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छत्तीसगढ़ में पर्यटन के विविध आयाम


जानिए पर्यटन के चार आधार, सुरक्षा, साधन, आवास आहार।

भारतीय गणराज्य का नवनिर्मित प्रदेश छत्तीसगढ़ है तथा इससे पूर्व यह मध्यप्रदेश का भाग था। प्रकृति ने इस भू-भाग को अपने हाथों से दुलार देकर संवारा है। जब हम भमण करते है तो ज्ञात होता है कि प्रकृति की लाडली संतान है। जिस तरह एक माता अपनी संतानों में से किसी एक संतान से विशेष अनुराग एवं स्नेह रखती है, उसी तरह प्रकृति भी छत्तीसगढ़ की धरती से अपना विशेष अनुराग प्रकट करती है। प्राकृतिक सुषमा, पुरातत्व, जैव विविधता, सांस्कृतिक विविधता, तीज त्यौहार, विशिष्ट खान-पान शैली एवं निवासियों के आदर, दुलार एवं सहयोग की भावना को देखते हुए यह पर्यटन की दृष्टि से सर्वोत्तम क्षेत्र है।

हम भारत के अन्य राज्यों की ओर दृष्टिपात करते है तो पाते हैं कि उनकी प्रसिद्धि पर्यटन के किसी एक या दो आयामों को लेकर ही दिखाई देती है, परन्तु छत्तीसगढ़ का पर्यटन बहुआयामी है, यहाँ पर्यटक की रुचि के अनुसार स्थान हैं, जहां वह घूमना चाहता है। वन, नदी-नाले, प्राचीन धरोहरें, जैव विविधताओं के साथ सागर जैसी अनुभूति कराने वाले कोरबा जिले का बुका जैसा विशाल जलराशि वाला क्षेत्र भी है जो सागर की अनुभूति देता है।

छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थलों की ओर दृष्टिपात करें तो विविधताएं दिखाई देती हैं, जिसे हम पर्यटन के विभिन्न आयाम कह सकते हैं। सरगुजा से लेकर बस्तर तक अनेक ऐसे अनछुए स्थान हैं जो पर्यटन की दृष्टि से प्रकाश में नहीं आए हैं या कम प्रकाशित हैं। यहाँ अभ्यारण्य, नदी-घाटी सभ्यताओं के अवशेष, पुरातात्विक महत्व के स्मारक, नदियाँ, जलप्रपात, झरने, पर्वत, जलाशय, वन्य प्राणि, आदि मानव के द्वारा निर्मित शैलाश्रय, धार्मिक स्थल, वानस्पतिक एवं जैव विविधता, मनेन्द्रगढ़ स्थित हसदेव नदी तीर का जीवाश्म क्षेत्र, हमारी विरासत हैं जिन्हें हम सुविधा की दृष्टि से निम्न श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं प्राकृतिक पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन, धार्मिक पर्यटन पुरातात्विक पर्यटन, साहसिक पर्यटन, शीतकालीन पर्यटन, मानसूनी पर्यटन, कृषि पर्यटन इत्यादि।

प्राकृतिक पर्यटन स्थल – हम जानते हैं कि छत्तीसगढ़ प्रदेश का 44 प्रतिशत भू-भाग वनों से आच्छादित है, ये वन भिन्न-भिन्न तरह के वन्य पशु-पक्षी, कीट-पतंगों का निवास हैं। यहाँ बर्ड वाचर के लिए ही लगभग 300 तरह पक्षियों की प्रजातियां हैं तथा बस्तर की मैना तो दुर्लभ ही मानी जाती है जिसमें मनुष्य की बोली बोलने की प्रतिभा है। वन्य पशुओं में बाघ, तेन्दुआ, चीतल, सांभर, लकडबग्घा, जंगली भालू, काकड़, सियार, जंगली सुअर, लंगूर, सेही, माऊस डीयर, बार्किंग डीयर, चिरकमाल,, खरगोश, सिवेट, लोमड़ी, नीलगाय, उदबिलाव, गौर, जंगली भैंसा आदि पाये जाते हैं। इसके साथ विभिन्न प्रजातियों के सर्प भी इन वनों की शोभा हैं। इंद्रावती नदी में मगर प्राकृतिक परिवेश में दिखाई देते हैं।

