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भारत के इतिहास से छेड़छाड़ : सत्य शोधन की आवश्यकता

काव्य मीमांसा में राजशेखर ने एक मत देते हुए कहा है कि- “इतिहास पुराणाभ्यां चक्षुर्भ्यामिव सत्कविः. विवेकांजनशुद्धाभ्यां सूक्ष्मप्यर्थमीक्षते !”अर्थात इतिहास लेखन में जितनी दक्षता और सतर्कता अपेक्षित होती है संभवतया उतनी अन्य विधाओं में प्रायः नही होती।” मेरे विचार में यह इतिहास के बारे में शत प्रतिशत सही वक्तव्य है क्योंकि अतीत और वर्तमान का किंचित त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन भविष्य की अनेक भ्रान्तियों को जनता है और यह त्रुटिपूर्ण अर्थ, पश्चातापों की आग में पीढ़ियों को झोंक कर किसी भी क्षेत्र की प्रगति और उस राष्ट्र के चरित्र के पाँव तमसावृत्त की अनन्य वीथिकाओं मे भटकने के लिए छोड़ सकते हैं।

अगर बात करें हम हमारे इतिहास के छेड़छाड़ को लेकर, तो जी हां यह बिल्कुल सही बात है कि भारत के इतिहास के साथ बहुत ज्यादा छेड़छाड़ की गई है। आजादी के पूर्व ही नही अपितु आजादी के बाद लिखे गए भारतीय इतिहास के भी कई पक्षो को अत्यधिक तरजीह दे कर न केवल एकपक्षीय लिखा गया वरन कई असल और वास्तविक तथ्यों को भूमिगत कर दिया गया जिससे हमारा इतिहास पूरी तरह किसी एक विचारधारा के इर्द गिर्द ताना बाना रचता नज़र आता है और इतना दुराग्रह पूर्ण और पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो गया कि सत्य ही धूल धूसरित हो कर रह जाता है जो कतई न्याय संगत नही कहा जा सकता है ।

इससे आजादी के बाद लगभग सात दशक तक जिस तरह से हमे हमारा इतिहास पढ़ाया गया उससे हमारी पीढियां गौरवशाली अतीत से अनभिज्ञ रह कर और स्वयं की चंद गलतियों का ढिंढोरा पीटते-पीटते गुमराह ही अधिक हुई है और इतनी हुई कि स्वयं की संस्कृति और सभ्यता को ही हीन समझने की भूल करने लगी है। अब वक्त आ गया है कि इतिहासकार निष्पक्षता से तथ्यों का अवलोकन कर पुनर्विचार करे सत्य पर से पर्दा उघाड़े और पड़ताल करें ताकि ऐतिहासिक सत्य उजागर हो सके।

आरम्भ से अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ का यह सिलसिला सर्वप्रथम 1817 में स्कॉटलैंड के अर्थशास्त्री और राजनीतिक दार्शनिक जेम्स मिल से आरम्भ होता है। जेम्स मिल ने तीन विशाल खंडों में ‘ए हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ नामक किताब लिखी थी जिसमे उन्होंने भारत के इतिहास को हिन्दू, मुसलमान और ब्रिटिश तीन कालखंडो में बांट दिया था। दरअसल मिल इस पूर्वाग्रह से ग्रसित थे कि उस वक्त का एशियाई समाज सभ्यता के मामले में यूरोप से काफी पीछे था और भारत मे अंग्रेजों के आने से पहले केवल हिन्दू अथवा मुस्लिम तानाशाहों का ही राज चलता था और यहां केवल जातिगत बन्धन, धार्मिक बैर और अंधविश्वासों का बोलबाला ही था अतः उन्होंने अपनी ऐतिहासिक पुस्तक में भारत के इतिहास को वैसा ही चित्रित किया और ब्रिटिशों को उनको सभ्य बनाने वाले उद्धारकों की तरह प्रस्तुत किया।

