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केशकाल के प्राचीन शिवालय : सावन विशेष

छत्तीसगढ़ अंचल में सरगुजा से लेकर बस्तर प्राचीन शिवलिंग पाये जाते हैं। यह वही दण्डकारण्य का क्षेत्र है जो भगवान राम की लीला स्थली रही है तथा बस्तर में उत्तर से लेकर दक्षिण तक प्राचीन शिवालयों के भग्नावशेष पाए जाते हैं। श्रावण मास में बस्तर की हरियाली देखते ही बनती है। चारों ओर हरितिमा छाई रहती है और डोंगरियों पर घूमते फ़िरते मेघ, पर्यटक होने का आभास कराते हैं।

बस्तर के केशकाल में कई स्थानों पर प्राचीन शिवलिंग स्थापित हैं। केशकाल विधानसभा के अंतर्गत आने वाले फरसगांव ब्लाक के भोंगापालऔर केशकाल ब्लाक के बड़े खौली -नारना-गारका एवं गढधनौरा में श्रावण मास का आनंद उठाते हुए शिव दर्शन पूजन का लाभ अर्जित करने लोगों का तांता लग जाता है।

व्यावसायिक एवं पारिवारिक व्यस्ततता से नीरस बोझिल हुई जिंदगी और कोरोना संक्रमंण के चलते लगे लाकडाउन से घर में बैठे बैठे जीवन में आये चिंता अवसाद एवं मनहूसियत से उबरने, तन मन को तरोताजा करने हरे भरे पेड़ पौधों एवं नदी नाले पहाड़ जंगल के बीच पंहुच अल्हादकारी आनंद की अनुभूति करने का जो सुख मिलता है वह तन मन को तरोताजा करते जीवन में नई स्फूर्ति का संचार कर देता है।

श्रावंण मास में प्रकृति अपना अनुपम श्रृंगार कर लेती है और हरी भरी वादियों के बीच चहचहाते पक्षियों का कलरव और सुंदर- सुरभ्य-मनोरम स्थल के बीच वीराने में विराजित औघढ वरदानी देवाधिपति देव महादेव जी के दर्शन करने के मिले अवसर को लोग अपना अहो भाग्य मानते हैं।

भोंगापाल – कोंडागांव जिला मुख्यालय से 70 कि.मी. कांकेर जिला मुख्यालय से भी लगभग 80 कि.मी. और केशकाल से मात्र 50 कि.मी. दूरी पर स्थित भोंगापाल वैसे तो प्राचीन प्रसिद्ध बौद्ध स्थल है पर यहां पर उसी समय काल के मिले शिवलिंग की भी बड़ी श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करते हैं। भोंगापाल गांव से 2 कि.मी.दूर लूसरा नदी के किनारे मिली पांचवीं-छठंवी शताब्दी के बुद्ध प्रतिमा को स्थानीय लोग बूढ़ा बाबा के रूप में पूजते हैं।

इतिहास पुरातत्व एवं मूर्तिकला के जानकारों का यह मानना है कि यह बुद्ध की प्रतिमा है। बुद्ध की प्रतिमा मिलने से इतिहास और धार्मिक दृष्टिकोण सें इस स्थान का महत्त्व एवं आकर्षण बढ़ जाता है। यहाँ पर मिले प्राचीन प्रांण प्रतिष्ठित शिवलिंग की पूजा आराधना करने वालों की उपस्थिति माघ पूर्णिमा महाशिवरात्रि एवं श्रांवण मास में अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत बढ़ जाती है।

भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित घोषित इस स्थल पर दूर दूर से देशी पर्यटकों के अलावा विदेशी पर्यटक बड़ी जिज्ञासा लिए आते हैं और देखने के बाद इस घोर आश्चर्य में खो जाते हैं कि प्राचीन काल में भी बस्तर में इतने अंदरूनी वनक्षेत्र में राजा महाराजा आकर इतने सुंदर और भव्य मंदिरों का निर्माण कैसे करवाये रहे होंगेॽ श्रद्धालुओं को आत्मशक्ति प्रदान करने वाला यह स्थल अपने स्वर्णिंम इतिहास के बारे में अटकल लगाने को उत्प्रेरित कर देता है।

गढधनौरा-गोबरहीन-कोंडागांव जिला मुख्यालय से 60 कि.मी. कांकेर जिला मुख्यालय से 28 कि.मी.और केशकाल से मात्र 3 कि.मी.दूरी पर स्थित है बस्तर संभाग के प्रसिद्ध पर्यटन एवं धार्मिक स्थलों की सूची में विशिष्ट आकर्षण स्थान रखने वाला स्थल है गढधनौरा – गोबरहीन।

