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महर्षि महेश योगी की जन्म भूमि पाण्डुका

छत्तीसगढ़ की पावन धरा अनेक संतों एवं महापुरूषों की जन्म स्थली रही है। उन्हीं में से एक दिव्यात्मा महर्षि महेश योगी जी हैं। इनका जन्म पवित्र राजिम नगरी से कुछ दूरी पर स्थित पाण्डुका ग्राम में 12 जनवरी सन् 1918 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। जहां पर वे एक कच्चे मकान में रहा करते थे। उनका मूल नाम महेश प्रसाद वर्मा था।

महर्षि जी के पिता जी राजस्व विभाग में आर.आई के पद पर कार्यरत् थे। महर्षि महेश योगी जब छोटे थे तभी उनके पिता जी का तबादला पाण्डुका से गारड़वाड़ा जबलपुर हो गया। जबलपुर से उन्हें बेहद लगाव था। योगी जी ने हितकारिणी स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक की उपाधि अर्जित की तत्पश्चात् दर्शनशास्त्र  में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त किये।

पाण्डुका में गुरुकुल आश्रम

महेश योगी जी गन कैरीज फैक्ट्री में नौकरी भी किये, इसी दौरान् उनकी मुलाकात स्वामी ब्रम्हानंद सरस्वती जी से हुई। यही से उनके जीवन में एक नया मोड़ आया और वे आध्यात्म की ओर अग्रसर हो गये। उन्होंने ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी के सानिध्य में 13 वर्ष तक शिक्षा ग्रहण की।

महर्षि महेश योगी ने शंकराचार्य की मौजूदगी में रामेश्वरम् में दस हजार बाल ब्रह्मचारियों को आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा दी। जानकार बताते हैं कि 1953 में वाराणसी के दशाश्वमेध घाट में उनके गुरू शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी को जल समाधि दी जा रही थी, इसी समय महर्षि महेश योगी वहां पहुंचे और गुरू के बिछोह में वे इतने द्रवित हो गए कि उन्होंने गंगा नदी में छलांग लगा दी थी, गोताखोरों ने उन्हें बाहर निकाला था।

हिमालय क्षेत्र में दो वर्ष का मौन व्रत किये तथा ध्यान और योग सीखे तथा सन् 1955 में उन्होंने टी.एम. तकनीक (ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन) अर्थात् अनुभवातीत ध्यान की शिक्षा देना शुरू किया। सन् 1957 में 150 देशों का भ्रमण कर भारतीय आध्यात्म तथा ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन को एक आन्दोलन के रूप में शुरू किए। महर्षि महेश योगी भारतीय संस्कृति के संदेशवाहक, अध्यात्मिक महापुरूष, विश्व बंधुत्व, आधुनिक ज्ञान तथा संसार के महा समन्वयक होने का गौरव प्राप्त किया है। योगी जी ने सम्पूर्ण दुनिया को शांति और सदाचार की शिक्षा दी और 200 से अधिक देशों में अपने भारत देश का नाम रोशन किया।

आश्रम के व्यवस्थापक एवं शिक्षक तुलेन्द्र तिवारी जी

महर्षि योगी पर कई पुरूस्कार जीतने वाली फिल्म बना चुके बीबीसी के यावर अब्बास ने एक बार ऋषिकेश स्थित उनके आश्रम में उनसे पूछा था कि क्या कारण है कि वे और उनका ध्यान योग पश्चिम देशों में बहुत लोकप्रिय है किन्तु भारत में नहीं। महेश योगी जी का जवाब था ‘‘इसकी वजह यह है कि यदि पश्चिमी देशों में लोग कीसी चीज के पीछे वैज्ञानिक कारण देखते हैं तो उसे तुरन्त अपना लेते हैं और मेरा ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन योग के सिद्धांतों पर क़ायम रहते हुए पूरी तरह वैज्ञनिक है।‘‘

उस दौर का ख्याति प्राप्त रॉक म्युज़िक ग्रूप ‘बीटल्स‘ ने 1968 में उनके आश्रम का दौरा किया और वह महर्षि महेश योगी जी के शरण में चला गया, तब यह आन्दोलन अपने चरम पर आ गया। ध्यान में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए बीटल्स ग्रूप भारत आया था। उसके बाद उन्होंने जो गीत लिखा वह योगी जी द्वारा बताई गई कहानियों पर आधारित था।

सन् 1975 तक ट्रेसडेंशल मेडिटेशन अर्थात् भावातीत ध्यान पूरी पश्चिमी देशों में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। 1954 को टाईम पत्रिका ने अपने कव्हर पेज पर महर्षि महेश योगी की चित्र सहित कवर स्टोरी छापी थी जिसका शिर्षक था ‘‘ध्यान सारी समस्याओं का जवाब।“ भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से लेकर आध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा जी भी महर्षि महेश योगी जी के शिष्य हुए।