कोडाकल झरना, बस्तर

वन्य प्राणियों एवं वनों की रक्षा करने के लिए यहाँ इंद्रावती, कांगेर, गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान हैं। साथ ही अचानकमार, बादलखोल, बारनवापारा, सेमरसोत, सीतानदी, तमोर पिंगला ,भैरमगढ़, भोरमदेव, गोमर्डा, पामेड़, उदन्ती अभयारण्य हैं। इंदिरा उद्यान, कानन पेंडारी चिड़ियाघर, मैत्री बाग चिड़ियाघर, नंदन वन चिड़ियाघर, जंगल सफ़ारी नया रायपुर एवं कोटमी सोनार का मगरमच्छ पार्क भी है।

एक ओर निर्मल जल की धार लिए प्रवाहित शास्त्रों में वर्णित चित्रोत्पला गंगा (महानदी) शिवनाथ, इंद्रावती, हसदेव, अरपा, पैरी, सोंढूर, मनियारी, महान, हाफ़, जोंक, लीलागर, डंकिनी-शंखिनी आदि नदियाँ हैं तो दूसरी तरफ़ इन नदी घाटी में बनने वाले छोटे बड़े झरनों और जलप्रपातों सैकड़ों की संख्या में है, बलरामपुर का कोठली जलप्रपात, कोरिया का अमृतधारा, कसडोल का सिद्धखोल, सिरपुर का धसकुड़, गरियाबंद का चिंगरा पगार, बस्तर का तीरथगढ़, चित्रकोट जैसे जलप्रपात, हांदावाड़ा का बाहूबली आदि के साथ बड़े-छोटे झरने शस्य श्यामल धरा को मनोहर रुप प्रदान करते हैं। तातापानी बलरामपुर, मैनपाट का उल्टापानी, जलजली (हिलती हुई भूमि) भी महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल हैं।

इन राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभ्यारण्यों में साल, सागौन, बेंत, धावड़ा, हल्दु, तेन्दु, कुल्लू , कुसुम, आंवला, कर्रा, जामुन, सेन्हा, आम, बहेडा, बांस आदि के वृक्ष पाए जाते हैं, इसके अतिरिक्त सफेद मूसली, काली मूसली, तेजराज, शतावर, रामदतौन, जंगली प्याज, जंगली हल्दी, तिखुर, सर्पगंधा के अन्य औषधीय पौधे भी पाए जाते हैं। ये वन पर्यटकों की आंखों के रास्ते हृदय को प्रफ़ुल्लित करती है। वन प्रेमी एवं वन्य फ़ोटोग्राफ़ी करने वाले पर्यटकों के लिए छत्तीसगढ़ के वन किसी स्वर्ग से कम नहीं हैं।

धार्मिक पर्यटन स्थल – प्राचीन काल से ही दक्षिण कोसल कहलाने वाला यह भू-भाग विभिन्न धार्मिक पंथो एवं मतों के सहजीवन का क्षेत्र रहा है। यहाँ शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध तथा जैनतीर्थ है, बस्तर से लेकर सरगुजा तक स्थानीय स्तर पर धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केन्द्र हैं। इसके साथ ही भगवान राम के लंका गमन का मार्ग भी यहीं से जाता है, इस पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्थल के पड़ाव भी दर्शनीय हैं।

शिवरीनारायण

वैष्णव क्षेत्र के रुप में यहां पद्मावती नगरी राजिम, शिवरीनारायण, दूधाधारी मठ, तुरतुरिया, रमई पाट रायपुर इत्यादि महत्वपूर्ण स्थान है, शक्ति स्थलों में दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा, महामाया रतनपुर, बम्लेश्वरी डोंगरगढ़, खल्लारी माई खल्लारी (महासमुद) महामाया अम्बिकापुर एवं अन्य स्थल हैं। शैव धार्मिक स्थलों के रुप में राजिम पंचकोशी, कुलेश्वर, पटेश्वर, चम्पेश्वर, बम्हनेश्वर, कर्पुरेश्वर, फ़णीकेश्वर, विशाल प्राकृतिक शिवलिंग भूतेश्वरनाथ (गरियाबंद) बूढामहादेव रतनपुर, देवगढ़ सरगुजा इत्यादि हैं। जैन तीर्थ, ॠषभ तीर्थ दमऊ धारा, सक्ती, नगपुरा दुर्ग इत्यादि है तथा प्राचीन बौद्ध तीर्थ के रुप में सिरपुर प्रसिद्ध है। रामायणकालीन दक्षिणापथ मार्ग से गुजरते हुए वर्तमान में भी हमें कदम-कदम पर धार्मिक दर्शनीय स्थल मिलते हैं।