यानी वही तथाकथित “whiteman’s bieden theory”दी जबकि सत्य इससे उलट कुछ और ही था! आश्चर्य कि बात यह है कि कालांतर में भारत की आजादी के बाद भी जब इतिहासकारों द्वारा भारत का इतिहास लिखा गया तब भी मूलभूत रूप से इन भारतीय इतिहासकारों के द्वारा भी मिल द्वारा किये गए भारतीय इतिहास के वर्गीकरण को बिना सोचे समझे ज्यो का त्यों स्वीकार कर लिया गया या सिर्फ उनके मात्र नाम ही बदल दिए गए। क्या उनके लिए यह विचार करना जरूरी नही रह गया था कि किसी कालखण्ड का नामकरण मात्र किसी शासक की जाति या धर्म पर कितना जायज हो सकता है? क्या बहुसंख्यक जनता के इतिहास व संस्कृति एव जीवनशैली को इस नाम मे समेटा जा सकता है? माना किसी कालखंड के केंद्रीय तत्वों को पकड़ने की कोशिश होनी चाहिए किंतु क्या अतीत की एक अवधि से दूसरी अवधि के बीच के संक्रमण काल मे आए सामाजिक व राजनीतिक,आर्थिक,धार्मिक एवं सांस्कृतिक बदलावों का कोई महत्व नही होता है?

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रजा तो छोड़िए प्राचीन भारत के सारे शासकों का भी धर्म कभी एक सा नही रहा है। भारतीय संस्कृति तो इतनी महान गौरवपूर्ण व समन्वयात्मक रही है कि प्राचीन भारत मे झांक कर देखने पर ऐसे उदाहरण मिलते है कि एक ही वंश के पिता, पुत्र, शासको का धर्म भी अलग अलग रहा मिलता है। उन्होंने कभी न पुत्रो को स्वधर्म मानने को विवश किया और न ही अपनी प्रजा को अपना धर्म मानने को विवश किया है। उदाहरणार्थ चन्द्रगुप्त मौर्य जैन मतावलम्बी थे तो, बिंदुसार हिन्दू और बौद्व, और अशोक महान बौद्ध, फिर भी उनके शासन काल मे सर्वधर्म समभाव मौजूद रहे। ऐसे में इन तथाकथित इतिहासकारो द्वारा शासको के धर्म से पूरे कालखंड को तय कर औरो के जीवन और तौर तरीकों को कोई महत्व नही देना भारतीय इतिहास के साथ कैसे न्यायोचित हो सकता है? यह विचारणीय ही नही अत्यंत सोचनीय भी है।आप स्वयं विचार कीजिये।

उपनिवेशवाद के दौर में ब्रिटिश लेखकों, विद्वानों और इतिहासकारों ने हिन्दुस्तान पर अपनी हुकूमत को दीर्घकालीन रखने के लिए तथा भारत के समृद्ध आर्थिक-सामजिक तथा सांस्कृतिक ढांचे को ध्वस्त करने की साजिश के तहत व्यापक तौर पर ‘भारतीय इतिहास’ को निशाना बनाते हुए जमकर छेड़खानी की। क्योंकि वह इस बात से भलीभाँति परिचित थे कि किसी भी देश की संस्कृति और इतिहास को गरिमाहीन किये बगैर वहां के नागरिकों को अधिक दिनों तक दासत्व के बंधन में नही रखा जा सकता है उनका मनोबल गिराने ,उन्हें आत्महीनता का अनुभव करवाने हेतु उनकी संस्कृति और इतिहास को छिन्न भिन्न कर देना चाहिए और एक उद्देश्यपूर्ण नीतिगत तरीके से वही सब उन्होंने किया भी ।

किँतु चलो वह तो विदेशी थे, इससे भी अधिक हैरत वाली बात तो यह है कि आजादी के बाद भी हमारे देश के एक विशेष तबके के इतिहासकारों ने अपने निजी हितों और प्रयोजनों को दृष्टिगत रखते हुए ही इतिहास लिखा और जनता के समक्ष प्रस्तुत किया। अंग्रेजों द्वारा सुझाए गए वर्गीकरण से अलग हटकर भारतीय इतिहासकारों ने जो हमारे गौरवशाली अतीत पर भारतीय इतिहास का वर्गीकरण किया- उसमे कुछ अलग न था केवल अंग्रेजों द्वारा बांटे गए कालखण्ड के नाम मात्र बदल दिए गए यथा-‘प्राचीन’, ‘मध्यकालीन’और ‘आधुनिक काल’! वह भी ठीक नही है और वह भी पश्चिम से प्रेरित ही है क्योंकि प्राचीन काल के भारतीय ज्ञान और गौरव की समन्वय वादी सहिष्णु प्रवर्ति को ताक पर रख कर भारतीयों को इतिहास पर अज्ञान की कालिख पोत दी गई तो वहीं मध्यकालीन सामंती प्रवत्तियों के पानी पर सदैव खूंखार सुल्तानों, लुटनेवाले मंगोलो और तथाकथित महान मुगलों की आक्रामक पनडुब्बियों को डल झील में तैरते सुंदर शिकारों की तरह प्रस्तुत करने की नासमझ भूल सोचनीय ही कही जा सकती है।

