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लोक कल्याण हेतु दान का पर्व : छेरछेरा

छतीसगढ़ के त्योहारों में परम्परा का गजब समन्वय है, देश भर में होली दिवाली सहित अनेक पर्व तो मनाते ही है किंतु माता पहुंचनी, पोरा, तीजा, इतवारी, नवाखाई, बढोना, छेवर और छेरछेरा ऐसे लोक स्थापित पर्व हैं जिसे लोक अपने स्तर और तरीके से नियत तिथि को मनाता है।

छेरछेरा का त्योहार पूस पूर्णिमा को मनाया जाता है, शास्त्रीय परम्परा के अनुसार इस दिन प्रातः स्नान व सूर्य को अर्घ्य देने को पुण्य का कार्य माना जाता है। पौराणिक ग्रन्थों में नदी स्नान एवं सूर्य अर्घ्य का विशेष महत्त्व बताया गया है, महाभारत में भीष्म पितामह जब बाण की मृत्यु शय्या पर थे तो इच्छा मृत्यु के कारण वे सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हैं। वहीं बुजुर्गों ने छेरछेरा को छै + अरी अर्थात छह शत्रु- काम, क्रोध, मोह, लोभ, तृष्णा, और अहंकार को त्यागने का नाम बताया है। इस दिन जो याचना करते हैं ब्राह्मण के समान होते हैं, जो माताएँ दान करती है देवी शाकम्भरी की तरह होती हैं।

लोक कथा के अनुसार एक बार घोर आकाल पड़ा, अन्न के एक एक दाने के लिए प्राणी त्राहि -त्राहि करने लगे और शाकम्भरी देवी की प्रार्थना की मां शाकम्भरी प्रकट हो कर अन्न फल औषधि प्रदान कर किसानों की कोठी को भर दिया। विपुल फसल की खुशी में अंहकार का त्याग व दानशीलता, सामाजिक समरसता के लिए गरीबी अमीरी का भेद को मिटाने सभी वर्ग के लिए अमीर गरीब सब के घर से मुट्ठी भर अनाज संग्रह कर जरूरतमंद लोगों की मदद के साथ समाज उपयोगी कार्य मे योगदान देते हैं।

लोककथा यह भी है कि कलचुरि शासक कल्याणसाय दिल्ली के मुगल बादशाह जहांगीर के दरबार मे आठ साल रहे, उनकी वापसी पूस पूर्णिमा को हुई, आगमन पर रानी फुलकैना जो उनकी उपस्थिति में कलचुरि शासन की सत्ता सम्हाली, उन्होंने सोने चांदी व अन्न मुक्त हस्त से दान की, उनसे प्रेरित प्रजा ने भी मुट्ठी भर दान दे कर राज्य की कीर्ति स्थापित की, कहते हैं कि राजा कल्याण साय ने इस परम्परा को लोक पर्व के रूप में मनाने की घोषणा की।

एक मान्यता से राजतंत्र में गणतंत्र की झलक मिलती है, समाज को स्वेच्छानुसार कर के रूप में थोड़ा अनाज, ग्राम्य जीवन में लोक कल्याण के प्राप्त करने की स्वीकृति है, जो सामाजिक आर्थिक समानता का धोतक भी है।

छेरछेरा पर्व कब और कहां से प्रारंभ हुआ, यह कह पाना शोध का विषय है किन्तु पश्चिमी ओड़िसा और पूर्वी छतीसगढ़ में उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन को किसान फसल वर्ष के अंतिम दिवस व नव वर्ष की शुरुवात के रूप में मनाया जाता है।

किसानी में कामगार रखने की परंपरा रही पूरे वर्ष में एक निश्चित कट्टो अनाज में वर्ष भर काम करने का अनुबंध होता है। इस दिवस अपने कामगार व पऊनि पसारी लोहार, रावत, धोबी, नाई, सहिस, बैगा गुनिया को सम्मान स्वरूप अन्न देकर पुनः अगले किसानी वर्ष के लिए अनुबंध करने का भी पर्व है। इस दिन किसान द्वारा लिए गए उधारी बाढ़ी को अदा करने के लिए भी जाना जाता है, किसान उऋण होकर अपनी खेती की तैयारी में लग जाता है।

