Home / सप्ताह की कविता / उठो-उठो ऐ सोने वालों, तुम्हें जगाने आये हैं।

उठो-उठो ऐ सोने वालों, तुम्हें जगाने आये हैं।

राष्ट जागरण धर्म हमारा, वही निभाने आये हैं।
उठो-उठो ऐ सोने वालों, तुम्हें जगाने आये हैं।

दुश्मन ताक रहा है, छोर पार वो बैठा है।
ललचाया सा उसका मुँह है, देखो कैसे ऐंठा है।
नीयत उसकी ठीक नही है, तुम्हें बताने आये हैं।1।

राष्ट जागरण धर्म हमारा, वही निभाने आये हैं।
उठो-उठो ऐ सोने वालों, तुम्हें जगाने आये हैं।

भीतर भी कुछ बाँट रहे है, जहर शब्द की प्याली में।
छेद बनाते दिखते हैं कुछ, खाते हैं जिस थाली है।
फन फैलाये पाप कालिया, तुम्हें दिखाने आये हैं।2।

राष्ट जागरण धर्म हमारा, वही निभाने आये हैं।
उठो-उठो ऐ सोने वालों, तुम्हें जगाने आये हैं।

मक्कारो का जोश देश में, बढा दिखाई देता है।
देशद्रोह का पारा भी अब, चढ़ा दिखाई देता हैं।
कलमकार हम देश भक्ति का, पाठ पढ़ाने आये हैं।3।

राष्ट जागरण धर्म हमारा, वही निभाने आये हैं।
उठो-उठो ऐ सोने वालों, तुम्हें जगाने आये हैं।

सप्ताह के कवि

मनीराम साहू ‘मितान’ कचलोन, सिमगा, छत्तीसगढ़

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