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स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानी : हेमू कालाणी

21 जनवरी 1943 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी हेमू कालाणी बलिदान दिवस

भारतीय सवाधीनता संग्राम असंख्य बलिदानों का इतिहास है। हजारों लाखों जीवन की आहूति के बाद ही भारत में स्वतंत्रता का सूर्य उदित हो सका। ऐसे ही एक अमर बलिदानी हैं हेमू कालाणी। संभवतः उनका जन्म ही स्वाधीनता संग्राम के लिये हुआ था। वे अपनी बालवय सात वर्ष की आयु से ही हाथ में तिरंगा लेकर प्रभात फेरियों में शामिल होने लगे थे। बचपन से स्वतंत्रता संघर्ष का नशा कुछ ऐसा चढ़ा जो जीवन के बलिदान के बाद ही शाँत हो सका।

क्राँतिकारी हेमू कलाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को सिन्ध प्राँत के सुक्कुर में हुआ था। यह क्षेत्र अब पाकिस्तानमें में है। परिवार जैन परंपरा का अनुयायी था पर पिता की सक्रिय भागीदारी आर्यसमाज के आयोजनों में थी। इस कारण परिवार में स्वत्व स्वाभिमान, साँस्कृतिक और राष्ट्र जागरण का भाव था।

संयोग से बलिदानी हेमू कालाणी का जन्म ठीक उसी दिन हुआ था जिस दिन इतिहास प्रसिद्ध क्राँतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी गई थी। उनके पिता पेसुमल कालाणी व्यवसायी थे और माता जेठी बाई धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिये समर्पित रहीं।

पंजाब और सिन्ध का यह क्षेत्र तीन परंपराओ से बहुत जाग्रत था। एक तो आर्यसमाज के सांस्कृतिक अभियान से, दूसरा क्राँतिकारियों के आंदोलन से तीसरा गाँधी जी के स्वदेशी आव्हान से। उस क्षेत्र का बच्चा बच्चा स्वदेशी और राष्ट्र जागरण के रंग में रंग रहा था।

गांव गांव में प्रभात फेरियाँ निकलने लगी थीं। जब हेमू केवल सात वर्ष के थे तब उन्होंने हाथ में तिरंगा लेकर प्रभात फेरियों में हिस्सा लेना आरंभ कर दिया था। स्वदेशी का यह भाव जो उनके बचपन में पनपा अंतिम श्वांस तक यथावत रहा।

किशोर अवस्था में वे क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रति आकर्षित हुए और क्रान्तिकारियो के संपर्क में आ गये। वे टोली बनाकर दोनों दिशाओं में एक साथ काम करने लगे। अंग्रेजों से भारत को स्वतंत्र कराने के जलसे जुलूस में भी और क्राँतिकारी गतिविधियों में भी हिस्सा लेते। भगाने के उद्देश्य से विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने लगे।

वे पढ़ने में भी बहुत होशियार थे। इसके साथ खेल कूद, तैराकी और दौड़ स्पर्धाओं में भी हिस्सा लेते थे। खेल गतिविधियों में कई बार पुरस्कृत हुए। अभी वे केवल उन्नीस वर्ष के थे कि 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ हो गया। यह आव्हान गांधी जी ने किया था।

गाँधी जी ने ‘अंग्रेजो से भारत छोड़ने को कहा और भारतीयों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया। यह आंदोलन पूरे देश में फैला। यद्यपि आंदोलन की पूर्व बेला में गाँधी जी और काँग्रेस के लगभग सभी नेता बंदी बना लिये गये थे। पर आँदोलन न रुका। आँदोलन स्वस्फूर्त हो गया। जो जहाँ था वह आंदोलन मे टूट पड़ा।

हेमू कालाणी भी अपने दोस्तों और टोली के साथ आँदोलन में कूद पड़े। वे जिस संगठन के माध्यम से क्राँतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे उसका नाम ‘स्वराज सेना’ था। सिन्ध प्राँत के आँदोलन में इस संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इसी संगठन के आव्हान पर हेमू ने ‘अंग्रेजो- भारत छोड़ो’ के नारे के साथ पूरे सिंध में स्वदेशी अभियान छेड़ दिया।

वे विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार एवं स्वदेशी अपनाने के आव्हान के साभाएँ करते नौजवानों को जाग्रत कर रहे थे। तभी क्रांतिकारियों को जानकारी मिली कि बलूचिस्तान में चल रहे आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज सैनिकों, हथियारों व बारूद से भरी रेलगाड़ी सिंध के रोहिणी स्टेशन और सक्खर शहर से होकर बलुचिस्तान के क्वेटा नगर जाएगी।

यह समाचार सुनकर संगठन ने इस रेलगाड़ी रोकने का दायित्व 19 वर्षीय छात्र हेमू कालाणी और उनकी टोली को दिया। वह 23 अक्टूबर 1942 की रात थी। क्राँतिकारी हेमू कालाणी ने अपने साथ दो सहयोगी नंद और किशन को लिया। तीनों ने रेलगाड़ी के मार्ग का अध्ययन पहले कर लिया था। वे रेलगाड़ी के मार्ग पर पहुँचे।

हेमू कालाणी ने रिंच और हथौड़े की सहायता से रेल की पटरियों की फिशप्लेटों को उखाड़ना आरंभ कर दिया। अन्य दोनों साथी निगरानी के लिये तैनात थे। रात के सन्नाटे के कारण हथौड़ा चलाने की आवाजें दूर तक जा रही थीं। यह आवाज गश्त कर रहे सिपाहियों ने भी सुनी जिसे सुनकर सिपाही दौड़कर आए।

सिपाहियों को देखकर निगरानी के लिये तैनात नंद और किशन तो भाग कर अंधेरे में छिप गए। पर हेमू कालाणी को उन्होंने पकड़ लिया। उन्हे क्रूरतम शारीरिक यातनाएँ दी गई। सिपाहियों ने दो लोगों को भागते देख लिया था उनसे साथियों के नाम पूछे गये। पर उन्होंने कठोर यातना सहकर भी अपने साथियों के नाम न बताये। न नंद और किशन के और न अपने संगठन के अन्य साथियों के।

सक्खर की मार्शल ला कोर्ट ने उनपर देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस निर्णय के अनुमोदन के लिए निर्णय सिन्ध प्रांत के हैदराबाद स्थित सेना मुख्यालय के प्रमुख अधिकारी कर्नल रिचर्डसन के पास भेजा गया।

अंग्रेजों के समय मार्शल लाॅ कोर्ट के आदेश पर अंतिम निर्णय सेना प्रमुख अधिकारी ही करते थे। इसलिए यह फाइल कर्नल रिचर्डसन के पास गई। कर्नल रिचर्डसन ने हेमू कालाणी को ब्रिटिशराज केलिये खतरनाक शत्रु करार दिया और आजीवन कारावास की सजा को फांसी में बदल दिया।

अंततः 21 जनवरी, 1943 को प्रात: सात बजकर 55 मिनट पर हेमू कालाणी को फांसी दी गई। जब क्राँतिकारी हेमू कालाणी का बलिदान हुआ तब वे मात्र उन्नीस वर्ष के थे। वे पूरे सिन्ध में नौजवानों के आदर्श थे। उनकी स्मृति में डाक टिकिट भी जारी हुआ और विभिन्न नगरों में उनके नाम पर सड़क या कालोनियों के नाम भी हैं।

आलेख

श्री रमेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल, मध्य प्रदेश


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