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बाबा साहेब के व्यक्तित्व पर बचपन में मिले धार्मिक संस्कारों का प्रभाव

यह भारत भूमि की विशेषता है कि उसे समयानुकूल राजनीतिक, बौद्धिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक नेतृत्व प्राप्त होता रहा है। भारत को राजनीतिक रूप से एकसूत्र में बांधने का प्रश्न उठा, तब आचार्य चाणक्य सामने आए। विदेशी दमनकारी शक्तियों के सामने भारत के सामर्थ्य को प्रकट करने के लिए चंद्रगुप्त मौर्य, राजा दाहिर, महाराजा रणजीत सिंह, महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज जैसे पराक्रमी व्यक्तित्व उभर कर आते हैं।

आध्यात्मिक एवं बौद्धिक चेतना की पताका अखंड भारत से लेकर अखिल विश्व में फहराने के लिए आदिगुरु शंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद तक एक दैवीय परंपरा है। आधुनिक भारत में महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर सहित अनेक नाम हैं।

भारत के पास महापुरुषों की एक लंबी शृंखला है, जिसमें एक से एक चमकते हीरे, प्रेरणापुंज एवं प्रकाशस्तम्भ विद्यमान हैं। इसी कड़ी में बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का नाम आता है। उनका जीवन संघर्ष और प्रेरणा से भरा हुआ है।

बाबा साहेब अंबेडकर ने सोये हुए भारत राष्ट्र को जगाने का काम किया। भारत के मूल विचार को एक बार फिर जीवंत किया, जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति ब्रह्म का अंश है। भारत का विचार कहता है कि कोई व्यक्ति ऊंचा-नीचा नहीं है। सबमें एक ही ईश्वर का अंश है। इसलिए सब समान हैं। कतिपय कारणों में भारत के इस मूल विचार में विचलन आया और लोगों का व्यवहार इस अद्भुत विचार के विरुद्ध हो गया। कथनी और करनी में अंतर गहरा गया।

एक ही ब्रह्म का अंश होने के बावजूद कुछ लोगों को पवित्र और कुछ को पतित समझा जाने लगा। यहाँ तक कि कुछ लोगों की परछाई भी अस्पृश्य हो गई। भारत जैसे उन्नत जीवनशैली वाले राष्ट्र की इस प्रकार की सामाजिक स्थिति कतई उचित नहीं ठहराई जा सकती थी। भारत को इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए अनेक महापुरुषों ने अपने प्रयत्न प्रारंभ कर दिए। इस दिशा में बाबा साहब के प्रयासों को विशेष तौर पर उल्लेखित किया जाता है।

व्यक्ति-स्वातंत्र्य, व्यक्ति-विकास और समाज-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले बाबा साहेब अंबेडकर का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ। उनका परिवार अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति का था। परिवार के तीन सदस्यों ने कालान्तर में संन्यास आश्रम को चुना। दादाजी मालोजी राव ने रामानंद संप्रदाय से दीक्षा ली थी। पिताजी रामजी ने कबीर पंथ की दीक्षा ली (कबीर के ही गुरु रामानंद थे) और रामजी के बड़े भाई यानी बाबा साहब के ताऊजी ने भी संन्यास लिया था और गृह त्याग कर वे ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करने के लिए घर छोड़ कर चले गए थे।

