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दो व्यवस्थाओं की खींचतान के बीच पहला आमचुनाव और बस्तर (आलेख – 1)

चुनावी मौसम है, और हर ओर चर्चा चुनावों की ही हो रही है। मैं बस्तर मे हुए पहले लोकसभा चुनावों से ले कर अब तक की परिस्थिति पर केंद्रित एक आलेख श्रंखला आप मित्रों के साथ साझा करने जा रहा हूँ। इस आलेख श्रंखला में हम स-विस्तार और क्रमवार बस्तर की राजनैतिक परिस्थितियों की चर्चा करेंगे। आज पहली कड़ी में चलते हैं, उस परिस्थिति की ओर जबकि बस्तर में पहले चुनाव होने वाले थे।

बस्तर संभाग में चुनावों की परिपाटी को समझने के लिए उस क्षितिज की ओर चलना होगा जिन समयों में साम्राज्यवादिता का अवसान हुआ और नए नए स्वाधीन हुए देश भारत में लोकतंत्र की आहट सुनाई पड़ने लगी थी। यदि उन समयों के संदर्भों, प्रत्यक्षदर्शियों और पुस्तकों पर एक दृष्टि डाली जाये तो लगता है कि हमने संविधान तो बहुत शक्तिशाली और स्तुत्य बनाया है लेकिन इसके प्रतिपादन से पहले जिस तरह से व्यवस्था परिवर्तन हुआ वह बहुत आपाधापी भरा था।

एक ओर जहाँ वह केन्द्रीय नेतृत्व जिसे हस्तानन्तरण के रूप मे सत्ता प्राप्त हुई थी, वह सैंकड़ों राजाओं-महाराजाओं की महत्वाकांक्षा से जूझ रहा था; सरदार वल्लभ भाई पटेल इस प्रयास मे थे कि देसी रियासतें भारतीय गणराज्य का स्वेच्छा से हिस्सा बना जायें। ब्रिटिश शासन में राजा महाराजा जिस तरह का जीवन जी रहे थे, जो सुविधा-संपन्नता और शान-शौकत उन्हे प्राप्त थी, जैसे अधिकार उन्हें मिले हुए थे ऐसे में लोकतंत्र की आहट उन्हें विचलित कर रही थी।

वे राज्य जहाँ की राजनीति को वहाँ की धार्मिक जनसंख्या प्रभावित कर रही थे, वे तो भारत और पाकिस्तान में सम्मिलित होने की रस्साकशी में उलझे दिखाई पड़े; जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसे राज्यों में ऐसी समस्या सुरसा के मुख की तरह विकराल हो चली थीं। ऐसे राज्य विवेचनाहीन रह गये, और आज भी उनपर कम बातें होती हैं, जहाँ राजतन्त्र की छाया थी लेकिन वे द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत और उससे जनित खीचातानी का हिस्सा नहीं थे। क्या इन राज्यों में व्यवस्थापरिवर्तन सहजता से हो सका था? क्या इस व्यवस्था परिवर्तन ने ऐतिहासिक, राजनैतिक और समाजशास्त्रीय ताने-बाने को छिन्न भिन्न नहीं किया था? क्या इन प्रश्नों का उत्तर हमें बस्तर की राजनीति को ध्यान से समझने पर प्राप्त हो सकता है?

बस्तर में आज की स्थिति और राजनैतिक घटनाक्रमों को समझने के लिए हमें इतिहास की ओर ही लौटना पड़ेगा। यह समय था जबकि हैदराबाद का निजाम एक स्वतंत्र देश बनाने की अपनी इच्छा के लिए प्रतिबद्ध था और उसकी दृष्टि बस्तर रियासत पर गड़ी हुई थी। ब्रिटिश शासन के कालखण्ड में ही महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी के शासन समय में बैलाड़ीला में लौह अयस्क की खोज हो चुकी थी।