इससे भी अधिक भारत का आधुनिक काल भी नाजायज ही कहा जाएगा। यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है क्योंकि पश्चिम में आधुनिक काल विज्ञान, तर्क, लोकतंत्र, मुक्ति, समानता, आर्थिक विकास, प्रगति जैसी आधुनिक शक्तियों के विकास का युग माना जाता है जबकि भारत मे यह आधुनिक काल अंग्रेजों की दासता का औपनिवेशिक साम्राज्य का दौर था जहां समानता, लोकतंत्र, मुक्ति, आर्थिक विकास और प्रगति का तो कोई नामोनिशान ही नही था जबकि शोषण,अत्याचारों का बोलबाला था और उस अंग्रेजों के काल को हम आधुनिक काल मे पढ़ते है जो किसी तरह भी जायज नही है। हमे एक पक्षीय पढाया जा रहा है।यह अंग्रेजी नीतियों का ही दुष्परिणाम है कि भारत आज भी साम्प्रदायिक ज्वाला में जल रहा है।तिस पर इतिहास के साथ हुई इसी ऐतिहासिक छेड़छाड़ के परिणामस्वरूप आज तक हम विभिन्न सामाजिक विषमताओं और बुराइयों से जूझ रहे हैं। यही नहीं, भारतवर्ष की अखंडता और एकता की जड़ें भी इसी बौद्धिक प्रहार के कारण कमजोर हुई हैं,जिसके दुष्परिणाम हम आज तक भुगत रहे है।

इतिहास अपरिवर्तनीय होता है। इतिहास का अर्थ ही होता है-‘ऐसा ही हुआ है।’ हम इतिहास से सबक लेकर वर्तमान व भविष्य संवार सकते हैं, किंतु राजनीतिक जरूरतों के अनुसार इतिहास में बदलाव नहीं कर सकते है। लेकिन दुर्भाग्य है कि भारतीय इतिहास के साथ अक्सर ऐसा ही होता रहा है। स्वतंत्रता के बाद सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने हेतु एक विशेष दरबारी इतिहासकारो का वर्ग उभरा और उन्होंने भारतीय इतिहास का विरुपण इस तरह एक पक्षीय किया कि सत्य ही विलोपित हो गया। सता पक्ष ने भी राजनीतिक जरूरतों के अनुसार अपनी सत्ता में भारतीय इतिहास के साथ खिलवाड़ किया और सम्भवतया ऐसा इसलिए सम्भव हो सका कि उस काल तक भारतीय लोगो में अपने इतिहास एव ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति उतनी गम्भीरता नही थी ,एक तरह की उदासीनता ही रही किंतु आज के सोशल मीडिया और डिजिटल युग मे जब इतिहास ही नहीं, पूरा का पूरा ज्ञान केवल किताबो तक सीमित नही रह गया । युवा पीढ़ी के हाथों में ही पूरी दुनिया आ चुकी है वहां उनसे सत्य कैसे छुप सकता है?

इतिहास घटित हुआ भूत होता है। सांस्कृतिक तत्व अनुभूत होता है। जो भूत में अपना रंगरोगन चढ़ाते हैं, भूत इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करता। आज का युवा भी इतिहास की परते उतरती जा रही भीतरी कच्ची गारे की गन्दी दीवारों को सह नही पा रहा है और कल तक जो भारतीय इतिहासकार बड़े कद्दावर नामी गिरामी हो कर पहचाने जाते थे,बड़े बड़े पद्मभूषण एव पद्मश्री से नवाजे गए, वे सभी के सभी सत्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने व भारतीय इतिहास को बिगाड़ कर पेश करने के लिए सवालिया कठघरे में खड़े है। सत्य कभी छुपता नही, वह हजार वर्षो बाद भी जमीन फाड़ कर भी बाहर आता है और डिजिटल युग मे जब सभी मूल तथ्य डिजिटल लाएब्रेरी पर उपलब्ध हो तो सत्य कैसे दबा रह सकता है?

