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बागबाहरा कलां की तीन देवियाँ

हमारे देश भारत एवं विदेशों में भी आदि शक्ति जगतजननी मां जगदंबा शक्तिपीठों में विराजमान हैं। जहाँ उन्हें कई नाम एवं कई रूपों में बारहों महीने पूजा जाता हैं और चैत कुंवार के नवरात्रि में विशेष पूजा अर्चना की जाती है। जहां श्रद्धालु जन भारी संख्या में मनोकामना पूर्ति हेतु दर्शन करते हैं। श्रद्धा एवं आस्था के साथ शक्तिपीठ में विराजमान माताओं की पूजा अर्चना होती है।

छत्तीसगढ़ में वही आस्था एवं श्रद्धा के साथ विभिन्न देवीयों की स्थापना कर पूजा अर्चना की जाती है। जैसे मुख्य देवी के मंदिर को चंडी माता मंदिर या खल्लारी माता मंदिर कहा जाता है। तो स्थापना को चंडी थापना (स्थापना शब्द का छत्तीसगढ़ी बोली में बिगड़ा रूप) या खल्लारी थापना कहा जाता है।

थापना वास्तव में मुख्य देवियों के मंदिर की दूरी एवं दुर्गम पहाड़ियों की ऊंचाई की तकलीफमय यात्रा से बचने के लिए सर्वसुलभ ग्रामीण इलाकों में जब पाषाण खंड को मूर्ति का आकार देकर या बिना मूर्ति आकार में पाषाण खंड को शास्त्रीय विधि से प्राण प्रतिष्ठा कर पूजा अर्चना की जाती है। पाषाण खंड पर सिंदूर का लेपन कर (इसे चोला चढ़ाना भी कहा जाता है) मुख्य देवी की तरह ही पूरी आस्था के साथ पूजा अर्चना की जाती है। वास्तव में यही परम्परा इस पौराणिक मान्यताओं को सिद्ध करती है कि ईश्वर कण-कण में सर्वत्र विराजमान हैं। जहां श्रद्धालु भक्त ग्रामीण जन चैत्र कुंवार नवरात्रि पर्व के अलावा भी बारहों महीने पूजा अर्चना करते हैं।

विभिन्न नामों से पूजी जाने वाली स्थापित देवियों की स्थापना एवं पूजा अर्चना के पीछे भी कोई न कोई किवदंती या देवी आस्था से जुड़ी स्वप्न कथा अवश्य होती है। इसी श्रृंखला में आज हम चर्चा करेंगे ग्राम पंचायत बागबाहरा कला में स्थापित त्रिदेवियों के बारे में।

माता खल्लारी थापना

छत्तीसगढ़ प्रान्त के जिला महासमुंद के बागबाहरा ब्लाक स्थित ग्रामपंचायत बागबाहरा कला कला में भी माता खल्लारी थापना, माता चंडी थापना एवं माता काली थापना स्थित हैं। सभी माताओं के स्थापना से जुड़ी कथा एवं मान्यता भिन्न भिन्न एवं विशेष हैं।

माता खल्लारी थापना मन्दिर ग्रामपंचायत बागबाहरा कला के आश्रित ग्राम करमापटपर में बागबाहरा से पिथौरा पक्की सड़क मार्ग पर बागबाहरा से लगभग तीन किलोमीटर दूरी पर मुख्य मार्ग पर स्थित है। माता खल्लारी थापना मन्दिर में सड़क के दोनों ओर और भी कई देवी देवताओं के मंदिर हैं। मन्दिर के मुख्य पुजारी श्री मनकर सिंह ठाकुर जिनकी आयु लगभग 75 से 80 वर्ष है जो ग्राम करमापटपर के निवासी हैं जो विगत पाँच छः वर्षों से माता जी की पूजा अर्चना कर रहे हैं। वे बताते हैं कि माता खल्लारी सैकड़ों वर्ष पूर्व से यहां स्थापित हैं। जहाँ प्रतिदिन सुबह शाम पूजा अर्चना के साथ चैत एवं कुंवार नवरात्रि पर्व पर ज्योति कलश स्थापना की जाती है और माताजी का यशोगान किया जाता है।