बालक भीम के जन्म से लगभग 12 वर्ष पूर्व रामजी और भीमाबाई के जीवन में एक अलौकिक घटना घटी थी। उस घटना के बाद से ही रामजी और भीमाबाई को यह विश्वास था कि उनके घर में अलौकिक बालक का जन्म होगा। बाबा साहब की जीवनी लिखने वाले प्रख्यात लेखक चांगदेव भवान राव खैरमोड़े ने उस अनूठी घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि सन् 1879 में रामजी सूबेदार सपरिवार रावलपिंडी के सैनिक कैंप में थे। अन्य महार अधिकारियों के भी परिवार उनके साथ मौजूद थे। एक दिन शाम को पास ही बहने वाली एक नदी पर महिलाएं कपड़े धोने और पानी भरने गई थीं। महिलाएं जब कपड़े तथा बर्तन आदि साफ कर रही थीं तब निकट के ही जल प्रवाह के पास कुछ गोसाई आए और वे भी स्नान करने लगे। अपना काम करते समय उन महिलाओं को आपस में कोंकणी मराठी भाषा में बातें करते हुए सुनकर एक वृद्ध गोसाई ने उत्सुकता से उनकी ओर देखा। आधी-अधूरी स्नान की स्थिति में ही वे एक मध्यम आयु की स्त्री की ओर निहारते हुए खड़े रहे आौर फिर कांपते स्वर में शुद्ध मराठी में बोले- “भीमा, तुम यहाँ कैसे”? उस गोसाई के स्नेहिल स्वर में प्रेम-पूर्ण उच्चारित शब्दों को सुनकर भीमाबाई आश्चर्य से स्तब्ध रह गई। ये गोसाई कौन है? इसे मेरा नाम कैसे पता चला? इसके पूछे हुए प्रश्नों का मैं क्या उत्तर दूं? इस तरह के कई विचारों के कारण बदहवास दशा में खड़ी भीमाबाई की ओर वे गोसाई कुछ आगे बढ़े और बोले- “भीमा, तुम घबराओ मत। मैं तुम्हारा जेठ हूँ। मैंने संन्यास ले लिया है और अपने दल के साथ घूमते-घूमते यहाँ आया हूँ”।

भीमाबाई ने गोसाई बने हुए अपने जेठ को भक्तिभाव से प्रणाम किया और उन्हें तथा उनके दल के सदस्यों से अनुरोध किया कि “आप सभी को हमारे घर आमंत्रित करने के लिए मैं अपने पतिदेव को भेज रही हूँ। आप उस आमंत्रण को स्वीकार करें और अपनी चरणधूलि से हमारे घर को पवित्र करें”।

भीमाबाई के निवेदन को उन सभी ने स्वीकार किया। शीघ्रता से अपने काम निपटा कर भीमाबाई घर गई और सूबेदार को सारा वृत्तांत सुनाया। सूबेदार सभी गोसाईयों को आमंत्रण देकर अपने घर लाए। घर के आगे धूनी जला कर गोसाईयों ने भजन गाने शुरू कर दिए। सूबेदार के गोसाई बंधु सूबेदार से बोले- “हम गोसाई लोग हैं, आज यहाँ तो कल वहाँ। हमें भोजन बना कर देने के चक्कर में तुम मत पड़ो। हमें केवल फलाहार दो और यहाँ से निकलने की अनुमति दो”।

सूबेदार फल और मेवा-मिठाई लाए और उन्हें गोसाईयों के सामने रख दिया। गोसाई ने उन्हें केवल स्पर्श कर एक तरफ रख दिया। भीमाबाई अपने जेठ से निवेदन करते हुए बोली- “भीतर आइये और मेरे बच्चों को देखिये”। इस पर गोसाई उनसे बोले- “नही बेटे, एक बार इन नाते-रिश्तों के जंजाल से मैं बाहर आ गया हूँ, तो वह अब हमेशा के लिए है। मैं अब माया-मोह के जाल में फंसने के लिए अंदर क्यों आऊं? अपने वंश की तीन पीढिय़ों में तीनों पुरुष संन्यासी बन गए। घोर तपस्या करके तीनों ने भगवान से एक ही वर माँगा है कि भगवान हमारे वंश में एक ऐसा पुत्र उत्पन्न कीजिए जो हमारे कुल का नाम सर्वत्र रोशन करे और जो अपने बंधुओं और धर्म के बुरे दिन समाप्त कर जाति और धर्म को प्रकाशित करे। ईश्वर ने वह वर दे दिया है और यह निश्चित है कि अपने कुल के प्रथम गोसाई की तीसरी पीढ़ी में अर्थात् वर्तमान पीढ़ी में ऐसा पुरुष जन्म लेने वाला है। अब अपने कुल में रामजी अकेला ही गृहस्थ पुरुष है। इसलिए रामजी और तुम्हारे घर में पुरुष उत्पन्न होने वाला है। यह बात मेरे मुंह से निकले यही परमात्मा की इच्छा थी और इसीलिए इस तरह अचानक अपनी भेंट हो गई”। इतना कह कर उन गोसाई ने एक स्त्री के हाथों नारियल-रोली आदि से भीमाबाई की गोद भरवायी। इसके बाद सभी गोसाइयों ने जयघोष किया और वे वहाँ से निकल गए।

