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रामायण साहित्यों में विज्ञान 

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ राम की पुरातन एवं सनातन ऐतिहासिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना भी हो जाएगी। अब विभिन्न रामायणों में दर्ज उस विज्ञान की वैज्ञानिकताओं को भी मान्यता देने की आवश्यकता है, जिन्हें वामपंथी पूर्वाग्रहों के चलते वैज्ञानिक एवं बुद्धिजीवी न केवल नकारते रहे हैं, बल्कि इनकी ऐतिहासिकता को भी कपोल-कल्पित कहकर उपहास उड़ाते रहे हैं। अतएव यह समय प्राचीन भारतीय विज्ञान के पुनरुत्थान का समय भी है।  

क्योंकि रामायण और महाभारत कथाएं नाना लोक स्मृतियों और विविध आयामों में प्रचलित बनी रहकर वर्तमान हैं। इनका विस्तार भी सार्वभौमिक है। विश्व के वामपंथी विचारधारा से प्रेरित बुद्धिजीवियों का भी एक वर्ग तरह-तरह के कुतर्क गढ़ कर इस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत को मिथक कहकर नकारने की कोशिश करता रहा है। लेकिन देश-दुनिया के जनमानस में राम-कृष्ण की जो मूर्त-अमूर्त छवि बनी हुई है, उसे गढ़े गए तर्कों-कुतर्कों से कभी खंडित नहीं किया जा सका। शायद इसीलिए भवभूति और कालिदास ने रामायण को इतिहास बताया। वाल्मीकि रामायण और उसके समकालीन ग्रंथों में ‘इतिहास’ को ‘पुरावृत्त’ कहा गया है। गोया, कालिदास के ‘रघुवंश’ में विश्वामित्र राम को पुरावृत्त सुनाते हैं। मार्क्सवादी चिन्तक डॉ. रामविलास शर्मा ने रामायण को महाकाव्यात्मक इतिहास की श्रेणी में रखा है। जबकि इन ग्रंथों में विज्ञानसम्मत अनेक ऐसे सूत्र व स्रोत विद्यमान हैं, जिनके माध्यम से नए आविष्कार की दिशा में बढ़ा जा सकता है। हम इन्हें क्यों नहीं संकलित कर पाठ्यक्रमों में शामिल करते? ऐसा करने से मेधावी छात्रों में विज्ञान सम्मत महत्त्वाकांक्षा जगा सकते हैं और भारतीय जीवन-मूल्यों के इन आधार ग्रंथों से मिथकीय आध्यात्मिकता की धूल झाड़ने का काम भी कर सकते हैं।

इतिहास तथ्य और घटनाओं के साथ मानव की विकास यात्रा की खोज भी है। यह तय है कि मानव, अपने विकास के अनुक्रम में ही वैज्ञानिक अनुसंधानों से सायास-अनायास जुड़ता रहा है। ये वैज्ञानिक उपलब्धियां या आविष्कार रामायण, महाभारतकाल में उसी तरह चरमोत्कर्ष पर थीं, जिस तरह ऋग्वेद के लेखन-संपादन काल के समय संस्कृत भाषायी विकास के शिखर पर थी। रामायण का शब्दार्थ भी राम का ‘अयण’ अर्थात ‘भ्रमण’ से है। वे तीन सौ रामायण और अनेक रामायण विषयक संदर्भ ग्रंथ, जिनके प्रभाव को नकारने के लिए पाउला रिचमैन ने 1942 में ‘मैनी रामायणस द डाइवर्सिटी ऑफ ए नैरेटिव ट्रेडिशन इन साउथ एशिया’ लिखी और ए. के. रामानुजन ने ‘थ्री हंड्रेड रामायण फाइव एग्जांपल एंड थ्री थॉट्स ऑन ट्रांसलेशन’ निबंध लिखकर कामजन्य विद्रूप अंशों का संकलन किया। इन्हीं रामायणों, रामायण विषयक संदर्भ ग्रंथों और मदन मोहन शर्मा शाही के बृहद् उपन्यास से  विज्ञान सम्मत आविष्कारों की पड़ताल की जा सकती है।     रामायण एकांगी दृष्टिकोण का वृत्तान्त भर नहीं है। इसमें कौटुम्बिक सांसारिकता है। राज-समाज संचालन के कूट मंत्र हैं। भूगोल है। वनस्पति और जीव जगत है। राष्ट्रीयता है। राष्ट्र के प्रति उत्सर्ग का चरम है। अस्त्र और शस्त्र हैं। यौद्धिक कौशल के गुण हैं। भौतिकवाद है। कणांद का परमाणुवाद है। सांख्यदर्शन और योग के सूत्र हैं। वेदांत दर्शन है और अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियां हैं। गांधी का राम-राज्य और पं. दीनदयाल उपाध्याय के आध्यात्मिक भौतिकवाद के उत्स इन्हीं रामायणों में हैं। वास्तव में रामायण और उसके परवर्ती ग्रंथ कवि या लेखक की कपोल-कल्पना न होकर तात्कालीन ज्ञान के विश्वकोश हैं। जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने तो ऋग्वेद को कहा भी था कि यह अपने युग का ‘विश्व कोश’ है। मसलन ‘एन-साइक्लोपीडिया ऑफ वर्ल्ड’!

