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लोक मानस में रचा बसा पर्व : अक्षय तृतीया

हिन्दू धर्म में अक्षय तृतीया का महत्व बहुत ही अधिक है। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के छठवें अवतार के रूप में भगवान परशुराम जी बैशाख शुक्ल तृतीया को अवतरित हुए, हिंदु धर्म के मुताबिक प्रथम पर्व है, इसे अक्षय तृतीया अर्थात ऐसा तिथि जो समृद्धि, आशा, आनन्द सफलता जो कभी कम न हो, अजर अमर अविनाशी की कामना पूर्ति का अवसर प्रदान करता हो, अच्छे भाग्य और सफलता को लाने वाला दिवस, जिनके आगमन से प्रकृति में खुशहाली का संचार हो।

पर्व की प्रतीक्षा हिन्दू, जैनियों के साथ जनजातियों द्वारा बेसब्री से की जाती है। इसे छत्तीसगढ़ में अक्ति, उत्तर भारत मे अक्षय तृतीया, आखा तीज, झारखंड में माडा, अलग क्षेत्रों में जैनियों द्वारा शुभदिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गंगा के धरती पर अवतरण एवं सुदामा कृष्ण के मिलन से जुड़ी हुई है।

न माधव समों मासो न कृतेन युग समम्।
न च वेद समं शास्त्रम न तीर्थ गङ्ग्या समम् ।।

वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगा जी के सामान कोई तीर्थ नहीं है उसी तरह अक्षय तृतीया के समान कोई तिथि नहीं है।

विष्णु धर्म सूत्र, मत्स्य पुराण, नारदीय पुराण, भविष्य पुराण आदि में उल्लेख है। इसलिए यह मुहूर्त अपने कर्मो को सही दिशा में प्रोत्साहित करने का श्रेष्ठ समय है। अपनी योग्यता को निखारने और क्षमता के बढ़ाने का उत्तम अवसर है। इस पर्व को पूरे देश मे मनाया जाता है। दक्षिण कोसल में छतीसगढ़, पश्चिमी ओडिसा, झारखंड में विशेष रूप से किसान उत्साह के साथ मनाते हैं। इसकी तैयारी चैत्र नवरात्र के बाद शुरू हो जाती है। पश्चिमी ओडिसा में इसे चैत जात्रा, बस्तर में माटी जात्रा के नाम से जानते हैं।

चैत्र की इस जात्रा में ग्राम प्रमुख द्वारा निर्धारित तिथि की आम सभा मे ब्राह्मण द्वारा खरी पञ्चाङ्ग द्वारा वर्ष में होने वाली घटनाओं संकेतकों की गणना का विश्लेषण सभा मे किया जाता है। जिसमे वर्ष में राजा मंत्री के प्रभावों के आधार पर गुण दोष का वर्णन किया जाता है। आंकड़ों को पंचाग की भाषा मे बिस्वा से दर्शाया गया है। जैसे इस वर्ष वर्षा, फसल तिलहन, दलहन, कीट पतंग, रोग, शोक, खुशहाली, घास फूस सभी की गणना की भविष्यवाणी कर लोगों में जनचेतना, प्रकृति संरक्षण व किसानी के लिए योजना निर्माण के लिए चर्चा परिचर्चा का अवसर होता है।

किसके हाथ में पानी है, का आशय वर्षा की स्थिति से होता है। जैसे रावत, धोबी, मरार का आशय उनके कार्यकलाप से तुलना कर खेती में सावधानी रखने व फसल लेने की सलाह दी जाती है। लोगों को पंचाग में काल्पनिक पात्रों के द्वारा भविष्य की व्याख्या को बड़े ही सुंदर ढंग से आसानी से बताया जाता है, समझाने के तरीकों मे अवस्था बालक, किशोर, युवा, वृद्ध की उपमा से सन्देश दिया जाता है। सभा मे चर्चा परिचर्चा के साथ किसानी की योजना को मूर्त रूप दिया जाता है, जिससे भविष्य में आने वाली विफलता को सफलता में परिणित किया जा सके।

इस पर्व के माध्यम से परिवार के मुखिया का निर्धारण पञ्चाङ्ग में अक्षांश देशांश के आधार पर अष्टोतरी, विंशोत्तरी गणना सूत्र के द्वारा राशिनुसार आय व्यय की गणना की जाती है, बताया जाता है कि किसके हाथ मे कितना आखत है, उसी आधार पर उसके हाथ में बोनी व अन्य शुभकार्यो की शुरुवात की जाती है। पञ्चाङ्ग की गणना प्रजातांत्रिक तरीके से मुखिया चयन में सहायक और अपने कौशल को सिद्ध करने का अवसर प्रदान करता है।

