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प्राचीन गुरुकुल पद्धति और शिक्षा के सरोकार

‘‘या प्रथमा संस्कृति विश्वारा’’ अर्थात् भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। विश्व इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में विश्व के दृश्य पटल पर यदि किसी देश की संस्कृति ने पूर्णता एवं दिव्यता के साथ-साथ सामाजिक वैज्ञानिक, दार्शनिक, आर्थिक समृद्धि एवं सांस्कृतिक-नैतिक श्रैष्ठता को प्राप्त किया था, तो वह था भारत।

जहां काल के गर्भ में यूनान, रोम, सीरिया, बेबीलोन की संस्कृतियों ने बिखरकर दम तोड़ दिया, वही भारतीय संस्कृति एक मात्र संस्कृति है जो समय के प्रवाहों के समक्ष अडिग चट्टान की तरह खडी रही। जिसने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को चार हजार वर्षो से भी अधिक समय तक सुरक्षित रखा, उसका प्रचार-प्रसार किया और संशोधित किया वह है प्राचीन भारत की शिक्षा व्यवस्था जिसका शंखनाद मनुस्मृति के (2.20) में किया गया –
‘‘एतद् देश प्रसूतस्य सकाशदग्रजन्मनः।
स्वं, स्वं चरित्र शिक्षरेन पृथिव्यां सर्वमानवाः।।

यही कारण है कि प्राचीन काल में विश्वभर के तमाम जिज्ञासु, ज्ञान पिपासु विदेशियों के कदम बरबस महान, सांस्कृतिक भूमि भारत की ओर बढ आए। इसीलिए अल्तेकर महोदय ने अपनी कृति ‘Education in Ancient India’, P-12 पर ठीक ही लिखा है कि– “Ancient Indian civilization is one of the most interesting and important civilization of the world if we want to understand it properly, we must study it’s system of education which preserved, propagated and modified it during the course of more than four thousand years.”

वस्तुतः जैसाकि विश्व भर में महानतम विचारको प्लेटो, काण्ट, अरस्तु, एच.एस. हार्न, फ्रोबेल, विवेकानन्द, राधाकृष्णन, गांधी आदि सभी ने माना है कि शिक्षा मात्र सूचना देने या कोशलों का प्रशिक्षण देने तक ही सीमित नही वरन् सम्पूर्ण निर्माण, सर्वागींण विकास का एक प्रभावी माध्यम भी है।

हमारे आर्ष ग्रंथो व ऐतिहासिक अध्ययन से भी यही विदित होता है प्राचीन भारतीय शिक्षा की गुरुकुल पद्धति न केवल पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रक्रिया थी वरन् आधुनिक शैक्षिक मनोवैज्ञानिक आधारों, सूत्रों व आर्दर्शो और प्रतिमानों का भी उसमें पूरी तरह समावेश था।

प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री एवं मनोविज्ञान विद्वान जॉन डीवी ने शिक्षा को एक त्रिभूजी आधार माना है जिसके तीन ध्रुव – विद्यार्थी, अध्यापक व पाठयक्रम में परस्पर उचित सांमजस्य व अन्तः क्रिया ही शिक्षा के मूल उद्धेश्यों की पूर्ति करता है। प्राचीन भारतीय गुरुकुल पद्धति का अध्ययन-विश्लेषण यदि डिवी के सिद्धान्त के आधार पर किया जाए तब भी वह शत प्रतिशत सत्य व सटीक बैठती है।

इतना ही नही आधुनिक शैक्षिक मनोवैज्ञानिक आधार पर शिक्षा प्रक्रिया का लोकप्रिय मॉडल देने वाले प्रसिद्ध शिक्षा मनोवैज्ञानिक बी.एस. ब्लूम के मॉडल के अनुसार शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसमें विद्यार्थी केन्द्र बिन्दू होता है और शिक्षा के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सिखनें के अनुभवों से गुजरते हुए विद्यार्थी और आचार्य के बीच अन्तः क्रिया होती है जिससे विद्यार्थी में व्यवहारगत परिवर्तन परिलक्षित होता है।

इसके आधार पर यदि हम प्राचीन भारतीय शिक्षा गुरुकुल पद्धति की पड़ताल करे तब भी हम पाते है कि यह पद्धति ब्लूम के मॉडल पर शत-प्रतिशत खरी उतरती है। क्योकि यह पूरी तरह से विद्यार्थी को केन्द्र में रखकर चलती थी और गुरु-शिष्य की अन्तरंगता अत्यन्त घनिष्ठ होती थी। इस हेतु हमें प्राचीन भारतीय शैक्षिक सरोकारों एवं गुरुकुल पद्धति को समझना नितांत जरुरी है।

