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ऐसे क्रांतिकारी जिनका निर्जीव शरीर समुद्र में फेक दिया गया

क्राँतिकारी महावीर सिंह राठौर का जन्म दिवस 16 सितम्बर विशेष

जेल की प्रताड़ना से हुआ था बलिदान कोई कल्पना कर सकता है ऐसे मानसिक दृढ़ संकल्प की कि पुलिस की हजार प्रताड़नाओं के बाद भले प्राण चले जायें पर संकल्प टस से मस न हो। ऐसे ही संकल्पवान क्राँतिकारी थे महावीर सिंह राठौर।

जिन्हें क्राँतिकारियों का विवरण पूछने के लिये प्रताड़ित किया गया और तब उन्होंने क्राँतिकारियों को प्रताड़ित किये जाने के विरुद्ध अनशन किया फिर भी प्रताड़ना बंद न हुई और अंततः 28 वर्ष की आयु में सेलुलर जेल में उनका बलिदान हो गया।

वे किशोर वय से स्वतंत्रता संग्राम में सहभागी बने थे। 1021 में जब असहयोग आँदोलन आरंभ हुआ तब वे सत्रह साल के भी पूरे नहीं हुये थे। उन्होंने अपनी आयु के किशोरों और बच्चों को एकत्र कर प्रभात फेरी निकाली।

झंडा लेकर जुलूस निकाला अंग्रेजों के विरुद्ध नारे लगाये। पुलिस ने पकड़कर दस बेतों की सजा दी और छोड़ दिया था पर बेंत प्रहार से उनका संकल्प और मजबूत हुआ। वे स्वाधीनता संग्राम की राह पर चल निकले।

ऐसे दृढ़ निश्चयी संकल्पवान क्राँतिकारी महावीर सिंह राठौर का जन्म 16 सितम्बर 1904 को उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले की शाहपुर तहसील के अंतर्गत ग्राम तहला में हुआ था। पिता देवी सिंह एक संपन्न और प्रभावशाली परिवार से थे। उनके पूर्वजों की जमींदारी भी रही थी।

परिवार आर्य समाज से जुड़ा हुआ था। पढ़ाई के लाये आर्य समाज से संबंधित डीएवी कॉलेज भेज दिया था और यहीं उनके विचारों में ओज एवं दृढ़ता आई। 1921 के असहयोग आँदोलन में सहभागी होने से वे काफी चर्चित हो गये थे इसलिए पढ़ाई के दौरान ही उनका संपर्क क्राँतिकारी गतिविधियों से उनका संपर्क सहज ही बन गया। वे नौजवान भारत सभा के सदस्य बन गये।

इस संस्था के माध्यम से वे लाहौर के क्राँतिकारियों के भी संपर्क में आये। इनमें सरदार भगतसिंह और दुर्गा भाभी भी शामिल थीं। 1922 की एक घटना है। तब वे मुश्किल से अठारह वर्ष के थे। असहयोग आँदोलन से निबटने के लिये अंग्रेज जगह जगह बैठकें कर रहे थे।

उसी दौरान उनके पिता जी ने उनकी शादी तय करने के सम्बन्ध में उनके पास पत्र भेजा जिसे पाकर वो चिंतित हो गए| अपने आप को मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए चल रहे यज्ञ में समिधा बना देने का दृढ संकल्प करने के बाद उन्होंने अपने पिता जी को राष्ट्र की आजादी के लिए क्रांतिकारी संघर्ष पर चलने की सूचना देते हुए शादी-ब्याह के पारिवारिक संबंधों से मुक्ति देने का आग्रह किया।

