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प्राचीन नगर चम्पापुर एवं चम्पई माता

छत्तीसगढ़ नाम से ही ध्वनित होता है कि यह गढ़ों का प्रदेश है। छत्तीसगढ़ में बहुत सारे गढ़ हैं जो विभिन्न जमीदारों एवं शासकों के अधीन रहे हैं, जिनका प्रमाण हमें अभी तक मिलता है। इन गढ़ों में तत्कालीन शासकों द्वारा पूजित उनकी कुलदेवी की जानकारी भी मिलती है। ऐसा ही एक गढ़ है, जिसे मोंहदीगढ़ कहते हैं। महासमुंद जिले के चिकित्सक डॉ जी पी चंद्राकर ने इस गढ़ के विषय में विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त की। इस स्थान पर चम्पई माता का भी स्थान है।

वे ऐतिहासिक धरोहर के विषय में जानने के लिए नागपुर गये। नागपुर में पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में रखे गये चीनी यात्री व्हेनसांग के यात्रा वृत्तांत के अनुसार माता चम्पई का स्थान सातवीं शताब्दी के पूर्व का है। डॉ. जी.पी. चंद्राकर जी उस यात्रा वृत्तांत के आधार पर लिखते हैं कि 7 वीं शताब्दी के चीनी पर्यटक व्हेनसांग के यात्रा आलेख के अनुसार छत्तीसगढ़ के 36 मृत्तिकागढ़ में से एक गढ़ चम्पापुर हुआ। जानकारी के अनुसार कलचुरीवंशज राजा भीमसेन द्वितीय की राजधानी चम्पापुर के नाम से विख्यात थी।

चम्पई माता

चम्पापुर की नगर देवी चंपेश्वरी देवी थी, चम्पेश्वरी देवी आज भी ब्रह्मगिरि पर्वत के महादेव पठार नामक स्थान की एक गुफा में विराजमान हैं। आसपास के ग्रामीण वर्तमान में भी चम्पेश्वरी माता की पुजा अर्चना बड़ी श्रद्धा के साथ कर रहे हैं। शारदीय नवरात्रि एवं चैत नवरात्रि के समय यहाँ पर ग्रामीणों के सहयोग से ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करने का विधान वर्षों पूर्व से पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है।

डॉ चंद्राकर के लेख के अनुसार सम्भवतः बौद्ध कालीन ब्रह्मगिरि पर्वत वर्तमान महादेव पठार नामक पर्वत सिद्ध होता है। इस पर्वत का उद्गम गौरखेड़ा ग्राम से एवं अंत लोहारगांव नामक ग्राम के पास कोड़ार नाला के समीप होता है। इस पर्वत पर पश्चिम से पूर्व भव्य पठार एवं पाँच गुफाएं हैं। इन गुफाओं में से वर्तमान में प्रचलित रानीखोल गुफा एवं चम्पेश्वरी माता गुफा सुरंग मार्ग से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। एवं आभास होता है कि वे दोनों गुफाएं भूमिगत संघाराम भवन के प्रवेश एवं निर्गम द्वार है ।

गौर खेड़ा ग्राम में करीब 3-4 किलोमीटर दूरी पर उत्तर दिशा की ओर जंगलों से घिरा हुआ एक पठारी मैदान है इस मैदान में एक अति प्राचीन पीपल वृक्ष है। वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग स्थापित है जिसे बाबादेव कहा जाता है। पीपल वृक्ष से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण की ओर प्राचीन वट वृक्ष है। अवलोकन करने से यह स्थान साधना योग्य ज्ञात होता है। वहीं पर काले रंग के पत्थरों से युक्त एक भव्य गुफा है जिसे स्थानीय लोग रानीखोल कहते हैं।

बाबाडेरा से करीब तीन किलोमीटर दूर नीचे की ओर तराई में घनघोर जंगल है। इस जंगल में एक बारहमासी नाला बहता है। नाले के इर्दगिर्द आम्र वृक्ष है। इस जगह का निरीक्षण करने से यहां कभी वैभव सम्पन्न बस्ती होने का आभास होता है। मालूम होता है कि यही वह स्थल है जहाँ कभी राजा भीमसेन द्वितीय का बसाया हुआ चम्पापुर नामक गढ़ रहा होगा। इस स्थान से कुछ दूरी पर परसापानी तथा लड़ारीबाहरा नामक वीरान जंगल है। जहां कभी कृषि कार्य होता रहा होगा क्योंकि इस स्थान पर खेतों मेड़ों के अवशेष हैं। इससे ज्ञात होता है कि चम्पापुर के निवासी जीवकोपार्जन हेतु कृषि कार्य किया करते थे।

