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तरेंगा राज की महामाई

दाऊ कल्याण सिंह की नगरी एवं तरेंगा राज शिवनाथ नदी के तट पर राजधानी रायपुर से 70 किलोमीटर एवं बिलासपुर से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह गांव मां महामाया की नगरी के नाम से प्रसिद्ध है, मान्यता के अनुसार मां महामाया का मंदिर  प्राचीन है, मंदिर के पुजारी लोकेशनाथ योगी बताते हैं कि यह मंदिर उनके पूर्वजों के भी पूर्वजों के समय का समय का है।

महामाई माता का दरबार

मंदिर के इतिहास से जुड़ी एक कथा प्रचलित है कहा जाता है कि “एक बार एक भैसा तालाब में गिर गया जब वह तालाब से निकला तो उसके सिंग पर जल में उपस्थित जाले एवं चीले इत्यादि लग गए थे जब भैसा दौड़ने लगा तो ग्रामवासियों ने उसका पीछा किया, पीछा करने के पश्चात जहां वह भैंसा रुका वहां हवन कुंड था और मां महामाया का मंदिर एवं बलि दी हुई सामग्री पशुओं के सींग इत्यादि ग्रामवासियों ने देखे। ग्रामवासी मंदिर के अस्तित्व से अज्ञात थे, ग्रामवासियों ने इसकी सूचना गांव के मुखिया को दी, गांव के बैगा ईश्वर पटेल बताते हैं कि यह घटना तुलेश्वर नाथ अग्रवाल जो दाऊ कल्याण सिंह के दादा है उनके समय से भी पहले की है।

समय-समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया परंतु मां महामाया देवी की प्रतिमा वैसी ही स्थापित है जैसी वह पहले हुआ करती थी। जीर्णोद्धार का कार्य मंदिर एवं गर्भ गृह के बाहर ही हुआ है। माता के श्रृंगार हेतु सामने के दरवाजे से प्रवेश वर्जित है अर्थात पुजारी माता के श्रृंगार हेतु पीछे के दरवाजे से जाकर मां का श्रृंगार करते हैं, बाकी मंदिरों के समान गर्भ गृह में मां महामाया की प्रतिमा दरवाजे के सीध में ना होकर बाजू में रखी गई है ताकि सीधी दृष्टि मां पर ना पड़े।

महामाई माता

ग्रामवासियों की यह भी मान्यता है कि मां महामाया विपदा ओं एवं बीमारियों से ग्राम वासियों की रक्षा करती है इसीलिए जाते हुए आषाढ़ मास से बैगा गांव की नदी से जल लाकर माता को चढ़ाकर उस जल की पूजा करके ग्राम बांधने की तैयारी में लग जाते हैं, इस प्रक्रिया के पहले गांव में हांका किया जाता है। सावन के आखिरी हफ्ते में यह जल का छिड़काव गांव के चारों ओर किया जाता है। बैगा इस जल का छिड़काव ग्रामवासियों को अपने घरों में किसानों को अपने खेत-खार में करने को कहते हैं इसके पश्चात मां महामाया महामारी जादू-टोना, धुकी-महामारी इत्यादि से गांव की रक्षा करती है।

जिस प्रकार एक मां अपनी संतान की रक्षा करती है, उसी प्रकार मां महामाया भी अपनी संतानों की रक्षा करती है। ग्रामवासी यहां अपनी मनोकामना की पूर्ति हेतु आते हैं, मंदिर प्रांगण में स्थित अकोल के वृक्ष पर सैकड़ों नारियल बंधे हुए हैं जो मनोकामना ओं की पूर्ति हेतु बांधे गए हैं। इनमें से कुछ नारियल बहुत पुराने हैं परंतु एक नारियल में भी चींटी अथवा सूक्ष्म जीव जंतु देखने को नहीं मिलते।

मानता पीपल वृक्ष

मनोकामना पूर्ण होने के पश्चात ग्रामवासी यहां बलि देते हैं अथवा भंडारा करवाते हैं, जिस प्रकार माता अपना स्नेह बनाए रखती है उसी प्रकार माता के रुष्ट होने पर माता का प्रकोप भी देखने को मिलता है। वर्षों पहले माता रुष्ट गई थी एवं अपने मंदिर के पट अंदर से बंद कर लिए थे, अथक प्रयासों के पश्चात भी पट ना खुलने पर माता को बकरे एवं 108 नींबू की बलि चढ़ाई गई तत्पश्चात माता ने पट खोले। वहीं दूसरी ओर रूष्ट होने पर माता ग्राम से चली गई थी, कुछ ही दूरी पर माता का मंदिर बनाकर माता को रोका गया एवं वापस गांव लाया गया।

मंदिर प्रांगण में उपस्थित एक श्रद्धालु कमलकांत बताते हैं कि मां महामाया की तीन बहने और है, जिनमें दो तालाब के किनारे एवं एक सिंगारपुर स्थित मावली में स्थापित है। ग्रामवासी कहते हैं कि चारों बहनें आधी रात में स्नान हेतु तालाब में जाती है जिसने भी देखने की कोशिश की या पीछे गया वह कभी लौट कर नहीं आया। नवरात्रि में मां महामाया सिंगारपुर में स्थित अपनी छोटी बहन को श्रृंगार चढ़ाने जाती है। मंदिर में मां महामाया के अतिरिक्त खुजली माता का मंदिर भी है, कहा जाता है माता को नमक चढ़ाकर, माता के पानी से स्नान करने से सभी चर्म रोगों से निदान मिलता है।

ठाकुर देवता – तरेंगा राज, भाटापारा

मंदिर प्रांगण में छोटी-छोटी आकर्षक मूर्तियां भी स्थापित हैं जो समिति के द्वारा बनवाई गई है। छोटे-छोटे मंदिर हैं जो समितियों तथा ग्रामवासियों द्वारा बनवाए गए हैं। इसके अतिरिक्त प्रवेश द्वार के बाई और ठाकुर देव विराजमान है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि गांव के बैगा चंदन दास योगी द्वारा यह प्रतिमा निकाली गई, तत्पश्चात उनका स्वर्गवास हो गया। गांव के बैगा ईश्वर पटेल बताते हैं कि चबूतरे के नीचे ठाकुर देव की अनेकों प्रतिमाएं हैं।

मंदिर में श्रद्धालुओं के द्वारा अखंड ज्योत जलाई जाती है। नवरात्रि में हजारों की भीड़ में लोग इकट्ठा होकर मां महामाया की उपासना करते हैं एवं ज्योत प्रज्वलित की जाती है, भंडारे करवाए जाते हैं मेलों का आयोजन भी किया जाता है।

आलेख

श्रुतिप्रिया शर्मा
प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग
पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर

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