खल्लारी माता

वर्तमान में माताजी के मंदिर के व्यवस्था का संचालन ग्राम बागबाहरा कला, करमापटपर, कल्याणपुर, कोटनपाली, मुड़ागांव, बागबाहरा के सदस्यों द्वारा किया जा रहा है। जिनमें अध्यक्ष श्री चोवाराम जी साहू कोटनपाली हैं। सभी कार्यकर्ताओ के मार्गदर्शन में माताजी की कृपा से वर्तमान नवरात्रि में दो सौ से तीन सौ के मध्य मनोकामना ज्योति कलश स्थापना श्रद्धालु जन द्वारा प्रत्येक नवरात्रि में प्रज्ज्वलित किया जाता है।

पुजारी जी बताते हैं कि माताजी के मुख्य मंदिर में एक ज्योति कई वर्षों से अखंड प्रज्ज्वलित हो रही हैं। मन्दिर के बगल में पुजारी जी की कुटिया है। माताजी के मंदिर के सामने ओर श्रद्धालु भक्तजन के द्वारा कई मंदिर बनवाया गया है जिनमें यम-यमी भाई बहन का मंदिर, शनिदेव, हनुमान जी, गणेश जी का मंदिर, जगन्नाथ जी का मंदिर, संतोषी माता का मंदिर, भैरव बाबा का मंदिर तथा अन्य देवी देवताओं के मंदिर स्थित हैं। समिति के द्वारा माता जी का भव्य मंदिर बनकर तैयार है। इन सब के साथ ही साथ शंकर जी की विशाल प्रतिमा का निर्माण भी कराया गया है जिन्हें श्रद्धालु भक्त श्री पुनीत राम वर्मा सेवानिवृत्त स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा कराया गया है। मन्दिर पहाडी के नीचे छोटा सा कुआं हैं जहाँ ग्रीष्म ऋतु में भी पर्याप्त पानी भरा होता है। मन्दिर में और भी कई भवन निर्माणाधीन हैं।

माताजी का यह मंदिर सड़क के दोनों ओर के चढ़ाऊँ पर छोटी पहाडी के शिखर पर स्थित है जहां का घना वन मन को मोह लेता है मन्दिर के समीप में ही देव ग्राम लमकेनी का बांध और पहाड़ी स्थित है। सामने में ग्राम कोटनपाली और बिराजपाली कि पहाड़ी स्थित है। माताजी का यह मंदिर वर्तमान में पर्यटन की संभावनाओ से ओतप्रोत है, इसका संचालन दानदाताओं के दान पर ही आधारित है। माता खल्लारी थापना सड़क पर ही होने के कारण इस मार्ग पर यात्रा करने वाले यात्री भी सहज भाव से दर्शन हेतु रुककर पूजा अर्चना करते हैं।

माता चंडी थापना

माता चंडी स्थापना मन्दिर बागबाहरा से खरियार रोड (उडीसा) मार्ग पर बागबाहरा से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर ग्राम बागबाहरा कला स्थित राजीव कानन के सामने स्थित है। जहां पर चैत्र नवरात्र एवं कुंवार नवरात्र में ज्योति कलश स्थापना के साथ जंवारा बोया जाता है। माता चंडी मंदिर के स्थापना कर्ता एवं संचालन कर्ता ग्राम बागबाहरा कला निवासी कृषक श्री कामता नाथ शुक्ला जी हैं। जो वर्तमान में 68 वर्षीय हैं तथा मार्कफेड सेवा से सेवानिवृत्त हैं।

श्री कामतानाथ शुक्ला जी बताते हैं कि वे अपने युवा काल से ही प्रत्येक नवरात्रि में उपवास रहकर ग्राम घुंचापाली स्थित तंत्रोक्त प्रसिद्ध उड्डीश माता चंडी मन्दिर दर्शन के लिए जाते थे। जब 1988 के चैत्र नवरात्र में व्रत रखे थे और मन्दिर गये तब न जाने ऐसी कौन सी प्रेरणा हुई कि क्यों न माता चंडी पहाड़ी के पाषाण खंड को अपने गांव में स्थापित कर उनकी पूजा अर्चना की जाय?

