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विश्व कल्याणकारी सनातन धर्म प्रवर्तक आदि शंकराचार्य

आठ वर्ष की आयु में दक्षिण से निकले और नर्मदा तट के ओमकारेश्वर में गुरु गोविंदपाद के आश्रम पर जा पहुंचे। जहां समाधिस्थ गुरु ने पूछा, “बालक! तुम कौन हो”?

बालक शंकर ने उत्तर दिया,” स्वामी! मैं ना तो मैं पृथ्वी हूं, ना जल हूं ना अग्नि, ना वायु, ना कोई गुण धर्म हूं। मैं इंद्रियों में से कोई इंद्रिय नहीं हूं। मैं तो अखंड चैतन्य हूं।”

बालक के ऐसे उत्तर के साथ गोविंदपाद को एक योग्य शिष्य मिल गया! जिनका शिष्य महान दार्शनिक एवम धर्म प्रवर्तक आदि शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जिनकी पदचाप केरल से लेकर केदारनाथ के पहाड़ों पर और द्वारकापुरी से लेकर पुरी के सागर तट पर आज भी जीवंत है। जिनके उपदेश भारत के गुरुकुल और आश्रमों में आज भी गुंजायमान हैं। जिनका वेदान्त दर्शन अपने आप में परिपूर्ण हैं। सनातन धर्म के नीति मूल्यों के पतन के समय उनकी पुनर्स्थापना करते हुए आदि शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना की। उत्तर दिशा में बद्रिकाश्रम में ज्योति पीठम अथर्ववेद के आधार पर की। पश्चिम दिशा द्वारका में शारदा पीठम की स्थापना सामवेद के आधार पर, दक्षिण दिशा श्रृंगेरी में शारदा पीठम सामवेद के आधार पर और पूर्व दिशा जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन पीठम की स्थापना ऋग्वेद के आधार पर की।

हिंदुओं को संगठित करने और जातिवाद को समाप्त करने के लिए आदि शंकराचार्य ने दशनामी संप्रदाय की भी स्थापना की। गिरी, पर्वत और सागर जिनके ऋषि भृगु हैं। पुरी, भारती और सरस्वती इनके ऋषि शांडिल्य हैं। वन और अरण्य के ऋषि कश्यप वहीं तीर्थ और आश्रम के ऋषि अवगत हैं। इसे संत संप्रदाय कहा जाता है। दशनामी के 13 अखाड़े को कुंभ में सर्वप्रथम स्नान करने गौरव इस लिए प्राप्त हुआ है।

आदि शंकराचार्य के शिष्य चारों वर्णों में से हुए। जिनमें पद्मपाद (सनंदन) हस्तमालक, मंडन मिश्र और तोटक (तोटकाचार्य) हैं। शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत वेदांत दर्शन कहा जाता है। जिनके दो गुरु गौड़ पादाचार्य के प्रशिष्य और गोविंद पादाचार्य के शिष्य रहे।

आदि शंकराचार्य ने दुनिया को बताया, “ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया! आत्मा की गति मोक्ष में है।” अपने उपदेश में स्पष्ट कहा, नश्वर शरीर तक दृष्टि सीमित मत रखो, यह भाव हमेशा रखो कि मैं ही विश्व हूं, सारा विश्व मेरे शरीर का ही अंग है।”

शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत वेदांत के रूप में लोकप्रियता मिली क्योंकि उनका यह स्पष्ट मानना था कि जगत ब्रह्म का परिणाम ना होकर ब्रह्मा का

विवर्तमात्र मात्र है। वास्तविक अन्यथाभाव को तो परिणाम कहते हैं परंतु अवास्तविक, अतात्विक अन्यथा भाव को विवर्तवाद कहा जाता है।

यदि ब्रह्म या ईश्वर जगत के रूप में परिणत हो जाता है, जो जगत की उत्पत्ति के बाद ब्रह्म की सत्ता समाप्त हो चाहिए, जो असंभव है! यदि केवल वह आंशिक रूप में ही परिणत हो जाता है तो विभाज्य हो जाएगा और इस प्रकार ब्रह्म शाश्वत नहीं रह जाएगा। पुनः ब्रह्म अद्वय, अमिश्रित, अयौगिक और चेतन तत्व है। ब्रह्म का परिणाम कभी भी नहीं हो सकता।

आदि शंकराचार्य ने अपने दर्शन को अद्वैत वेदांत नाम इसलिए दिया क्योंकि उनका यह स्पष्ट अभिमत था कि निर्गुण, निर्विशेष तथा निर्विकल्प ब्रह्म का निर्वचन वाणी द्वारा संभव नहीं है। जो कहते हैं कि “नेति नेति” के द्वारा जो सभी भावों का विर्वतन या निषेध करते हैं और उस निषेध की प्रागप्रेक्षा के रूप में जो अवशिष्ट रहता है तथा जो सर्वथा अवाग्डमनस गोचर है वह अद्वैत है।

अद्वैत एक तर्क प्रणाली है जो सिद्ध करती है कि आत्मा ही अद्वैत है और अद्वैत ही आत्मा है। क्योंकि आत्मा ही निषेध का आश्रय है और आत्मा के लिए ही अनात्मा का निषेध किया जाता है। अतएव आदि शंकराचार्य “नेति नेति” के द्वारा ही अद्वैतवाद को सिद्ध करते हैं।

सनातन धर्म को पुनर्स्थापित करने का बीड़ा उठाया था शंकराचार्य ने। जिन्होंने भारत भूमि की यात्रा प्रारंभ की, शंकराचार्य अपनी यात्रा के दौरान विभिन्न धर्म केंद्रों में जाते और वहां शास्त्रार्थ की चुनौती देते। पूरे भारतवर्ष में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सका। इसे शंकर दिग्विजय यात्रा कहा जाता है।

भारत देश की चार दिशाओं में मठ की स्थापना का उद्देश्य था भारत का एकीकरण। भारतीय चेतना को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए चार मठ, चार धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, पंच प्रयाग के साथ उनका विराट दर्शन, साहित्य उस युगपुरुष ने हमें दिया जो हमारी समूची संस्कृति का वाहक बन गया।

शंकराचार्य ही भारतीय राष्ट्रीय एकता के देवदूत हैं जिन्होंने सनातन धर्म को जीवन्त किया।सनातन धर्म संपूर्ण विश्व को एक कुटुम्ब मानता है। जहां कोई भेदभाव नहीं है। इसीलिए हर धर्म स्थलों पर जयकारा आज भी होता है।
‘अधर्म का नाश हो।’ ‘प्राणियों में सद्भावना हो।’ ‘विश्व का कल्याण हो।’

आलेख

श्री रविन्द्र गिन्नौरे भाटापारा, छतीसगढ़

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