लंकाधीश रावण ने नाना प्रकार की विधाओं के पल्लवन की दृष्टि से यथोचित धन व सुविधाएं उपलब्ध कराई थीं। रावण के पास लडाकू वायुयानों और समुद्री जलपोतों के बड़े भण्डार थे। प्रक्षेपास्त्र और ब्रह्मास्त्रों का अकूत भण्डार व उनके निर्माण में लगी अनेक वेधशालाएं थीं। दूरसंचार व दूरदर्शन की तकनीकी-यंत्र लंका में स्थापित थे। राम-रावण युद्ध केवल राम और रावण के बीच न होकर एक विश्वयुद्ध था। जिसमें उस समय की समस्त विश्व-शक्तियों ने अपने-अपने मित्र देश के लिए लड़ाई लड़ी थी। परिणामस्वरूप ब्रह्मास्त्रों के विकट प्रयोग से लगभग समस्त वैज्ञानिक अनुसंधान-शालाएं उनके आविष्कारक, वैज्ञानिक व अध्येता काल-कवलित हो गए। यही कारण है कि हम कालांतर में हुए महाभारत युद्ध में भी वैज्ञानिक चमत्कारों को रामायण की तुलना में उत्कृष्ट व सक्षम नहीं पाते हैं। यह भी इतना विकराल विश्व-युद्ध था कि रामायण काल से शेष बचा जो विज्ञान था, वह महाभारत युद्ध के विंध्वस की लपेट में आकर नष्ट हो गया। इसीलिए महाभारत के बाद के जितने भी युद्ध हैं, वे खतरनाक अस्त्र-शस्त्रों से न लड़े जाकर, थल सेना के माध्यम से ही लड़े गए दिखाई देते हैं। बीसवीं सदी में हुए द्वितीय विश्व युद्ध में जरूर हवाई हमले के माध्यम से अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा-नागाशाकी में परमाणु हमले किए।

वाल्मीकि रामायण एवं नाना रामायणों तथा अन्य ग्रंथों में ‘पुष्पक विमान’ के उपयोग के विवरण हैं। इससे स्पष्ट होता है, उस युग में राक्षस व देवता न केवल विमान शास्त्र के ज्ञाता थे, बल्कि सुविधायुक्त आकाशगामी साधनों के रूप में वाहन उपलब्ध भी थे। रामायण के अनुसार पुष्पक विमान के निर्माता ब्रह्मा थे। ब्रह्मा ने यह विमान कुबेर को भेंट किया था। कुबेर से इसे रावण ने छीन लिया। रावण की मृत्यु के बाद विभीषण इसका अधिपति बना और उसने फिर से इसे कुबेर को दे दिया। कुबेर ने इसे राम को उपहार में दे दिया। राम लंका विजय के बाद अयोध्या इसी विमान से पहुंचे थे।

रामायण में दर्ज उल्लेख के अनुसार पुष्पक विमान मोर जैसी आकृति का आकाशचारी विमान था, जो अग्नि-वायु की समन्वयी ऊर्जा से चलता था। इसकी गति तीव्र थी और चालक की इच्छानुसार इसे किसी भी दिशा में गतिशील रखा जा सकता था। इसे छोटा-बड़ा भी किया जा सकता था। यह सभी ऋतुओं में आरामदायक यानी वतानुकूलित था। इसमें स्वर्ण खंभ, मणिनिर्मित दरवाजे, मणि-स्वर्णमय सीढियां, वेदियां (आसन) गुप्त गृह, अट्टालिकाएं (केबिन) तथा नीलम से निर्मित सिंहासन (कुर्सियां) थे। अनेक प्रकार के चित्र एवं जालियों से यह सुसज्जित था। यह दिन और रात दोनों समय गतिमान रहने में समर्थ था। इस विवरण से जाहिर होता है, यह उन्नत प्रौद्योगिकी और वास्तु कला का अनूठा नमूना था।

‘ऋग्वेद’ में भी चार तरह के विमानों का उल्लेख है। जिन्हें आर्य-अनार्य उपयोग में लाते थे। इन चार वायुयानों को शकुन, त्रिपुर, सुन्दर और रुक्म नामों से जाना जाता था। ये अश्वहीन, चालक रहित , तीव्रगामी और धूल के बादल उड़ाते हुए आकाश में उड़ते थे। इनकी गति पतंग (पक्षी) की भांति, क्षमता तीन दिन-रात लगातार उड़ते रहने की और आकृति नौका जैसी थी। त्रिपुर विमान तो तीन खण्डों (तल्लों) वाला था तथा जल, थल एवं नभ तीनों में विचरण कर सकता था। रामायण में ही वर्णित हनुमान की आकाश-यात्राएं, महाभारत में देवराज इन्द्र का दिव्य-रथ, कात्र्तवीर्य अर्जुन का स्वर्ण विमान एवं सोम-विमान, पुराणों में वर्णित नारदादि की आकाश यात्राएं एवं विभिन्न देवी-देवताओं के आकाशगामी वाहन रामायण-महाभारत काल में वायुयान और हैलीकॉप्टर जैसे यांत्रिक साधनों की उपलब्धि के प्रमाण हैं।

किंवदंती तो यह भी है कि गौतम बुद्ध ने भी वायुयान द्वारा तीन बार लंका की यात्रा की थी। एरिक फॉन डॉनिकेन की किताब ‘चैरियट्स ऑफ गॉड्स’ में तो भारत समेत कई प्राचीन देशों से प्रमाण एकत्रित करके वायुयानों की तत्कालीन उपस्थिति की पुष्टि की गई है। इसी प्रकार डॉ. ओंकारनाथ श्रीवास्तव ने अनेक पाश्चात्य अनुसंधानों के मतों के आधार पर संभावना जताई है कि ‘रामायण’ में अंकित हनुमान की यात्राएं वायुयान अथवा हैलीकॉप्टर की यात्राएं थीं या हनुमान ‘राकेट बेल्ट’ बांधकर आकाशगमन करते थे, जैसाकि आज के अंतरिक्ष-यात्री करते हैं। हनुमान-मेघनाद में परस्पर हुआ वायु-युद्ध भी हावरक्रफ्ट से मिलता-जुलता है। आज भी लंका की पहाड़ियों पर चैरस मैदान पाए जाते हैं, जो शायद उस कालखण्ड के वैमानिक अड्डे थे। प्राचीन देशों के ग्रंथों में वर्णित उड़ान-यंत्रों के वर्णन लगभग एक जैसे हैं। कुछ गुफा-चित्रों में आकाशचारी मानव एवं अंतरिक्ष वेशभूषा से युक्त व्याक्तियों के चित्र भी निर्मित हैं। मिस्र में तो दुनिया का ऐसा नक्शा मिला है, जिसका निर्माण आकाश में उड़ान-सुविधा की पुष्टि करता है। इन सब साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि पुष्पक व अन्य विमानों के रामायण में वर्णन कोई कवि-कल्पना की कोरी उड़ान नहीं हैं।