यह कितने आश्चर्य की बात है कि दरबारी संस्तुतियां गाते भारतीय तथाकथित कद्दावर इतिहासकार भारत का इतिहास लिखते वक्त भारत की सर्व प्राचीन पांच हजार वर्ष पुरानी गौरवपूर्ण संस्कृति को दरकिनार कर मध्यकाल की दीये की टिमटिमाहट में सूरज की दीप्ति खोजने की जुगत में लगे रहे और क्रूर,हिंसक, वासना और अत्याचार से भरे मध्यकाल को महिमामण्डित करने के चक्कर मे भारत के प्राचीन गौरव सभ्यता व संस्कृति को ही पूरी निगल गए, केवल चंद पृष्ठों में समेट गए और ऐसे बेतुके प्रश्न कर गए जो किसी भी बुद्धिजीवी भारतीय के गले नही उतर सकते।

मसलन-भारत के एक नामी गिरामी इतिहासकार जिनका नाम इतिहास पढ़ने वाले अधिकांश लोग जानते हैं और जो नहीं जानते ,वो हाल के दिनों में असहिष्णुता वाले मुद्दे पर इनका नाम जान गए होंगे। इनकी एक किताब है “प्राचीन भारत का इतिहास” जिसमें बताया गया है कि महाभारत 950 ईसा पूर्व घटित हुई और रामायण 850 ईसा पूर्व । मतलब कि इनके हिसाब से पहले महाभारत हुआ और फिर रामायण! जरा विचार कीजिये कि किस प्रकार से हमारे बच्चों को एक झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है ताकि ये बच्चे अपनी ही संस्कृति और परम्पराओं के विरुद्ध खड़े हो जाएँ।

इतना ही नही वर्षो तक राम को काल्पनिक पात्र कहा गया। नासा की साइट भी एडम पूल को संभावित रामसेतु कहती हो, जिसके वंश की गौरवगाथा यत्र तत्र सर्वत्र बिखरी पड़ी हो उसके प्राथमिक स्रोत खोजने में भारतीय इतिहासकार आजादी के सत्तर वर्ष बाद भी अनभिज्ञ ही रहे, आखिर क्यों? जिस महाभारत को काल्पनिक और मिथकीय कहते रहे है उसके पुरातात्विक साक्ष्य हस्तिनापुर, हाल कुरुक्षेत्र व डूबी हुई द्वारिका में लंबे समय पहले ही खोजे जा चुके है, जिसे वे नकारते रहे है।

जिस चक्रवर्ती सम्राट चंदगुप्त मौर्य व अशोक महान ने सकल जम्बूद्वीप को एक किया, अखण्ड भारत की पहली बार स्थापना की, दीर्घ शान्ति पूर्ण शासन किया, जिस चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य व समुद्रगुप्त ने हजारों वर्ष पूर्व भारत को स्वर्ण काल दिया, उनकी योजनाएं, प्रबंधन प्रशासन व नीतियां इतिहास में पढ़ानी इतिहासकारो को उतनी महत्वपूर्ण नही लगी । हमे उनकी नीतियां नही पढ़ाई जाती, उन पर केवल प्रश्न उठाए जाते है।

अशोक महान की नीतियों को केंद्रीय तत्व का अभाव बता कर झुठला दिया जाता है और साम्राज्य के पतन का कारण घोषित कर दिया गया। जबकि क्रूर, चरित्रहीन व अत्याचारी अल्लाउद्दीन खिलजी की बाजार नीतियां, महमूद तुगलक की निष्फल योजनाएं और उसकी असफलता के कारण खोजे जाते है और उसे दूरदर्शी सुल्तान सिद्ध करने में वक्त गवाया जाता है। भारत में मनसब दारी प्रथा और बादशाह अकबर को महान बताकर इतिहास का एक दीर्घकाल मुगलो व सुल्तानों के नाम कर दिया गया। जबकि तत्कालीन सभी प्राथमिक स्रोत यह बताते है कि पूरा गुलाम वंश ,खिलजी वंश, सल्तनत काल व मुगल काल खून खराबे के मलबे से ढका पड़ा सडांध मारता कूड़ा है।

