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गौधन अलंकरण एवं शृंगार : सुहई

भारतीय समाज में गोधन अलंकर एवं पूजा की परंपरा है। तदनुरूप राउत जाति के लोग भी गौ पूजा अलंकरण में विश्वास करते है। वृद्ध और युवा पीढ़ी के मध्य विचारों में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन न आने के कारण दोनों पीढ़ियों के द्वारा समान रूप से परंपरागत ढंग से गोधन श्रृंगार (अलंकरण) एवं पूजा की जाती है। इससे अधिक महत्व की बात यह है कि यदुवंशियों ने वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक भारत की साहित्य, संगीत, संस्कृति, अलंकरण एवं अन्य कलाओं को भी प्रभावित किया है।

छत्तीसगढ़ वह राज्य है जहां हम कण- कण में भगवान की ना केवल कल्पना करते हैं बल्कि उन्हें भगवान रूप में पूजते भी हैं यूं तो यहां छोटी सी चींटी से लेकर हाथी तक, जमीन पर रेंगने वाले सांप से लेकर आकाश में उड़ने वाले गरुड़ तक हर पशु- पक्षी का अपना ही महत्व है। परंतु गोधन का स्थान इन सब में अलग और पूज्यनीय है गोधन न केवल हमारी संस्कृति, संस्कार का प्रतीक है बल्कि हमारे समाज और स्वास्थ्य का आधार भी है।

सुहई बंधन का पौराणिक प्रसंग – द्वापर युग में श्री कृष्ण पशु पालक थे। शास्त्र विद्या के साथ अपने पशुधन की भी साज सज्जा का ध्यान रखते थे। श्री कृष्ण का बचपन गायों की सेवा करके बीता, इसी कारण उन्हे गोपालक भी कहा जाता है। वैसे तो द्वापर युग में वृंदावन में हर घर में ही गाय पाली जाती थी, लेकिन बाल्याकाल से ही श्री कृष्ण और गायों के बीच एक अलग ही प्रकार का अलौकिक और भावपूर्ण रिश्ता रहा।

श्री कृष्ण गायो की देखभाल एवं श्रृंगार खुद ही किया करते थे वे सभी गोधन को यमुना जी ले जाकर अपने हाथों से मल-मल कर नहलाया करते, अपने पीतांबर से हर गाय का शरीर पोछते, फूल, माला, पत्तियों की माला पहनाकर उनका सुहई बांधकर सजाया करते थे।

द्वारकालीला में यह भी लिखा हुआ है कि द्वारकाधीश श्री कृष्ण जो पहली बार ब्यायी हुई दुधारू सीधी शांत गाय होती थी और जिनके सींग स्वर्ण मण्डित खूर रजत मंडित पूंछ में मोती की माला और श्रृंगार से सजी होती थी उसका गोदान श्री कृष्ण नित्य करते थे। द्वापर युग में श्री कृष्ण के इस अवतार में गोधन श्रृंगार का महत्वपूर्ण रहा। यशोदा नंदन श्री कृष्ण को गोधन से बहुत लगाव था। गोधन के महत्व को बताने के लिए श्री कृष्ण ने कई गौशाला का निर्माण कराया और गोधन श्रृंगार और पूजा से जुड़ी त्योहारों की शुरूआत की श्री कृष्ण की प्रतिमा में श्रृंगारसे सजी हुई गोधन को देखा जा सकता है।

आध्यात्मिक महत्व – गोधन को हम मातृ के रूप में स्वीकार कर श्रद्धा भक्ति, पूजन अर्चन करते है। गोधन आस्था और विश्वास में श्रेष्ठ माना गया है और गोधन माता की संतान के रूप में अनायास ही परिचित है। यह अलंकारिक परिचय आस्था और विश्वास में आधारित है न कि बाध्यता एवं विधान में। हिन्दू मान्यताओं में गोधन को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है माँ का दर्जा दिया गया है। इसलिए छत्तीसगढ़ में गोवर्धन पूजा के दिन यदुवंशियों द्वारा गोधन श्रृंगार और पूजा का उद्देश्य पशुधन के सम्मान में करते है और एक देवी देवता की तरह पूजा एवं श्रृंगार करते है।

