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मुगलों को धूल चटाने वाले वीर योद्धा – लचित बोरफ़ुकन

लचित बोरफुकन, जिन्हें ‘चाउ लासित फुकनलुंग’ नाम से भी जाना जाता है, 17वीं शताब्दी के एक महान और वीर योद्धा थे। उनकी वीरता के कारण ही उन्हें पूर्वोत्तर भारत का वीर ‘शिवाजी’ कहा जाता है। उन्होंने मुगलों के खिलाफ जो निर्णायक लड़ाई लड़ी थी, उसके लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है।

उनका जन्म 24 नवंबर1622 में अहोम राजवंश के एक बड़े अधिकारी के घर ‘चराइदेऊ’नामक स्थान पर हुआ था | उनका पूरा नाम ‘चाउ लाचित फुकनलुंग’था उन्होंने सैन्य कौशल के साथ–साथ मानविकी तथा शास्त्र का भी अध्ययन किया था| बचपन से ही काफी बहादुर और समझदार लाचित जल्द ही अहोम राजवंश की सेना के सेनापति बनगए। बरफूकन, लाचित का नाम नहीं बल्कि उनकी पदवी थी।

पूर्वोत्तर भारत के इस राज्य पर साल 1225 से लेकर 1826 तक अहोम साम्राज्य का शासन था। अहोम साम्राज्य की स्थापना म्यांमार के शान प्रांत से आये सुकफ़ा (Sukaphaa) नाम के राजा ने की थी। इस साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में मानस नदी तक और पूरब में पटकई पहाड़ी क्षेत्र तक हुआ करता था।

अहोम साम्राज्य की स्थापना भले ही बाहर से आए लोगों ने की थी, लेकिन इसके शासकों ने बेहद ही आत्मीय तरीके से यहां के स्थानीय लोगों के साथ अपने आप को जोड़ लिया। इसके शासकों ने असम के बाहुल्य हिंदू जनता के धर्म के मुताबिक ही अपना शासन किया और खुद को हिंदू धर्म से जोड़कर ही पेश किया।

दूसरी तरफ मध्यकाल में मुगल साम्राज्य का विस्तार कूच बिहार तक हो गया था और अब वे पूरब की ओर बढ़ना चाहते थे, जिसके लिए मुगलों ने अपनी नजदीकी कूच साम्राज्य के साथ बढ़ानी शुरू कर दी। जब कभी अहोम और कूच साम्राज्य के बीच कोई संघर्ष होता तो मुगल हमेशा कूच साम्राज्य का साथ देते थे।

बता दें कि अहोम का सबसे ज्यादा तनाव इसके पड़ोसी राज्य कूच साम्राज्य से ही रहता था। तमाम इतिहासकारों का मानना है कि मुगल दो वजहों से पूर्व की ओर बढ़ना चाहते थे। इनमें से पहला है अहोम साम्राज्य के उपजाऊ जमीन पर मुगलों का नियंत्रण और दूसरा उनके साम्राज्य का विस्तार।

साल 1615 में कूच बिहार साम्राज्य के राज परिवार में आपसी कलह शुरू हो गया और धीरे-धीरे यह कलह सत्ता के लिए संघर्ष के रूप में उभरकर सामने आया। इस संघर्ष में एक गुट का समर्थन मुगलों ने किया तो दूसरे का अहोम ने। इसी क्रम में मुगलों और उनके बीच कई लड़ाइयां लड़ी गई।

साल 1661 में मुगलों की विशाल सेना ने उनको काफी बुरी तरीके से हराया और उन्हें एक बेहद अपमानजनक संधि करने के लिए मजबूर कर दिया। इस समय के मुताबिक गुवाहाटी का नियंत्रण उनके हाथों से निकलकर मुगलों के नियंत्रण में आ गया। गुवाहाटी अहोम के हाथ से जा चुका था, लेकिन साल 1667 में लाचित बोड़फुकन की अगुवाई में अहोम ने एक बार फिर से गुवाहाटी को वापस छीन लिया।

औरंगजेब को जैसे ही गुवाहटी के बारे में पता चला तो उसने आमेर के राजा राम सिंह की अगुवाई में एक बड़ी सेना अहोम पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। उस वक्त उनके राजा चक्रध्वज सिंह थे और इसके सेनापति लाचित बोड़फुकन। बता दें कि इस साम्राज्य के सेना प्रमुख को बोड़फुकन कहा जाता है।

दुर्भाग्य से 1670 में राजा चक्रध्वज सिंघा का देहांत हो गया और उदयादित्य सिंघा नए राजा बने। 1671 के आरंभ में राम सिंह को अपने गुप्तचरों से पता चला कि अन्दुराबली के किनारे पर रक्षा इंतजामों को भेदा जा सकता है और गुवाहाटी को फिर से हथियाया जा सकता है।

उसने इस अवसर का फायदा उठाने के उद्देश्य से मुगल नौसेना खड़ी कर दी। उसके पास चालीस जहाज थे जो सोलह तोपों और छोटी नौकाओं को ले जाने में समर्थ थे। दुर्भाग्यवश लाचित इस समय इतने अस्वस्थ हो गए कि उनका चलना-फिरना भी अत्यंत कठिन हो गया।

1671 के मार्च महीने में सराईघाट का युद्ध आरंभ हुआ। यह युद्ध उस यात्रा का चरमोत्कर्ष था जो यात्रा आठ वर्ष पहले मीर जुमला के आक्रमण से आरंभ हुई थी। भारतवर्ष के इतिहास में कदाचित् यह पहला महत्वपूर्ण युद्ध था जो पूर्णतया नदी में लड़ा गया। ब्रह्मपुत्र नदी का सराईघाट इस ऐतिहासिक युद्ध का साक्षी बना।

इस युद्ध में ब्रह्मपुत्र नदी में एक प्रकार का त्रिभुज बन गया था, जिसमें एक ओर कामख्या मंदिर, दूसरी ओर अश्वक्लान्ता का विष्णु मंदिर और तीसरी ओर इटाकुली किले की दीवारें थीं। यह भीषण युद्ध जलस्थिति इसी त्रिभुजाकार सेना-संरचना में लड़ा गया।

इस निर्णायक युद्ध में अहोम सेना ने महान योद्धा लाचित बरपुखान के नेतृत्व में अपने वर्षों के युद्धाभ्यास से अर्जित रणकौशल का अद्भुत प्रदर्शन किया। इस युद्ध में अहोम सेना ने अनेक आधुनिक युक्तियों का उपयोग किया। यथा- पनगढ़ बनाने की युक्ति।

युद्ध के दौरान ही बनाया गया नौका -पुल छोटे किले की तरह काम आया। अहोम की बच्छारिना (जो अपने आकार में मुगलों की नाव से छोटी थी) अत्यंत तीव्र और घातक सिद्ध हुई। इन सभी आधुनिक युक्तियों ने लाचित बरपुखान की अहोम सेना को मुगल सेना से अधिक सबल और प्रभावी बना दिया।

दो दिशाओं से हुए प्रहार से मुगल सेना में हडकंप मच गया और सांयकाल तक उसके तीन अमीर और चार हजार सैनिक मारे गए। इसके बाद मुगल सेना पूरी तरह तबाह होकर मानस नदी के पार भाग खड़ी हुयी। दुर्भाग्यवश इस युद्ध में घायल लाचित बरपुखान ने कुछ दिन बाद ही प्राण त्याग दिए।

वीर सपूत लाचित बरपुखान के नेतृत्व में अहोम सेना द्वारा अर्जित की गई सराईघाट की इस अभूतपूर्व विजय ने असम के आर्थिक विकास और सांस्कृतिक समृद्धि की आधारशिला रखी। आगे चलकर असम में अनेक भव्य मंदिरों आदि का निर्माण हुआ।

यदि सरायघाट के युद्ध में मुगलों की विजय होती, तो वह असम के लिए सांस्कृतिक विनाश और पराधीनता लेकर आती। लेकिन लाचित बरपुखान जैसे भारत माँ के वीर सपूत के अदम्य साहस और असाधारण नेतृत्व क्षमता के कारण ही मुगल साम्राज्य के दुष्प्रभाव से अहोम साम्राज्य बच सका।

मरणोपरांत भी लाचित असम के लोगों और अहोम सेना के ह्रदय में अग्नि की ज्वाला बनकर धधकते रहे और उनके प्राणों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। लाचित बरपुखान द्वारा संगठित सेना ने 1682 में मुगलों से एक और निर्णायक युद्ध लड़ा, जिसमें उसने अपने सेनापति लाचित को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए इटाकुली किले से मुगलों को खदेड़ दिया। परिणामस्वरूप, मुग़ल फिर कभी असम की ओर नहीं आए।

मुगल आक्रांताओं को पराजित करके स्वराष्ट्र के स्वाभिमान और गौरव की रक्षा करने वाले लाचित बरपुखान जैसे प्रेरणास्पद पूर्वजों से प्रभावित होकर ही तिरोत सिंह, नंगबाह, पा तागम संगमा, वीरांगना रानी रुपलियानी, रानी गाइदिन्ल्यू, मनीराम दीवान, गोपीनाथ बारदोलोई, कुशल कुँवर, कनकलता बरुआ आदि स्वाधीनता सेनानियों ने आगे चलकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध भी आजीवन संघर्ष किया। उत्तर-पूर्व भूमि की पवित्रता और स्वाधीनता की रक्षा में लाचित बरफूकन के शौर्य और बलिदान का अप्रतिम और आदि महत्व है।

उनका जीवन-आदर्श और जीवन-मूल्य ही परवर्ती स्वाधीनता सेनानियों का पाथेय और प्रेरणा बने। यही कारण है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 24 नवम्बर 2015 को “लाचित दिवस” के अवसर पर उनकी वीरता को रेखांकित करते हुए कहा था, “लाचित भारत के गौरव हैं। सराईघाट के युद्ध में उनके द्वारा प्रदर्शित अभूतपूर्व साहस को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है।” इस वर्ष असम सरकार द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में उनकी जन्मजयंती को बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। आजादी की अमृत महोत्सव बेला में इतिहास के उपेक्षित नायकों की पुनर्प्रतिष्ठा सराहनीय पहल है।

संदर्भ

1- हिन्दी ओप इंडिया, 2- दृष्टि, 3- भारत डिस्कवरी, 4- दिभू डॉट कॉम, अमर उजाला

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