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का एक प्रमुख तत्व था गुरुकुल व्यवस्था पर इसे समझने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि प्राचीन भारत में शिक्षा के उद्धेश्य व आर्दश और पाठ्यक्रम क्या था। हमारे आर्ष ग्रंथो, वैदिक और परवर्ती साहित्यिक-ऐतिहासिक ग्रंथो यथा महाभारत, सुभाषित रत्न-संदोह, सुभाषित रत्न भंडार, मनु स्मृति एवं अन्य कालिदास आदि के संस्कृत ग्रंथो के अध्ययन से ज्ञात होता है कि प्राचीन भारतीय मनिषियों की दृष्टि में शिक्षा मनुष्य के सर्वागींण विकास का साधन थी।

जिसका उद्धेश्य मात्र पुस्तकीय ज्ञान करवाना नही था वरन् भौतिक आध्यात्मिक उत्थान तथा विभिन्न उत्तदायित्वों के विधिवत निर्वहन के लिए बालक को तैयार कर सुनागरिक तैयार करना था। हालांकि प्राचीन ग्रंथो में तद्युगिन शिक्षा के उद्धेश्यों का पृथक से वर्णन प्राप्त नही होता है तथापि विभिन्न ग्रंथो के अध्ययन से ज्ञात होता है कि प्राचीन भारत में शिक्षा का प्राथमिक उद्धेश्य चरित्र निर्माण था।

आर्ष और प्राचीन संस्कृत ग्रंथो के अध्ययन से ज्ञात होता है कि चरित्र निर्माण के साथ-साथ विधिवत आत्मनियन्त्रण व आत्मानुशासन के अभ्यास द्वारा व्यक्तित्व का सर्वागींण विकास करना, नागरिक व सामाजिक कर्तव्यों का ज्ञान करवाना, सामाजिक सुख और कौशल की वृद्धि, संस्कृति का संरक्षण व परिवर्धन करना और निष्ठा एवं धार्मिक-आध्यात्मिकता का संचार करना भी शिक्षा का लक्ष्य होता था।

संस्कारों के आरोहण, संस्कृति के परिरक्षण व परिवर्धन के माध्यम के रुप में शिक्षा उस युग में इतनी आवश्यक मानी गई इसका प्रमाण वृहदारण्यक-उपनिषद, मनुशास्ति के इस उद्घोष में विहित है ‘‘तस्मात्पुत्रमनुशिष्ट लोक्यमाहुस्तमादेन (मनुशास्ति) एवं‘‘माता शत्रु पिता वैरी वालो यै न पाठित।’’ इन उंक्तियों से प्राचीन भारत में शिक्षा के प्रभाव आवश्यकता और व्यापकता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

प्राचीन काल की शिक्षा पद्धति गुरुकुल व्यवस्था पर आधारित थी जिससे दृष्टव्य है कि समाज के विकास के साथ-साथ पीढ़ीयों से अर्जित श्रुतज्ञान को लिपिबद्ध करने और फिर ज्ञान-विज्ञान को अपनी अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित करने की आवश्यकता के क्रम में ज्ञान को संस्थाबद्ध किये जाने की महत्ता का अनुभव भारत में आर्ष मनीषियों ने पांच हजार वर्ष पूर्व ही कर लिया था।

प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था पर विहंगम दृष्टिपात करने पर हम गौरवमई आर्श्चय से भर जाते है क्योकि इतने जटिल एवं चुनौतीपूर्ण कार्य को भी भारतीय वैदिक ऋषियों ने इतने अधिक वैज्ञानिक, तार्किक व सुव्यवस्थित ढंग से किया कि कालांतर में इस सु-सुगठित शिक्षा प्रणाली में अध्ययन हेतु विदेशी छात्र भी आकृष्ट हुए बिना न रह सके।

गुरुकुल व्यवस्था में विद्यार्थी अपने घर से दुर गुरु के घर, आश्रम या कभी-कभी किसी शिक्षा केन्द्र में रह कर शिक्षा प्राप्त करता था। इस प्रकार के विद्यार्थी को अन्तेवासी या आर्चाय-कुलवासी कहा जाता था। प्राचीन आर्यो की मौलिक व्यवस्था वर्णाश्रम व्यवस्था उस युग की विशिष्ट वैज्ञानिक व्यवस्था थी जिसमें शिक्षाकाल के दौरान छात्र अपने जीवन काल का प्रथम ब्रह्मचर्य आश्रम सम्पूर्ण विधिवत अपने गुरु के समीप गुरु घर में रह कर शिक्षा अर्जित करते हुए पूरा कर लेता था।