अपनी पुस्तक ‘आई प्रवीर दि आदिवासी गॉड’ मे बस्तर रियासत के अंतिम महाराजा रहे प्रवीर चंद्र भंजदेव लिखते हैं “सरदार पटेल की रुचि अपने पसंद के प्रशासक की नियुक्ति करने में थी जिससे बस्तर रियासत को तत्कालीन हैदराबाद रियासत के प्रभाव से मुक्त रखा जा सके। नीलगिरी में जब अप्रिय घटनाएं होंए लगीं, हैदराबाद रियासत ने भारत के केन्द्रीय शासन की अधीनता को स्वीकार कर कुछ रियासतों के पूर्व शासकों को जिनकी राजनैतिक पहुँच थी और जिनका राजनीतिज्ञों पर प्रभाव था, राज्य प्रमुखों के पद पर नियुक्त कर दिया”।

रियासत की राजनीति ने अभी लोकतंत्र को ठीक से समझा भी नहीं था, अभी पहले चुनाव भी नहीं हुए थे और ऐसे में प्रभुत्व की कशमकश आरंभ हो गई थी, क्या इसके पीछे का कारण जल्दी ही होने वाले पहले राष्ट्रीय चुनाव थे? बस्तर में महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव प्रभावशाली थे, उन्हें न तो आसानी से नजरंदाज किया जा सकता था न ही उनकी लोकप्रियता के समानांतर कोई व्यक्तित्व खड़ा किया जा सकता था। क्या इसी लिए रियासत का एडमिनिस्ट्रेटर अथवा दीवान बदले जाने की कवायद होने ली थी? बस्तर रियासत का अब तक भारतीय गणराज्य में विलीनीकरण हो चला था तथापि राज्य की व्यवस्थायें बदलाव की आंधी को झेलते हुए भी कायम थी।

अपनी पुस्तक ‘लौहण्डीगुड़ातरंगिणी’ में प्रवीर लिखते हैं, कि “मैंने अंग्रेजों की सलाह से रघुराजसिंह को अपना दीवान बनाया था। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मुझे दिल्ली बुलाया कर रघुराजसिंह को दीवान के पद से हटाने की कोशिश की”। यह संदर्भ केंद्र और समाप्त होती रियासत के चुनाव होंए से पहले बचे-खुचे अधिकार को ले कर भी होने वाली खींचतान को प्रदर्शित करता है।

बस्तर रियासत पर केंद्र से पद रहा दबाव क्यों था, क्या इसके लिए नई नई पनपने वाली स्थानीय राजनीति जिम्मेदार थी? क्या हस्तांतरण से मिली सत्ता के कारण केंद्र में बनी पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कॉंग्रेस पार्टी दूरदर्शिता के साथ पहले चुनाव में जाना चाहती थी और वह सभी प्रतिपक्षी स्वरों की पहचान कर रही थी? राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को कॉंग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के साथ साथ रियासत में नए नए पनपे स्थानीय कॉन्ग्रेसी नेताओं से भी शिकायत थी। अपनी पुस्तक ‘लौहण्डीगुड़ातरंगिणी’ में वे लिखते हैं – “बस्तर में आरंभ से ही मुझे अपनी प्रजा से अलग करने का प्रयास किया गया। गाँव गाँव में सूर्यपाल तिवारी और उसके आदमी राजा और रानी के विरुद्ध प्रचार करते।”

इसी क्रम में अपनी पुस्तक में महाराजा स्पष्ट करते हैं कि उनकी प्रतिबद्धता कॉग्रेस पार्टी के प्रति नहीं थी, वे आश्चर्यचाकित थे कि जब राजतन्त्र नहीं रहा, राजा का शासन लौटने वाला नहीं है तो राजा का इतिहास और छवि को धूमिल करने का क्या औचित्य है? पहले चुनाव के रूप में लोकतंत्र की आहट पर टिप्पणी करते हुए वे आगे लिखते हैं – “स्वतंत्र भारत में कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी भी वैधानिक पार्टी का समर्थन कर सकता है। ऐसा न हो तो स्वतंत्रता का कोई प्रमाण नहीं रहा जाएगा”। इन्ही समयों में बस्तर रियासत के विभाजन की चर्चा भी जोरों पर थी।

पहले चुनाव से पहले ही बस्तर में दो व्यवस्थाओं की खींचतान देखी जा रही थी जिसने कालांतर में बड़ी दरार का स्वरूप ले लिया। विचार कीजिए कि बस्तर में निहित अनेक समस्याओं जिसमें नक्सलवाद भी सम्मिलित है, इसके बीज इसी समय पड गए थे?

लेखक

राजीव रंजन प्रसाद
लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार

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