विभिन्न स्थानों पर पर्व की महत्ता इस पर्व के बारे में अनेक लोककथा, लोकगीत प्रचलित है किंतु अध्ययन से पता चलता है कि इसका प्रभाव राम-गमन पथ में व जोंक नदी घाटी की सभ्यता में विशेष रूप से देखा जा सकता है। प्राचीन कालीन जल मार्ग व जल व मगध शासन तथा मिलीजुली संस्कृति इस पर्व की व्यापकता का धोतक है।

कोरापुट ओडिसा एवं बस्तर क्षेत्र में पूर्णिमा के एक सप्ताह पूर्व हरे रामा हरे कृष्णा का गायन ढोल की थाप पर भाव विभोर हो कर गया जाता है और अन्नदान लिया व दिया जाता है। प्राप्त अन्न को धार्मिक सामाजिक व जरूरतमंदों को दान कर सदउद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयोग किया जाता है। मान्यता है पूस में अन्नदान करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है। घरो में मिश्रित अनाज की पीठा याने रोटी बनाने की परंपरा है।

सुअरमार जमींदारी का महल और गोल घेरे में कंगुरे

कोंडागांव व नारायणपुर जिले में इस त्योहार को फसल कटाई उत्सव बडोनी, छेवर, अंत मे छेरछेरा के रूप में पूरे महीने भर मनाया जाता है। महिलाएं गोल घेरा बनाकर आंचलिक गीतों से ढोल की थाप में नृत्य करती हैं, अन्न दान के बाद गीत के माध्यम से आशीष देती है, बच्चें घर घर जा कर आवाज देते हैं ”
छेरछेरा झीरलिटी झिरलिटी पंडकी मारा लिटी
डोकरा डोकरी झगड़ा होला चाबुन दिला लिटी ।
आव डोकरी चंडायला तोला देबो रोटी” के उच्चारण से मांगने का उत्साह व दानशीलता देखते बनती है।

वहीं जोंक, तेल, अंग नदी की घाटियों में पूर्णिमा के दिन सुबह से व्यक्तिगत अथवा सामूहिक छेरछेरा मांगते हैं यहां महिलाएँ तीन पंक्तियों में “णमो णमो गुरु- णमो-णमो नारायणो, भक्तों बन्धु कृपासिन्धो तो पाद शरणम के धुन से गायन करती हुई छेवर लेती हैं। बच्चें छेरछेरा- छेर बरक़्क़ीन छेर-छेरा का आह्वान करते हैं। यहां की फसल हिरवां, झुन्गा, बोदी, चना के मिश्रण में गुड़ डाल कर मीठा मिश्रण के गोली को चावल, आटे के घोल से पकवान व अनरसा तैयार किए जाते हैं।

इस त्यौहार में सामूहिक रूप से अपने घरों की मिट्टी से छबाई व घर को सफाई पोताई कर सजाया जाता है। पर्व मनाने अपने बहन बेटी को न्योता देकर बुलाते हैं व सम्मान विदाई करते है। जोंक नदी के बायीं ओर भी इसी उत्साह के साथ मनाया जाता है यहां के पकवान को माड़ा रोटी कहते हैं।

सारंगढ़ क्षेत्र में पूरी रोटी एक प्रकार की पूरन पूड़ी की तरह सेकने वाली रोटी होती है, इसी तरह राजनांदगांव बिलासपुर से सरगुजा और झारखंड में भी अपनी क्षेत्रीय उत्पादकता के साथ पकवान कही भाप से तो कही तल कर तो कही सेंक कर बनाए जाने वाले पकवान अपने क्षेत्र की विशिष्टता को बताते हैं।

छत्तीसगढ़ में अक्खड़ भिक्षार्थी का श्लोक “अरन बरन कोदो दरन, जभ्भे देबे तब्भे टरन” का रट इस त्योहार को प्रासंगिक बनाता है, कही शाकम्बरी देवी को मरकनिन, बरक़्क़ीन, रउताइन, डाँगचेघि, गोर्राइन और ना जाने कितने नाम से अपने अपने क्षेत्र और कुनबे में पुकारते हैं।