क्योकि वैदिक ऋषियों ने विद्या अर्जन को एक ‘तप’ माना है अतः गुरुकुल जो अधिकतर दूरस्थ वन्य प्रांत में होते थे। गुरु की सन्निधि में रहते हुए बालक सम्पूर्ण जीवन को जीने की कला या ढंग सीखता था। प्राचीन षोडश संस्कारों में से दो का संबंध तत्कालीन युग में शिक्षा से था ‘उपनयन’ एवं ‘समावर्तन’ संस्कार।

गुरुकुल की प्रवेश पद्धति में प्रवेश के वक्त उपनयन संस्कार द्वारा सर्वप्रथम गुरु द्वारा बालक को दीक्षित किया जाता था तत्पश्चात वह निष्ठापूर्वक योग, ध्यान, निधिध्यासन व ब्रह्मर्चय का पालन करते हुए गुरु सन्निधि में विद्या-अध्ययन अर्जन करता था। वह गुरु के लिए पारिवारिक सदस्यों की तरह होता था और गुरु व गुरुमाई उसके साथ पुत्रवत व्यवहार करते थे।

गुरु प्रवेश देने से पूर्व कई बार उसकी परीक्षा भी लेते थे। प्राचीन आर्ष ग्रंथो में ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख मिलता है। गुरुसेवा, अनुशासन व विद्या अध्ययन उसका परम पुनीत कर्तव्य था। उसकी सेवाओं के बदले में गुरु भी उस पर व्यक्तिगत ध्यान देता और पूरी लगन के साथ उसे विविध विधाओं कलाओं व विषयों की शिक्षा देता था। इससे गुरु के आचरण व चरित्र का शिष्य के मनोमस्तिष्क पर सीधा प्रभाव पड़ता था।

अपने परिवार से दूर रह कर स्वयं का कार्य स्वंय करने व गुरु सेवा करने से बालक में स्वतः ही आत्मनिर्भरता, सेवा-भाव, आत्मानुशासन विकसित हो जाता और इस प्रकार वह विद्या अध्ययन के साथ ही जीविकापार्जन की शिक्षा भी प्राप्त करता जाता था। गुरु आज की भांति च्ंपक ज्मंबीमत नही होते थे अतः उनका स्थान अत्यन्त आदर पूर्ण होता था।

भिक्षाटन द्वारा उसमें श्रम की महत्ता, विनय-भाव तथा सैकड़ो विद्यार्थियों के साथ गुरुकुल में रहने से सहिष्णुता, सहर्चय स्वतः पल्लवित होता और जब विद्याअर्जन कर लौटता तो हर परिस्थिति व समाज में सामजंस्य की समस्या अपेक्षाकृत वर्तमान की तुलना में कम रहती थी।

गुरु-शिष्य संबंध इतने घनिष्ट व पवित्र होते थे क्योकि छात्र से शिष्य का सीधा सम्पर्क रहता था। पिता-पुत्र के से संबंध होने से उपनयन के बाद शिष्य की भोजन, वस्त्र एवं बीमार होने पर औषधी की व्यवस्था का भार स्वयं गुरु ही वहन करता था। बदले में शिष्य गुरु की आज्ञा पालन व गुरु सेवा में दृढ रहता। गुरु द्रोह को इसलिए सबसे बड़ा अपराध माना गया है।

गुरु सेवा, आज्ञापालन की ऐसी कई कथाएं महाभारत व अन्य वैदिक ग्रंथो में पढने को मिलती है। वर्तमान में जबकि शिक्षक-शिष्य-संबंध हिसंक स्थिति में है, वहीं गुरुकुल प्रणाली में अद्भुत गौरवमयी परम्परा दृष्टव्य होती है। गुरुकुल में प्रवेश की पात्रता स्वयं गुरु ज्ञान के लोक कल्याणकारी उपयोगों के साथ-साथ दुरुपयोगजन्य संकटो पर दूरदर्शी चिंतन रखते हुए निर्धारित करता था।

