास है। भाई रामकुमार वर्मा भिलाई के शिक्षक, साहित्यकार, शोधार्थी व संस्कृति कर्मी का भी धन्यवाद, जिन्होंने साथ रहकर मेरा मार्ग दर्शन किया।

शोध-सर्वेक्षण-दिनांक, स्थान व सहयोगियों के नाम

1.दिनांक 14.02.2022, ग्राम-डिंडौरी, विकासखण्ड-लोरमी, जिला-मुंगेली (छ.ग.) सहयोगी-श्री देवचरन धुरी शिक्षक व साहित्यकार, ग्राम-पांडातराई, जिला-कबीरधाम (छ.ग.)।
2.दिनांक 07.03.2022, ग्राम-बस्ती-बहरा (बेलगहना), तहसील-कोटा, जिला-बिलासपुर (छ.ग.), सहयोगी-श्री राजेश चौहान व बृजभान चौहान ग्राम-बेलगहना, बिलासपुर (छ.ग.)।
3.दिनांक 07.03.2022, ग्राम-नवाडीह(बेलगहना), तहसील-कोटा, जिला-बिलासपुर (छ.ग.), सहयोगी-श्री विजयेन्द्र कोल, आरक्षक-पुलिस चौकी-बेलगहना।
4.दिनांक 07.03.2022, ग्राम-बरपाली, मिठ्ठू नवागाँव, केंदागढ़, तहसील-कोटा, जिला-बिलासपुर (छ.ग.), सहयोगी-श्री विरेन्द्र कोल, छात्रावास अधीक्षक, मिठ्ठू नवागाँव।
5.दिनांक 08.03.2022, ग्राम-कोटा, तहसील-कोटा, जिला-बिलासपुर। ग्राम-बीजा व कोड़ासर, तहसील-तखतपुर, जिला-बिलासपुर (छ.ग.), सहयोगी-श्री विरेन्द्र कोल, छात्रावास अधीक्षक व श्री रामजी कोल, उपाध्यक्ष -जिला कोल समाज सिलतरा बिलासपुर (छ.ग.)।

शोधकर्ता

डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.) मो. नं. 9424113122 ईमल:- pisilalyadav55@gmail.com

About nohukum123

Check Also

श्रावण मास का आध्यात्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिन्दू पंचांग में काल गणना एवं बारह मासों की पृष्ठभूमि वैज्ञानिकता पर आधारित है। जिसमें …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *