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संस्कृति

संस्कृति विभाग में लोक संस्कृति, नृत्य, त्यौहार-पर्व, परम्पराएं, शिष्टाचार, सामुदायिक त्यौहार एवं लोक उत्सव को स्थान दिया गया है।

गौधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व पोला तिहार

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जननी, महारानी कौशिल्या का मायका दक्षिण कोसल जिसे छत्तीसगढ़ के रूप में जाना जाता है, सदैव राष्ट्रीय सांस्कृतिक भावधारा का संवाहक रहा है। पुण्य सलिला महानदी, शिवनाथ, सोंढुर, अरपा, पैरी, इंद्रावती आदि नदियों से आप्लावित यह उर्वर भूमि अपनी कृषि आधारित ग्रामीण पृष्ठभूमि के लिए …

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माँझीनगढ़ के शैलचित्र एवं गढ़मावली देवी जातरा

भारतीय ग्राम्य एवं वन संस्कृति अद्भुत है, जहाँ विभिन्न प्रकार की मान्यताएं, देवी-देवता, प्राचीन स्थल एवं जीवनोपयोगी जानकारियाँ मिलती हैं। सरल एवं सहज जीवन के साथ प्राकृतिक वातावरण शहरी मनुष्य को सहज ही आकर्षित करता है। ऐसा ही एक स्थल छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिला मुख्यालय से 60 कि.मी.की दूरी पर …

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अनमोल जैव विविधता को संजोता पर्व हलछठ

भारत के पर्व प्रकृति को संजोते हैं, जीवों को संरक्षित करते हैं। सदियों से चले आये पर्वों के रीति रिवाज को जब हम तिलांजलि दे रहे हैं तब उनकी महत्ता हमारे सामने आ रही है। हलषष्ठी एक ऐसा ही त्यौहार है जिसमें जैव विविधता, भू-जल को संरक्षित कर व्यवहारिक रूप …

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सामाजिक नियमों में बंधा हुआ बस्तर का जनजातीय समाज

बस्तर का जनजातीय समाज अपनी अलौकिक सांस्कृतिक विरासत के लिये जाना जाता है और यही संस्कृति उनकी पहचान है। इस संस्कृति को उनके पूर्वजों ने उसी रूप में सौंपा है, जिस रूप में उन्होने अपने समय में निभाया था। अपनी सांस्कृतिक विरासत का आज की पीढ़ी भी उसी तरह से …

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नागपंचमी के दिन गुरु मंत्र सिद्ध करने वाले नगमतिहा

छत्तीसगढ़िया लोक समाज में विभिन्न परंपराओं की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। यहाँ शैव, वैष्णव और शाक्त मत के अलावा सिद्धों और नाथों का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। हरियाली अमावस्या को मनाए जाने वाले पर्व “हरेली” को कृषि यंत्रों की पूजा के साथ गांव देहात में मंत्र दीक्षा …

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चोड़रापाट के डोंगेश्वर महादेव : सावन विशेष

वर्तमान समय आपाधापी का समय है। मनुष्य इस आपाधापी के कारण मानसिक शांति से कोसों दूर हैं। सुख-सुविधा की चाहत में मनुष्य इतना उलझ गया है कि भौतिक संपदाओं की उपलब्धि के बावजूद भी न तो उसकी आंखों में नींद है, और न ही मन में चैन। ऐसी स्थिति में …

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छत्तीसगढ़ी लोक पर्व हरेली तिहार

आषाढ़ मास में माता पहुचनी के बाद श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या को किसान अपना द्वितीय पर्व ‘हरियाली’ मनाता है। किसान अपने खेती में इस प्रकार हल जोतता है मानों अपने कंधा रूपी हल से धरती माँ के केशों को सवांर रहा हो मांग निकालता है, जिसे किसानी भाषा में कुंड़ …

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छत्तीसगढ़ का हरेली त्यौहार एवं लोक प्रचलित खेलों की परम्परा

लोक संस्कृति का वैभव लोक जीवन के क्रिया-व्यवहार में परिलक्षित होता है। यदि समग्र रूप से समूचे भारतीय लोक जीवन को देखें तो आँचलिकता व स्थानीयता के आधार पर, चाहे व पंजाब हो, या असम हो, कश्मीर हो या केरल, महाराष्ट्र हो या पश्चिम बंगाल, गुजरात हो या राजस्थान, उत्तरप्रदेश …

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सर्व अनिष्ट से ग्राम रक्षा का लोक पर्व सवनाही बरोई

छत्तीसगढ़ की कृषि आधारित संस्कृति, रीति-रिवाज और पर्व अनूठे हैं। यहां पर प्रचलित लोक पर्वों में लोक मंगल कामना सदैव रहती है। यहां जड़-चेतन सभी उपयोगी संसाधनों की विभिन्न लोक पर्वों में पूजा की जाती है। चाहे वह कृषि का औजार हो या जीव-जंतु या प्रकृति देव। छत्तीसगढ़ में चौमासा …

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ग्रामीण संस्कृति का अविभाज्य अंग वनवृक्ष साल

वृक्ष हमारी संस्कृति एवं जीवन का अभिन्न अंग है, इनके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब हम लद्धाख के वृक्ष विहीन पर्वतों एवं भूमि को देखते हैं तो लगता है किसी दूसरे ग्रह पर पहुंच गए, जहां जीवन नहीं है। इन वृक्षों में जीवन का सार …

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