जानकारी के अनुसार चम्पापुर नरेश भीमसेन द्वितीय को अन्य राजा जयराज ने पराजित किया। पराजित राजा भीमसेन द्वितीय के भ्राता भरतबल की रूपवती पत्नी जो तत्कालालिक कौसलनरेश राजकन्या थी को युद्धकाल में सुरक्षा के दृष्टिकोण से सुरक्षित स्थान नागार्जुन संघाराम में भूमिगत सुरंग मार्ग से पहुंचा दिया था। युद्ध समाप्ति पश्चात पराजित राजा भीमसेन द्वितीय तथा भरतबल ने इस जंगल में रानी लोकप्रभा की खोज की लेकिन रानी की कहीं अता पता नहीं चला। खोज होते रही, परन्तु रानी कहाँ गायब हुईं? कैसे गायब हुई? क्या जंगली जानवरों के चपेट में आ गई? क्या हुआ पता नहीं चला। हताश होकर राजा भीमसेन और भरतबल खल्लावाटिका (खल्लारी) के तत्कालीन राजा हरिब्रह्मदेव की शरण में पहुंचे। भरतबल ने पत्नी वियोग में दुखी होकर आत्महत्या कर ली, कुछ समय उपरांत भीमसेन की भी मृत्यु हो गई। यह रहस्य इतिहास के पन्नों में दर्ज है। परन्तु इस स्थान का पुरातात्विक अन्वेषण आज तक नहीं हो पाया है।

आक्रमण के कारण चम्पापुर का वैभव तहस नहस हो गया, बचे खुचे पुरवासी 2-3 हिस्सों में बंटकर पलायन कर गये। कुछ लोग उस स्थान को छोड़कर वर्तमान बेलर ग्राम में जा बसे तथा कुछ लोग पर्वत के पूर्व की तलहटी में बस गए। बसाहट पश्चात इस स्थान को चम्पई ग्राम से जाना गया। शेष बचे लोग यत्र-तत्र जीवकोपार्जन हेतु पलायन कर गये इस तरह से प्राचीन चम्पापुर वीरान हो गया।

कालांतर में समस्त खल्लारी क्षेत्र कोमाखान जमींदारी के अंतर्गत समाहित हो गया। तत्कालालिक जमींदार समस्त खल्लारी प्रक्षेत्र को सिदार जाति के आदिवासी मालगुजारों के अधीन कर दिया। इस परिपाटी में चम्पई का भूभाग भी सिदार जाति के मालगुजारों एवं गोंड़ जाति के गढ़ियों (गौटिया) के कब्जे में आ गया। सिदार जाति के प्रथम मालगुजार ने मोहन्दी नाम का गाँव बसाया।

प्रारंभिक काल में मोहन्दी नामक गांव की बसाहट डीह भाठा नामक स्थान पर स्थापित थी, क्रमशः चम्पई ग्राम एवं बेलर ग्राम के कुछेक निवासी भी डीहभाठा आकर बस गए। इस तरह डीह भाठा आबाद होते गया परन्तु तत्कालिन मालगुजार के परिवार की वंश वृद्धि क्षीण होते चली गई। अंधविश्वास के कारण मालगुजार लोग अपने वंशजों के लिए शापित समझकर अपने स्थान को छोड़कर नीचे के स्थान में बस गये। उस समय सिदार मालगुजार पनेका डीह का मालगुजार था। पनेका डीह को छोड़ कर नीचे के स्थान में आ गया और इस तरह मोहन्दी ग्राम का निर्माण हुआ। समय के अनुसार लोग डीह भाठा एवं पनेका डीह को भूल गए और मोहन्दी ग्राम अस्तित्व में आ गया।

मोहन्दी गांव के अस्तित्व में आने के पूर्व ग्राम के उत्तर में एक और डीह अस्तित्व में था जहाँ कुछ सांवरा जाति के लोग बसे हुए थे। बँहडोला डबरी उन लोगों का निस्तारी तलैया था तथा लजगरहीन माता उनकी डीह की आराध्य देवी थीं परन्तु ये सांवरा लोग कहाँ गायब हुए? डीह कैसे उजड़ा यह सब समय के गर्भ में है।

ऐसा प्रतीत होता है कि अपने प्रारंभिक काल में मोहन्दी ग्राम खूब फला फ़ूलाम क्योंकि यहाँ पाठशाला एवं साप्ताहिक बाज़ार ब्रिटिश ज़माने के गिने चुने प्रायमरी स्कूलों तथा बाज़ारो में से एक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात साप्ताहिक बाज़ार तो यथावत चालू रहा परंतु अज्ञात कारणों से प्रारंभिक पाठशाला बन्द हो गई। पुनः सन् 1954-55 में जनपद सभा महासमुंद के द्वारा पाठशाला को फिर प्रारंभ किया गया। तब से लेकर आज गांव में मिडिल स्कूल एवं हाई स्कूल शासन द्वारा संचालित हो रहा है

ग्रामीणों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मोहन्दी के पास में ही तीर्थ ग्राम दलदली है, जहाँ पर महादेव पठार है जो लगभग 1600 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। यहाँ पर शिवलिंग की स्थापना आदिकाल में बंजारा जाति के लोगों द्वारा की गई थी। जहाँ पर बाबा कुटी प्राचीन साधना केन्द्र स्थित है। इस विषय पर डॉ जी पी चंद्राकर का यह लेख बहुत ही महत्वपूर्ण है जो ग्राम मोहन्दी एवं चम्पई माता के प्रति प्रेम और श्रद्धा को व्यक्त करता है। श्री भोला राम साहू इस लेख को सहेजकर रखें हैं।

