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नाग पंचमी का व्यापक अर्थ एवं मीमांसा

श्रावण मास के श्रुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भारत में नाग पंचमी मनाने की परम्परा है। हमारी सनातन परम्परा में नागों को देवता माना गया है, इसलिए इनकी पूजा के लिए एक दिन निर्धारित किया गया है। नाग पंचमी का संबंध सिर्फ एक सर्प विशेष से नहीं है प्रत्युत अपने दार्शनिक अर्थों में “नाग” शब्द बहुत व्यापक अर्थों को लिए हुए है।

कपिलो कालियोऽनन्तो वासुकिस्तक्षकस्तथा।
पंचैतान्स्मरतो नित्यं विषबाधा न बाधते।।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी ने “नागाणां अंनंतस्चास्मि” तथा “सर्पाणामस्मि वासुकी” अर्थात नागों में अनंत को अपना स्वरूप बताया है तथा सर्पों में वासुकी को अपना स्वरूप बताया है। वहां नागों और सर्पों का भेद उन्होंने पृथक-पृथक करके दोनों में अपने स्वरूपों की व्याख्या की है ।

आज का आधुनिक विज्ञान भी सर्पों को और नागों को अलग-अलग संघ में रखता है। सर्प को जहां सरीसृप वर्ग में तथा वहीं नाग को कार्डेटा संघ में रखता है। सरीसृप वर्ग में सर्प को इसलिए कि उसमें रीड की हड्डी नहीं होती तथा नाग को कार्डेटा संघ में इसलिए कि वह रीड की हड्डी से युक्त होता है, जैसे कि मनुष्य।

अब प्रश्न आता है नाग पंचमी पूजा क्यों? यहां पंचम शब्द 5 संख्या का वाचक है पंचमी तिथि को नागों की यह पूजा संपन्न होती है इसलिए भी नाग पंचमी का पूजन होता है अथवा पांच प्रकार के नाग विशिष्ट होते हैं उन पांच यानी पंचविध नागों के पूजन के कारण भी इस पूजन का नाम नागपंचमी पड़ा है।

वेदांतसार नामक अद्वैत वेदांत के दार्शनिक ग्रंथ में नाग एक प्रकार का प्राणवायु बताया गया है जिसमें उसकी परिभाषा बताई गई है “नागो उदगिरणकर:”अर्थात नाग वायु शरीर में स्थित वह प्राणवायु है जिसके द्वारा व्यक्ति वमन या उद्गिरण करता है।

अर्थात पुरुष जिस प्राणविशेष से किसी वस्तु को लील लेता है या किसी वस्तु को उगलता है वह नाग वायु है। अपने दार्शनिक अर्थों में हमारे इस ब्रह्मांड के समानांतर अनेकानेक अन्य ब्रह्मांड भी इसी ब्रह्मांड में उपस्थित हैं, जिनमें एक ब्रह्मांड से दूसरे ब्रह्मांड में जाने के लिए व्यक्ति अपने प्राणों को माध्यम बनाकर एक सत्ता आयाम से दूसरे आयाम में या तो प्रवेश कर सके या उसमें से निकल सके।

इस प्रकार की प्राण विशिष्ट क्षमता को नाग कहा गया है। इस अर्थों में नाग केवल सांप विशेष नहीं अत्यंत रहस्यमय प्राणशक्ति भी प्रमाणित होती है। प्रमाण स्वरुप महर्षि उत्तंक का नागलोक के माध्यम से स्वर्गलोक में जाना आदि प्रसिद्ध श्रुति कथाएं हैं।

१-तक्षक नाग – पृथ्वी के भूतल के सभी सर्पों का राजा है। यह देवराज इन्द्र के ही नागरूप हैं।

२-कालिया नाग – समुद्र के सर्पों का राजा है,समुद्री सर्पों की पूंछ मछली की तरह चपटी होती है,तथा ये विषवायु से आकाशचारी जीवों तक को समुद्र में गिरा देने की भी सामर्थ्य रखते हैं। कालियनाग के श्रीकृष्णजी द्वारा अंटार्कटिक समुद्र में भगाये जाने का (बरमूडा त्रिकोण) वर्णन मिलता है। दक्षिणी समुद्र में राहु केतु की माता सिंहिका भी समुद्री सर्प रूप में ही रहती थी। कालिय वरूणदेव के ही नागरूप हैं।

