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गोंड़ शासकों की नगरी धमधागढ़ एवं दशावतार शिल्पांकन

धमधा दुर्ग जिले के अन्तर्गत दुर्ग से बेमेतरा रोड पर मुख्य सड़क पर स्थित है। यहां पर प्राचीन बस्ती में तालाब के किनारे महामाया मंदिर स्थित हैं। मंदिर के उत्तर में प्राचीन प्रस्तरों से निर्मित एक मोटी दीवार है जिसमें कलचुरि कालीन देवी देवताओं की प्रतिमायें जड़ी हैं। इसी मंदिर परिसर में गोंड़ समाज के लोंगों का भी एक आधुनिक मंदिर निर्मित हैं जहां गोंड़ समाज के लोगों द्वारा विशेष अवसरों पर पूजा की जाती है।

धमधा दर्शन में प्रकाशित लेख, गोड़ों का तीर्थ स्थल धमधागढ़ जो कि धमधा के ही विद्याभूषण ताम्रकार द्वारा लेख किया गया है, से प्राप्त जानकारी के अनुसार सन् 1138 ई. में रतनपुर के शासक पृथ्वीदेव के प्रतापी सेनापति जगतपाल ने अपनी राजधानी दुर्ग नगर में स्थापित की थी जिसके अवशेष खाई के रूप में आज भी विद्यमान हैं।

सन् 1519 में रतनपुर शासक वाहरेन्द्र (वाहरसाय) ने मुस्लिम आक्रमणकारियों को पीछे भगाया तथा अपनी राजधानी सरईगढ़ छूरा के पास के किले में स्थापित की। धमधा के प्रथम शासक सांड़खदेव ने लगभग 80 वर्ष तक राज्य किया। उसके काल में यहाँ पर कच्चा किला व भवन बनाया गया। उसके चारों तरफ खाई खुदवाई गई, वृक्ष लगवाये गये, चौखड़िया नामक एक कुण्ड बनवाया तथा बूढ़ादेव मंदिर की स्थापना की गई।

धमधागढ़ किले का महल

इसके पुत्र राजा वेन ने किले की खाई का विस्तार किया। इस वंश के तीसरे राजा अवधृत सिंह ने 35 वर्ष तक, चौथे राजा गोरखसाय ने 27 वर्ष, पांचवें नरेश बरियार सिंह ने 20 वर्ष, छठवें नरेश जयभिमान सिंह ने 43 वर्ष तक व 7 वें राजा मधुकरराय के 70 वर्ष तक शासन करने की जानकारी मिलती है।

आठवें राजा रेवासाय संवत् 1544 में गद्दी पर आसीन हुये जो मण्डला नरेश नरीनसाय से लगातार पांच माह तक सामना किया और सफल हुआ। इसने किले के उत्तर-दक्षिण और पूर्व में तीन तरफ दरवाजे लगवाये तथा दक्षिण में सुरक्षा हेतु एक ऊंचा बुर्ज बनवाया गया। इसने 72 वर्ष तक शासन किया। तत्पश्चात 9 वें शासक जैसिंह साय संवत् 1616 में गद्दी पर बैठा जिसने 29 वर्ष तक शासन किया।

दसवां नरेश दशवंत सिंह अल्प वयस्क था। राज्य का संचालन उसकी माता ने किया तथा उसी के काल में महामाया मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर के अन्दर महाकाली, लक्ष्मी एवं सरस्वती देवी के नाम से पूजित प्रतिमा की स्थापना की। इसी काल में किले का चकरा तथा नगार खाना भी बनवाया। इसका शासनकाल 85 वर्ष तक था।

ग्यारहवें शासक संवत् 1730 में अपर बल सिंह आसीन हुये जिन्होंने 70 वर्ष तक शासन किया। इसके दीवान रामसिंह भाठ (भट्ट) ने बूढ़ेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कराया। इसके शासनकाल में ही धमधा से लगभग एक कोस की दूरी पर शिवनाथ नदी के बायें तट पर लक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण कराया जिसे आजकल चतुर्भुजी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस प्रतिमा के परिकर में भी दशावतारों का अंकन है जो विष्णु भक्त होने का प्रमाण है।

धमधागढ़ का द्वार

धमधागढ़ के 12 वें शासक मेरसिंह अल्प समय में ही दिवंगत हो गया तथा 13 वाँ और अंतिम शासक भवानी सिंह था। इस समय तक समस्त छत्तीसगढ़ में मराठा शासन का प्रभाव हो चुका था। सन् 1800 ई. में भवानी सिंह को मराठा सेनापति वासू गोपाल ने हराकर धमधागढ़ पर विजय प्राप्त की तथा भवानीसिंह की रानी ने आत्माहत्या कर ली। इस प्रकार धमधागढ़ में मराठों का शासन हो गया।