पुरातात्विक पर्यटन स्थल- प्राचीन स्थलों का भ्रमण करने वाले पर्यटकों के लिए बस्तर से लेकर सरगुजा तक स्थापत्य एवं प्रतिमा शिल्प सौंदर्य का खजाना बिखरा हुआ है। बस्तर में ढोलकल, बारसुर, नारायणपाल, दंतेवाड़ा, तुलार, गुप्तेश्वर, ढंढोरेपाल, भोंगापाल, मध्य छत्तीसगढ़ में आरंग, रतनपुर, रामटेकरी, मदकू द्वीप, डमरुगढ़, भोरमदेव, मड़वा महल, पचराही, चतुरभूजी धमधा, मल्हार, नकटा मंदिर जांजगीर, शिवरीनारायण, ताला, सिरपुर, खल्लारी, जांजगीर, नगपुरा, खरखरा, देवबलौदा, सिंघोड़ा, बालौद, तुरतुरिया, पलारी, गिरौदपुरी, दामाखेड़ा, सिहावा, चंदखुरी, दमऊधारा, पाली, लाफ़ागढ़, चैतुरगढ़ तथा सरगुजा में सीता बेंगरा रामगढ़ (प्राचीन नाट्यशाला), सीतामढी, हरचौका, देवगढ़, हर्रा टोला बेलसर, सतमहला, डीपाडीह, आदि प्राचीन स्थल दर्शनीय हैं।

महामाई मंदिर चैतुरगढ़

प्रागैतिहासिक पर्यटन स्थल – प्रागैतिहासिक काल के मानव सभ्यता के उषाकाल में छत्तीसगढ़ भी आदिमानवों के संचरण तथा निवास का स्थान रहा है। इसके प्रमाण प्रमुख रूप से रायगढ़ जिले के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, बसनाझर, बोतलदा, ओंगना पहाड़ और राजनांदगांव जिले के चितवाडोंगरी से प्राप्त होते हैं। आदिमानवों द्वारा निर्मित तथा प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के पाषाण उपकरण, महानदी, मांड, कन्हार, मनियारी, जोंक तथा केलो नदी के तटवर्ती भाग से प्राप्त होते हैं। सिंघनपुर तथा कबरा पहाड़ के शैलचित्र विविधता तथा शैली के कारण प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्रों में विशेष रूप से चर्चित हैं। प्रागैतिहासिक काल के अन्य अवशेषों के एकाश्म शवाधान के बहुसंख्यक अवशेष रायपुर और दुर्ग जिले में मिलते हैं तथा यहाँ पचास से अधिक मडफ़ोर्त भी हैं। प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विविधता का सम्पूर्ण सौंदर्य छत्तीसगढ़ में देखने मिलता है।

बरहा झारिया का शैलचित्र

सांस्कृतिक पर्यटन स्थल – इस पूण्य भूमि में दक्षिण कोसल के राजा भानुमंत की पुत्री मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की माता कौसल्या ने जन्म लिया था। प्रकृति की गोद में बसे भगवान राम के ननिहाल (दक्षिण कोसल) में चंदखुरी ग्राम में स्थित मंदिर कौसल्या माता को अर्पित है। बस्तर का 75 दिनों का दशहरा प्रसिद्ध है। छत्तीसगढ़ के मेले मड़ई सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। सरगुजा से लेकर बस्तर धान की फ़सल काटने के बाद देवउठनी ग्यारस के बाद मेले मड़ई प्रारंभ हो जाते हैं। जिसमें सरगुजा संभाग का तातापानी का मेला, रामगढ़ का रामनवमी का मेला, शिवरीनारायण, राजिम, सिरपुर, रामनामी मेला, बस्तर का दियारी तिहार, आमाजुगानी, नारायणपुर मड़ई, ककसाड़ जात्रा, बैगा मेला मड़ई सहित माघ पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा को महत्वपूर्ण मेले भरते हैं। इन मेलों में उपस्थित होकर अपनी संस्कृति का परिचय देते हैं।

कृषि पर्यटन स्थल- वैसे तो कृषि छत्तीसगढ़ में सभी स्थानों पर होती है, परन्तु कुछ विशेष क्षेत्र हैं जहाँ विशेष तरह की खेती हो रही है। जैसे जशपुर में चाय खेती, यहाँ के पाट (पठार) के ठंडे क्षेत्रों में टाऊ, आलू, सेब, आड़ू, अलूचा, अंगुर, अनानस, स्ट्राबेरी, नाशपाती की खेती, महासंमूंद में अमरुद की खेती, अम्बिकापुर में लीची, जीरा फ़ूल धान की खेती, बस्तर के कांकेर में सीताफ़ल, चिरौजी, काजू, नारियल के साथ कंदीय फ़सलों की खेती के तथा इंदिरागांधी कृषि विश्वविद्यालय में चावल की 23 हजार किस्में प्रचलित हैं, जिसको प्रत्येक वर्ष तकनीकि मापदंडों के अनुसार उगाया जाता है। यह विश्व का दुसरा बड़ा संग्रह है। इस तरह छत्तीसगढ़ कृषि पर्यटन एवं अध्ययन के लिए उपयुक्त क्षेत्र है।