ताजा वैज्ञानिक अनुसंधानों ने भी तय किया है कि रामायण काल में वैमानिकी प्रौद्योगिकी इतनी अधिक विकसित थी, जिसे आज समझ पाना भी कठिन है। रावण का ससुर मयासुर अथवा मयदानव ने भगवान विश्वकर्मा (ब्रह्मा) से वैमानिकी विद्या सीखी और पुष्पक विमान बनाया। जिसे कुबेर ने प्राप्त कर लिया। पुष्पक विमान की प्रौद्योगिक का विस्तृत व्यौरा महार्षि भारद्वाज द्वारा लिखित पुस्तक ‘यंत्र-सर्वेश्वम्’ में भी किया गया था। वर्तमान में यह पुस्तक विलुप्त हो चुकी है, लेकिन इसके 40 अध्यायों में से एक अध्याय ‘वैमानिक शास्त्र’ अभी उपलब्ध है। इसमें भी शकुन, सुन्दर, त्रिपुर एवं रुक्म विमान सहित 25 तरह के विमानों का विवरण है। इसी पुस्तक में वर्णित कुछ शब्द जैसे ‘विश्व क्रिया दर्पण’ आज के राड़ार जैसे यंत्र की कार्यप्रणाली का रूपक है।

नए शोधों से पता चला है कि पुष्पक विमान एक ऐसा चमत्कारिक यात्री विमान था, जिसमें चाहे जितने भी यात्री सवार हो जाएं, एक कुर्सी हमेशा रिक्त रहती थी। यही नहीं यह विमान यात्रियों की संख्या और वायु के घनत्व के हिसाब से स्वमेव अपना आकार छोटा या बड़ा कर सकता था। इस तथ्य के पीछे वैज्ञानिकों का यह तर्क है कि वर्तमान समय में हम पदार्थ को जड़ मानते हैं, लेकिन हम पदार्थ की चेतना को जागृत करलें तो उसमें भी संवेदना सृजित हो सकती है और वह वातावरण व परिस्थितियों के अनुरूप अपने आपको ढालने में सक्षम हो सकता है। रामायण काल में विज्ञान ने पदार्थ की इस चेतना को संभवतः जागृत कर लिया था, इसी कारण पुष्पक विमान स्व-संवेदना से क्रियाशील होकर आवश्यकता के अनुसार आकार परिवर्तित कर लेने की विलक्षणता रखता था। तकनीकी दृष्टि से पुष्पक में इतनी खूबियां थीं, जो वर्तमान विमानों में नहीं हैं। ताजा शोधों से पता चला है कि यदि उस युग का पुष्पक या अन्य विमान आज आकाश गमन कर लें तो उनके विद्युत चुंबकीय प्रभाव से मौजूदा विद्युत व संचार जैसी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाएंगी। पुष्पक विमान के बारे में यह भी पता चला है कि वह उसी व्यक्ति से संचालित होता था, जिसने विमान संचालन से संबंधित मंत्र सिद्ध किया हो, मसलन जिसके हाथ में विमान को संचालित करने वाला रिमोट हो। शोधकर्ता भी इसे कंपन तकनीक (वाइब्रेशन टेकनोलॉजी) से जोड़ कर देख रहे हैं। पुष्पक की एक विलक्षणता यह भी थी कि वह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक ही उड़ान नहीं भरता था, बल्कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक आवागमन में भी सक्षम था। यानी यह अंतरिक्षयान की क्षमताओं से भी युक्त था।

रामायण एवं अन्य राम-रावण लीला विषयक ग्रंथों में विमानों की केवल उपस्थिति एवं उनके उपयोग का विवरण है, इस कारण कथित इतिहासज्ञ इस पूरे युग को कपोल-कल्पना कहकर नकारने का साहस कर डालते हैं। लेकिन विमानों के निर्माण, इनके प्रकार और इनके संचालन का संपूर्ण विवरण महार्षि भारद्वाज लिखित ‘वैमानिक शास्त्र’ में है। यह ग्रंथ उनके प्रमुख ग्रंथ ‘यंत्र-सर्वेश्वम्’ का एक भाग है। इसके अतिरक्त भारद्वाज ने ‘अंशु-बोधिनी’ नामक ग्रंथ भी लिखा है, जिसमें ‘ब्रह्मांड विज्ञान’ (कॉस्मोलॉजी) का वर्णन है। इसी ज्ञान से निर्मित व परिचालित होने के कारण विमान विभिन्न ग्रहों की उड़ान भरते थे। वैमानिक-शास्त्र में आठ अध्याय, एक सौ अधिकरण (सेक्शंस) पांच सौ सूत्र (सिद्धांत) और तीन हजार श्लोक हैं। इस ग्रंथ की भाषा वैदिक संस्कृत है।

वैमानिक-शास्त्र में चार प्रकार के विमानों का वर्णन है। ये काल के आधार पर विभाजित हैं। इन्हें तीन श्रेणियों में रखा गया है। इसमें मंत्रिका श्रेणी में वे विमान आते हैं, जो सतयुग और त्रेतायुग में मंत्र एवं सिद्धियों से संचालित व नियंत्रित होते थे। दूसरी श्रेणी तांत्रिका है, जिसमें तंत्र शक्ति से उड़ने वाले विमानों का ब्यौरा है। इसमें तीसरी श्रेणी में कलयुग में उड़ने वाले विमानों का ब्यौरा भी है, जो इंजन (यंत्र) की ताकत से उड़ान भरते हैं। यानी भारद्वाज ऋषि ने भविष्य की उड़ान प्रौद्योगिकी क्या होगी, इसका अनुमान भी अपनी दूरदृष्टि से लगा लिया था। इन्हें कृतक विमान कहा गया है। कुल 25 प्रकार के विमानों का इसमें वर्णन है।