एक बार महर्षि महेश योगी से ओशो रजनीश के शिष्यों ने उनकी मुलाकात का आयोजन कराया था। योगी जी ने वेदों में निहित ज्ञान पर आधारित कई पुस्तकों की रचना किये आधुनिक तकनीकी के द्वारा अपनी शिक्षा एवं उपदेशों का प्रचार किए। उन्होंने महर्षि मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना की, जहां पर ऑनलाईन शिक्षा दी जाती थी।

श्री राम मुद्रा

योगी जी ने अपने विश्व यात्रा की शुरूआत सन् 1959 में अमेरिका से प्रारंभ किया। इनके दर्शन का मूल आधार था ‘‘जीवन परम आनंद से भरपूर है और मनुष्य का जन्म इसका आनंद उठाने के लिए हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति में ऊर्जा, ज्ञान और सामर्थ्य का अपार भंडार है तथा इसके सदुपयोग से वह जीवन को सुखद बना सकता है।‘‘ महर्षि कहते थे प्रातः और सायं दो बार 15 से 20 मिनट तक ध्यान किया जाना चाहिए। ध्यान के लिए वे मंत्र भी देते थे। मंत्र जाप में साधक की चार श्रेणियां आती हैं। पहली बैखरी, दूसरी मध्यमा, तीसरी पश्यंती और चैथी परा।

महर्षि महेश योगी इस बात के लिए भी सुर्खियों में आए थे कि उन्होंने अपने भक्तों को उड़ना सिखाने का दावा किया था। ये योगी जी के अनुभवातीत ध्यान का ही एक हिस्सा था। इसमें उनके भक्त फुदकते हुए उड़ने की कोशिश करते थे। फ्लाइंग योगा को योगी जी ने ‘ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन सिद्धी प्रोग्राम‘ का नाम दिया था और इसे ध्यान चिकित्सा के तौर पर प्रायोजित किया था। उनका दावा था कि ‘फ्लाइंग योगा‘ की उनकी थ्योरी पूरी तरह से शोध के बाद विकसित की गई है।

योगी जी ने राम नाम की एक मुद्रा भी चलाई थी, जिसे नीदरलैंड ने साल 2003 में कानूनी मान्यता दी थी। राम नाम की इस मुद्रा में चमकदार रंगों वाले एक, पांच और दस के नोट थे। इस मुद्रा को महर्षि की संस्था ‘ग्लोबल कंट्री ऑफ वल्र्ड पीस‘ ने साल 2002 के अक्टूबर माह में जारी किया था। नीदरलैंड के कुछ गांवों और शहरों की सौ से अधिक दुकानों में ये नोट चलने लगे थे। अमेरीकी राज्य आईवा के महर्षि वैदिक सिटी में भी ‘राम‘ मुद्रा का प्रचलन था। 35 अमेरीकी राज्यों में ‘राम‘ पर आधारित बॉन्डस शुरू किए गए थे।

महर्षि संस्थान द्वारा संचालित श्री राम मुद्रा

महर्षि महेश योगी जी के भारत में – आन्ध्र प्रदेश, बिहार, उत्तर – प्रदेश, मध्य – प्रदेश, नेपाल, असम एवं दूसरे राज्यों के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड आदि अनेक स्थानों पर आश्रम है, जहां वैदिक और आधुनिक शिक्षा के अलावा ध्यान और योग की शिक्षा दी जाती है। वर्ष 1990 में हॉलैंड के व्लोड्राप गांव में ही अपनी सभी संस्थाओं का मुख्यालय बनाकर, वे वहीं स्थायी रूप से बस गए और संगठनों से जुड़ी गतिविधियों का संचालन करने लगे।

दुनिया भर में उनके साठ लाख अनुयाईयों के माध्यम से उनकी संस्थाओं ने आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और प्राकृतिक तरीके से बनाई गई कॉस्मेटिक हर्बल दवाओं के प्रयोग को बढ़ावा दिये। अपने सेवानिवृत्त होने पर उन्होंने कहा था, कि मेरे गुरू ने मुझे जो कार्य दिया था वह मैने कर दिया। साल 2008 में जारी हुई उनकी संस्था से जुड़ी एक रिपोर्ट के अनुसार महेश योगी ने 150 देशों में 500 स्कूल, दुनिया में 4 महर्षि विश्वविद्यालय और चार देशों में वैदिक शिक्षण संस्थान खोले थे। इनका संगठन ‘लाभ न अर्जित करने वाला‘ संगठन था, लेकिन साल 2008 कि रिपोर्ट में उनके संगठन के पास दो अरब पाउंड यानि तकरीबन 160 अरब रूपयों की संपत्ति होने की बात कही गई थी।

डच के स्थानीय समय के अनुसार एम्सटर्डम के पास छोटे से गांव व्लोड्राप में स्थित अपने नीजि आवास में 06 फरवरी 2008 को महर्षि महेश योगी जी की मृत्यु की सूचना मिली, तो सारे आश्रम शोक सन्तप्त हो गए। 11 फरवरी को उनका पार्थिव शरीर प्रयागराज लाया गया और उनका अन्तिम संस्कार किया गया।

आलेख

ललित शर्मा
इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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