प्राचीन काल में गढ़ रहे गढधनौरा तथा उसके आश्रित गांव गोबरहीन को शिवधाम के तौर पर लोग जानते हैं और बारहों मास यंहा पर दूर-दूर से लोग दर्शन पर्यटन के लिए पंहुचते ही रहते हैं। श्रावंण मास में तो अपने घर परिवार एवं दोस्तों के सांथ पंहुचने वालों का आना जाना लगा ही रहता है। सोमवार को तो सुबह से ही दूर दूर से श्रद्धालु शिवभक्तों का आना जाना शुरू हो जाता है।

यहाँ पर खुले आसमान तले विराजमान देवाधिपति देव महादेव के भव्य अलौकिक शिवलिंग का दर्शन करके श्रद्धालु शिवभक्त मुग्ध हो जाते हैं। दर्शन पूजन करते हुए यहाँ पंहुचने वाले अपने दोनो बांहों को फैलाकर शिवलिंग को अपने सीने से चिपकाकर अपने हांथ की उंगलियों को मिलाने की कोशिश करते अपने भाग्य एवं भविष्य का परीक्षंण करते हैं।

यह आमधारंणा है कि शिवलिंग जिनकी बाहों में समा जाते हैं वो बहुत भाग्यशाली होता है। ईंटों के प्राचीन ऊंचे विशाल किले पर विराजे इस शिवलिंग का दर्शन पूजन करने के बाद श्रद्धालु पुरातत्त्व विभाग के द्वारा कराए गये मलमा सफाई से निकले मंदिरों के भग्नावशेषों एवं उसमें से निकली प्राचीन मूर्तियों को देखते हुए साल के विशालकाय पेड़ों के बीच मिले जोड़ा लिंग का दर्शन पूजन करने पंहुचते हैं।

शिव और शक्ति के समन्वित रूप के तौर पर एक सांथ स्थापित दो लिंगों को दुनिया का दुर्लभ लिंग माना जाता हैं। क्योंकि छोटा बडा शिवलिंग और एक ही जगह पर कई लिंग मिलने का प्रमांण तो मिलता है पर एक सांथ दो लिंग होने की अभी तक जानकारी सामने नही आया है इसलिए इसे अद् भूत बेमिसाल शिवलिंग के तौर पर माना जाता है।

यहां पर दूर दूर तक मिले हुए प्राचीन पुरावशेषों को देखकर यह माना जाता है कि यहां पर कभी किसी महान शिवभक्त राजा महाराजा ने अपने गढ़ की स्थापना करके बहुत बड़ी संख्या में देवी देवताओं के मंदिरों का निर्माण करवाया रहा होगा। इतिहासकारों एवं पुरातत्व वेत्ताओं द्वारा यहाँ पर मिले मंदिरों व मूर्तियों की निर्मांण कला को देखते हुए यह माना जा रहा है कि यहां पर नलवंशी नागवंशी राजाओं के द्वारा गढ़ स्थापित करके मंदिरों का निर्मांण कराकर मूर्तियों को स्थापित किया गया रहा होगा।

वहीं भगवान श्री राम के वन गमन मार्ग पर शोध करने वालों का यह मानना है कि भगवान श्रीराम दंण्डकारंण्य वन में प्रवेश करते हुए यंहा पर पधारकर भगवान शिव की पूजा अराधना कर कुछ दिन विश्राम करने के बाद आगे प्रस्थान किये थे। भगवान श्री राम के वन गमन मार्ग से जुड़ जाने से इस स्थान पर लोगों की आस्था और लोगों का आकर्षंण बढ़ गया है।

नारना शिवलिंग— केशकाल से लगभग 8 कि.मी.की दूरी पर एक गांव है नारना। ज़हां पर प्राचीन शिवलिंग है जिसकी पूजा आराधना करने बहुत दूर दूर से श्रद्धालु शिव भक्त पंहुचते रहते हैं। माघ पूर्णिमा महाशिवरात्रि पर और श्रावंण सोमवार को यहाँ पर बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु पंहुचते हैं।

बड़े खौली का प्राचीन शिवलिंग– केशकाल से 25 कि.मी.दूर धनौरा और वंहा से लगभग 6 कि.मी.दूर पर है ग्राम बडेखौली ज़हां पर भी प्राचीन भव्य शिवलिंग है। जिसे भी यह माना जाता है कि यह शिवलिंग भी गढधनौरा गोबरहीन एवं भोंगापाल के बुद्ध के ही काल का है। यहां पर भी श्रद्धालु भक्तों का आना जाना लगा रहता है माघ पूर्णिमा और शिवरात्रि पर यंहा भी भक्तों का मेला लग जाता है।

केशकाल जिले में आदि मानव की बसाहट से लेकर परवर्ती काल तक के पुरावशेष प्राप्त होते हैं। सघन वनों से आच्छादित यह जिला आदि मानवों का बसेरा रहा है जहाँ वर्तमान में भी पुरातत्व सामग्री प्राप्त होते रहती है। इस तरह देखा जाए तो केशकाल जिला पुरातत्व एवं पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण एवं समृद्ध है।

आलेख

श्री कृष्ण दत्त उपाध्याय वरिष्ठ प्रत्रकार केशकाल, बस्तर

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