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बिंद्रानवागढ़ की जमींदारी

बिंद्रानवागढ जमींदारी का इतिहास शुरु होता है लांजीगढ के राजकुमार सिंघलशाह के छुरा में आकर बसने से। तत्कालीन समय में यहां भुंजिया जाति के राजा चिंडा भुंजिया का शासन था। यहां की जमींदारी मरदा जमींदारी कहलाती थी। राजकुमार सिंघलशाह चूंकि एक राजपुत्र था, उसके छुरा में आकर बसने से चिंडा भुंजिया को अपना साम्राज्य छिन जाने का भय हुआ इसलिए उसने युक्तिपूर्वक एक दिन राजकुमार को भोजन के लिए आमंत्रित किया और उसको धोखे से विष दे दिया।

राजकुमार सिंघलशाह की मृत्यु हो गई। जब इस घटना की जानकारी उसकी पत्नी को हुई तो वह अपने गर्भस्थ शिशु की प्राण रक्षा के लिए ओडिशा के पटनागढ राज्य में चली गई। वहां एक ब्राम्हण के यहां आश्रय लिया और अपनी पहचान छुपाकर रहने लगी। ब्राम्हण ने रानी को असहाय गर्भवती नारी समझकर उसको पुत्रीवत् स्नेह दिया और उसका लालन-पालन करने लगा। समय आने पर रानी ने एक परम तेजस्वी बालक को जन्म दिया। जिसका नाम रखा गया-कचना धुरवा। तब पटनागढ में राजा रमई देव का शासन था। शनै:शनै:बालक बढता गया और उसने अपने अप्रतिम शौर्य और वीरता के कारण राजा की सेना में पहले एक सैनिक और बाद में सेनापति का पद प्राप्त किया।

इस दौरान उसकी माता कचना धुरवा को उनके अतीत के बारे में जानकारी देती रही। कचना धुरवा राजा का विश्वास जीतता रहा और राजा का प्रिय बनता गया। राजा उसकी बहादुरी पर मुग्ध था। उसके सेवा के बदले में वह कचनाधुरवा को कोई बड़ा ईनाम देना चाहता था। तब समय पाकर कचना धुरवा ने राजा से मरदा की जमींदारी मांगी। राजा ने उसकी बात मान ली और उसको मरदा की जमींदारी दे दी।

फिर कचना धुरवा मरदा आया और चिंडा भुंजिया को मारकर अपनी पिता की मृत्यु का बदला लिया। साथ ही एक नई जमींदारी की नींव रखी-नवागढ जमींदारी। चूंकि ये जमींदारी वनबाहुल्य क्षेत्र में स्थित थी और बंदरों से प्रभावित थी, इसलिए कालांतर में इसका नाम नवागढ़ से बेंदरानवागढ(बिन्द्रानवागढ़) प्रचलित हो गया। बिंद्रानवागढ वैसे एक गांव का नाम है जो आज भी मौजूद है। इसी के नाम पर राज्य का विधानसभा क्षेत्र भी है। जैसे बस्तर नाम के एक छोटे से गांव के नाम पर बस्तर जिला है वैसे ही बिन्द्रानवागढ़ के नाम पर एक विशाल विधानसभा क्षेत्र है।

रायपुर गजेटियर के अनुसार इस जमींदारी के अंतर्गत कुल 446 गांव आते थे और यह 1559 वर्गमील तक फैली थी। सन् 1901 में यहां की कुल जनसंख्या 61174 थी और गरियाबंद इस जमींदारी का सबसे बड़ा गांव था। इस जमींदारी में ज्यादातर गोंड और कमार जनजाति के लोग ही निवास करते थे। अन्य जाति वर्ग के लोग काफी बाद में आए। कमार जनजाति के लोग बीहड़ वनों में रहना अधिक पसंद करते थे। इस जमींदारी के लगभग 970 वर्गमील में घना जंगल हुआ करता था, जिसमें सरई और सागौन के वृक्ष बहुतायत में मिलते थे।

