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Tag Archives: घनाराम साहू

आराध्या भक्त शिरोमणी माता कर्मा

भक्त माता कर्मा जयंती चैत्र मास कृष्ण पक्ष एकादशी के दिन मनाई जाती है जिसे पापमोचनी एकादशी भी कहा जाता है । छत्तीसगढ़ में इस परंपरा की शुरुआत साहू समाज द्वारा सन 1974 में रायपुर से की गई थी । बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश के किसी सामाजिक पत्रिका …

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राजिम मेला : ऐतिहासिक महत्व एवं संदर्भ

ग्रामीण भारत के सामाजिक जीवन में मेला-मड़ई, संत-समागम का विशेष स्थान रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व जब कृषि और ग्रामीण विकास नहीं हुआ था तब किसान वर्षा ऋतु में कृषि कार्य प्रारम्भ कर बसंत ऋतु के पूर्व समाप्त कर लेते थे। इस दोनों ऋतुओं के बीच के 4 माह में …

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छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम 1857 से पूर्व प्रारंभ हुआ : विशेष आलेख

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़वासियों की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। वर्तमान छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम 1857 से पूर्व प्रारम्भ हो चुका था, तत्कालीन समय में यह जमींदारी क्षेत्र था तथा कलचुरियों, मराठों एवं अंग्रेजों के अधीन रहा। कभी मराठों से स्वतंत्रता पाने के लिए यहाँ …

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क्रांति दिवस 30 सितम्बर : सलिहागढ़

सन 1930 के जनक्रांति “जंगल सत्याग्रह” का केंद्र बिंदु रहा सलिहागढ़, छत्तीसगढ़-ओडिशा सीमा क्षेत्र में जोंक नदी के तट पर बसे नगर पंचायत खरियाररोड के दक्षिण-पूर्व दिशा में लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह क़स्बा अब ओडिशा के नुआपाड़ा जिला के अंतर्गत है जो पूर्व में महासमुंद …

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तीजा तिहार का ऐतिहासिक-सामाजिक अनुशीलन

लोक परम्पराएं गौरवशाली इतिहास की पावन स्मृतियाँ होती हैं, जो काल सापेक्ष भी हैं। वर्तमान छत्तीसगढ़ विविधताओं से परिपूर्ण भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का संगम क्षेत्र रहा है इसलिए यहाँ की परम्पराओं में चहूँ ओर की छाप दिखाई देती है। वैष्णव परंपरा में वर्षा ऋतु (आषाढ़, सावन, भादो, कुंआर) को …

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कबीर पंथ एवं गुरु गद्दी परम्परा : छत्तीसगढ़

संत कबीर मध्यबिंदु के सन्देश वाहक थे क्योंकि प्रवृति एवं निवृति मार्ग के मध्यबिंदु को समाज जीवन में श्रेष्ठ माना जाता है।| छत्तीसगढ़ भौगोलिक कारणों से प्राचीनकाल से संस्कृति संगम का क्षेत्र रहा है। भारत के मध्य में होने के कारण चारों दिशाओं की सभ्यताओं का आगमन इस क्षेत्र में …

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भगवान राजीव लोचन एवं भक्तिन राजिम माता : विशेष आलेख

राजिम दक्षिण कोसल का सबसे बड़ा सनातन तीर्थस्थल के रूप में चिन्हित रहा है क्योंकि यह नगर तीन नदियों उत्पलेश्वर (चित्रोत्पला) (सिहावा से राजिम तक महानदी) प्रेतोद्धारिणी (पैरी) एवं सुन्दराभूति (सोंधुर) के तट पर बसा है। प्रेतोद्धारिणी की महत्ता महाभारत काल से पितृकर्म के लिए प्रतिष्ठित, चिन्हित रही है जिसका …

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