धमधा किलाः धमधा शहर में महामाया मंदिर के परिसर में निर्मित गोंड़कालीन प्रवेशद्वार के दोनों तरफ भी दशावतार प्रतिमायें अंकित हैं जो छत्तीसगढ़ की उत्कृष्ट दशावतार प्रतिमायें हैं। इन प्रतिमाओं को देखने से यह स्पष्ट होता है कि पूर्व में यहाँ पर कल्चुरिकालीन मंदिर निर्मित रहा होगा जिसके नष्ट हो जाने पर मंदिर की प्रतिमाओं के गोंड़कालीन शासकों के काल 14-15 वीं शताब्दी में प्रवेश द्वार निर्मित कर इसमें जड़ दिया गया होगा।

इसमें दशावतारों को दो पंक्ति में निर्मित किया गया है तथा ये प्रतिमायें उस समय निर्मित मूल मंदिर की द्वारशाखा में जड़े रही होंगी। एक पंक्ति में क्रमशः नीचे से ऊपर की तरफ मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह तथा वामन का अंकन है जिसमें कच्छप तथा वराह को नीचे ऊपर के दूसरे खण्ड में निर्मित किया गया है जबकि दूसरे शाखा में ऊपर से नीचे की तरफ क्रमशः परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध तथा कल्कि का अंकन है।

इस प्रकार कुल दस अवतार दृष्टव्य हैं। ये प्रतिमाएं छत्तीसगढ़ में ज्ञात अभी तक की सबसे सुन्दर एवं स्पष्ट दशावतार की प्रतिमाएं हैं। द्वार शाखाओं में प्रदर्शित दशावतारों को 4-4 के खण्डों में प्रदर्शित किया गया है जिनके मध्य में तथा चारों किनारे पर एक पंक्ति में गोलाकार पुष्प पंक्ति का अलंकरण है जो प्रायः कल्चुरिकालीन स्थापत्य कला में मिलता है।

धमधागढ़ के मुख्य द्वार पर दशावतार अंकन

श्रीमद्भगवद् गीता के श्लोक यदा यदा हि धर्मस्य ग्लार्निभवति भारत एवं सम्भवामि युगे युगे के द्वारा विष्णु के अवतारों को असीमित कर दिया फिर भी महाभारत में विष्णु के हंस, कूर्म, मत्स्य, वराह, वामन, तथा नृसिंह अवतारों का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा कृष्ण, बलराम, भार्गव, राम, दाशरथी राम और कल्कि को मिलाकर महाभारत ने दश अवतारों को स्वीकार किया है।

वायु पुराण के अनुसार हंस, यज्ञ, नृसिंह, वामन, और कल्कि की गणना की जाती है। गरूड़ पुराण में विष्णु के 22 अवतारों का वर्णन हुआ है जिनमें कुमार, यज्ञेश, वराह, देवर्षि नारद, नरनारायण, कपिल, दत्तात्रेय, यज्ञ उरूक्रम, ऋषभदेव, मत्स्य, कमठ, धन्वन्तरि, मोहिनी, नृसिंह, वामन, परशुराम, व्यास, राम (दाशरथी), कृष्ण, तथा बुद्ध के दश अवतारों का क्रम स्वीकार करता है।

धमधागढ़ के मुख्य द्वार पर वाद्यक, नर्तकी, शैव साधक एवं अन्य प्रतिमाएं

छत्तीसगढ़ के मंदिरों की द्वार शाखाओं में यद्यपि कालक्रमानुसार तथा विभिन्न राजवंशों के काल में निर्मित मंदिरों में अलग-अलग प्रतिमायें निर्मित की गई हैं। लेकिन अभी तक मुझे ज्ञात स्थापत्य कला के आधार पर निम्नलिखित मंदिरों की द्वारशाखाओं के पाश्र्व शाखा में दोनों तरफ दशावतारों का अंकन ज्ञात हुआ है-राजीवलोचन मंदिर राजिम के अनुशांगिक देवालय में, लक्ष्मण मंदिर, सिरपुर के पाश्र्व शाखाओं में, तुम्माण, कोरबा की द्वारशाखा में, धमधा किला के प्रवेश द्वार में एवं रामचन्द्र मंदिर, राजिम की द्वारशाखा में ।

तुम्माण, जिला कोरबा की द्वारशाखा त्रिशाखा है जिसमें नीचे तरफ नदी देवियों तथा द्वारपालों का अंकन है। नदी देवी के ऊपरी भाग में मध्य की शाखा में दायें तरफ कुल पांच खण्डों में क्रमशः मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह तथा वामन (अस्पष्ट) प्रतिमा का अंकन है। बायीं द्वारशाखा में क्रमशः नीचे से ऊपर की तरफ राम, बलराम, बुद्ध, तथा कल्कि का अंकन है।