इससे भी अधिक अफसोसजनक तथ्य तो यह है कि जिन सुल्तानों व बादशाहो के कुकर्मों ने भारतीयों की संस्कृति, परम्परा, सभ्यता का विनाश किया, हवस का शिकार बनाया, भारत को लूटा वे आदर्श हीरो बना दिये गए और जो भारत के असल हीरो थे, वे भारतीय इतिहास के चंद पन्नो में ही सिमट कर रह गए। मध्यकाल की स्वर्णिम एतिहासिक इमारत जिस मलबे पर खड़ी की गई है यदि उसे कुरेद कर देखा जाए तो मंजर हिरोशिमा और नागासाकी से भी अधिक भयावह दिखेगा क्योंकि वहां तो सब कुछ एक ही बार मे निबट गया था किन्तु भारतीय मध्यकालीन इतिहास के इस मलबे के ढेर में तो वर्षो-वर्षो का सडांधयुक्त लूटमार खूनखराबा, बर्बादी दबी पड़ी है।

यदि विश्वास नहीं हो तो उसी काल के लिखे हुए प्राथमिक ग्रँथों को उठा कर पढ़ लीजिये वहां सारे सविस्तार ब्यौरे मिल जाएंगे फिर चाहे वह इब्नबतूता हो, मिनहाज सिराज हो, बरनी हो, बदायुनी हो या फिर अबुल फजल! ऐसे दो दर्जन से अधिक साक्ष्यों में पड़ा सडांध मारता कचरा आखिर इन तथाकथित महान इतिहासकारो को क्यो नज़र नही आया? क्यो अधूरा सच सत्तर वर्ष तक भारतीय जनमानस पर जबरन थोपा गया? क्या किसी देश के इतिहास से ऐसी छेड़खानी सहन हो सकती है? होनी चाहिए? क्यों भारतीयों को यह गर्व करने से रोका गया कि उनकी मूलभूत संस्कृति कितनी प्राचीन अविरल और विराट रही है, वीरतापूर्ण रही है कि सम्पूर्ण जम्बूद्वीप उसका संस्करण रहा है!

मतलब, राजनीतिक रूप से भले ही इतने बड़े भारत में हजारो राजाओ ने राज किया होंगा, मगर उनकी सांस्कृतिक पहचान एक ही थी। वह ‘कल्चरल कवर’ पूरे विस्तार में भारत का एक शानदार आवरण था, जिसके रहते उनके परस्पर आपसी राजनीतिक संघर्ष में भी भारत की संस्कृति चारों तरफ एक जैसी ही फलती-फूलती रही थी। यह महत्वपूर्ण बात थी, जिसे आजाद भारत के इतिहास लेखकों ने बिल्कुल ही नजरअंदाज कर दी। क्या यह अनेदखी अनायास थी या फिर जानबूझकर की गई थी? क्या यह जानना हर भारतीय बच्चे का हक नही है? जिंदा अंगारो में जलती रही नारियां, सतीत्व की रक्षा हेतु जोहर करती रही नारियां और अल्लाउद्दीन खिलजी जैसे नरभक्षी भेड़िए फिर भी चीरते रहे, हमें पढ़ाया गया कि वे बहुत साहसी लड़ाके और वीर थे, तो फिर हसंते हंसते केसरिया करने वाले वे आत्मसम्मानी वीर राजपूत कौन थे?

जो नरभक्षी थे जिन्होंने तलवार के बल पर राजनीति की, जबरन संबंध गांठे, हमें पढ़ाया गया वे मुगल अकबर महान सम्पूर्ण हिंदुस्तान के सर्वविदित बादशाह हो गए, तो फिर जीवन भर मातृभूमि के लिए सब कुछ त्याग देने वाले वे महाराणा प्रताप और राव चंद्रसेन कौन थे? इस सम्बंध में मध्यप्रदेश के राज्य सूचना आयुक्त विजय मनोहर तिवारी ने ऐसे तथाकथित कद्दावर वामपंथी इतिहासकारों को एक चिट्ठी लिखी है जो उल्लेखनीय है। इस लंबी चिट्‌ठी में उन्होंने मध्यकाल के इतिहास को ले कर सही ही लिखा है–“अगर भारत के इतिहास को एक किक्रेट मैच के नज़रिए से देखा जाए तो पचास ओवर के टेस्ट मैच में सल्तनत और मुगल काल आखिरी ओवर की गेंदों से ज़्यादा हैसियत नहीं रखते। लेकिन इतिहास की कोर्स की किताबों में इन खिलाड़ियों को पूरे ‘मैच का मैन ऑफ द मैच’ बना दिया गया है। अगर मैच जिताने लायक ऐसा कुछ बेहतरीन होता भी तो कोई समस्या या आपत्ति नहीं थी।”