तांत्रिक विमानों में ‘भैरव’ और ‘नंदक’ समेत 56 प्रकार के विमानों का उल्लेख है। कृतक विमानों में ‘शकुन’, ‘सुन्दर’ और ‘रुक्म’ सहित 25 प्रकार के विमान दर्ज हैं। ‘रुक्म’ विमान में लोहे पर सोने का पानी चढ़ा होने का प्रयोग भी दिखाया गया है। ‘त्रिपुर’ विमान ऐसा है, जो जल, थल और नभ में तैर, दौड़ व उड़ सकता है।

उड़ान भरते हुए विमानों का करतब दिखाये जाने व युद्ध के समय बचाव के उपाय भी वैमानिकी-शास्त्र में हैं। बतौर उदाहरण यदि शत्रु ने किसी विमान पर प्रक्षेपास्त्र अथवा स्यंदन (रॉकेट) छोड़ दिया है तो उसके प्रहार से बचने के लिए विमान को त्रियग्गति (तिरछी गति) देने, कृत्रिम बादलों में छिपाने या ‘तामस यंत्र’ से तमः (अंधेरा) अर्थात धुआं छोड़ दो। यही नहीं विमान को नई जगह पर उतारते समय भूमिगत सावधानियां बरतने के उपाय व खतरनाक स्थिति को परखने के यंत्र भी दर्शाए गए हैं। जिससे यदि भूमिगत सुरंगें हैं तो उनकी जानकारी हासिल की जा सके। इसके लिए दूरबीन से समानता रखने वाले यंत्र ‘गुहागर्भादर्श’ का उल्लेख है। यदि शत्रु विमानों से चारों ओर से घेर लिया हो तो विमान में ही लगी ‘द्विचक्र कीली’ को चला देने का उल्लेख है। ऐसा करने से विमान 87 डिग्री की अग्नि-शक्ति निकलेगी। इसी स्थिति में विमान को गोलाकार घुमाने से शत्रु के सभी विमान नष्ट हो जाएंगे।

इस शास्त्र में दूर से आते हुए विमानों को भी नष्ट करने के उपाय बताए गए हैं। विमान से 4087 प्रकार की घातक तरंगें फेंककर शत्रु विमान की तकनीक नष्ट कर दी जाती है। विमानों से ऐसी कर्कश ध्वनियां गुंजाने का भी उल्लेख है, जिसके प्रगट होने से सैनिकों के कान के पर्दे फट जाएंगे। उनका हृदयाघात भी हो सकता है। इस तकनीक को ‘शब्द सघण यंत्र’ कहा गया है। युद्धक विमानों के संचालन के बारे में संकेत दिए हैं कि आकाश में दौड़ते हुए विमान के नष्ट होने की आशंका होने पर सातवीं कीली अर्थात घुंडी चलाकर विमान के अंगों को छोटा-बड़ा भी किया जा सकता है। उस समय की यह तकनीक इतनी महत्त्वपूर्ण है कि आधुनिक वैमानिक विज्ञान भी अभी उड़ते हुए विमान को इस तरह से संकुचित अथवा विस्तारित करने में समर्थ नहीं हैं।

रामायण काल में वैमानिकी प्रौद्योगिकी विकास के चरम पर थी, यह इन तथ्यों से प्रमाणित होता है कि वैमानिक शास्त्र में विमान चालक को किन गुणों में पारंगत होना चाहिए। यह भी उल्लेख इस शास्त्र में है। इसमें प्रशिक्षित चालक (पायलट) को 32 गुणों में निपुण होना आवश्यक बताया गया है। इन गुणों में कौशल चालक ही ‘रहस्यग्नोधिकारी’ अथवा ‘व्योमयाधिकारी’ कहला सकता है। चालक को विमान-चालन के समय कैसी पोशाक पहननी चाहिए, यह ‘वस्त्राधिकरण’ और इस दौरान किस प्रकार का आहार ग्रहण करना चाहिए, यह ‘आहाराधिकरण’ अध्यायों में किए गए उल्लेख से स्पष्ट है।

राम-रावण युद्ध केवल धनुष-बाण और गदा-भाला जैसे अस्त्रों तक सीमित नहीं था। मदनमोहन शर्मा ‘शाही’ के तीन खण्डों में छपे बृहद उपन्यास ‘लंकेश्वर’ में दिए उल्लेखों से यह साफ हो जाता है कि रामायण काल में वैज्ञानिक आविष्कार चरमोत्कर्ष पर थे। राम और रावण दोनों के सेनानायकों ने भयंकर आयुधों का खुलकर प्रयोग भी किया था। लंका उस युग में सबसे सम्पन्न देश था। लंकाधीश रावण ने नाना प्रकार की विधाओं के पल्लवन के लिए यथोचित धन व सुविधाएं भी उपलब्ध कराईं थीं। रावण के पास लड़ाकू वायुयानों और समुद्री जलपोतों के बेड़े थे। प्रक्षेपास्त्र और ब्रह्मास्त्रों का अटूट भण्डार व इनके निर्माण में लगी अनेक वेधशालाएं थीं। दूर संचार यंत्र भी लंका में उपलब्ध थे।