चाय की खेती

साहसिक पर्यटन स्थल – पहाड़ों की ट्रेकिंग करना एवं प्राकृतिक स्थलों में भ्रमण करना साहसिक पर्यटन की श्रेणी में आता है। जैसे की बस्तर के ढोलकल पहुंचने के लिए छ: किमी की पहाड़ी ट्रेकिंग करनी पड़ती है तो हांदावाड़ा के बाहूबली जलप्रपात तक पहुंचने के लिए इंद्रावती को पार करना पड़ता है। बारनवापारा अभ्यारण्य में सिंघाधुरवा गढ़ तक पहुंचने के लिए ट्रेकिंग करनी पड़ती है तो मैनपाट की पहाड़ियों में घुमक्कड़ों ने नवीन ट्रेकिंग रुट बना लिया है। इसके साथ बाईकिंग एवं सायकिलिंग का भी आयोजन घुमक्कड़ लोग करते हैं।

ट्रेकिंग मांझिनगढ़, केशकाल बस्तर

इसके साथ ही मानसून में छत्तीसगढ़ की खूबसूरती देखते ही बनती है। यहाँ की नदियां उफ़ान पर होती हैं तो झरने भी पूर्ण यौवन पर रहते हैं जिसके कारण दर्शनीय होते हैं। चारों ओर फ़ैली हरियाली मनमोह लेती है, इसके साथ ही मैदानी क्षेत्र शीतकालीन पर्यटन के उत्तम है तथा ग्रीष्म काल में सरगुजा के पाट क्षेत्र तथा बस्तर की घने वन सुकून देते हैं। इस तरह समग्र दृष्टि डालें तो छत्तीसगढ़ में सभी मौसमों में पर्यटन के विभिन्न अनछुए आयाम दिखाई देते हैं।

छत्तीसगढ़ पर्यटकों की पहली पसंद कैसे बने?

जब छत्तीसगढ़ भारत के किसी भी प्रदेशों से पर्यटन के क्षेत्र में कम नहीं है तब भी पर्यटकों की पहली, दूसरी, तीसरी पसंद क्यों नहीं है। इसका कारण ढूंढना आवश्यक है कि विदेशी पर्यटक छत्तीसगढ़ क्यों नहीं आते? मेरे तीस वर्षों के इस क्षेत्र के अनुभवों के अनुसार पर्यटन के चार प्रमुख बुनियादी आधार हैं, जानिए पर्यटन के चार आधार, सुरक्षा, साधन, आवास आहार। अगर पर्यटक को ये चारों सुविधाएं प्राप्त होती है वहीं वे निर्भय होकर पर्यटन के लिए जाना चाहेंगे। पैसा खर्च करके कोई जान का जोखिम नहीं उठाना चाहता।

यह स्वाभाविक ही है कि किसी भी पर्यटन क्षेत्र से सैलानियों का मोहभंग तभी होता है जब उन्हें स्थानीय तौर पर सुरक्षा, आवास, भोजन व परिवहन की परेशानियों से जूझना पड़ता है। छत्तीसगढ़ में पर्यटकों के न आने का प्रमुख कारण मीडिया में माओवादियों को लेकर फ़ैलाई गई नकारात्मकता है। विशेष कर बस्तर में घट रही माओवादियों की हिंसात्मक घटानाएं सोशल मीडिया पर सर्च करने पर पहले दिखाई दे जाती हैं।

छत्तीसगढ़ जैसे आकर्षक इलाके में नक्सलियों की पैठ के चलते, विदेशी तो दूर देशी पर्यटक भी आने से कतराते हैं। इन सैलानियों के मनो-मस्तिष्क पर आए दिन अखबारों की सुर्खियां नक्सलियों के हिंसक वारदातों का हवाला लिए चस्पा रहती हैं। ऐसे हालात में नक्सलियों के खौफ पर्यटकों की राह में बड़ा रोड़ा बने हुए हैं। जब सुरक्षा का प्रश्न खड़ा हो जाता है तो छत्तीसगढ़ पर्यटन पर विचार छोड़कर पर्यटक सुरक्षित स्थान की टिकिट ले लेता है। इससे पर्यटकों की संख्या में निरंतर कमी दिखाई दे रही है।

