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देवगुड़ी हल्बा टिकरापारा कांकेर बस्तर

देवगुड़ी में विराजित भुमिहार देवता एवं मौली माता भुवनेश्वरी

लोक बगैर देव नहीं, देव बगैर लोक नहीं। सनातन संस्कृति में देवी/ देवताओं की स्थापना/आराधना की जाती है, इस संस्कृति की धारा में वैदिक, पौराणिक एवं लोक देवी/देवता होते हैं। इन देवी/देवों में लोक देवता मानव के सबसे करीबी माने जा सकते हैं क्योंकि ये स्वयं भू हैं, इनसे लोक का परिचय किसी ने नहीं करवाया, लोक इनसे स्वयं परिचित हुआ।

बैगा किरपा राम सोरी, हल्बा टिकरापारा

वैदिक एवं पौराणिक देवों से तो किसी माध्यम के द्वारा ही भेंट मुलाकात होती है, परन्तु लोक देवी देवता हमेशा साथ होते हैं और प्रत्यक्ष रहते हैं। लोक देवी/ देवताओं के प्रतीकों का निर्माण मनुष्य ने स्वयं किया। फ़िर देवताओं ने मनुष्य का मार्गदर्शन किया और उसकी रक्षा की।

लोक देवी/देवताओं का पौराणिक संबंध भी होता है। जंगल यात्रा के दौरान मेरा परिचय “भूमिहार देव” से हुआ। रानी डोंगरी ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम टिकरापारा (हल्बा) में शीतला देवी के समक्ष मौली (मावली) माता तथा भूमिहार देव विराजमान थे।

भुमिहार देवता एवं मौली माता (भुवनेश्वरी)

भूमिहार देव का काम भी ग्राम की रक्षा रक्षा करना है, इस एवज में त्यौहारों पर उन्हें भेंट पूजा और होम धूप दिया जाता है।
बैगा किरपा राम सोरी बताते हैं कि भूमिहार देव ने गांव बसाने के लिए जंगल साफ़ किया और भूमि को समतल कर गांव बसाने के लिए तैयार किया। इसके बाद लोग सुविधाएं देख कर इस जगह बसे और गाँव का निर्माण हुआ।

वनवासी संस्कृति के जानकार श्री शिवकुमार पाण्डेय बताते है कि जिसे मौली माता कहा है, उसे नारायणपुर (बस्तर) में माटी आय़ा तथा गोंडी मे तलुर मुत्ते कहते है, और रछ्क देव को राव या भीमा देव माना जाता है ये प्राकृतिक देव है इऩका विग्रह नही होता।

भूमिहार देव लकड़ी के खूंटे के रुप में एवं घोड़े के प्रतीक के रुप में मौली माता (भुवनेश्वरी) विराजमान हैं, भुवनेश्वरी धरती माता को कहा जाता है। जिस धरती माता ने गांव बसाने के लिए भूमि दी, उसकी कृतज्ञता अर्पण करना भी मनुष्य का कर्तव्य है, वरना वह कृतघ्न कहलाएगा। इसलिए ग्राम में लोक देवी भुवनेश्वरी की स्थापना कर उनकी पूजा पाठ की जाती है।

देवी की सवारी घोड़ा होने के कारण देवी के प्रतीक रुप में सफ़ेद घोड़े की स्थापना की जाती है। इस तरह भूमि स्वामीनी देवी और भूमि को गांव बसाने के योग्य तैयार करने वाले देव, दोनों की पूजा आराधना सामान्य रुप से करने की प्राचीन परम्परा है।

देवगुड़ी – रानी डोंगरी पंचायत

लोक देवता, मानव के इतने करीब हैं कि वे उनके परिवार का एक हिस्सा ही समझे जाते हैं, किसी न किसी रुप में प्रत्येक घर एवं चौपाल में विराजित रहते हैं, भक्तों का सीधा संबंध इन आदि शत्क्तियों से होने कारण वे सीधे ही अपनी मांग रखते हैं और मांग पूरा होने की एवज में देवताओं की इच्छा भी पूर्ण की जाती है।

बिना किसी बड़े प्रभामंडल के लोक देवताओं का आत्मीय संबंध लोक से स्थापित रहता है। देव स्थान की साफ़ सफ़ाई का ध्यान रखना बैगा का कर्तव्य है और ग्राम वासी इन स्थानों को साफ़ सुथरा कर पवित्र रखते हैं। क्योंकि लोक देवताओं का उनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है।

आलेख एवं फ़ोटो

ललित शर्मा
इंडोलॉजिस्ट

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One comment

  1. दयानन्द शर्मा

    बहुत सुन्दर ,आसान एवं आसानी से समझने लायक भाषा मे आप हमेशा कुछ नया ही परोसते है ,आभार आपका…

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