संभव है कि कुछ लोगों को यह घटना अतिशयोक्ति लगे या वे इसे अंधश्रद्धा बताकर नकार दें परंतु उससे पहले यह समझना आवश्यक है कि इस घटना का वर्णन बाबा साहेब की सबसे पहली प्रामाणिक जीवनी लिखने वाले लेखक चांगदेव भवानराव खैरमोडे ने किया है। श्री खैरमोडे की बाबा साहेब के सान्निध्य में बहुत समय बिताया, उनके जीवन को समीप से देखा और उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर अनुसंधान किया। श्री खैरमोडे द्वारा लिखा हुआ बाबा साहेब के चरित्र का पहला खंड वर्ष 1952 में बाबा साहेब के जीवनकाल में ही प्रकाशित हुआ था। इसलिए श्री खैरमोडे द्वारा बाबा साहेब के चरित्र में वर्णित इस अलौकिक प्रसंग पर अविश्वास करना ठीक नहीं होगा। बाबा साहेब ने भी इस प्रसंग का कभी किसी प्रकार का खंडन नहीं किया।

बाबा साहेब का बचपन अत्यंत संस्कारी एवं धार्मिक वातावरण में बीता। उनके परिवार के तीन सदस्यों ने संन्यास आश्रम को चुना। पिताजी ने कालान्तर में कबीरपंथ की दीक्षा ली। कुल मिलाकर बाबा साहेब के परिवार का वातावरण अत्यंत धार्मिक था। उनके घर में चलने वाले रामायण, पाण्डव प्रताप, ज्ञानेश्वरी एवं अन्य संत साहित्य के नित्य पाठन और भजन के दैनन्दिन प्रभाव से निर्माण होने वाले धार्मिक पवित्र वातावरण का सविस्तार वर्णन, बाबा साहेब के जीवन पर चरित्र ग्रंथ लिखने वाले ग्रंथकारों चांगदेव भवानराव खैरमोडे और धनंजय कीर ने किया है।

धनंजय कीर के अनुसार, बाबा साहेब के घर का वातावरण ‘संत के भोजन, अमृत का पान, करते कीर्तन सदा…’ का था। बाबा साहेब स्वयं कहते थे- “जब मेरी बहनें मीठे स्वर में पद गातीं, तब मुझे लगता था कि धर्म व धार्मिक शिक्षा मनुष्य के जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। अकसर यह समझा जाता है कि मैं धर्महीन हूँ, परंतु यह बात सही नहीं है। मेरे बारे में लोगों की यह गलत-फहमी है। जो मेरे सान्निध्य में आए हैं, उन्हें मेरी धर्म विषयक श्रद्धा एवं प्रेम के बारे में मालूम हैं। धार्मिक ढोंग मुझे जरा भी पसंद नहीं है… पिताजी के भजनपाठ के कारण मुक्तेश्वर, तुकाराम आदि संत कवियों की रचनाएं मुझे कंठस्थ हुईं। इतना ही नहीं तो मैं इस काव्य पर मन में विचार भी करने लगा”।

