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भारतीय इतिहास में मुगलों का बड़ा सैन्य समर्पण

7 जनवरी 1738 : भोपाल युद्ध और दोराहा संधि

इतिहास के पन्नों में एक ओर आक्रांताओं के क्रूरतम अत्याचार और विध्वंस का वर्णन है तो दूसरी ओर भारतीयों के शौर्य का विवरण भी। भोपाल के समीप हुआ यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें मुगल, निजाम हैदराबाद, अवध एवं भोपाल नबाब की संयुक्त सेनाओं को मराठों ने पराजित किया और पेशवा बाजीराव ने 70 हजार मुगल सैनिकों से समर्पण कराया और पचास लाख रुपया युद्ध खर्चे के रूप में बसूल किये।

उन दिनों मुगल बादशाह मोहम्मद शाह दिल्ली की गद्दी पर थे। निजाम हैदराबाद, अवध, भोपाल आदि सब उनके आधीन थे। लेकिन निजाम भी मन ही मन अपनी ताकत बढ़ा रहा था। निजाम ने एक प्रकार से भोपाल रियासत को अपने आधीन कर लिया था।

उधर मराठा साम्राज्य के पेशवा बाजीराव ने उत्तर भारत में अपनी धाक भी जमा ली थी। वे छत्रपति शिवाजी महाराज के उस सपने को पूरा करने के अभियान में लगे थे जो उन्होंने पूरे भारत में हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना का देखा था।

बाजीराव 1720 में पेशवा बने और उत्तर भारत में अभियान आरंभ किया। उन्हें हर युद्ध में विजय मिली। युद्ध के मैदान में मुगल और मुगलों का कोई समर्थक उनके सामने टिक ही नहीं पाया। इसके दो कारण थे। एक तो औरंगजेब के मरने के बाद मुगल सत्ता कमजोर होने लगी थी।

दूसरे पेशवा बाजीराव अद्भुत सेनापति थे। वे युद्धनीति और कूटनीति दोनों में पारंगत थे। उन्होंने दिल्ली पर अनेक धावे बोले। वे हर युद्ध अभियान में सफल रहे। अपने इन्ही अभियानों की श्रृंखला में मराठा सेना दिल्ली पर चढ़ाई की थी।

हमले के बाद बादशाह मोहम्मद शाह ने एक प्रकार से समर्पण ही कर दिया था। पर बादशाह ने मन ही मन पेशवा बाजीराव और मराठों की शक्ति समाप्त करने की योजना बनाई। अपनी योजना को पूरा करने केलिये बादशाह ने निजाम हैदराबाद से संपर्क किया। निजाम भी एक युद्ध में बाजीराव से पराजित हो चुक था।

उन दिनों भोपाल रियासत निजाम के आधीन हुआ करती थी। बादशाह ने अवध नबाब से भी बात की और राजा जयसिंह द्वितीय से भी। रणनीति बनी कि पेशवा बाजीराव के नेतृत्व उत्तर भारत से लौट रही मराठा सेना को भोपाल में घेरा जाय।

योजना के अनुसार निजाम भोपाल आकर किले में रुक गया। पेशवा और मराठा सेना को घेरने के लिये भोपाल के समीप सिरोज से लेकर दोराहे तक और रायसेन के बीच नाकाबंदी कर ली गई। रास्ते में इस नाकबंदी की खबर बाजीराव को लग गई थी।

बाजीराव चलती हुई सेना में रणनीति बनाने और बदलने में माहिर माने जाते थे। उनकी सेना में लगभग पचास हजार सैनिक थे। उन्होंने योजना गुप्त रखी और सेना को तीन टुकड़ियों में बाँट दिया। इनमें बीस बीस हजार के दो दस्ते और एक दस्ता दस हजार का बनाया।

दोनों बड़े दस्तों को दो अलग अलग दिशाओं में रवाना कर दिया। पेशवा ने दस हजार की सेना वाला दस्ता अपने पास रखा और अपनी गति धीमी की। यह समाचार भोपाल भी पहुँचा। निजाम को लगा अब बाजीराव को घेरना आसान होगा। लेकिन तभी पहले दस्ते ने सिरोंज से आगे बढ़कर धावा बोला।

इसकी कमान सिंधिया के हाथ थी। दूसरे दस्ते ने आष्टा से धावा बोला। इसकी कमान होल्कर के हाथ में थी। यह युद्ध दिसम्बर 1737 के अंतिम सप्ताह में आरंभ हुआ। लगभग एक सप्ताह के भीषण युद्ध के बाद पेशवा की तीसरी सुरक्षित टुकड़ी चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में सीधे भोपाल में घुसी और किला घेर लिया।

किले के भीतर निजाम हैदराबाद, नबाब भोपाल, नबाब अवध भी मौजूद थे। किला घेरकर पानी की सप्लाई काट दी गई। कुछ विवरणों में यह भी लिखा है कि पानी में विष मिला दिया गया था। जो हो, विष मिलाया हो अथवा पानी की सप्लाई काटी हो।

किले के भीतर लोग प्यास से बेहाल हो गये। तब निजाम ने राजा जयसिंह द्वितीय के माध्यम से संधि का प्रस्ताव भेजा। भोपाल के समीप दोराहा नामक स्थान पर पेशवा बाजीराव और राजा जयसिंह द्वितीय के बीच यह वार्ता आरंभ हुई। जो इतिहास में भोपाल युद्ध और दोराहा संधि के रूप में जानी जाती है।

यह वार्ता 7 जनवरी 1738 को संपन्न हुई। पेशवा बाजीराव ने समझौते के लिये युद्ध स्थल पर मौजूद सभी मुगल सेना के पूर्ण समर्थन की शर्त रखी। निजाम ने शर्त मानी। यह मुगल सेना लगभग सत्तर हजार सैनिकों की एक संयुक्त सेना थी जिसमें मुगल, निजाम, अवध और भोपाल रियासतों के सैनिक थे। सबका समर्पण हुआ।

मराठा सेना ने मुगल सेना की तोपें और कुछ हथियार जब्त किये तथा युद्ध व्यय के रूप में पचास लाख रुपया भी वसूल किया। इसके साथ पूरे मालवा क्षेत्र में राजस्व बसूली के अधिकार भी मराठों ने लिये।

इतिहास में यह युद्ध अपनी तरह का बहुत अलग था। बाजीराव पेशवा जब मथुरा से चले थे तब उन्हें कल्पना भी नहीं थी कि मार्ग में उन्हे घेरने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। षड्यंत्र की सूचना उन्हें मार्ग में मिली।

उन्होने बिना किसी हलचल के अपनी सेना को तीन टुकड़ियों में विभाजित कर दिया। एक टुकड़ी आरोन के रास्ते सिरोंज की ओर चली तो दूसरी देवास की ओर रवाना हुई। सेना को विभाजित करके अलग-अलग दिशाओं से हमला बोलना पेशवा बाजीराव की रणनीति थी

मराठा सेना के अलग अलग दिशाओं में जाने का यह समाचार जब भोपाल आया तो निजाम हैदराबाद को अपनी जीत आसान लगी। उसे कल्पना भी न थी कि जो सेना देवास की ओर गई है वह आष्टा के रास्ते से भी हमला कर सकती है।

दो दिशाओं से हुये इस हमले और तीसरी टुकड़ी द्वारा सीधे किला घेर लेने जैसी रणनीति विश्व में बहुत कम देखने को मिलती हैं। अनेक युद्ध लेखकों ने इस युद्ध का विश्लेषण किया और इसे विश्व के अनूठे युद्ध में से एक माना।

आलेख

श्री रमेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल, मध्य प्रदेश


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