३-वासुकीनाग – विराट पुरुष के शरीरस्थ ईडा,पिंगला और सुषुम्ना नामक तीन मुखों वाले,तथा मेरूदण्ड के मूलाधार पर्यंत नाड़ियों की आकृति वाले,जिनका श्वास-प्रश्वास रूपी मंथक्रिया से संस्कार समुद्र के मंथन द्वारा अमृतत्व की प्राप्ति तक में महती भूमिका रहती है ऐसे योगीश्वर शिव के विशेष प्रिय नाग वासुकी हैं।ये विधाता ब्रह्मा के ही नागरूप हैं।

४-कपिलनाग -“सिद्धानां कपिलो मुनि:”योगक्रिया में, देंहादि अनात्मतत्त्वों के कर्दम में अनुप्रविष्ट आत्मचेतना को उनसे वियुक्तकर चेतना को आत्मतत्व में आहूत-संयुक्त कर देने वाले देवहूति नंदन को,जो समस्त सिद्धियों का अनुभव कराते हैं कपिल नाग कहा गया है।ये शिव के ही रूप हैं।

५-अनंत नाग- अनंतानंत ब्रह्मांडों को धारण करने वाले, अनंतानंत ब्रह्मांडों में जीवों का आगमन-निर्गमन कराने वाले जगदाधिष्ठान स्वरूप जगदात्मा जो अपरिमेय होने (मापरहित) से शेष भी कहलाते हैं वही श्रीकृष्णस्वरूप अनंत नाग हैं।

ॐ नमोस्त्वनंताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरूबाहवे!
सहस्रनाम्ने पुरूषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारिणे नमः:!!

नमो कपिलाय अनंताय वासुकिस्तक्षकाय च।
कालियस्तक्षकाय पंचनागाय वै नमः:।।

नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय तस्मै नकाराय नमः: शिवाय।।
नमो नागेन्द्राय,नाग कवचाय,नागांगदकुण्डलाय नागयज्ञोपवीतिने नागराजाय नमो नमः:।।

इस तरह प्राचीन ग्रंथों में और दर्शन में नागों का उल्लेख बहुतायत में मिलता है। नागों का प्रभुत्व भारत की प्राचीन सभ्यता से लेकर मिस्र एवं माया सभ्यता तक मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि नागों प्रभुत्व सार्वदेशिक रहा है।

डॉ कमलेश पाठक,
बलिया, उत्तर प्रदेश

पुनर्जन्म नागयोनि में!

भारत ही नहीं, अनेक देशों में गांवों, नगरों, जलाशयों, पहाड़ों और कंदराओं के रास्तों में नाग की मूर्तियां अथवा संकेतक मिल जाते हैं। ऐसा इसलिए है कि नाग हमारे लिए मार्ग के सूचक और प्रतीक रहे हैं। नाग की कोटियां और योनि रही है। पितृ होकर नागलोक भी मिलता है। पानी के बाद, जिन प्राणियों ने रास्तों को नापा और अपने निशान छोड़े, उनमें प्राचीन प्रमाण नागों के मिले। नागों के अपने चिह्न हैं। चिह्न से आशय भी नाग हैं। हाथी, उरग, ताल, माल जैसे कोई सौ वस्तुओं को नाग का पर्याय मिला है। भारत ही नहीं, मिस्र और यूनान तथा कंबोडिया और जावा तक ऐसी मान्यताएं मिल जाती हैं।

नागलोक की मान्‍यता के मूल में विश्‍वव्‍यापी विचार रहा है। गांव-गांव और खेत-खेत नागों के स्‍थानक बने मिलेंगे। यदि लोक मान्‍यता पर विचार करें तो कुछ लोगों को सांपों की दैहिक उपस्थिति भी होती है जिसमें वह अनायास ही सांप की तरह रैंगता हुआ आगे जाकर बैठ जाता है और लोग उसे अपनी पी‍ड़ाएं बताते हैं। राजस्‍थान में गोगाजी, तेजाजी, देवजी, ताखाजी, गातोड़जी ही नहीं कल्‍लाजी, जयमल आदि भी नाग योनि को प्राप्‍त लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं। (गांव गांव गोरख, नगर नगर नाथ)