अतः वह प्रवेश से पूर्व की विद्यार्थी की प्रवृति, क्षमता, स्वभाव, चरित्र और नैतिकमूल्यों के प्रति उसकी श्रद्धा को प्रवेश मापदण्ड़ का आधार बनाते थे जबकि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में केवल छात्र की शक्ति व प्रतिशतांक के आधार पर ही प्रवेश दे दिया जाता है। इस बौद्धिक आरक्षण ने शिक्षा को पतन के गर्त में ढकेलने का कार्य किया है। शिष्य द्वारा भी गुरु की पात्रता परखी जाती थी। उसे अपना गुरु चुनने की स्वतन्त्रता होती थी।

वर्तमान में भारत में शिक्षा के भाषाई माध्यम की बड़ी समस्या है पर गुरुकुल में लोक भाषाओं, भारतीय भाषाओं व तत्कालीन सुपरिचित संस्कृत भाषा में ही शिक्षा होती थी। अतः भारतीयता के गौरव के साथ बोधगम्यता व सुगमता अधिक थी। गुरुकुल प्रणाली में शिक्षा के विषय और उनकी संख्या विद्यार्थी की रुचि व क्षमता पर निर्भर होती थी जो वर्तमान में नही है।

आज जहां विद्यार्थी एक समान विषयों को प्रारम्भिक कक्षाओं में पढ़ने को बाध्य है जो बोझ की तरह होती है, वहीं गुरुकुल में विद्यार्थी के पाठ्यक्रम में चार वेद, छः वेदांग, चौदह विधाओं, 18 शिल्प व 664 कलाओं, दर्शन, इतिहास और विज्ञान में से स्वयं के लिए चयनित विषयों का अध्ययन करने की सुविधा थी।

गुरुकुल में शिक्षा प्रणाली मौखिक व श्रृतिपरम्परा पर आधारित थी जो प्र्रायः व्याख्यान, व्याख्या एवं शास्त्रार्थ जैसी परम्परागत शिक्षण विधियों द्वारा दी जाती थी। उच्चारण की शुद्धता पर बल दिया जाता था परंतु साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिया जाता था कि सिखाई हुई विद्या शिष्य के आचरण में उतरी भी है या नही ? क्योकि ज्ञान को क्रिया में उतरे बिना भार स्वरुप ही माना जाता था जबकि वर्तमान युग में इसका पूर्णतया अभाव है अतः अधिक पढे लिखे व बुद्धिजीवी वर्ग ही जघन्य अपराध करते नजर आते है।

प्राचीन गुरुकुल की मूल्याकंन प्रणाली भी अति विशिष्ट थी। आधुनिक शिक्षा प्रणाली में मूल्याकंन का आधार जहां मात्र विद्यार्थी की स्मरणशक्ति है जबकि गुरुकुल प्रणाली में मूल्याकंन पद्धति व्यावहारिक व विद्यार्थी के व्यवहारगत परिवर्तन से आंकी जाती थी।

पूरे अध्ययनकाल तक गुरु विद्यार्थी का सतत् मूल्यांकन उसकी सीखने की क्षमता, त्वरिता, अनुकरण, व्यावहारिक दक्षता, विद्या के उपयोग व व्यवहारगत परिवर्तन से करता था और गुरु जब पूरी तरह संतुष्ट हो जाता था तब अध्ययन की समाप्ती पर षोडश संस्कारों में से शिक्षा संबंधी दूसरा संस्कार – ‘‘समार्वतन संस्कार’ का आयोजन होता था। ‘समार्वतन’ के अन्तर्गत छात्र को विद्वतमंडुली से शास्त्रार्थ कर विजयी होना होता था।

तदन्तर व स्नातक हो जाता था परंतु विद्वतसभा से शास्त्रार्थ में विजय ही उसकी योग्यता का अंतिम प्रमाण नही होता था वरन् आर्चाय-गुरु द्वारा की गई परीक्षा में उर्तीण होने तथा उनके संतुष्ट होने पर ही उसकी दीक्षा होती थी अर्थात अन्तिम निर्णय गुरु के ही पास होता होता था।

प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था उपब्धियों और डिग्रियों से मुक्त थी। संस्थागत शिक्षा की पूर्णावधी पर दीक्षान्त आयोजित होता था जो पूर्णतया विद्या के परीक्षण के साथ-साथ नैतिक मापदण्ड़ो पर आधारित होती थी और गुरु द्वारा दी गई ‘वाचिक-उपाधि’ ही पर्याप्त मानी जाती थी।