इसके साथ आधारभूत आवश्यकताओं की कमी भी दिखाई देती है। पर्यटन स्थलों तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक साधनों की तो नितांत कमी है। अगर इन स्थलों पर बड़े होटल या रिसोर्ट नहीं है पर होम स्टे की परम्परा भी नहीं पनप पाई है। उत्तरांचल के किसी भी स्थान पर आपको रात होने पर जेब के अनुसार रुकने और खाने के लिए होमस्टे मिल जाता है। पर यहां होम स्टे भी नहीं मिल पाते। इसके साथ ही स्थानीय निवासी पर्यटन को आय का साधन नहीं बना पाये हैं।

प्रशिक्षित एवं सुसभ्य गाइडों का अभाव, पर्यटन संबंधी सूचनाओं के व्यापक प्रचार प्रसार की कमी, पर्यटन सूचना केंद्रों की कमी एवं पर्यटन मंडल की उदासीनता, पर्यटकों की इच्छा अनिच्छा की समझ का अभाव, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की सुरक्षा की अपर्याप्तता आदि कुछ ऐसी समस्याएँ है जिनके कारण प्रदेश में पर्यटन का समुचित विकास नहीं हो पा रहा। उक्त समस्याओं के कारण विशेषकर विदेशी पर्यटक भी में आने में आशंकित रहता है।

सुझाव एवं सलाह –

एक पहलु भी विचारणीय है कि कश्मीर में निरंतर आतंकवादी घटनाएं घटती रही हैं, परन्तु वहाँ पर्यटक पहुंच ही जाते हैं, इसका एकमात्र कारण है कि वहाँ के निवासियों की आय का प्रमुख स्रोत पर्यटन ही है तथा इसलिए आतंकवादी भी पर्यटकों को नहीं छेड़ते और पर्यटन से आय कभी बंद नहीं हो पाती, क्योंकि पर्यटन उनकी आर्थिक आवश्यकताओं से जुड़ गया है।

दो वर्षों पहले दंतेवाड़ा में ढोलकल की गणेश प्रतिमा तोड़ कर पहाड़ी से नीचे गिरा दी गई थी। इसको तोड़ने का एकमात्र कारण था कि वहां तक पर्यटकों की पहुंच बन रही थी। इससे जाहिर है कि माओवादी भी पर्यटन को अपने लिए खतरा मानकर चलते हैं।

छत्तीसगढ़ के निवासी पर्यटकों के साथ जुड़ नहीं पाये, इसका कारण यह है कि उन्हें पर्यटकों द्वारा प्राप्त आमदनी का स्वाद मुंह नहीं लगा तथा अगर स्थानीय निवासी पर्यटन के साथ जुड़ जाएं और इसे आय का साधन बनाएं तो माओवादी जैसी समस्या से भी राहत मिल सकती है। यही माओवादी भी नहीं चाहते।

इसके साथ ही होम स्टे को प्रमोट करना चाहिए, जिससे स्थानीय निवासियों को आमदनी का स्रोत मिल सके, बड़े होटल मोटल की बजाय वर्तमान में पर्यटक होम स्टे में रुकना अधिक पसंद करते हैं।
पर्यटक अक्सर छुट्टी के अवसर पर ही घरों से पर्यटन के लिए निकलते हैं, वांछित स्थल तक पहुंचने के लिए आवागमन का उत्तम एवं तीव्रतम साधन मिले एवं स्थल तक पहुंचने के लिए अच्छी सड़कें हों तो पर्यटक पहुंच सकते है। नवम्बर माह में मुझे जशपुर जैसे सुंदर स्थान में पहुंचने के लिए उड़ीसा के सुंदरगढ़ होकर जाना पड़ा, क्योंकि रायपुर से जशपुर तक पहुंचने के लिए थका देने वाली सड़क है।

पर्यटन मंडल द्वारा प्रचार प्रसार के उचित उपाय तथा प्रमुख स्थलों पर सूचना केन्द्रों का ईमानदार प्रयास भी पर्यटक संख्या में वृद्धि कर सकता है। साथ ही पर्यटकों से फ़ीड बैक लेकर अपनी कमी जानने का प्रयास करना चाहिए, जिसे सुधारा जा सके।

आलेख

ललित शर्मा इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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