बौद्ध ग्रंथों ललितविस्‍तर, जैन मूर्तिलक्षण ग्रंथों में अनेकत्र नागों का विवरण मिलता है। शिवधर्म पुराण और अन्‍यत्र भी यह विवरण है। नाग काे संख्‍या कोश में आठ का पर्याय माना गया है, इसलिए हमारे यहां अष्‍टकुली नागों की मान्‍यता रही है। यह नागपुरी नामक किसी राज्‍य के शासकों की वंश विस्‍तार बताता है, ऐसी मान्‍यता विदिशा में रही है जहां से नागवंशीय शासकों के सिक्‍के भी मिले हैं। बस्तर नागों की मान्यताओं से समृद्ध है। अतिमा वाजपेई की इस पर बड़ी किताब है।

मिस्र में भी यह मान्‍यता मिलती है। जैसा कि Luxor City – Egypt की सूचना है, वहां पर नागदेवी या नागिन की स्थापना रही है। यह ”आइसिस” के नाम से ख्यातिलब्‍ध थी। यह चंद्रमा की देवी मानी जाती है। हमारे यहां रोहिणी काे लेकर प्रचलित मान्‍यताओं पर विचार करना होगा। वह मिस्र ही नहीं, टोलेमियो और रोम के निवासियों के द्वारा भी सम्‍मान प्राप्‍त रही है। वे मानते थे क‍ि चांद के माथे पर तस्‍तरी एक नारी का प्रतीक है। आइसिस मिस्र के देवताओं ओसीरसि-मिथक के समूह में प्रमुखता प्राप्‍त देवी रही है।

यह जानकार आश्‍चर्य होता है कि संबंध उनमेें ऐसे हैं कि वह देवता की बहन भी है और उसकी पत्नी थी। उसने जीवनकाल में छह हत्‍याएं की। बाद में उसका शव बरामद हुआ। नेफथीस और थोथ के सहयोग से उसने दूसरी दुनिया में एक नया जीवन पाया…। उसने अपनी मुखाकृति नारी वाली रखी जबकि शेषांग नाग जैसा रखा। नागिन की हमारे यहां भी ऐसी कथाएं बहुत रोचक है… अहोई, साऊ या साई माता की पूजा की परंंपरा हमारे यहां रही है, इसे अहोई भी कहा जाता है, कार्तिक कृष्‍णा अष्‍टमी को खासकर मारवाड़ में यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन कही जाने वाली कथा में मिस्र की मान्‍यता का रोचक रूप देखा जा सकता है…।

आदरणीय श्रीराजेंद्ररंजन चतुर्वेदी लोक साहित्य के विद्वान अध्येताओं की तरह कहते हैं कि नाग हमारे गण गोत्र में हैं जिसे टोटम कहते हैं। वराहमिहिर ने मानव की मुख आकृतियों को पशु मुख से तौला है और उसे अनूक नाम दिया है। चतुर्वेदी जी कहते हैं :
नरसिंह [मुख सिंह का शरीर आदमी का]
वाराह [मुख शूकर का और बाकी शरीर आदमी का]
हयग्रीव [मुख घोडा का, शरीर आदमीका]
गणेश [मुखहाथी का, शरीर आदमी]
हनुमान [मुख वानर का, शरीर आदमी]।

फिर आगे उनके वाहन को देखें :
श्वान > भैरव,
गरुड >विष्णु,
महिष > यम,
उलूक > लक्ष्मी,
बैल > महादेव।
और,
गज-ग्राह युद्ध, नाग-गरुड-युद्ध प्रसिद्ध हैं। राम कथा का स्रोत काकभुशुंडि है। भगवत गाथा का स्रोत शुक है। युगान्त-प्रलय के समय एक सींगवाले मत्स्य का प्रादुर्भाव हुआ, उसने नाव में बैठे मनु की रक्षा की। समुद्र-मन्थन के समय कूर्म [कछुआ] ने मन्दराचल को पीठ पर धारण किया। हिरण्याक्ष जब धरती की चटाई बना कर पाताल ले गया, तब वाराह ने हिरण्याक्ष का वध करके अपने एक दंष्ट्र पर धरती को धारण किया और शेषनाग के फण पर प्रतिष्ठित कर दिया। विष्णु के पहले तीन अवतार मानवेतर हैं। चौथा अवतार नृसिंह अर्ध-मानुषी है। मत्स्य, वराह, कूर्म, गज, नाग, गरुड, वराह, सिंह, नंदी [बैल], शुक, काक, जटायु, कपि [ वानर हनुमान], मंडूक, तीतर, महिष, मयूर, अश्व आदि गणगोत्र [टोटम] हैं?