मान्यता है कि गोधन की सेवा श्रृंगार करने से सूख समृद्धि ऐश्वर्य से परिपूर्ण रहते है। श्री कृष्ण जी गोधन का श्रृंगार, सेवा और पर्व से मनुष्य जाति को यह संदेश देते है कि पुरातन युग में स्वयं (भगवान श्री कृष्ण) ने गौ माता की सेवा की थी तो इस कलियुग में रहने वाले प्राणियों को भी गोधन की सेवा अलंकरण, सम्मान करना चाहिए क्योंकि मनुष्य जाति अपने पालन पोषण के लिए गोधन पर निर्भर है।

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और धर्म में गोधन का महत्व इसलिए नहीं है कि भारत प्राचीन काल से एक कृषि प्रधान देश रहा है। दरअसल छत्तीसगढ़ की संस्कृति में गोधन को पूजने और श्रृंगार करने के कृषि के अलावा कुछ आध्यात्मिक, धार्मिक कारण भी रहे हैं।

गाय ही एकमात्र ऐसा प्राणी- पशु है, जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है, जबकि मनुष्य सहित सभी प्राणी ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। जिसकी सांस तक से प्राणी मात्र का भला होता हो वह पूजनीय और वंदनीय क्यों नहीं होगा घ्

छत्तीसगढ़ सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और प्राकृतिक समृद्धि से परिपूर्ण क्षेत्र है। विभिन्न धर्म, जाति, वर्ग संप्रदाय एवं मतों के अनुयायियों के मध्य यहां पारस्परिक समरसता विद्यमान है। छत्तीसगढ़ में गोधन, बैल, गोबर, धूल, मिट्टी, प्रकृति के प्रति सहज लगाव प्रस्तुत आलेख के माध्यम से समझा जा सकता है। पूरे साल भर चलने वाले यहां के तीज- त्यौहार एवं विभिन्न उत्सव पर्वों की इंद्रधनुषी छटा देखते ही बनती है।

हिंदू ग्रंथों की मानें तो गाय के शरीर में 33 कोटी प्रकार के देवी -देवताओं का निवास है। गाय के शरीर में शायद ही कोई ऐसा स्थान हो जिस पर किसी देवता का वास ना हो। यहीं कारण है कि गोवर्धन पूजा (देवारी) पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा एवं श्रृंगार मोर पंखों द्वारा किया जाता है।

श्रृंगार और सौन्दर्य – प्रियता मानव जाति का स्वाभाविक गुण है। ये गुण उतनी प्राचीन है जितना मानव समाज। प्रागैतिहासिक अथवा आधुनिक युग के राउत समाज में भी पशुधन श्रृंगार की यह प्राचीन परंपरा देखने को मिलती है। श्रृंगार और उत्सवों का मनुष्य के सामाजिक जीवन में अहम स्थान होता है। वो किसी भी देश, धर्म संप्रदाय में निवास करता हो लेकिन स्वभावतः मनुष्य श्रृंगार प्रेमी है। विभिन्न प्रकार के धर्म और संप्रदायों में विश्वास करते हुए पूरी दुनिया में मनुष्यों ने हजारों प्रकार के श्रृंगार का सृजन किया। दुनिया के लोगों में धर्म, क्षेत्र, जाति, संप्रदाय, रंग आदि के हिसाब से जितनी विविधता है उतनी ही विविधता इनके श्रृंगार में भी है। चाहे वह पशुधन का श्रृंगार हो या मनुष्यों का।

छत्तीसगढ़ राज्य में त्योहारों की कमी नहीं। सभी पर्व और त्योहार यहां के लोक जीवन की कहानी कहते हैं। यहां लोक जीवन का अराध्य श्रम है। श्रम से सराबोर कृषि कर्म की अलग ही पहचान है। यह पहचान यहां के लोक पर्वों में सन्निहित है, चाहे वह हरेली हो या गोवर्धन पूजा, छेर -छेरा हो या पोला।

गोधन संस्कृति में गाय और गोवंश जीवन जगत की मूलाधार रही है। गौ माता और खेती किसानी में बैल किसानों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हैं। छत्तीसगढ़ में विभिन्न जातियॉ निवास करती है। इन जातियों में राउत जाति अपनी विशेषताओं के कारण अलग महत्व रखती है। गौ पालन और दुग्ध व्यवसाय करने वालो इस जाति को यहां के समाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यो के महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

छत्तीसगढ़ के राउत लोगों का मुख्य पेशा गाय- बैल चऱाना है। यदुवंशीय होने के कारण इस पेशे को वे पवित्र मानते हैं। पूरे गांव के गाय- बैल को यह चराते हैं। इस दोहा से इस बात की भी पुष्टि हो जाती है-
गाय गरु के सेवा करके,
किसान से लेबो धान
पहली सुमरिहां कान्हा ला,
दूसर में मालिक किसान।