इस जमींदारी का संबंध भारत के स्वतंत्रता संग्राम से भी रहा है। सन् 1857 में देश में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आरंभ हुआ। इसके ठीक पहले सन् 1856 में छत्तीसगढ़ के सोनाखान क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा, तब वहां के राजा वीरनारायण सिंह ने अपनी प्रजा के लिए कसडोल के एक व्यापारी से अनाज मांगा। जब बार बार अनुनय-विनय करने पर भी व्यापारी नहीं माना तो उसने उसके गोदाम को लूट लिया और अनाज गरीब जनता में बांट दिया। इसकी शिकायत उस व्यापारी ने अंग्रेजों से कर दी।तब अंग्रेज उसकी गिरफ्तारी के लिए आए।वीर नारायण सिंह ने विद्रोह कर दिया और अंग्रेजों का दुश्मन बन गया।तब अंग्रेज अधिकारियों ने वीर नारायण सिंह को पकड़ने के लिए सैनिक टुकड़ी भेजी। सोनाखान को उजाडकर आग लगा दी गई।

इस लड़ाई में दुर्भाग्य ये रहा कि इसमें में देवरी, भटगांव, बिलाईगढ और कटगी के जमींदारों ने वीर नारायण सिंह को सहयोग देने के बजाय अंग्रेजों का सहयोग दिया। एकमात्र संबलपुर के जमींदार सुरेंद्र साय ने अंग्रेजों का सहयोग नहीं किया। अपनी प्रजा के ऊपर अंग्रेजों के अत्याचार को देखकर नारायण सिंह ने विवश होकर अंततः आत्मसमर्पण को उचित समझा और रायपुर आकर आत्मसमर्पण कर दिया। इस लडाई में देवरी के जमींदार महराजसाय की अहम भूमिका थी। वह रिश्ते में वीरनारायण सिंह का चाचा था मगर अपनी निजी शत्रुता निभाने के लिए उसने अंग्रेजों का सहयोग किया और लडाई में उनका मार्गदर्शन करता रहा। इतिहास गवाह है कि मीरजाफर और जयचंद जैसे गद्दार हर युग और काल में हुए हैं। इस लड़ाई के लिए वीर नारायण सिंह को अपराधी मानते हुए ब्रिटिश सरकार ने 10 दिसंबर 1857 को रायपुर में मौत की सजा दी।

इस घटना ने संबलपुर के राजा सुरेंद्र साय को व्यथित कर दिया। वीर नारायण सिंह के साथ उनके अच्छे संबंध थे। वह भी अंग्रेजों का दुश्मन था और अंग्रेजी सरकार के नाक में उसने दम कर रखा था। वीर नारायण सिंह के पुत्र गोविंदसिंह को उसने अपनी सैन्य सहायता दी और उसके मार्गदर्शन में गोविंदसिंह ने महराजसाय की गर्दन काटकर अपनी पिता की मृत्यु का बदला ले लिया। आजादी की जिस खुली हवा में हम सांस ले रहे हैं वह हमें असंख्य वीरों की बलिदान के एवज में मिली सौगात है।

आजादी की गाथा बलिदान और बलिदानियों की अमर गाथा है। खैर, इस घटना के बाद वीर सुरेंद्रसाय का अंग्रेज़ों के साथ गोरिल्ला युद्ध चलता ही रहा। सन् 1860 में जब वीर सुरेन्द्र साय को मानिकगढ से भगा दिया गया तब बिन्द्रानवागढ़ के राजा उमरशाह ने उसको अपने राज्य में शरण दी। उनके लिए रसद आदि की व्यवस्था की। राजा उमरशाह अंग्रेजी शासन के विरोधी थे। वो अंग्रेजी शासन को टैक्स देने के भी खिलाफ थे। जब इस पर अंग्रेजी शासन ने उनसे 1 जनवरी 1861 को जवाब मांगा तो उन्होंने उसका प्रत्युत्तर चार महीने बाद भी नहीं दिया। जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने उन पर 1000 रू का जुर्माना ठोका था।