ग्रामीणों द्वारा ब्राह्मण को उसके उपक्रम के प्रतिफल में मुट्ठी भर अनाज व दान पुण्य दिया जाता है। ग्राम प्रमुख द्वारा निर्धारित तिथि को महाराज द्वारा निर्देश के अनुसार वरिष्ठ प्रमुख पटेल, पंच, मुकरदम, कोटवार आदि ग्राम देवता, (सहड़ा देव) मातागुड़ी में बताए गए अनाज के रंग के आधार पर गोटिया अनाज व पूजा की सामग्री अक्षत, सफेद पुष्प, धूप दीप से पूजा कर गांव में सुख शांति अच्छी फसल के लिए प्रार्थना करते हैं। नये वस्त्र में बीज को परसा के दोने में मुठ लेने के लिए प्रत्येक परिवार को बीज रोपण के लिए पहुंचाया जाता है।

अक्षय तृतीया के दिन पूजा

अक्षय तृतीया की पूर्व रात्रि में घर का मुखिया संध्या में पवित्रस्थल या देवघर में अपने कुल देवी देवता, गौरी शिव, पितरों को स्मरण करते हुए चावल के तीन कुड़ी में आमंत्रित करते हुए, नए बांस के झेझरी, टुकनी में बीज को रखता है, नए मिट्टी के पात्र (कुडेरा,कलश,मटका) में पितरों को अभिमंत्रित कर चावल आटे का घोल (लगार) से हाथा दे अक्षत छोड़ते हैं। दूसरे दिन ब्रह्म मुहूर्त में मुखिया स्नान ध्यान कर रात में अभिमन्त्रित देवी देवता की पूजाकर झेझरी में रखे बीज को पंडित द्वारा बताए निर्देश यथा जिसमें क्या खाना है, किधर मुंह करना है आदि छोटी-छोटी बातों को विशेष ध्यान रखा जाता है। मुठ लेने वाला पीछे मुड़कर नही देखता न ही बात करता है। अपने खेत मे जा कर भूमि अस्त्र पूजा कर खुदाई कर बीज की खुर्रा बोनी करता है।

दूसरे चरण में इष्टदेव व पितरों की पूजा होती है। मिट्टी के पात्र को लेकर तालाब में जाते हैं स्नान कर उरई जड़ की पूजा करते हैं, अपने देवी देवता व पितरों को नाम सहित आमंत्रित करते हुए अक्षत व उड़द दाल को उरई व पात्र में अभिमंत्रित करते हुए गोंदली (प्याज) आम नैवेद्य के रूप में अर्पित करते हैं। इसी दिन अपने पितरों को मिलाते हैं, जिसे अक्ति पानी के नाम से जाना जाता है, पानी देने के बाद ही तेलई चढ़ती है। किसी के परिवार में कोई व्यक्ति मृत है तो उसके घर शोक स्वरूप पकवान (तेलई) नही बनाया जाता। पितरों को प्रसन्न करने बड़ा पूड़ी खीर बनाई जाती है। ज्यादातर यह परम्परा जनजाति व अन्य वर्गों में परम्परागत नियमो का निर्वहन कर अपने परम्परा को अक्षुण्ण रखते हैं। शिव मंदिरों नए कलश में छेद कर शिवलिंग में बून्द-बून्द जल से अभिषेक के प्रचंड गर्मी में शीतलीकरण की परम्परा है।

तीसरे चरण में विद्यारम्भ की परम्परा है, जिसे पोनी पसारी व अन्य अपने परम्परागत कौशलों को अपने भविष्य की पीढ़ी को सौपते है। जैसे मछवार जाल (सोफी), लोहार औजार, नाई, बढ़ई, बजगरी आदि अपनी कला कौशल को आने वाले पीढ़ी को देते हैं।

शुभमुहूर्त देव लग्न में शादी ब्याह, गृह प्रवेश, नये कार्य का शुभारम्भ, सम्पत्ति क्रय, व्यवसाय आदि की शुरुआत करते हैं। पुतरी बिहाव, मेचका बिहाव जैसी परम्परा भी हमारे आने वाले बच्चों को परिवार घर संस्कृति से जोड़ने की परम्परा और सामाजिक कौशल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। कुछ सामाजिक बुराई जिसमे बाल विवाह भी है, जो अब न के बराबर है।

अक्षय तृतीया के दिन जल परीक्षण कर मानसून की भविष्यवाणी

भारत के ऋतुवैज्ञानिकों ने राष्ट्र कल्याण की भावना से मानसून सम्बन्धी भविष्यवाणियों के सम्बन्ध में अनेक वैज्ञानिक सिद्धान्त और मान्यताएं स्थापित कीं तथा पिछले आठ हजार वर्षों से इन्हीं ऋतुवैज्ञानिक मान्यताओं के आधार पर समूचे भारत का कृषक वर्ग अपने खेती-बाड़ी का कारोबार करता आया है.

