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भोंगापाल के बुद्ध एवं मोहनी माया

लोक मान्यताएं प्रधान होती हैं, लोक ने जिसे जिस रुप में मान लिया, पीढियों तक वही मान्यता चलते रहती है। जिस तरह राजिम के राजिम लोचन मंदिर के मंडप में स्थापित बुद्ध को राजा जगतपाल माना जाता है, तुरतुरिया में केशी वध एवं वृत्तासुर वध के शिल्पांकन को लव और कुश माना जाता है, जिस तरह भंगाराम में डॉक्टर देव माना जाता है, उसी तरह भोंगापाल में भी बुद्ध के लिए अलग मान्यता दिखाई देती है।

राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. 30 में स्थित विकास खण्ड मुख्यालय फरसगाँव से लगभग 35 कि. मी. दूर ग्राम भोंगापाल के बीहड़ जंगल में बौद्ध विहार के प्राचीन ध्वंसावशेष है । भग्न चैत्यगृह में गौतम बुद्ध की पद्मासन की मुद्रा में भव्य प्रतिमा है । गौतम बुद्ध की कथा से सर्वथा अपरिचित ग्रामीण जन इस प्रतिमा को गांडादेव के नाम से सम्बोधित करते हैं ।

बौद्ध विहार से कुछ ही दूरी पर एक और भग्न हिन्दू मंदिर का ध्वंसावशेष है, जहाँ एक ही प्रस्तर फलक पर सप्तमातृका की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है । स्थानीय जन सप्तमातृकाओं को गांडा देव की सात पत्नियाँ बताते हैं । चैत्यगृह राज्य शासन द्वारा धरोहर के रुप में संरक्षित है, किन्तु प्रतिमा खण्डित अवस्था में है ।

भोंगापाल का सप्तमातृका फ़लक

जब प्रतिमा के खण्डित होने का कारण जानने का प्रयास किया तो हमें एक रोचक जानकारी मिली। ग्रामवासियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अंचल में यह जन विश्वास प्रचलित है कि यदि कोई युवक किसी युवती से एकतरफा प्रेम करता है, किन्तु युवती के रुख से लगता है कि उसे पाना संभव नहीं है तो वह गौतम बुद्ध की प्रतिमा को खरोंच कर (चूर्ण को) पान या किसी अन्य खाद्य पदार्थ के माध्यम से युवती (जिसे वह प्यार करता है) को खिलाने का प्रयास करता है।

युवती यदि चूर्ण खा गई तो वह खिलाने वाले युवक के प्रति प्रेमासक्त हो जाती है। इसी प्रकार कोई युवती किसी युवक को प्यार करती है, तो वह भी यही नुस्खा अपनाते हुए गौतम बुद्ध की प्रतिमा को खरोंचकर उस युवक को खिला देती है जिसे वह प्यार करती है । युवक चूर्ण खिलाने वाली युवती के प्रति प्रेमासक्त हो जाता है । इस अद्भुत मोहनी की माया में गौतम बुद्ध की भव्य प्रतिमा खण्डित हो गई है।

जो गौतम बुद्ध अपनी एक ही खूबसूरत पत्नी यशोधरा को त्याग कर राजसी सुख और माया-मोह से विरक्त हो गया था, उन्ही गैतम बुद्ध को यहाँ सात पत्नीयों के साथ भोग-विलास में रत विलासी राजा माना जाता है और विरक्त गौतम बुद्ध की प्रस्तर काया को माया- मोह की ओर आसक्त करने वाला एक माध्यम बनाया जाता है ।

धार्मिक कथा के अनुसार कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन का एक पुत्र हुआ, जिसका नाम था सिद्धार्थ। सिद्धार्थ बचपन से ही लोगों के दुखों के बारे में सोचता था । कभी-कभी विचारों में इतना मग्न हो जाता था कि आस-पास होने वाली गतिविधियों से भी अनभिज्ञ रह जाता था । इन सब बातों से राजा शुद्धोधन को डर लगने लगा था कि राजकुमार सिद्धार्थ कहीं सन्यासी न बन जाय ।

सिद्धार्थ को सांसारिक माया मोह में आसक्त बनाये रखने के लिए राजा सुद्धोधन ने राजमहल में उनकी सुख-सुविधा और भोग-विलास के सारे इंतजाम कर दिये थे । सोलह वर्ष की आयु में ही राजकुमारी यशोधरा से उनका विवाह कर दिया गया। सिद्धार्थ का राहुल नामक एक पुत्र भी हुआ। लेकिन सिद्धार्थ तो हमेशा लोगों के दुखों पर चिंतन में मग्न रहता था ।

एक बार सिद्धार्थ को राजमहल से बाहर निकल कर नगर भ्रमण की इच्छा हुई । नगर भ्रमण के दौरान रोगी, वृद्ध और अर्थी (शवयात्रा) जैसे तीन दृश्यों को देखा, तो वह अत्यंत दुखी हो गया । और जब सारथी ने बताया कि रोगी हो जाना, वृद्धावस्था को प्राप्त होना, तथा अन्त में मृत्यु हो जाना मानव जीवन की स्वभाविक प्रक्रिया है । तब से सिद्धार्थ लोगों को दुःखों से मुक्ति दिलाने का उपाय सोचता और चिंतन में डूब जाता था ।

सिद्धार्थ का मन विचलित सा रहने लगा, माया-मोह और राजसी सुख से उनका मन विरक्त हो गया। अन्ततः एक रात अपनी खूबसूरत पत्नी, प्यारा सा पुत्र एवं राजमहल की सारी सुख सुविधाओं को छोड़कर तपस्या के लिए निकल पड़ा । वर्षों की कठिन साधना के बाद बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें बोधि (ज्ञान) की प्राप्ति हुई । और राजकुमार से तपस्वी बने सिद्धार्थ, गौतम बुद्ध कहलाये।

आलेख

घनश्याम सिंह नाग
ग्राम पोस्ट-बहीगाँव जिला कोण्डागाँव छ.ग.


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