महल का भीतरी हिस्सा

लक्ष्मण मंदिर, सिरपुरः का प्रवेशद्वार अत्यंत कलात्मक है जो प्रस्तर निर्मित है। मंदिर की द्वारशाखा के पांचवी शाखा में विष्णु के अवतार के दृश्य फलकों में उत्कीर्ण हैं। इनमें से मत्स्य, वराह, नृसिंह और राम तथा कृष्ण लीला में कलियदनम, कंस-वध तथा केसी-वध आदि दृश्यों का अंकन है। इनके अलावा इस मंदिर के सिरदल में ललाटविम्ब में शेषशायी विष्णु का भी अंकन है।

रामचन्द मंदिर राजिम के गभगृह के प्रवेश द्वार के एक शाखा पर विष्णु के दशावतारों का अंकन है सबसे निचले भाग में अर्द्धमानवी, तथा अर्द्धपशु रूप में वराह की प्रतिमा है। इसके बाद मत्स्य और कूर्म का यथार्थ अंकन है। इसके बाद अर्द्धमानुशी तथा अर्द्धपशु रूप में नृसिंह की मूर्ति है। इसके ऊपर क्रमशः परशुराम, राम , कल्कि और कृष्ण के अवतारों का अंकन है। डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर के मतानुसार सबसे ऊपरी भाग पर दशवें अवतार के रूप में जगन्नाथ के प्रसिद्ध श्री विग्रह का आलेख है जो कि ज्ञात परम्परा के विपरीत है।

वामन मंदिर राजिम: राजिमलोचन मंदिर परिसर में उत्तर-पूर्व कोने में स्थित अनुशांगिक देवालय है। इस मंदिर की द्वारशाखा में विष्णु के दशावतारों का अंकन है। दायें तरफ की आन्तरिक भित्ति में नीचे से ऊपर की ओर 5 भागों में क्रमशः मत्स्यावतार, कूर्म, वराह, नृसिंह तथा वामन का अंकन है। इसी प्रकार बांयी भित्ति में भी क्रमशः ऊपर से नीचे की तरफ परशुराम (राम भार्गव), राम (दाशरथी), कृष्ण वासुदेव, बुद्ध, एवं कल्कि अवतारों का अंकन किया गया है। राजिम के मंदिरों की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि यहाँ के किसी भी मंदिर की द्वारशाखा में नदी देवियों का प्रवेश द्वार के पाखों पर अंकन नहीं है।

तीतुरघाट शिवनाथ नदी के तीर स्थित सती स्तंभ, इसे लक्ष्मी माता के रुप में पुूजा जाता है।

इनमें से राजिवलोचन मंदिर राजिम, जिला गरियाबंद की द्वारशाखा में अंकित दशावतार एक पतली शाखा में लक्ष्मण मंदिर सिरपुर, जिला महासमुंद, में बाहर की तरफ तीसरी शाखा में खण्डों में, बंकेश्वर मंदिर तुम्माण, जिला कोरबा तथा रामचन्द्र मंदिर राजिम, जिला गरियाबंद, की द्वारशाखा में पतली पट्टी में खण्डों में तथा धमधा जिला दुर्ग स्थित किले में प्रदर्शित दशावतार प्रतिमायें मूल मंदिर से हटाकर प्रवेश द्वार के दोनों तरफ गोड़कालीन शासकों के काल में निर्मित भित्ति में जड़ी है जो उपरोक्त सभी से उत्कृष्ट कोटि की हैं।

इस प्रकार उपरोक्त पांचों मंदिरों की द्वारशाखा में अंकित दशावतारों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि राजीवलोचन मंदिर के अनुशांगिक देवालय तथा धमधा किले के प्रवेश द्वार में अंकित प्रतिमायें दायें तरफ नीचे से ऊपर तथा बायें तरफ ऊपर से नीचे की तरफ जबकि तुम्माण स्थित बंकेश्वर के दायें तरफ नीचे से ऊपर तथा बायें तरफ पुनः नीचे से ऊपर क्रमशः दशावतार अंकित है। इसके अलावा राजिम स्थित रामचन्द्र मंदिर में एक ही द्वारशाखा में क्रमशः नीचे से प्रांरंभ होकर ऊपर तक लघु आकार के खण्डों में दशावतारों का अंकन है।