चंडी माता

तब उसी चैत्र नवरात्र में कुछ मित्रों के साथ जाकर माताजी को लाकर गांव में सड़क किनारे धोबनींन वृक्ष के नीचे माता जी की प्राण प्रतिष्ठा करवाये तब से आज दिनांक तक लगातार पूजा अर्चना कर रहे हैं। वर्ष 1995 के कुंवार नवरात्र पर्व से लगातार ज्योति कलश स्थापना एवं जंवारा बोकर पूजा अर्चना किया जा रहा है। शुक्ला जी के श्रद्दा भक्ति को देखकर 1988 में ही माता जी को स्थापित करने के उपरांत श्रद्धालु सरदार जी द्वारा धोबनींन पेड़ के नीचे छोटा सा मन्दिर बनवाकर माताजी को उसमें स्थापित किया गया।

1995 में ज्योति कलश स्थापना हेतु श्री शुक्ला जी उसी मन्दिर के ऊपर धोबनींन पेड़ को बीच में रखकर ईंट कच्चे गारे का खपड़ा छानी वाला ज्योति कक्षा अपने व्यय पर बनवाकर लगातार ज्योति प्रज्ज्वलित किया जाता रहा। कुछ वर्ष पूर्व बागबाहरा के राइसमिल व्यवसायी श्री मोहन अग्रवाल जी द्वारा मंदिर निर्माण हेतु एवं ज्योति कक्ष निर्माण हेतु दान प्रदान किया गया, तब से माताजी को उसी मन्दिर में स्थापित कर पूजा अर्चना किया जा रहा है। वर्तमान में श्रद्धालु भक्तजनों द्वारा चैत एवं कुंवार नवरात्रि में चालीस से पचास मनोकामना पूर्ति ज्योति कलश प्रज्ज्वलित किया जाते है। श्री चंडी माता थापना मन्दिर में पूजा अर्चना एवं कार्यक्रमों का संचालन कामतानाथ शुक्ला जी द्वारा किया जाता है।

काली माता मन्दिर

ग्राम बागबाहरा कला में माता खल्लारी थापना एवं माता चंडी थापना की तरह ही माता चंडी थापना मन्दिर से कुछ दूरी पर काली माता के तंत्र साधक साधकों द्वारा माता काली का मन्दिर बनवाकर माता काली की स्थापना किये। स्थापना उपरांत प्रत्येक माह कष्ट बाधा निवारण हेतु यज्ञ हवन इत्यादि करते हुए प्रत्येक चैत्र मास एवं प्रत्येक कुंवार नवरात्रि में मनोकामना ज्योति कलश स्थापना करके माता काली की पूजा अर्चना करते हैं। माता काली की पूजा अर्चना करने वाले साधक काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं तथा विशेष प्रकार से काली माता की पूजा अर्चना करते हैं। माता काली आदि शक्ति मां भवानी का रौद रूप माना जाता है।

काली माता

काली मंदिर के संस्थापक श्री लकेश्वर बाबाजी परसकोल महासमुंद थे, बाबा जी में समाधि लीन हो गए हैं। वर्तमान में मंदिर का संचालन महाकाली माता समिति के द्वारा किया जा रहा है। दीपक यादव जी गोवर्धन निषाद जी, विष्णु जी, तारेन विश्वकर्मा जी, राजेन्द्र ध्रुव जी, हरीचंद्र यादव जी, सोनू जी, कार्तिक जी, मनोज यादव जी के मार्गदर्शन में पूजा अर्चना का संचालन किया जा रहा है। यहां चैत एवं कुंवार नवरात्रि में श्रद्धालु जन द्वारा मनोकामना पूर्ति ज्योति कलश स्थापना की जाती है।

आलेख

श्री सुनील शुक्ल,
बागबाहरा, छत्तीसगढ़

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