ये सभी रामायणें निर्विवाद रूप से स्वीकारती हैं कि रावण के पास पुष्पक विमान था और रावण सीता को इसी विमान में बिठाकर अपहरण कर ले गया था। गंधमादन पर्वत, गृध्रों की नगरी थी। यहां के गृध्रराज भूमि, समुद्री व आकाशीय मार्ग पर भी अधिकार रखते थे। यह नगरी सम्राट सम्पाती के पुत्र सुपाश्र्व की थी। सम्पाती राजा दशरथ के सखा थे। सम्पाती वैज्ञानिक था। उसने छोटे-बड़े वायुयानों और अंतरिक्ष यात्री की वेषभूषा का निर्माण किया था। सुपाश्र्व ने ही हनुमान को लघुयान में बिठाकर समुद्र लंघन कराकर त्रिकुट पर्वत पर विमान उतारा था। त्रिकुट पर्वत लंका की सीमा परिधि में आज भी है। सुपाश्र्व के पास आग्नेयास्त्र भी थे, जिनसे प्रहार कर हनुमान ने नागमाता सुरसा को परास्त किया था। इस अस्त्र के प्रयोग से समुद्र में आग लगी और नाग जाति जलकर नष्ट हो गई। त्रिकुट पर्वत के पहले मैनाक पर्वत था, जिसमें रत्नों की खानें थीं। रावण इन रत्नों का विदेश व्यापार करता था। लंका की संपन्नता का कारण भी यही खानें थीं। सुपाश्र्व ने राम-रावण युद्ध में राम का साथ दिया था।

लंका में ऐसे वायुयान भी थे, जो आकाश में खडे़ हो जाते थे और आलोप हो जाते थे। इनमें चालक नहीं होता था। ये स्वचालित थे। उस समय आठ प्रकार के विमान थे जो सौर्य ऊर्जा से संचालित होते थे। रावण पुत्र मेघनाद की निकुम्भिला वेधशाला थी। जिसमें प्रतिदिन एक दिव्य रथ अर्थात एक लड़ाकू विमान का निर्माण होता। मेघनाद के पास ऐसे विचित्र विमान भी थे जो आँख से ओझल हो जाते थे और फिर धुआं छोड़ते थे। जिससे दिन में भी अंधकार हो जाता था। यह धुआं विषाक्त गैस अथवा अश्रु गैस होती थी। ये विमान नीचे आकर बम-बारी भी करते थे।

मेघनाद की वेधशाला में ‘शस्त्रयुक्त स्यंदन’ (राकेट) का भी निर्माण होता था। मेघनाद ने युद्ध में जब इस स्यंदन को छोड़ा तो यह अंतरिक्ष की ओर बहुत ही तेज गति से बढ़ा। इन्द्र और वरुण स्यंदन शक्ति से परिचित थे। उन्होंने मतालि को संकेत कर दूसरा शक्तिशाली स्यंदन छुड़ाया और मेघनाद के स्यंदन को आकाश में ही नष्ट कर दिया और इसके अवशेष को समुद्र में गिरा दिया।

लंका में यानों की व्यवस्था प्रहस्त के सुपुर्द थी। यानों में ईंधन की व्यवस्था प्रहस्त ही देखता था। लंका में सूरजमुखी पौधे के फूलों से तेल (पेट्रोल) निकाला जाता था (अमेरिका में वर्तमान में जेट्रोफा पौधे से पेट्रोल निकाला जाता है।) अब भारत में भी रतनजोत के पौधे से तेल बनाए जाने की प्रक्रिया में तेजी आई है। लंकावासी तेल शोधन में निरंतर लगे रहते थे। लड़ाकू विमानों को नष्ट करने के लिए रावण के पास भस्मलोचन जैसा वैज्ञानिक था, जिसने एक विशाल ‘दर्पण यंत्र’ का निर्माण किया था। इससे प्रकाशपुंज वायुयान पर छोड़ने से यान आकाश में ही नष्ट हो जाते थे। लंका से निष्कासित किये जाते वक्त विभीषण भी अपने साथ कुछ दर्पण यंत्र ले आया था। इन्हीं ‘दर्पण यंत्रों’ में सुधार कर अग्निवेश ने इन यंत्रो को चैखटों पर कसा और इन यंत्रों से लंका के यानों की ओर प्रकाश पुंज फेंका जिससे लंका की यान शक्ति नष्ट होती चली गई। बाद में रावण ने अग्निवेश की इस शक्ति से निपटने के लिए सद्धासुर वैज्ञानिक को नियुक्त किया।

कथित बुद्धिजीवियों और पूजा-पाठियों द्वारा रामायणकाल की इन अद्भुत शक्तियों को अलौकिल व ऐन्द्रिक कहकर इनका महत्त्व ही समाप्त करने का षड्यंत्र किया है। जबकि ये शक्तियां ज्ञान का वैज्ञानिक बल थीं। जिसमें मेघनाद ब्रह्म विद्या का विशारद था। उसका पांडित्य रावण से भी कहीं बढ़कर था। विस्फोटक व विंध्वसक अस्त्रों का तो इस युद्ध में खुलकर प्रयोग हुआ, जिसमें ब्रह्मास्त्र सबसे खतरनाक था। इन्द्र ने शंकर से राम के लिए दिव्यास्त्र और पशुपतास्त्र मांगे थे। इन अस्त्रों को देते हुए शंकर ने अगस्त्य को चेतावनी देते हुए कहा, ‘अगस्त्य तुम ब्रह्मास्त्र के ज्ञाता हो और रावण भी। कहीं अणुयुद्ध हुआ तो वर्षों तक प्रदूषण रहेगा। जहां भी विस्फोट होगा, वह स्थान वर्षों तक निवास के लायक नहीं रहेगा। इसलिए पहले युद्ध को मानव कल्याण के लिए टालना ?’ लेकिन अपने-अपने अहं के कारण युद्ध टला नहीं।