बाबा साहेब के पिता रामजी ने अपने बच्चों को बहुत अच्छे से धार्मिक संस्कार दिए। रात के आठ बजते ही बाब साहेब, उनकी दोनों बहनों और बड़े भाई को देवघर में पहुँचना अनिवार्य था। बाबा साहेब के पिताजी रामजी इस नियम के प्रति बहुत कठोर थे। रामजी स्वयं भी ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते और ऊंची आवाज में अभंगों, स्त्रोतों और श्लोकों आदि का पाठ किया करते। शाम को भी लगभग दो घंटे पूजा-अर्चना करते। पूजा समाप्त होने के बाद वे गीता के दूसरे अध्याय के क्रमांक-19 से 23 तक श्लोकों का पाठ करते थे।

छोटी आयु में मन पर पडऩे वाले संस्कार व्यक्ति का जीवनभर साथ देते हैं। धर्म और धार्मिक संस्कारों ने बाबा साहेब के जीवन पर बड़ा गहरा प्रभाव छोड़ा था। धार्मिक वातावरण के अपने मन पर हुए परिणाम के बारे में डॉ. बाबा साहेब कहते हैं- “हमारा परिवार निर्धन हुआ तो भी उसका वातावरण किसी प्रगतिशील सुशिक्षित परिवार को शोभा दे सके ऐसा था। हमारे पिता इस बात को लेकर सदैव सजग रहते थे कि हममें विद्याध्ययन की रुचि जागृत हो तथा हमारा चरित्र उज्ज्वल बने। भोजन से पूर्व वे हमें पूजा घर में बैठा कर हमसे अभंग, दोहे-भजन आदि कहलवाया करते थे। वैसे तो हम सभी, और विशेष तौर से मैं, अकसर ही टालमटोल किया करते थे। किसी तरह दो-चार आधे-अधूरे अभंग गा कर भोजन के लिए थाली के सामने बैठ जाया करते थे। पिताजी तत्काल हमसे पूछा करते थे- ‘क्यों रे, आज तुम लोगों के भजन जल्दी पूरे हो गए’? उनके उस प्रश्न का उत्तर देने से पहले ही हम वहाँ से नौ-दो ग्यारह हो चुके होते। मगर यह सब सुबह होने वाली धींगामस्ती थी। शाम को हमारे पिताजी ये सब कभी भी नहीं होने देते थे। उनका यह कड़ा नियम-निर्देश था कि रात के आठ बजते ही मेरी दोनों बहने, मेरे बड़े भाई और मैं पूजागृह में होने ही चाहिए। किसी के भी अनुपस्थित रहने पर वे उसे क्षमा नहीं करते थे। जब वे भक्तिभाव से संतों के अभंग और कबीर के दोहे गाने लगते थे, तो उस समय बड़ा गंभीर और पवित्र वातावरण निर्मित हो जाता था। हमारे पिताजी में कंठस्थीकरण की बड़ी क्षमता थी”।

बचपन से गहरे धार्मिक संस्कारों के कारण ही 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में हिन्दू धर्म त्यागने और बौद्ध धर्म की आवश्यकता के विषय में उन्होंने कहा- “मनुष्य मात्र के उत्कर्ष के लिए धर्म एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है। मुझे पता है कि कार्ल मार्क्स के अध्ययन के कारण एक पंथ का आविर्भाव हुआ है। इसके अनुसार धर्म वगैरह कुछ भी नहीं होता। उनके लिए धर्म का कोई महत्व नहीं है। उन्हें सुबह ब्रेकफास्ट मिल जाए, उसमें ब्रेड, मलाई, मक्खन, मुर्गे की टांग आदि भरपेट भोजन मिल जाए, आरामदायक नींद मिल जाए तो सब कुछ मिल गया। यह उनका तत्वज्ञान है। मैं इस विचार का नहीं हूँ। मेरे पिता निर्धन थे। इसलिए मुझे इस तरह के कोई सुख नहीं मिले। मेरे जैसे कष्टमय जीवन किसी ने भी नहीं बिताया है। इसलिए मुझे इस बात का अहसास है कि सुख-संतोष के अभाव में व्यक्ति का जीवन किस तरह कष्टप्रद हो जाता है… धर्म की आवश्यकता गरीबों को है। गरीब आदमी आशा पर ही जीता है। जीवन का मूल आशा में है। यह आशा ही यदि नष्ट हो गई तो जीवन कैसा होगा? धर्म आशावादी बनाता है। पीडि़तों और निर्धनों को संदेश देता है कि – घबराओ नहीं, जीवन आशादायी होगा”।