चंद दिनों बाद पिता का उत्तर आया, जिसमें लिखा था–मुझे यह जानकर बड़ी ख़ुशी हुई कि तुमने अपना जीवन देश के काम में लगाने का निश्चय किया है। मैं तो समझता था कि हमारे वंश में पूर्वजों का रक्त अब रहा ही नहीं और हमने दिल से परतंत्रता स्वीकार कर ली है, पर आज तुम्हारा पत्र पाकर मैं अपने को बड़ा भाग्यशाली समझ रहा हूँ। शादी की बात जहाँ चल रही है, उन्हें यथायोग्य उत्तर भेज दिया है। तुम पूर्णतः निश्चिन्त रहो, मैं कभी भी ऐसा कोई काम नही करूंगा जो देशसेवा के तुम्हारे मार्ग में बाधक बने। देश की सेवा का जो मार्ग तुमने चुना है वह बड़ी तपस्या का और बड़ा कठिन मार्ग है लेकिन जब तुम उस पर चल ही पड़े हो तो कभी पीछे न मुड़ना, साथियो को धोखा मत देना और अपने इस बूढ़े पिता के नाम का ख्याल रखना। तुम जहाँ भी रहोगे, मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है।—-तुम्हारा पिता देवी सिंह

कासगंज में अंग्रेज कलेक्टर ने अपने विश्वस्त लोगों की बैठक बुलाई। इसमें सभी कर्मचारी और अधिकारियों के परिवारों को राजभक्ति प्रदर्शित करने केलिये बुलाई गई थी। इस बैठक में महावीर सिंह और उनका परिवार भी था। योजनापूर्वक वक्ता अंग्रेजी शासन की प्रशंसा कर रहे थे। इसी बीच महावीर सिंह ने उठकर वंदेमातरम और महात्मा गाँधी की जय का नारा लगा दिया। कलेक्टर नाराज हुआ। बंदी बनाये गये। परिवार जनों की प्रार्थना के बाद मुक्त किये गये।

1929 में दिल्ली की असेंबली बम काँड और सांडर्स वध काँड मामलों में सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी सिंह, राजगुरु सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त के साथ इन्हें भी सह आरोपी बनाया गया। मुकदमे की सुनवाई लाहौर में हुई। महावीर सिंह को आजीवन कारावास का दंड मिला।

पहले उन्हें पंजाब की जेल में रखा। 1933 में अंडमान की सेल्यूलर जेल में भेजा गया। यह जेल बंदियों को यातना देने के लिये “काला पानी” के नाम से कुख्यात थी। इस जेल में राजनैतिक बंदियों के साथ हो रहे अत्याचार के विरुद्ध महावीर सिंह ने भूख हड़ताल की।

अनशन के छठे दिन से ही अधिकारियों ने इसे कुचलने के लिए बलपूर्वक दूध पिलाने का कार्यक्रम आरम्भ कर दिया। वो 17 मई 1933 की शाम थी, जब आधे घण्टे की कुश्ती के बाद दस -बारह व्यक्तियों ने मिलकर महावीर सिंह को जमीन पर पटक दिया और डाक्टर ने एक घुटना उनके सीने पर रखकर नली नाक के अन्दर डाल दी।

उसने यह देखने की परवाह भी नही की कि नली पेट में न जाकर महावीर सिंह के फेफड़ो में चली गयी है। अपना फर्ज पूरा करने की धुन में पूरा एक सेर दूध उसने फेफड़ो में भर दिया और उन्हें मछली की तरह छटपटाता हुआ छोडकर अपने दल -बल के साथ दूसरे बन्दी को दूध पिलाने चला गया।

महावीर सिंह की तबियत तुरंत बिगड़ने लगी। कैदियों का शोर सुनकर डाक्टर उन्हें देखने वापस आया लेकिन उस समय तक उनकी हालत बिगड़ चुकी थी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहाँ रात के लगभग बारह बजे आजीवन लड़ते रहने का व्रत लेकर चलने वाला ये अथक क्रांतिकारी देश की माटी में विलीन हो गया। उनका बलिदान हुआ तो उनका निर्जीव शरीर समुद्र में फेक दिया गया।

इस प्रकार क्राँतिकारी महावीर सिंह के प्राणों का 28 वर्ष की आयु में बलिदान हुआ। इस घटना के विरोध में सेलुलर जेल के तीस अन्य राजनैतिक बंदियों ने भूख हड़ताल की। इसमें मोहित मोइत्रा और मोहन किशोर नामदास का भी बलिदान हुआ। उनके सम्मान में सेललुर जेल के सामने एक मूर्ति स्थापित की गई।

आलेख

श्री रमेश शर्मा,
भोपाल मध्य प्रदेश

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