सुहई का शाब्दिक अर्थ है ‘‘सुंदरता प्रदान करने वाला’’ जिस प्रकार देवी, देवता पुष्प हाऱ धारण करते हैं, जिससे उनकी सुंदरता (शोभा) बढ़ जाती है, उसी प्रकार सुहई बंधन से पशुधन की सुंदरता बढ़ जाती है। सुहई एक प्रकार का पशुओं के हार होता है। जिसे राउत जाति के द्वारा पशुधन के सम्मान में पहनाया जाता है।

गौधन का शृंगार – कंठहार सुहई

सुहई बांधते समय राउत जाति स्वयं भी विशेष श्रृंगार करते हैं, कौड़ियों से टके, पेटी (जैकेट) बाजुओं में कौंड़ी से बनी बहकर, धोती का सिर पर पागा (पगड़ी) मोर पंख की कलगी, कमर एवं पैर पर घुंघरू, मुंह पर मेकअप किए राउतों की शान देखते बनती है। साथ में तेंदु की लाठी जिसे विभिन्न रंग व मालाओं से सजाया जाता है।

गोधन की सेवा करने के कारण राउतों का संबंध गांव के पूरे किसान से हो जाता है। उनके गोधन, बैल की सेवा कर, दीवाली का इंतजार करते हैं। दीवाली के दिन को ग्रामीण क्षेत्रों में सुरहुती कहा जाता है। गौ-पालक यदुवंशीयों को इस पर्व की विशेष प्रतीक्षा होती है। दीवाली के दूसरे दिन यानी गोवर्धन पूजा को छत्तीसगढ़ में देवारी कहा जाता है। देवारी के दिन पशुधन को नए चावल की खिचड़ी खिलाने की प्रथा है। गोधन का सुहई बंधन की परंपरा छत्तीसगढ़ में पुरातन काल से चली आ रही है। गोधन के प्रति सम्मान का प्रतीक सुहाई बंधन छत्तीसगढ़ में राऊत जाति का लोक- त्यौहार है। देवारी (गोवर्धन पूजा) के दिन से सुहई बंधन की शुरुआत होती है, जिसका अंत कार्तिक पूर्णिमा के दिन होता है।

सुहई बनाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है इसे बनाने के लिए कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसे बनाने के लिए पलाश की जड़ों को निकाल कर, आग में भून कर रेशे निकाले जाते हैं जिसमें से काले रेशे उपयोगी नहीं होते सिर्फ सफेद रेशे ही सुहई बंधन बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। सफेद रेशे को बांख कहते हैं, इन्हीं बांख से रस्सी बनाई जाती है, इसकी तैयारी प्रायः नवरात्रि के समय से शुरू हो जाती है। इसमें काले रंग की रस्सी का प्रयोग होता है जो भी पूर्णता प्राकृतिक तरीके से बनाया जाता है। सुहई बनाने में धैर्य एवं कलात्मकता का होना जरूरी है। सुहई को मोर पंखों से सजाया जाता है, इसे मजूराही कहा जाता है।

राउत तीन तरह की सुहई का निर्माण करता है सुहई का राउतों के बीच धार्मिक महत्व है। और सुहई का आर्ट लोक-कला है। यह हार राउतों का विशेष निर्माण और आर्ट है जिसे समुचित स्थान प्राप्त होना शेष है।

गोधन का श्रृंगार करने अर्थात सुहई बांधने प्रत्येक घर जिसकी गोधन को राउत चराता है, उन्हीं गायों के गले में राउत (सुहई) हार पहनाता है। सुहाई के बीच- बीच में फुंदरी एवं गले के निचले हिस्से में बड़ा सा फुंदरा लगा होता है, जिसकी शोभा देखते ही बनती है। प्रायः इसे देवउठनी एकादशी को बांधी जाती है। गोधन श्रृंगार करते समय अर्थात बांधते समय राउतों का दोहा-
ओ सुहई बनायेंव, धंधा भूली गांठ देहेंव हरैया।
जे सुहई छोड़े तेला, झपट लागे गोरैया।।