बाबा साहेब के अपने भाषणों, लेखन और प्रकाशन में संतों की वाणी, उनके भजनों के पदों एवं श्लोकों का बहुत उपयोग किया करते थे। परिवार में उन्हें जो धार्मिक वातावरण मिला, यह उसका प्रभाव था। बाबा साहेब ने सबसे पहला समाचारपत्र प्रकाशित किया- मूकनायक। इस समाचारपत्र के पहले पृष्ठ पर उन्होंने सबसे ऊपर तुकाराम महाराज का एक अभंग लिखा था-

“काय करू आता धरूनिया भीड़।
नि:शंक हे तोंड वाजविले।।
नव्हे जगी कोणी मुक्तियांचा जाणे।
सार्थक लाजून नव्हे हित।।”

बाबा साहेब ने ‘बहिष्कृत भारत’ नामक एक और समाचारपत्र का प्रकाशन किया। इस समाचारपत्र के प्रथम पृष्ठ पर ज्ञानेश्वरी की पंक्तियां थीं-
आता कोदंड घेऊनी हाती। आरूढ पां इये रथी।
देई आलिंगन वीरवृत्ती। समाधाने।।
अंगी कीर्ति रूढवीं। स्वधर्माचा मानु वाढवीं।
इया भारापासोंनि सोडवी। मोहिनीहे।।
आतां पार्था नि:शंकु होई। या संग्रामा चित्त देई।
एथ हे वांचूनि काही। बोलो नये।।

हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्ध धर्म अपनाने के बाद आयु के उत्तरार्ध में डॉ. बाबा साहेब ने आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म आदि ईश्वर विषयक संकल्पनाओं का त्याग कर दिया था। लेकिन ऐसा होने के बाद भी उन्हें यह अहसास होता था कि मनुष्य के जीवन को नियंत्रित करने वाली कोई न कोई अज्ञात शक्ति कहीं है। इस शक्ति पर उनका विश्वास था। धनंजय कीर ने इस बारे में एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है- “एक बार एक छोटे से शहर से गुजरते समय उनकी गाड़ी पुल से फिसली और नीचे पड़े हुए एक पत्थर के आधार के कारण नदी के पानी के ऊपर ही ऊपर लटकती रही। उनके चालक ने और उन्होंने पलक झपकते नीचे छलांग लगा दी। वे भय के मारे पत्थर की तरह अचल खड़े रहे। अपनी जान बचाने के लिए उन्होंने अदृश्य शक्ति को प्रार्थना पूर्वक धन्यवाद दिया। वापस लौटने के बाद अपने पुत्र और भतीजे को कस कर भींचते हुए बोले कि नियति के उपहार और अदृश्य शक्ति की कृपा के कारण मेरी जान बची। यह कह कर वे फूट-फूट कर रो पड़े। वे कहा करते थे कि जो यह डींग मारे कि अपने धर्म और ईश्वर पर उसका विश्वास नहीं है, उस पर मैं विश्वास नहीं कर सकता”।

बौद्ध धर्म के पुनरूज्जीवन का प्रत्यक्ष प्रचार शुरू करने के बाद किसी अदृश्य शक्ति पर अपनी इस श्रद्धा को उन्होंने सुबह-शाम गौतम बुद्ध की मूर्ति के समक्ष प्रार्थना और पूजा-अर्चना करके बुद्ध-भक्ति में विलीन कर दिया। वे भक्ति भाव से कहा करते थे- “फलां-फलां बात मेरी इच्छानुरूप हुई तो मैं गौतम बुद्ध के समझ प्रार्थना करूंगा”। कुल मिलाकर घर के वातावरण से मिले धार्मिक संस्कारों का प्रभाव बाबा साहेब के संपूर्ण जीवन में दिखाई देता है।

आलेख

लोकेन्द्र सिं
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल

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