बात यही खत्म नही हो जाती है। तीसरा ऐतिहासिक काल स्वतंत्रता संग्राम का है, वह भी न्यायोचित नही लिखा गया। एक पूरा का पूरा युग गांधी और नेहरू के नाम कर दिया गया है। यह बात सत्य है कि गांधी और नेहरू के त्याग को हम कभी अनदेखा नही कर सकते किंतु भारतीय स्वतंत्रता पूरी एक पैकेजिंग की तरह थी जिसमे असंख्य अनगिनत भिज्ञ अनभिज्ञ लोगों का योगदान रहा जिनमे कइयों का तो हम नाम तक आज भी नही जानते हैं। सड़ती रही लाशें सड़कों पर, गांधी फिर भी मौन रहे! हमें पढ़ाया गया वर्षो तक कि गांधी के चरखे से आजादी आई, तो आजादी के लिए फांसी चढ़ने वाले वे 25-25 साल के नौजवान कौन थे ?

वो रस्सी आज भी संग्रहालय में मौजूद है जिसे गांधी जी अपनी बकरियां बांधा करते थे किंतु वह रस्सियां कहा गई जिससे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु हंसते-हंसते फांसी झूल गए थे? जाने कितने झूले होंगे फांसी पर, कितनों ने लाठियां, गोलियां खाई थी, कितनी सुहागनों ने अपनी चूड़ियां गवाई तो कितनी बहनों ने अपनी राखियां लुटाई थी,क्या यह अर्ध सत्य नही है कि केवल अहिंसा, उपवास और चरखे से ही आजादी आई थी? गांधी ने दांडी मार्च किया सारा भारत जाना वही दांडी मार्च दक्षिण में राजगोपालाचारी ने किया तो इतिहास में उनके दांडी मार्च का नाम तक नही आया? आजादी की पहली मांग लाहौर अदिवेशन में नेहरू ने रखी, बच्चा बच्चा पढ़ता है पर विदेश जा कर अपने देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सुभाष चन्द्र बोस ने विदेशी धरती पर भारत की पहली अन्तरिम सरकार बनाने की जो हिम्मत दिखाई उसे आज भी भारतीय इतिहास में पूरा न्याय नही पाता है?

सर सैयद अहमद खान आजादी की लड़ाई में शिक्षाविद,समाज-सुधारक हो गए पर जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम- विश्वविद्यालय हेतु भूमिदान किया वह स्वतंत्रता- सेनानी राजा महेन्द्रप्रताप सिंह इतिहास में गुमनाम ही रह गए? स्वाधीनता संग्राम में सभी विचारधाराओं के लोग सम्मिलित थे। राष्ट्रवादी थे, क्रांतिकारी थे, सोशलिस्ट थे, उदारवादी भी थे, कई साधु थे, बच्चे थे, महिलाएं थी, पुरुष थे, सबके अपने विचार थे। सबका समवेत स्वर हमारी स्वतंत्रता थी। मगर हमे इतिहास की पचहत्तर वर्षो से बस एक पक्षीय ही पढाया जा रहा है। यदि मात्र सत्य इतना ही है तो क्या बाकियों का त्याग और बलिदान व्यर्थ था?