इस पर्व में जल परीक्षण किया जाता है कहा जाता है कि भीषण गर्मी में जलस्तर काफी नीचे चला जाता है, अक्षय तृतीया से जल स्तर ऊपर उठने शुरू हो जाता हैं। वैज्ञानिक रूप से पतझड़ के बाद पौधों में नए पत्ते आते हैं जिससे धीरे-धीरे प्रकाश संश्लेशण की क्रिया बढ़ जाती है, पौधों की जड़ तीब्र गति से पृथ्वी के अंदर के जल को अवशोषित करने से जलस्तर ऊपर उठने लगता है। किसान मिट्टी के ढ़ेले के ऊपर पानी की कलसी रख कर परीक्षण करता है कि किस दिशा की मिट्टी कितनी मात्रा में गीली होती है, उसके आधार पर वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जाता है। इस तिथि में साग-भाजी लगाया जाता है, मान्यता है कि सब्जी की फसल अच्छी होती है जिससे समाज स्वस्थ्य व निरोग होता है।

पर्व में दान का बड़ा महत्व है, पुराणों में सूर्योदय पूर्व स्नान, दान, जप, स्वाध्याय शुभफल देता है, रविवार की तृतीया विशेष शुभकारी मानी जाती है। इस दिन अन्न, जल, दही, गन्नारस, हाथ से बने पंखे व उपहार दिया जाता है। श्वेत पुष्प कल्याणकारी माना जाता है। मां गौरी को साक्षी मान कर किया गया संकल्प अपनी योग्यता को निखारने और क्षमता बढ़ाने के लिए उत्तम समय होता है, ब्राह्मण इस दिन को भृगुकुल नन्दन भगवान परशुराम के अवतरण को अपने निःस्वार्थ कर्म, परोपकारिता, दानशीलता के साथ योग्य ब्राह्मण बनाने यज्ञोपवीत, द्विज संस्कार, बरुआ, आदि कर्मो से समाज कल्याण के लिए अपनी भूमिका तय करते हैं। आज का दिन लोककल्याण की सतत संकल्प के अक्षय का धोतक है।

अक्षय तृतीया की कुछ लोकमान्यताऐं

गाँव के सियानों से जानकारी लेते हुए लेखक

तृतीया के पूर्व मातागुड़ी में ग्राम बैगा/पंडित द्वारा बताए गए धान के रंग के आधार पर पूजा के लिए दीया बाती जला कर धान की एक कुड़ी बनाते हैं जिसे गिना जाता है। सम विषम के आधार पर गणना की जाती है, पुनः उसी कुड़ी को दो भाग में बराबर कर पुनः गिनती की जाती है, फिर आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है। चौमासा में वर्षा कैसी होगी, पानी की व्यवस्था कैसे की जाएगी, कौन से खेत मे क्या फसल लेनी है, खर-पतवार की स्थिति, कीट व्याधि, रोग शोक के बारे में बुद्धिमत्तापूर्ण तर्क दिए जाते हैं। धान गिनने को स्थानीय लोग दीया बाती धान गिनना कहते हैं।

नया कलशा में मिट्टी के ढ़ेले की गिरोरी बना कर पूजा के बाद पानी भरा जाता है, रात्रि प्रतीक्षा के बाद सुबह मिट्टी गिरोरी का अवलोकन करते हैं कि किस दिशा की मिट्टी कितनी भीगी है, उसके पश्चात बैगा गुनिया वर्ष की घटनाओं व वर्षा की स्थिति का विश्लेषण करते हुए वर्षा विचार करते हैं। मान्यता है अक्ति पर्व पर बेर की जड़ में नए पौधे आने लगे तो उसे अच्छा वर्षा का संकेत माना जाता है। जिस संवत्सर में जो राजा मंत्री होते हैं, ग्रह के अनुरूप रंगों का निरूपण होता है उसी आधार पर हल में जुतने वाले बैल, बीज मुठ लेने वाले धान का रंग आदि निर्धारित होता है।

आलेख

डॉ विजय शर्मा कोमाखान, जिला महासमुंद, छत्तीसगढ़

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One comment

  1. मनोज पाठक

    बेहतरीन आलेख👌 🖋

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