यहाँ स्थित चम्पई माता के स्थान को लेकर एक और मान्यता है कि रानी वीरना जो सारंगढ़ की रानी थी और उनके आठ वर्षीय पुत्र को सिरपुर के नागवंशी राजा मारना चाहते थे, बालक का नाम विषराज था। तब रानी वीरना अपने बालक के साथ अपने राज्य से भागकर प्राण बचाने चम्पई माता की शरण ली थी। रानी बहुत बड़ी शिवभक्त थी कालांतर में पुत्र का विवाह दंतेवाड़ा के आसपास नागलोक क्षेत्र की कन्या के साथ हुआ था।

एक और किवदंती है कि माता खल्लारी का प्रथम निवास ग्राम बेमचा है। माता खल्लारी बाज़ार आती थी। जब एक बंजारा युवक माता के मोहनी रूप पर आसक्त हो गया तब माता ने उसे श्राप देकर शिला में परिवर्तित कर दिया और स्वयं भी पहाड़ी पर विराजमान हो गई। बेमचा से खल्लारी शॉर्ट कट मार्ग में ही पहाड़ी पर माता चम्पई विराजमान हैं। जनश्रुति है कि एक बार माता खल्लारी से नाराज होकर जा रही थीं, ऐसा माना जाता है कि माता जिस रास्ते से गई वहां बिना हवा तूफान के रास्ते पर पड़ने वाले घर, पेड़ इत्यादि गिर गए थे। तब माता चम्पई ने अपने बगल में माता खल्लारी को स्थान दिया था। तब से माता चम्पई, माता खल्लारी और छोटी माता त्री देवी के रूप में सुंदर प्राकृतिक गुफा में विराजमान हैं।

माता चम्पई छत्तीसगढ़ प्रान्त के महासमुंद जिला के मोहन्दी गांव में सुरम्य वनों की छाया से आच्छादित पहाड़ी पर विराजमान हैं। माता जी के मंदिर पहुँचने के लिए महासमुंद मुख्यालय से सीधे छोटी पक्की सड़क महासमुंद से बारह पंद्रह किलोमीटर पर उपलब्ध है और महासमुंद, बागबाहरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर महासमुंद से पंद्रह किलोमीटर दूरी पर हाड़ाबंद गांव से उत्तर दिशा की ओर ग्राम मोहन्दी गांव स्थित है। मोहन्दी गांव से एक किलोमीटर दूर पहाड़ी पर लगभग 200 सीढ़ी की ऊंचाई पर माता चम्पई का स्थान विद्यमान है।

माता जी चम्पई पहाड़ी की गुफा में विराजमान हैं और उनके साथ में खल्लारी माता एवं छोटी माता जी भी विराजमान हैं। इस पहाड़ी पर नीचे से लेकर ऊपर तक बजरंग बली एवं शिवजी, भैरव बाबा तथा अन्य भी मंदिर श्रद्धालुओं जनों एवं मंदिर संचालन समिति द्वारा बनवाया गया है। यहाँ पर चैत एवं कुंवार नवरात्रि पर्व में अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित की जाती है और अक्षय तृतीया को मेला भी लगता है। मेला एवं नवरात्र पर्व में आसपास के गांव के श्रद्धालु जन और दूर गांव के श्रद्धालु जन यहाँ आकर पूजा अर्चना करते हैं।

मंदिर संचालन समिति में आसपास के गांव मोहन्दी, बेलर, अरण्ड, तरपोंगी गांव के सक्रिय एवं ऊर्जावान सदस्यों के द्वारा स्वयं की राशि, एवं दानदाता श्रद्धालुओं के दान से प्राप्त राशि से मंदिर के कार्यक्रमों का संचालन एवं मंदिर का विकास कार्य किया जा रहा है। भविष्य में अच्छी शासकीय अनुदान प्राप्त होता है तो मंदिर की भव्यता एवं शोभा और भी बढ़ेगी जहाँ बहुत अच्छा पर्यटन स्थल एवं स्वरोजगार के अवसर प्राप्त हो सकता है। प्राकृतिक जंगल और सुंदर रमणीय पहाड़ी पर स्थित यह स्थान आत्मीय शान्ति प्रदान करने वाला है।

उपरोक्त जानकारी डॉ जी. पी. चंद्राकर, श्री भोलाराम साहू, श्री गोपाल द्वारा प्राप्त हुई।

सभी छायाचित्र : ललित शर्मा

आलेख

श्री सुनील शुक्ल
बागबाहरा, छत्तीसगढ़

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2 comments

  1. Surendra singh bhamboo

    बहुत ही शानदार पोस्ट जय चम्पई माता

  2. मनोज पाठक

    बहुत अच्छी जानकारी प्रदान किया.. साधुवाद🌹

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