नागसभ्यता बहुत व्यापक है। नाग शक्तिशाली थे। जनमेजय का नाग यज्ञ महाभारत की ऐसी कहानी है कि जिसने कइयों को पहचान दी : नागदा जैसी बस्तियां ( मालवा और मेवाड़), तालाब ( नागहृद) , किले और मुहल्ले ही नहीं, ब्राह्मण और बनिये भी। मेवाड़ में नागदा कभी गुहिलों की राजधानी रहा और एकलिंग क्षेत्र के रूप में जाना गया। जहाजपुर भी ऐसी कथा समेटे हुए है। उत्तरा पुत्र परीक्षित को नाग ने मारा था। श्रीकृष्ण ने कालिय को यमुना से दूर भगाया था।

नागों ने नगर बसाये थे : तक्षशिला, नागपुर, नागौर, अहिच्छत्रपुर। पूरा नागलोक। नाग रसायन के जानकार थे। अमृत साधक। नागों की अन्य जातियों से अंतर्भुक्ति हुई, तब नागदेव तत्व का सूत्र व्यापक हुआ। शिव के साथ नाग, विष्णु के साथ नाग[शैया] बलराम शेषनाग के अवतार हैं। गूगापीर प्रसिद्ध हैं। उलूपी नागकन्या अर्जुन को व्याही थी। पार्श्वनाथ के प्रसंग ज्ञेय है। यह नाग-गाथा लंबी है। नाग, पुराण कथाओं में दूर-दूर तक फैला हुआ है। नाग संगीत की मान्यता और नागों द्वारा शास्त्रीय संगीत का अवदान मार्कण्डेय पुराण में साक्षीभूत है।

नागों को लेकर लोक में अनेक कहानियां कही जाती है। ग्रीक में देवी और नाग द्वारा सृष्टि रचना का मिथक प्रचलित है। हमारे यहां नाग कहां नहीं?

भाभी ने ननद से कहा कि > चलो मिट्टी खोद कर ले आवें ! ननद ने कहा कि आज हम उपासी हैं , आज नहीं । भौजाई बोली >> मैं मिट्टी खोद दूंगी , तुम भर लेना । ननद की समझ में आ गई , खदान पर पंहुचीं । भौजाई फावडा चलाने लगी , खोदते समय सांपिनी के अंडा-बच्चा फावडा लगने से मर गये। घर में मिट्टी आ गई। धीरे-धीरे बात पुरानी हो गई। उसे भूल गये। आगे चल कर भौजाई के गर्भ हो, बालक का जन्म भी हो किन्तु बालक कुछ दिन बाद ही मर जाय। छह बालक मरे ।

एक डोकरी-मैया आई। उसने कहा कि >> तूने स्याओ देवी मां का अपराध किया है । अब, यह स्याओ माता कौन है ? नाग देवी ! किस प्रकार यह कहानी हमें पुरातत्व के सूत्रों की भांति किसी प्राचीन – युग में ले जाती है ! यह संस्कृति शास्त्रियों के अध्ययन की बात है! ( व्रतखण्ड)

नाग कितना व्यापक है, पुराण कथाओं में दूर-दूर तक फैला हुआ है। गरुड कथा हो, शिव हों, विष्णु हों, पार्श्वनाथ हों, नाग के विस्तार को देखिये। गरुड क्यों विष्णु का वाहन है? उड़ने वाले नाग कैसे बारिश करते हैं। दिवाली का दीया देख नाग किस पाताल जाते हैं? भारत में अनेक-स्थानों पर नागतीर्थ हैं। मत्स्य, नरसिंह, कूर्म की तरह नाग पुराण था? महाभारत नाग शास्त्र के सूत्र आस्तिक मुनि के साथ लिए है। सुश्रुत और चरक विष व्याधियों के क्रम में नाग को नहीं भूलते। जिन दिनों मैं सर्पशास्त्र पर काम कर रहा था, तब अनेक पन्ने नागमणि की तरह आलोकित होते रहे। नीलमत पुराण ऐसी कहानियां आत्मसात् किए हैं। अनेक उत्सव नागों की देन हैं…!

डॉ. श्रीकृष्ण “जुगनू उदयपुर, राजस्थान

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