इसका तात्पर्य यह है कि मैंने धंधा भूली गहरे जड़ वाली पलाश ही सुहाई श्रृंगार बनाकर उसमें घुमावदार गांठ बनाया है जो इसे निकालेगा उसे गाय कोठी की गौरैया नामक देवी झपट लेगी। सुहई बांधने से पहले रौताइनें (राउत महिलाएं) समूह में गीत गाते हुए मालिक के घर जाकर चावल के आटे में टेहर्रा रंग या अन्य रंग मिलाकर उससे हाथा (भित्ति चित्र) बनाती है, (हाथा तब मालिक के घर जाकर राउत सुहई बंधन करता है उसके बाद राउत अपने किसान के धान के कोठे या दुआरी में सुखधना छाबता है। यह सुखधना धान एवं गोबर में सना हुआ गोला होता है। धान की कोठी पर बने हाथा पर वह इस गोबर सने धान को जोर से फेंक कर चिपका देता है। इसे यदुवंशी के आशीष का प्रतीक माना जाता है।

इस अवसर पर दोहा-
अख काट चुई मेले, अख का लेगे आगा।
ऐसे बाढ़ो मालिक बाढ़ो गंगा बाढ़ प्रयागा।।
तात्पर्य है कि गन्ने की फसल कटने के बाद भी फिर से बढ़ जाता है उसी प्रकार मालिक की समृद्धि भी गंगा की तरह बढ़े। चराचर जगत के समस्त प्राणियाँ, जड़ चेतन के प्रति हमारी संस्कृति में सम्मान का भाव है। छत्तीसगढ़ का देवारी (गोवर्धन) गोधन के श्रृंगार कृतज्ञता ज्ञापित करने का दिन होता है। गोधन की सुरक्षा का संदेश भी सुहाई बंधन करता है।

परंपरा अनुसार गोधन की सुहई (श्रृंगार) प्रति वर्ष बदली जाती है। सुहई बांधने के दिन से ही राउतों का अपने मालिक- किसानों की नौकरी या सेवा का पुराना वर्ष समाप्त हो जाता है। और इसके बाद नया वर्ष आरंभ हो जाता है।

छत्तीसगढ़ के पारंपररिक त्यौहार भादो महिने मे मनाया जाने वाला पोला तिहार भी गोधन की श्रृंगार और सम्मान का प्रतीक है। इस दिन सुबह बछड़ों और बैलों को नहलाकर, उनके सींगों को रंग से पोता जाता है। उनकी देह में रंग-बिरंगे छल्ले बनाकर खुर भी रंगे जाते हैं। फिर पूजा- पाठ करके उनकी आरती उतारी जाती है। इसके बाद नौजवान अपने बैलों की जोड़ी को घुंघरू एवं घंटी बांध कर सजाते हैं। ‘‘पोला तिहार’’ बैलों का सम्मान करने की दृष्टि से मनाया जाता है।

उपसंहार – इस प्रकार गोधन श्रृंगार करके राउत जाति का एक अलग संसार रचता- बसता है। इससे उनके अपने उल्लास, राग रंग तो स्पष्ट होते ही हैं, साथ ही उनकी संस्कृति, श्रृंगार परंपराओं का भी स्पष्ट रूप दिख जाता है। लोक में प्रचलित परंपराएं हमें प्रकृति से जोड़ती है, तथा सनातन संस्कृति की लोक परंपराएं लोक द्वारा सदैव अक्षुण्ण रखी जाती है। गोधन बैल, उंट, हाथियों जैसे पशुओं के श्रृंगार की क्रिया प्रकृति में भक्ति पूर्ण आस्था का प्रतीक है। सुहई बंधन की परंपरा व्यक्तिगत आर्थिक हैसियत ही नहीं सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक परिष्कार भी दर्शाता है।

श्रृंगार सौंदर्य प्रियता, मानव जाति का स्वाभाविक गुण है। पशुधन को वस्त्रों तथा विभिन्न शैली से श्रृंगार करना तथा सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग राउतों की पशुधन श्रृंगार प्रियता को प्रदर्शित करता है। गोधन श्रृंगार- सुहई बंधन की इस परंपरा को निर्मल हृदय के साथ हस्तांतरण करना हमारा कर्तव्य है।

आलेख

डॉ अलका यतीन्द्र यादव
सहायक प्राध्यापक हिंदी
पी.एन.एस. महाविद्यालय
बिलासपुर (छ.ग.)
90981 31676

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One comment

  1. विवेक तिवारी

    सुग्घर आलेख 👌👌👌👌

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