गुरु के मात्र यह कह देने से कि ‘‘अब तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हुई, तुम व्यावहारिक जीवन में लोककल्याण के लिए अपनी विद्या को सदुपयोग करने की दक्षता प्राप्त कर चुके हो’’ शिष्य का दीक्षान्त हो जाता था और मांगी गई भेंट गुरु हो अर्पण कर शिष्य अपने गृह की ओर प्रस्थान करता था। परंतु कालान्तर में मध्यकाल में विक्रमशिला, नालन्दा, वल्लभी जैसे बड़े विश्वविद्यालयी गुरुकुलों में उपाधी के विवरणें में ‘सनद’, ‘तर्कलंकार, तर्कचक्रवर्ती नाम से मिलता है।

वर्तमान में जबकि शिक्षा का व्यापारीकरण, औद्यागीकरण हो चुका है, शिक्षा अपने मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल सिद्ध होती जा रही है हमें प्राचीन भारतीय गुरुकुल प्रणाली के गौरवमई अद्भुद इतिहास से मार्ग दर्शन लेना चाहिए। क्योकि गुरुकुल प्रणाली पूर्णत वैज्ञानिक ही नही वरन् मनौवैज्ञानिक शैक्षिक आधारों की व्यावहारिक प्रणाली थी जिसमें ब्लूम के शिक्षा मॉडल के व्यवहारगत परिर्वतन पर पूरी तरह ध्यान दिया जाता था, जिसमें जॉन डिवी के छात्र, अध्यापक, पाठ्यक्रम, का अर्न्तसंबंध व अर्न्तक्रिया अत्यन्त व घनिष्ठ थी।

प्राचीन गुरुकुल की आंतरिक व्यवस्था पूर्णतया संस्थागत थी। सत्ता व समाज के हस्तक्षेप के बीना स्वतः र्स्फूत उत्तरदायित्यों का निर्वहन करते ये प्राचीन भारतीय गुरुकुल शिक्षा विद्या को धंधा बनाने के बजाय उपासना रुप में स्वीकारते थे और यहीं कारण था कि वर्तमान युग की शैक्षिक समस्याओं से उलट ये गुरुकुल मूल्यआधारित, गुणवत्ता युक्त शिक्षण और जीवनोपयोगी शिक्षा देने में पूर्ण समर्थ थे। गुरुकुल प्रणाली की यह प्राचीन भारतीय मनीषियों की देन इतनी व्यावहारिक और वैज्ञानिक थी कि आठवी शताब्दी तक आते-आते विक्रमशिला, नालन्दा, पाटलीपुत्र, ओदंतपुरी, तक्षशिक्षा, सोमपुरा, वल्लभी, जगद्दला ने सर्म्पूण विश्व में भारतीय शिक्षा का ऐसा परचम लहराया कि हजारों की संख्या में विदेशी भारत में विद्याअध्ययन हेतु आने लगे।

गुरुकुल शिक्षण-व्यवस्था भारतीय शिक्षा पद्धति का चरमोत्कर्ष काल थी जिसके व्यापक शैक्षिक दृष्टिकोण व व्यावहारिक शिक्षा ने न केवल भारतीय संस्कृति की विरासत को अक्षुण्ण रख समृद्ध किया वरन् चरित्र निर्माण कर कई प्रकाण्ड विद्वानों को भी आलोकित किया। कालांतर में 11वी व 12वीं शताब्छी के आक्राताओं के कहर ने इस प्राचीन व्यवस्था को आधात देकर चरमरा दिया। लगभग 7 लाख 32 हजार गुरुकुलों व 20 से ज्यादा विज्ञान शाखाओं वाले भारत की यह प्राचीन शिक्षा व्यवस्था क्रूर आक्रांताओं की भेंट चढ़ गई।

अंत में मिसाइल मेन डॉ. कलाम का कथन विचारणीय जान पड़ता है, उन्होने कहा – ‘‘दुर्भाग्य है कि भारत में हम अपने श्रेष्ठतम सृजनात्मक पुरुषो को भूलचुके है। इसका कारण विदेशियत का प्रभाव और अपने बारे में हीनता बोध की मानसिक ग्रंथी से देश के बुद्धिमान लोग ग्रस्त है’’ वर्तमान शैक्षिक जगत को गुरुकुल प्रणाली के आलोक में अपनी समस्याओं का समाधान खोजना चाहिए।

आलेख

डॉ नीता चौबीसा,
लेखिका इतिहासकार एव भारतविद बाँसवाड़ा, राजस्थान

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