राम द्वारा सेना के साथ लंका प्रयाण के समय द्रुमकुल्य देश के सम्राट समुद्र ने रावण से मैत्री होने के कारण राम को अपने देश से मार्ग नहीं दिया तो राम ने अगस्त्य के अमोघ अस्त्र (ब्रह्मास्त्र) को छोड़ दिया। जिससे पूरा द्रुमकुल्य (मरूकान्तार) देश ही नष्ट हो गया। यह अमोघ अस्त्र हाइड्रोजन बम अथवा एटम बम ही था। मेघनाद की वेधशाला में शीशे (लेड) की भट्टियां थीं। जिनमें कोयला और विद्युत धारा प्रवाहित की जाती थी। इन्हीं भट्टियों में परमाणु अस्त्र बनते थे और नाभिकीय विखण्डन की प्रक्रिया की जाती थी।

युद्ध के दौरान राम सेना पर सद्धासुर ने ऐसा विकट अस्त्र छोड़ा जो सम्भवतः ब्रह्मास्त्र से भी ज्यादा शक्तिशाली था, जो सुवेल पर्वत की चोटी को सागर में गिराता हुआ सीधे दक्षिण भारत के समुद्र में गिरा दिया। सद्धासुर का अंत करने के लिए अगस्त्य ने सद्धासुर के ऊपर ब्रह्मास्त्र छुड़वाया। जिससे सद्धासुर और अनेक सैनिक तो मारे ही गए लंका के शिव मंदिर भी विस्फोट के साथ ढहकर समुद्र में गिर गए। दोनों ओर प्रयोग की गई ये भयंकर परमाणु शक्तियां थीं। इस सिलसिले में डॉ. चांसरकर ने ताजा जानकारी देते हुए अपने लेख में लिखा है, पांडुनीडि का भाग या इससे भी अधिक दक्षिण भारत का भाग इस परमाणु शक्ति के प्रयोग से सागर में समा गया था और राम द्वारा ‘करूणागल’ के स्वर्ण और रत्नों से भरे शिव मंदिर, स्वर्ण अट्टालिकाएं भीषण विस्फोटों से सागर में गिर गईं। इन विस्फोटों से लंका का ही नहीं अपितु भारत का भी यथेष्ठ भाग सागर में समा गया था और लंका से भारत, की दूरी, उस भू-भाग के नष्ट होने से बढ़ गई थी। नल-सेतु (जल डमरूमध्य) का भाग भी रक्ष रणनीतिज्ञों ने नष्ट कर दिया होगा। यही कारण है कि त्रिकुट पर्वत की चोटियां भी तिरूकोणमल के भाग के साथ लंका के सागर में समा गईं होंगी और समुद्र भी गहरा हो गया होगा। इसका कारण यह भी हो सकता है कि युद्ध के बाद अवशेष बम आदि सामग्री को नष्ट करने के लिए अगस्त्य ने समुद्र में ही विस्फोट कराकर लंका से विदा ली हो, जिससे सागर गहरा हो गया। क्योंकि बाल्मीकि रामायण में ‘उथले उदधि और यहां नावें नहीं चल सकती’ का उल्लेख हनुमान करते हैं। अब गहरे पानी पैठकर पनडुब्बियों से तिरूकोणमलै के रामायणकलीन शिव मंदिरों के कई अवशेष खोज निकाले हैं। डिस्कवरी चैनल द्वारा इन अवशेषों का बड़ा सुंदर प्रस्तुतिकरण किया गया है। अब तो अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ ने त्रेतायुगीन इस ऐतिहासिक पुल को खोज निकाल कर इसके चित्र भी दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दिए हैं। शोधों से पता चला है कि पत्थरों से बना यह पुल मानव निर्मित है। इस पुल की लम्बाई लगभग तीस किलोमीटर बताई गई है। जब रावण अपने अंत समय से पहले वेधशाला में दिव्य-रथ के निर्माण में लीन था तब अग्निवेश ने अग्निगोले छोड़कर वेधशाला और उसके पूरे क्षेत्र को नष्ट करने की कोशिश की। ये अग्निगोले थर्माइट बम थे, जिसके प्रहारों से इस्पात की मोटी चादर तक क्षण मात्र में पिघल जाती थी। लंका के हेम मंदिर, हेमभूषित इन्हीं अग्निगोलों से पिघली थी। रावण के प्राणों का अंत जब अगस्त्य का ब्रह्मास्त्र नहीं कर सका तो राम ने रावण पर ब्रह्मा द्वारा आविष्कृत ब्रह्मास्त्र छोड़ा, जो बहुत ही ज्यादा शक्तिशाली था। इससे रावण के शरीर के अनेक टुकड़े हो गए और वह मृत्यु का प्राप्त हो गया।

इस विश्व युद्ध में छोटे-मोटे अस्त्रों की तो कोई गिनती ही नहीं थी। ये अस्त्र भी विकट मारक क्षमता के थे। शंबूक ने सूर्यहास खड्ग का अपनी वेधशाला में आविष्कार किया था। इस खड्ग में सौर ऊर्जा के संग्रहण क्षमता थी। जैसे ही इनका प्रयोग शत्रु दल पर किया जाता तो वे सूर्यहास खड्ग से चिपक जाते। यह खड्ग शत्रु का रक्त खींच लेता और चुम्बक नियंत्रण शक्ति से धारक के पास वापस आ जाता। लक्ष्मण ने खड्ग को हासिल करने के लिए ही शंबूक का वध किया था।

लंका के द्वार पर ‘दारू पंच अस्त्र’ स्थापित थे। इनका अविष्कार शुक्राचार्य भार्गव ने किया था, जिसे ‘रुद्र कीर्तिमुख’ का नाम भी दिया गया था। इस यंत्र की विशेषता थी कि जो गतिविधि शत्रु करता था, उसका पूरा चित्र इस यंत्र पर उभर आता था और इसके मुख से अग्निगोला निकलता और शत्रु का संहार करता। यह कीर्तिमुख सम्भवतः यंत्र मानव था। रावण धारावाहिक में सुमाली जब सुमाली लाट लौट रहा होता है तब इंद्र सुमाली की गतिविधियों को इसी ‘कीर्तिमुख अस्त्र’ से देखते हैं और सुमाली के संहार के लिए अग्निगोला छोड़ते हैं। इसी वक्त इस घटना को शिव देख रहे होते हैं और वे सुमाली की रक्षा के लिए इस गोले को बीच में ही नष्ट कर देते हैं।

