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Tag Archives: डॉ पी सी लाल यादव

लोक जीवन की शक्ति, लोक पर्व अक्ति

हमारा भारत का देश गाँवों का देश है। गाँव की गौरव गरिमा लोक परम्पराएं तीज त्यौहार, आचार विचार आज भी लोक जीवन के लिए उर्जा के स्रोत हैं। गाँव की संस्कृति लोक संस्कृति कहलाती है। जनपदों लोकांचलों में विभक्त ये गाँव अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को सांसों में बसाए हुए हैं। …

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पंडवानी के सूत्रधार श्रीकृष्ण

भारतीय लोक जीवन सदैव से ईश्वर और धर्म के प्रति आस्थावान रहा है। निराभिमान और निश्च्छल जीवन लोक की विशेषता है। फलस्वरूप उसका जीवन स्तर सीधा-सादा और निस्पृह होता है। उसकी निस्पृता और उसकी सादगी लोक धर्म की विशिष्टता है। धर्म और ईश्वर के प्रति अनुरक्ति और उसकी भक्ति लोक …

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कुँवर अछरिया की लोक गाथा एवं पुरातात्विक महत्व

लोक साहित्य वाचिका परम्परा के माध्यम से एक कंठ से दूसरे कंठ में रच-बस कर अपने स्वरूप को विस्तार देता है। फिर व्यापकरूप में लोक को प्रभावित कर लोक का हो जाता है। यही लोक साहित्य कहलाता है। लोक साहित्य में लोक कथा, लोकगीत, लोकगाथा, लोकनाट्य, लोकोक्तियाँ और लोक पहेलियाँ, …

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छत्तीसगढ़ी बालमन की मनोरंजक तुकबंदियाँ

बालमन बड़ा स्वतंत्र होता है। उसे बंधन जरा भी स्वीकार नहीं। बंधन में रहकर बालमन कुम्हलाने लगता है। जैसे कलियों को खिलने के लिए सूरज का प्रकाश चाहिए, उसी प्रकार बालमन को खिलने के लिए बंधन मुक्त होना चाहिए। बालकपन खेल प्रिय होता है। खेल-खेल में वह नए सृजन भी …

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छत्तीसगढ़ के लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ

लोक गीत लोक जीवन के अन्तर्मन की अतल गहराइयों से उपजी भावानुभूति है। इसलिए लोकगीतों में लोक समाज का क्रिया-व्यापार, जय-पराजय, हर्ष-विषाद उत्थान-पतन, सुख-दुख सब समाहित रहता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि “ये गीत प्रकृति के उद्गम और आर्येत्तर के वेद है।” उक्त कथन लोक गीत की …

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दे दे बुलौआ राधे को नगर में : होली फाग गीतों के संग

प्रकृति मनुष्य को सहचरी है, यह सर्वविदित है। किन्तु मनुष्य प्रकृति का कितना सहचर है? यह प्रश्न हमें निरूत्तर कर देता है। हम सोचने के लिए विवश हो जाते हैं कि सचमुच प्रकृति जिस तरह से अपने दायित्वों का निर्वाह कर रही हैं? क्या मनुष्य प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों …

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लोक का सांस्कृतिक उत्सव: मड़ई

लोक बड़ा उदार होता है। यह उदारता उसके संस्कारों में समाहित रहती है तथा यह उदारता आचार-विचार, रहन-सहन, क्रिया-व्यवहार व तीज-त्यौहार में झलकती है। जो आगे चलकर लोक संस्कृति के रूप में अपनी विराटता को प्रकट करती है। यह विराटता लोक संस्कृतिक उत्सवों में स्पष्ट दिखाई पड़ती है। छत्तीसगढ़ में …

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छत्तीसगढ़ी लोक शिल्प : कारीगरी

भारतीय संस्कृति की प्रवृति बड़ी उदात्त है। वह अपने संसर्ग में आने वाले तत्वों का बड़ी उदारता के साथ अपने आप में समाहित कर लेती है। संस्कृति का यही गुण भी है। जो सबको अपना समझता है, वह सबका हो जाता है। हमारी संस्कृति इसी गुण के कारण विश्व में …

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छेरिक छेरा छेर बरकतीन छेरछेरा : लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी

जीवन में दान का बड़ा महत्व है। चाहे विद्या दान हो या अन्न दान, धनराशि दान हो या पशु दान स्वर्ण या रजत दान। चारों युगों में दान की महिमा का गान हुआ है। दान दाता की शक्ति पर यह निर्भर करता है। दान के संबंध में ये उक्तियाँ लोक …

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प्राचीन इतिहास की साक्षी घटियारी

छत्तीसगढ़ की धरती पुरातात्विक धरोहरों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहां पुरातात्विक महत्व के अनेक केन्द्र हैं। जिन पुरातात्विक स्थानों पर पुरातत्ववेत्ताओं का ध्यान अधिक आकृष्ट हुआ, जिनको ज्यादा प्रचार-प्रसार मिला वे स्थान लोगों की नजरों में आये और गौरव के केन्द्र बने। जिन पर लोगों का ध्यान नहीं …

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