धमधा तहसील मुख्यालय में बूढ़ातलाब और चौघड़िया तालाब के तट पर शिवमंदिर एवं चतुर्भुजी विष्णु मंदिर भी विद्यमान हैं। शिवमंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम की तरफ है। मंदिर के गर्भगृह में राजपुरूष तथा गणेश की प्रतिमाएं स्थापित हैं। गर्भगृह के मध्य में शिवलिंगा जलहरी सहित स्थापित हैं। अन्तराल में दायें तरफ षट्मुखी कर्तिकेय मयूरासीन स्थापित हैं तथा बायें तरफ चतुर्भुजी गणेश की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के सम्मुख प्रस्तर निर्मित नंदी की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर परवर्ती फणिनाग कालीन शासकों के काल में लगभग 14-15 वीं शताब्दी ई. में निर्मित प्रतीत होता है।

दशावतार सहित चतुर्भुजी विष्णु की काले ग्रेनाइट की प्रतिमा तीतुरघाट

शिवमंदिर के दायें पार्श्व में समीप में एक ही परीसर के अन्दर पश्चिमभिमुखी विष्णु मंदिर निर्मित है। मंदिर का बाहरी भाग सादा है तथा गर्भगृह के अन्दर चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा स्थापित है जिसकी ग्रामवासी पूजा करते हैं। इस मंदिर तथा प्रतिमा का निर्माण भी स्थानीय फणिनागवंशी शासकों के काल में निर्मित प्रतीत होता है।

धमधा में त्रिमुर्ति महामाया मंदिर के पीछे तरफ पूर्वाभिमुखी बूढ़ादेव मंदिर स्थापित है। मंदिर के गर्भगृह में पिछली भित्ति के सहारे अलंकृत चैकी पर बूढ़ादेव जी प्रतीमा स्थापित है। धमधा तहसील मुख्यालय में गोंड़कालीन प्रस्तर निर्मित किले के अवशेष हैं।

धमधा तहसील मुख्यालय से लगभग 5 कि. मी. दूरी पर शिवनाथ नदी के बायें तट पर तीतुरघाट नामक ग्राम के समीप चतुर्भुजी मंदिर स्थापित है। मंदिर पूर्वाभिमुखी है जो प्राचीन है। मंदिर के गर्भगृह में पादपीठ पर एक प्रस्तर निर्मित चतुर्भुजी गरूड़ासीन लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा स्थापित है जिसके परिकर में दशावतार का अंकन है।

इस स्थल पर कार्तिक तथा माघी पूर्णिमा के अवसर पर मेला भरता है। चतुर्भुजी मंदिर के समीप ही बायें पार्श्व में एक अन्य मंदिर के अवशेष हैं जिसका जीणोद्धार कर नया मंदिर बना दिया गया है। मंदिर के मण्डप के स्तंभ बिखरे पड़े हैं तथा कुछ सती स्तंभ भी विद्यमान हैं जिनमें अभिलेख है। ये स्तम्भों लगभग 13-14 वीं शताब्दी ई. के प्रतीत होते हैं। यह स्थल भी पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा सकता है।

Update :- Lokendra Brahmabhatt : आभार आपका शानदार जानकारी के लिए लेकिन इसमे एक मिस्टेक है, राजा के दीवान #रामसिंह_भट्ट थे लेकिन लेख में #भाठ लिखा गया है, भट्ट और भाट दो दो विभिन्न प्रकार की जातियां है और दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है, भट्ट सामान्य (ब्राह्मण) जाति में आता जबकि भाट ओबीसी में, पूर्व में #भट्ट लोगो का कार्य राजा के सेनापति, मंत्री, दीवान, सलाहकार, का था जबकि #भाट जाती का वंशावलि का था ।कृप्या इसे सुधारे ।हो सकता है जब किसी ने ऐसा लेख लिखा हो तो गलती से भट्ट से भाट लिखा गया हो या उसे भट्ट के बारे में पता न रहा हो, चुकी भट्ट लोगो की संख्या कम और भाट लोगो की संख्या ज्यादा है है इसीलिए लिए लिखने वाले को भट्ट और भाट एक लगा हो ।#रामसिंह_भट्ट के हम वंसज आज भी धमधा में है, राजा ने कुछ अभूतपूर्व कार्य के लिए भट्ट लोगो को राणा की उपाधि दी थी, जिस वजह से उनके वंसज परिवार आज जाती के रूप में भट्ट की जगह #राणा का उपयोग करते है । रामसिंह भट्ट जी ने धमधा में कम से कम 3-4 तालाबो का निर्माण और इसके अलावा 3-4मन्दिरो का भी निर्माण करवाया था जो आज भी मौजूद है ।

आलेख

डॉ. कामता प्रसाद वर्मा
सी-6, वीणा विहार 
दावड़ा कालोनी, रायपुर

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