राम ने वैष्णव चाप पर आग्नेयास्त्र और प्रक्षेपास्त्र चलाये थे, जो भंयकर विस्फोटक के साथ शत्रुओं का नाश करते थे। राम को अग्निवेश ने एक विशिष्ट कांच दिया था जो सम्भवतः दूरबीन था। इसी दूरबीन से राम ने लंका के द्वार पर लगे ‘दारूपंच अस्त्र’ को देखा और प्रक्षेपास्त्र छोड़कर नष्ट कर दिया। जब कुम्भकर्ण और लक्ष्मण के बीच संग्राम चल रहा था, तब लक्ष्मण ने कुम्भकर्ण पर मानवास्त्र छोड़ा, जिसे कुम्भकर्ण ने कांचनमालिनी शक्ति से नष्ट कर दिया। इस शक्ति की विशेषता थी कि इसे छोड़ते ही आठ घंटियां मधुर ध्वनि उत्पन्न करती हुईं बजती थीं, ये घंटियां तत्काल सौर ऊर्जा ग्रहण करती थीं। यह शक्ति वायुवेग से चलती थी और सौर मण्डल की विद्युत स्वतः उत्पन्न होती थी। इस अस्त्र से जीवित बचना मुश्किल ही था, क्योंकि शत्रु शरीर में विद्युत धारा प्रवाहित हो जाने के कारण शत्रु का अंत हो जाता था।

कुम्भकर्ण अपने कंठ में ‘जीवन रत्न वलय’ पहनता था। इस यंत्र की विशेषता थी कि इससे लौ की चकाचौंध करती हुई किरणें निकलती थीं, उनके कारण शत्रु के अस्त्र ठहर नहीं पाते थे। लक्ष्मण ने जब कुम्भकर्ण पर ‘अर्धनाराच’ छोड़ा तो कुम्भकर्ण ने ‘अर्धनाराच’ को इसी वलय से किरणें निकाल कर नष्ट किया। लक्ष्मण ने शंबूक से प्राप्त करने के लिए अस्त्र ‘चंद्रहास खड्ग’ का भी कुम्भकर्ण पर बार किया, जिसे कुम्भकर्ण ने शूल के प्रहार से काट दिया। बाद में कुम्भकर्ण ने लक्ष्मण पर ‘मोक्खशक्ति’ छोड़ी जिसका प्रतिकार लक्ष्मण के पास नहीं था और लक्ष्मण घायल हो गए।

रामायणों में कुम्भकर्ण को ऐसा आलसी निरूपित किया है, जो छह माह सोता रहता था और एक दिन के लिए भोजन आदि के लिए उठता और फिर सो जाता था। जबकि वास्तविकता यह थी कि कुम्भकर्ण राष्ट्रभक्त तो था ही, वह एक वैज्ञानिक भी था। वह अपनी वेधशाला में अपनी पत्नी वज्रज्वाला के सहयोग से निरंतर आविष्कार करने में लगा रहता था। ऐसे में वह खाने-पीने की सुध भी भूल जाता था और वेधशाला से कम ही बाहर निकलता। कुम्भकर्ण वेधशाला में यंत्र मानव (रोबोट) दारूपंच अस्त्र (राडर) दर्पण (दूरदर्शन जैसा यंत्र) व अणुअस्त्रों के निर्माण में लगा रहता था। कुम्भकर्ण ने ‘चित्राग्नि’ यंत्र का आविष्कार भी किया था। इस यंत्र से पृथ्वी के सभी लोकों की स्थिति को चित्रों के मध्यम से जाना जा सकता था। कुम्भकर्ण ने इसे लंबे अनुसंधान के बाद हासिल किया था।      

कुम्भकर्ण की यंत्र मानव कला को ‘ग्रेट इन्डियन’ पुस्तक में ‘विजार्ड आर्ट’ का दर्जा दिया है। इस कला में रावण की पत्नी धान्यमालिनी भी पारंगत थी, जो राम-रावण युद्ध के समय गर्भवती थी। रावण की मृत्यु के बाद धान्यमालिनी ने अरिमर्दन नाम के एक पुत्र को जन्म दिया, जो वीर और प्रतापी था। विभीषण के राज्यारोहण के लगभग बीस साल बाद इसी अरिमर्दन ने विभीषण को पदच्चयुत किया और लंका की पुनः सत्ता संभालकर लंकाधीश कहलाया।     

रावण ने जब इस युद्ध का पटाक्षेप करने के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ी तो धान्यमालिनी ने राम की सेना पर मकरमुख, आशी विषमुख, वाराह मुख जैसे विंध्वंसकारी अस्त्रों का प्रयोग किया। इन अस्त्रों से छूटने वाले आयुधों में अग्निदीप्तिमुख प्रमुख था। जो छोड़ने पर सौर मण्डल की ओर सीधा जाता, फिर किसी नक्षत्र के समान चमकता और आकाश में ही टूटता। फिर सीधा पृथ्वी की ओर गिरकर शत्रु का नाश करता। अंत में राम ने रावण से छुटकारा पाने के लिए ब्रह्मा का दिया हुआ ब्रह्मास्त्र छोड़ा, जिससे रावण वीरगति को प्राप्त हुआ।

ऋषि अगस्त्य ने राम के हितार्थ शंकर से अजगव धनुष’ मांगा था। इस धनुष को मदनमोहन शर्मा ‘शाही’ ने एक पैटन टैंक माना है। इस धनुष की व्याख्या करते हुए श्री शाही ‘लंकेश्वर’ में लिखते हैं- ‘चाप’ अभी बंदूक के घोड़े (ट्रेगर) के लिए उपयोग में लाया जाता है। चाप ट्रेगर का ही पर्याय वाची होकर अजगव धनुष है। पिनाक धनुष में ये सब अनेक पहियों वाली गाड़ी पर रखे रहते थे। तब चाप चढ़ाने अथवा घोड़ा (ट्रेगर) दबाने से भंयकर विस्फोट करते हुए शत्रुओं का विनाश करते थे।

