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अवध वहीं जहाँ राम गुण आचरण

गोस्वामी तुलसीदास जी रचित श्रीरामचरितमानस में वर्णित लक्ष्मण-सुमित्रा संवाद में लक्ष्मण भावपूर्ण होकर कहते हैं-‘‘अवध तहाँ जहँ राम निवासु। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।। इसका भावार्थ है कि ‘जहाँ सूर्य का प्रकाश हो वहीं दिन होता है, इसी प्रकार जहाँ श्रीराम का निवास हो वहीं अयोध्या है।‘ मानस में इस चौपाई का प्रयोग लक्ष्मण की अपने भ्राता राम के प्रति आत्मीयता और त्याग को दर्शाने के लिए हुआ है, किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम देखें तो इसी से सीख लेते हुए हम यह भी कह सकते हैं कि ‘जहाँ श्रीराम के गुणों का अनुसरण होता हो निश्चित ही वह स्थान अयोध्यासम हो जाता है।‘

अयोध्या का अर्थ है जहाँ सम्पूर्ण वातावरण द्वंद्व, मनभेद, लोभ, संकीर्णता, शोषण, अनाचार इत्यादि दुर्गुणों से परे हो, तभी तो श्रीराम समान निर्विकार चरित्रों का निर्माण संभव हो सकेगा। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि यदि हम अपने घर-परिवार, अपने समाज और राष्ट्र सहित सम्पूर्ण वसुधा को रामायण में वर्णित अयोध्या के समान सुखी, समृद्ध और आत्मीयता से परिपूर्ण देखना चाहते हैं तो इसके लिए हमें श्रीराम के सद्गुणों को अपने आचरण में उतारना होगा।

श्रीवाल्मिकि रामायण के आरंभ में रचित श्लोकों में वर्णनानुसार महर्षि वाल्मीकि नारदमुनि से प्रश्न करते हैं कि इस पृथ्वी पर सर्वगुण सम्पन्न ऐसा कौन है, जो ऐसा गुणवान जिसके आचरण का भक्त बारंबार स्मरण करते हों, वीर्यवान जो स्वयं के साथ समाज को सुरक्षित रखे, स्वधर्म का पूर्ण ज्ञान रखते हुए आचरण करने वाला धर्मज्ञ, सबके प्रति सदाशयता रखने वाला कृतज्ञ, लक्ष्य प्राप्ति के प्रति अटल दृढ़प्रतिज्ञ, संकटों में भी सदैव सत्यवक्ता, संस्कारक्षम व चरित्रवान, शास्त्रों से विज्ञ विद्वान, सभी योग्य कर्म हेतु सामर्थ्यवान, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को वश में रखने वाला आत्मवान, काम, क्रोध, लोभ, मोहादि पर विजय पाने वाला जितेन्द्रिय, दिव्यरूपा द्युतिमान, दोष देखने की प्रवृत्ति से रहित अनसूयकः, दुष्टों के प्रति कुपित होने पर जिसका कोई सामना न कर सके, शत्रु को भी प्रिय लगने वाला, सर्वभूतेषु हित चाहने वाला, ऐसा सोलह गुणों को धारण करने वाला इस धरा पर कौन है? तब नारदमुनि भावपूर्ण होकर कहते हैं कि सूर्यवंशी इक्ष्वांकु कुल में जन्मे राम ही एकमात्र ऐसे महापुरूष हैं।

श्रीराम पुरूषों में सबसे श्रेष्ठ/उत्तम हैं इसीलिए मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाए। एक धनुष अर्थात एक लक्ष्य सदाचरण को अपनाने वाले, एक वचन अर्थात मन-वचन-कर्म में एक्य रखते हुए सदैव सत्य-संस्कार-संस्कृति की पालना सुनिश्चित करने वाले और एक पत्निव्रता अर्थात जीवन में संयम-शुचिता-समन्वय का अनुकरण करने वाले, वही तो श्रीराम कहलाए। राम का जीवन ही हम सबके लिए मानक स्वरूप है, यह हमें जीवन की श्रेष्ठता का आधार देता है। एक आदर्श पुत्र, भाई, मित्र, पति, शासक, प्रबंधक, सामाजिक समरसता और मनुष्य धर्म के यथार्थ पालक का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक हैं श्रीराम।

भक्तप्रवर शबरी को नवधा भक्ति का मार्ग बताते हुए संतों का सत्संग, प्रेम व श्रद्धा, अभिमान रहित गुरूसेवा, ऐन्द्रिक नियंत्रण हेतु मंत्रजाप-शील व वैराग्य, परम संतोषी, कपट से विरत रहकर स्वयं व ईश्वर में विश्वास, सम्पूर्ण जीव-जगत को राममय ही मानते हुए सदैव हर्षित रहने की प्रेरणा मानवजाति को देते हैं। राम का चरित्र पूजनीय से अधिक अनुकरणीय है।

तुलसीदासजी द्वारा हरिगीतिका छंद में रचित श्रीराम की स्तुति ‘श्रीरामचन्द्र कृपालु भजमन……..।।‘ में भी कहा गया है कि जन्ममरण के दारूण भय को दूर करने वाले, शील-संयम के दिव्य रूप को धारण करने वाले, दीनबंधु-स्नेही सुजान, दानवप्रवृत्ति का नाश करने वाले, शिव-शेष और मुनिजन को प्रसन्न रखने वाले, काम-क्रोध-लोभादि शत्रुओं को नष्ट करने वाले, ऐसे सर्वहितकारी प्रभु श्रीराम को मैं नमन करता हूँ। यहाँ भी हमें राम के गुणों को अपनाने की ही प्रेरणा दी गयी है।

रामचरित मानस में तुलसीदासजी की एक चौपाई आती है- ‘जहँ जहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परस्पर यहहि सिखवहिं।। भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि।।‘ भावार्थ यह है कि जहाँ-तहाँ व्यक्ति-समुदाय श्रीराम के गुण को गाते हैं, उन पर चिन्तन-मनन करते हैं और परस्पर आत्मीयता से बैठकर यही सीख देते हैं, आग्रह करते हैं कि शरणागत का पालन करने वाले, सबके जीवन का उद्धार करने वाले श्रीराम को भजो, उनका नित्य ध्यान करो।

उनकी मर्यादा पुरूषोत्तम स्वरूप की शोभा-गरिमा, सत्य-धैर्य व लोकहितकारी शील-संयम, करूणा-सतकर्म और दिव्यज्ञान से उज्जवलित अद्भुत रूप तथा मनुष्य जीवन को श्रेष्ठता की ओर ले जाने वाले गुणों को धारण करने वाले श्रीराम को भजो, उनके आदर्ष गुणों को आत्मसात कर आचरण में धारण करने का प्रयत्म करो। तभी सम्पूर्ण जगत ही अयोध्या समान हो जाएगा।

आलेख

श्री उमेश कुमार चौरसिया साहित्यकार एवं संस्कृति चिंतक, अजमेर (राजस्थान)

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