पूस महीने में शादी व्याह करने, देखने को वर्जित किया जाता है। रिश्तेदारी व आने-जाने में पाबंदी भी होती है। कहावत भी है- आये पूस, गये खुस खुस। यहाँ खुस का तात्पर्य जल्दी से है, ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ एवं तटवर्ती उड़ीसा में छेरछेरा त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है।

सुअरमार जमींदारी के कंगूरों में दानदाता एवं याचक : छेरछेरा पर्व का प्रतीक

सुअरमार जमीदारी में इस त्यौहार को मनाने का प्रमाण 17 वी शताब्दी के अंत मे बने कोमाखान राजमहल में दिखाई देता है, महल के शिखर के दाएं में गारे से बनी बेहद उम्दा कलाकृति है, जिसमे एक राज महिला सिर में टोकरी लिए दान मुद्रा में खड़ी है वही बांई ओर एक राज पुरुष बोरा लिए याचक की मुद्रा में, स्थापित कलाकृति तत्कालीन सामाजिक परिवेश को इंगित करता है।

ज्ञात होता है कि सत्रहवीं सदी में छेरछेरा का त्यौहार गरीबी अमीरी की हैसियत बताने वाला आध्यत्मिक पर्व था, दान देने और दान लेने की परंपरा को सामाजिक समरसता के रूप में देखा जा सकता है। इस त्योहार की खास बात यह है कि इस दिन किसी देवी या देवता की पूजा नही होती, अमूमन हर पर्व में पूजा का महत्व है पर इस दिन सभी जाति धर्म के पुरुष लोग सुबह से ही टोकनी, थैला लेकर घर घर मांगने निकल पड़तें है।

महिलाएँ नहा धोकर अपने अपने घर के दरवाजे पर टोकनी में धान, कोदो, कुटकी ले कर आने वाले हर याचक के झोली में मुट्ठी भर अनाज डालती हैं, गांव का हर पुरुष याचक व महिला दानी के रूप में प्रस्तुत होती है, ऐसे नैतिक शिक्षा का आदर्श कही और शायद ही दिखाई दे।

वर्तमान में मांगने के आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल गाजे बाजे वाद्य यंत्रो के साथ समूह में मांगने व मांगे गए धन राशि को किसी पुण्य विशिष्ट कार्य नियोजन के लिए किया जाता है। इससे कई ग्रामों में अनाज कोठी बनी, जो आगे चल कर स्वतन्त्रता संग्राम के प्रणेयता ठा प्यारेलाल के सहकारी आंदोलन का हिस्सा बनी। छेरछेरा का आदर्श वाक्य – छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरहेरा अर्थात मुक्त हस्त से दान करें, अपने मूल जमा पूंजी माई कोठी याने बिना खोट के दान के महत्व को बताया गया है।

मांगे गए मिश्रित अनाज का खिचड़ी या भाप से बनने वाले माडा रोटी जिसके अंदर गुड़ तिल, खोवा से स्वादिष्ट मिश्रण को नए अनाज के आटे के बीच भरकर बिना तेल से भाप विधि द्वारा पारम्परिक पकवान इस पर्व का मात्र व्यंजन है, वर्तमान में लोग अपने पसंद का सात्विक या निमिष व्यंजन परम्परा में बदल रहे हैं।

इस पर्व में धर्म से आगे आध्यात्मिक संस्कार संस्कृति के समन्वय में कर्म को आगे रखा है। दान की महत्ता उसके निष्पादन और सर्वभौमिकता के आदर्श आसानी से जन समुदाय में स्वीकार योग्य बनाया है। कर्म को सर्वश्रेष्ठ भूमिका में खड़ा किया गया। आज कोमाखान राजमहल के कँगूरे की शिल्पकला हमारी संस्कृति की वैभवशाली इतिहास और परम्परा की याद दिलाती है।

आलेख

विजय कुमार शर्मा (शोधार्थी) कलिंगा विश्वविद्यालय कोटनी, रायपुर (छ ग)

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