खरियार और बिंद्रानवागढ के जमींदार ब्रिटिश सरकार के घोर विरोधी थे। वीर सुरेन्द्र साय कभी अंग्रेजों के हाथ में नहीं आया था, सन् 1862 में बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में उसने आत्मसमर्पण कर दिया और एक कैदी के रूप में असीरगढ़ के किले में सन् 1884 में उनकी मृत्यु हो गई। संभवतः गरियाबंद क्षेत्र से जुडाव के कारण ही गरियाबंद के शासकीय कालेज का नामकरण अमर शहीद सुरेंद्र साय के नाम पर किया गया है। ठीक उसी प्रकार अंचल में देवता के रूप में पूजित वीर कचनाधुरवा के नाम पर छुरा के शासकीय कालेज का नामकरण किया गया है। एक मजेदार बात और है कि शासकीय कालेज के साथ ही छुरा में संचालित निजी कालेज का नाम भी वही है।

सन् 1880 में इस जमींदारी को जमींदार के नाबालिग होने के कारण कोरट कर ली गई थी। तत्कालीन जमींदार केवलशाह की कम आयु में ही मृत्यु हो गई। तब उसकी विधवा को इस जमींदारी का अधिकार दिया गया। सन् 1902 में उसकी भी मृत्यु हो गई। तब केवलशाह के भतीजे छत्रशाह को बिन्द्रानवागढ़ जमींदारी की जायदाद मिली। जब जमींदारी कोरट अधीन थी तब मुख्यालय गरियाबंद को बनाया गया था। उस दौरान कोर्ट के द्वारा तीन लाख के खर्च में महल और सडक बनवाई गई थी। सन् 1924 के आसपास इस जमींदारी अंतर्गत कुल 6 मदरसे, 7डाकखाने और 4 थाने क्रमशः देवभोग, नवागढ़, गरियाबंद और छुरा में थे।

बताया जाता है कि छुरा का भव्य महल राजा छत्रशाह के द्वारा ही बनवाया गया है। महल की वास्तुकला देखने लायक है। महल में अंकित फूलों और बेलबूटों का अंकन मन मोह लेता है। महल की बाहरी दीवार अत्यंत कलात्मक हैं। शीर्ष पर शेर की आकृति बनी हुई है। सामने की ओर जगह-जगह पर आले बने हुए हैं। संभवतः तब शायद बिजली की सुविधा नहीं रही हो,और इन आलों पर दीपक जलाकर रौशनी की जाती रही हो। कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि महल को बनाने के लिए बेल गूदा, गोंटा का चूर्ण, गुड़ आदि का प्रयोग हुआ था। छत पर सरई पेड़ के म्यार और लोहे की बड़ी बड़ी प्लेट लगी है। दरवाजे लकड़ियों से बनी हुए है और उसमें रंगीन शीशे लगे हुए हैं। अपने दौर में महल की भव्यता देखने लायक रही होगी।

सियान बताते हैं कि इस महल में सात दरवाजे थे। राजा के पास पारस पत्थर होने और महल निर्माण करनेवाले कारीगरों के हाथ कटवा देने की कहानियां भी क्षेत्र में प्रचलित है।अब इसकी सत्यता तो भगवान ही जाने। पर महल है शानदार! जीर्ण-शीर्ण होने के बाद भी उसकी भव्यता देखते ही बनती है। पहले यहां का दशहरा दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। मीलों दूर से लोग देखने आते थे। राजा द्वारा बनाई गई रावण की मूर्ति आज भी अच्छी हालत में है। कुछ समय पूर्व ही उनके वंशजों द्वारा इसकी मरम्मत करवाई गई है। सात आठ साल पूर्व पुनः यहां के राजशाही दशहरे को पुराना स्वरूप और भव्यता प्रदान करने का प्रयास किया गया था।

छुरा नगर के मध्य स्थित माता शीतला मंदिर अतिप्राचीन तो नहीं है, पर मूर्ति प्राचीन है। जिसकी शोभा देखते ही बनती है। भगवान राम का मंदिर भी यहां के जमींदारों ने बनाया है। जो मानस मंदिर के नाम से विख्यात है। यहां प्रतिवर्ष मानस यज्ञ का भव्य आयोजन होता है।

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One comment

  1. विवेक तिवारी

    अब्बड़ सुग्घर जानकारी बधाई भईया
    💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

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