इसके अलावा हमे यह नही भूलना चाहिए जो प्रायः आज इतिहास की किताबो में नदारद अथवा गौण कर दिया गया है कि भारत की आजादी के लिए जितनी शिद्दत से वन्देमातरम कहते हुए भगतसिंह और आजाद फांसी पर चढ़े थे उतने ही शिद्दत से अशफाक उल्ला खां और रामप्रसाद बिस्मिल ने भी सरफरोशी के गीत गाते हंसी खुशी भारत माँ पर जान लुटाई थी। जितना दंश विभाजन का हिन्दू जनता ने झेला था, उतना ही मुस्लिमों ने भी झेला था। आजादी पाने का जुनून भी दोनों में एक सा था और विभाजन का दर्द भी एकसा था, बस फायदा तो विभाजनकारी ताकते उठा गई थी, किंतु इसे इतिहास में कहीं भी उस ढंग से चित्रित ही नही किया गया है।

इसके अलावा कश्मीर और उत्तर पूर्व भारत का इतिहास तो भारतीय इतिहास से बिल्कुल ही गायब है। जो अहोम साम्राज्य भारत की शान था वह कहीं पढ़ने को नही मिलता है। दक्षिण के महान चोल, पल्लव और राष्ट्रकूट के वृहतर योगदान को बिल्कुल ही भूला दिया गया है जिन्होंने वृहत्तर भारत का अपूर्व निर्माण किया। हम्पी और विजयनगर के खंडहर आज भी भारत और यहा की संस्कृति की गौरवगाथा गाते नही अघाते किंतु इतिहास की किताबो में अकबर, बाबर जितनी जगह भी नही पाते है,क्यो?

हम अपने पिछले एक हजार वर्षों के इतिहास का ही यदि अध्ययन करें तो पाएंगे कि इस दौरान हमारे अनेको पुस्तकालय जला दिए गए। हमारे विश्व विद्यालय खाक में मिला दिए गए और हमारे मंदिर तोड़ दिए गए, हमारे प्राचीन ग्रँथों के साथ छेड़खानी की गई। क्यों? इसलिए कि हम भारतीय अपने असली इतिहास को भूल जाएं। हमारे से मतलब सिर्फ हिन्दू नहीं संपूर्ण भारतीय समाज से है। इन तथाकथित वामपंथी इतिहासकारों ने सौहार्द का माहौल बिगाड़ने का ही काम किया।

इतिहास का विरूपण एक गंभीर अपराध है। पुरातत्व और प्राचीन साहित्य, इतिहास की दो आंखे होती हैं। साहित्य संकेत देता है और राष्ट्र के इतिहास को जानने हेतु प्रेरित करता है और पुरातत्व साक्ष्य देता है। आज नई टेक्नालॉजी ने तो कमाल ही कर दिया है अब हम सिर्फ किताबी ज्ञान पर निर्भर नही है। आज की युवा पीढी इंटरनेट के फोर-जी जनरेशन अपने आईफोन पर आज सब कुछ देख सकती है और पढ़ सकती है। दुनिया की किसी भी लाइब्रेरी की किसी भी भाषा और उसके अपने अनुकूल अनुवाद में हर मूल दस्तावेज हाथों पर मौजूद है।

ऐसे में नई भारतीय पीढ़ी का युवा अपने देश का वास्तविक इतिहास जानना चाहता है, उसकी रुचि इस तरफ बढ़ी है चाहे वह किसी भी विषय का छात्र हो अब अपने देश के इतिहास के प्रति उसका रुझान भी है और प्रज्ञावान भी है इसिलए अब एक बार सभी प्राथमिक स्रोतों पर पुनर्विचार करते हुए बिल्कुल निष्पक्ष बिना लाग लपेट वाला ऐतिहासिक सत्य उजागर होने के प्रयास किये जा रहे है किंतु इन प्रयासों का भी वही दरबारी इतिहासकारो की लॉबी विरोध कर रही है। किंतु सत्य आखिर सत्य है,वह न तो अधिक समय तक छुप सकता है और न ही पराजित हो सकता है, वह तो मुखर हो कर ही रहता है। अतीत के पन्नो से बाहर झांकता सत्य बाहर आने को आतुर है, पुनर्विचार जरूरी है। भारतीय इतिहास का सत्य भी अब अंधेरे की काल कोठरी से उजलाई की ओर उन्मुख हो चुका है, यह एक अच्छी शुरुआत है, आखिर पचहत्तर वर्ष बाद ही सही किन्तु भारत के अतीत लेखन पर पुनर्विचार आवश्यक है ताकि आने वाली पीढ़ियों तक पूरा सच पहुंच सके।

आलेख

डॉ नीता चौबीसा,
लेखिका, इतिहासकार एवं भारतविद, बाँसवाड़ा,राजस्थान

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