राम और रावण की सेनाओं के पास भुशुंडी (बंदूक) थीं। कुछ सैनिकों के पास स्वचालित भुशुंडिया भी थीं। रावण ने एक छत्र का भी निर्माण किया था, जिसे ‘ब्रह्म-छत्र’ कहा जाता था। संकटकालीन स्थिति में इस छत्र से लंका को ढक दिया जाता था, जिससे लंका में अंधकार हो जाता था और शत्रु को एकाएक लंका दिखाई नहीं देती थी। सम्भवतः इस छत्र का निर्माण वायुयानों से छोड़े जानेवाले विस्फोटकों से बचने के लिए किया गया होगा।

लंका में दूर संचार यंत्रों का भी निर्माण होता था व चलन था। दूरभाष की तरह उस युग में ‘दूर नियंत्रण यंत्र’ था जिसे ‘मधुमक्खी’ कहा जाता था। जब इससे वार्ता की जाती थी तो वार्ता से पूर्व इससे भिन-भिन की ध्वनि प्रकट होती थी। सम्भवतः इसी ध्वनि प्रस्फुटन के कारण इस यंत्र का नामकरण मधुमक्खी किया गया होगा। ये यंत्र लंका के विशिष्ठ अधिकारियों और राज-परिवार के लोगों के पास रहते थे। विभीषण की लंकाधीश बनने की उत्कट लालसा थी। इसलिए उसने सीता को भी एक मधुमक्खी यंत्र दे दिया था। जिस पर संवाद जारी रखते हुए सीता ने विभीषण को विश्वासघाती बनाकर अपनी ओर कर लिया। बाद में अशोक वाटिका में मेघनाद ने इस यंत्र को पकड़ लिया और रावण के सामने काका विभीषण के राज्यद्रोही होने की पोल खोल दी। फलस्वरूप रावण ने विभीषण को लंका से निष्कासित कर दिया था। वैसे लंका की संहिता के अनुसार, राज्यद्रोह का दण्ड मृत्यु दण्ड था, लेकिन छोटा भाई होने के कारण रावण ने उसे क्षमा दान दे दिया। पर विभीषण इतना कृतघ्न निकला कि वह लंका से प्रयाण करते समय मधुमक्खी और दर्पण यंत्रों के अलावा अपने चार विश्वसनीय मंत्री अनल, पनस, सम्पाती और प्रभाती को भी साथ, राम की शरण में ले गया और राम की हित पूर्ति के लिए रावण के विरूद्ध इन यंत्रों का उपयोग भी किया। दर्पण यंत्र अंधकार में प्रकाश का आभास प्रकट करता था, जिसे ग्रंथों में ‘त्रिकाल दृष्टा’ कहा गया है। लेकिन यह यंत्र त्रिकाल दृष्टा नहीं बल्कि दूरदर्शन जैसा कोई यंत्र था।

लंका के दस हजार सैनिकों के पास ‘त्रिशूल’ नाम के यंत्र थे। जो दूर-दूर तक संदेश का आदान-प्रदान करते थे। सम्भवतः ये त्रिशूल वायर लैस ही होंगे। लंका में यांत्रिक सेतु, यांत्रिक कपाट और ऐसे चबूतरे भी थे जो बटन दबाने से ऊपर नीचे होते थे। ये चबूतरे सम्भवतः लिफ्ट थे।

राम-रावण युद्ध में प्रयोग में लाईं गईं शक्तियों को मायावी या दैवीय शक्ति कहकर उनके वास्तविक महत्त्व, आविष्कार के ज्ञान व सामर्थ्य को सर्वथा नकार दिया गया। वास्तव में ये विध्वंसकारी परमाणु अस्त्र और अद्भुत भौतिक यंत्र थे। इनकी सूक्ष्म और यथार्थ विवेचना के लिए इनके रहस्यों को समझना अभी शेष है। गोया, विश्वविद्यालयों में विभिन्न रामायणों के विज्ञान से जुड़े अंशों को पाठ के रूप में संकलित कर पढ़ाया जाए। इससे विद्यार्थियों में प्राचीन भारतीय विज्ञान को जानने की जिज्ञासा का प्रादुर्भाव उत्पन्न होगा और छात्र उस मिथक को तोड़ेंगे, जिसे कवि की कपोल कल्पना कहकर अब तक उपेक्षा की जाती रही है। इस दिशा में हमारे वैज्ञानिकों और विज्ञान अध्येताओं को भी सकारात्मक पहल करना चाहिए।

संदर्भ ग्रंथ सूची :-

1. वाल्मीकि रामायण, 2. रामकथा उत्पत्ति और विकास : डॉ. फादर कामिल बुल्के, 3. लंकेश्वर (उपन्यास) : मदनमोहन शर्मा ‘शाही’, 4. हिन्दी प्रबंध काव्य में रावण : डॉ. सुरेशचन्द्र निर्मल, 5. रावण-इतिहास : अशोक कुमार आर्य, 6. चैरियट्स गॉड्स : ऐरिक फॉन डानिकेन, 7. क्या सचमुच देवता धरती पर उतरे थे : डॉ. खड्ग सिंह वल्दिया (लेख) धर्मयुग 27 मई 1973, 8. प्रमाण तो मिलते हैं : डॉ. ओमकारनाथ श्रीवास्तव (लेख) 27 मई 1973, 9. महर्षि भारद्वाज तपस्वी के भेष में एयरोनॉटिकल साइंटिस्ट (लेख) विचार मीमांसा 31. अक्टूबर 2007, 10. विजार्ड आर्ट।

– प्रमोद भार्गव

शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224, 09981061100

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