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सुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरू

सुभाष चंद्र बोस जन्म दिवस विशेष आलेख

गंगाधर नेहरू का परिवार दिल्ली से उखड़ गया और 1857 में आगरा पहुंचा। 34 वर्ष की आयु में 1861 के वर्ष उनका निधन हो गया। इसके 3 महीने बाद मोतीलाल नेहरू का जन्म हुआ। मोतीलाल जी के बड़े भाई वंशीधर नेहरू आगरा में फैसला लेखक के पद पर काम कर रहे थे। पदोन्नति पाते हुए वे सबोर्डिनेट जज की हैसियत तक पहुंचे। दूसरे भाई नंदलाल नेहरू खेतड़ी के राजा फतेह सिंह के लिए निजी सचिव के पद पर थे। राजा की मृत्यु के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ी और कानून पढ़कर आगरा में वकालत शुरू की। जब हाईकोर्ट इलाहाबाद चला गया तो वह भी इलाहाबाद पहुंच गए। मोतीलाल इन्हीं नंदलाल के साथ थे। 12 वर्ष तक की आयु तक उन्होंने केवल अरबी और फारसी पढ़ी थी। स्नातक डिग्री परीक्षा में बैठे लेकिन पहले पेपर को बिगड़ा हुआ समझकर बाकि इम्तहान में नहीं बैठे। यह आकलन गलत निकला। विश्वविद्यालय शिक्षा अप्रिय ढंग से समाप्त हो गई। फिर उन्होंने वकालत की तरफ जाना तय किया। मोतीलाल जी को उत्तराधिकार में ना तो नगदी मिली थी और ना जायदाद उन्होंने अपने आप को पूरी तरह संभाला और संघर्ष के लिए तैयार हुए। कठिन परिश्रम किया। वकालत के लिए सफल उम्मीदवारों में उनका पहला स्थान था। पारिवारिक मित्र और वरिष्ठ वकील पृथ्वीनाथ के संरक्षण में कानपुर से वकालत शुरू हुई।

कश्मीरी ब्राह्मणों में भी कम उम्र में विवाह की परंपरा थी। मोतीलाल जी की शादी भी जल्दी हुई। 20 की उम्र के पहले पिता बन गए लेकिन संयोग नहीं ठीक था। माता और पुत्र दोनों चल बसे। जल्दी ही मोतीलाल जी की शादी फिर से हुई। उनकी दूसरी पत्नी स्वरूपरानी का कद छोटा था। नंदा ने बताया कि उनकी आंखें शरबती थी, बाल भूरे तथा हाथ पैर सुंदर और सुडौल। उन्होंने वैसी जबरदस्त सास के साथ गृहस्थी चलाई जो अपनी उग्रता के लिए विख्यात थी। दोनों की जोड़ी मनोहर लगती थी। इस दंपति की पहली संतान की मृत्यु हो गई। मोतीलाल जी ने 1886 में वकालत के लिए कानपुर से इलाहाबाद की तरफ रुख किया। यही 1889 में जवाहरलाल जी का जन्म हुआ।18 अगस्त 1900 को उनकी दूसरी संतान के रूप में पुत्री का जन्म हुआ। एक दुर्लभ संयोग के वश 1905 में 14 नवंबर को ही उन्हें एक और पुत्र की प्राप्ति हुई। यह आनंद क्षणिक ही सिद्ध हुआ। महीने के अंदर शिशु की मृत्यु हो गई। इसके उपरांत 1960 में 2 नवंबर को एक पुत्री का जन्म हुआ।

हिंदू समाज में भोजन करने पर कठोर नियम लागू है और यह समझना आसान है कि ब्राह्मणों में यह उग्रतम था। तर्कहीनता की हालत यह थी कि कुछ ब्राह्मण अपना भोजन स्वयं पकाते थे और भोजन करने के समय उनके बच्चे भी वहां नहीं पहुंच सकते थे। मोतीलाल ने समाज के इस प्रतिमान को बदलने की कोशिश पश्चिमीकरण के माध्यम से की। उनकी आर्थिक सफलता ने उनकी बदलाव की चाहत को और मजबूत किया। उनको अपने पहले मुकदमे के लिए 5 की फीस मिली थी। 33 की उम्र तक वह प्रतिमाह 2000 कमाने लगे थे। 40 की उम्र तक वह प्रतिमा 10,000 कमाने लगे थे।1896 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने उन्हें एडवोकेट की सूची में दाखिल किया। उस वर्ष कुल 4 एडवोकेट थे। 1909 में उन्हें इंग्लैंड में प्रीवी काउंसिल के सामने पेश होने और वकालत करने की अनुमति प्राप्त हो गई पैसा बरस रहा था। यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि वह भारत में पढ़े वकील थे विलायत में नहीं।

जिस समय साइकल एक नवीन और फैशनेबल चीज हुआ करती थी उन्होंने हर एक नया मॉडल खरीदा था। इलाहाबाद में साइकिल की एक दुकान में साझीदारी की। 1904 में एक कार विदेश से मंगाई। यह इलाहाबाद में पहली कार थी और संयुक्त प्रांत में भी शायद पहली। 1905 में यूरोपीय यात्रा के दौरान उन्होंने फिर एक कार खरीदी। 1909 में, फिएट और लेंसिया नाम नामक दो कंपनी की कार इकट्ठे खरीदी। उनके पास अरबी घोड़ों का भी अच्छा अस्तबल था। उनके बच्चों ने पैदल चलना सीखने के साथ-साथ घोड़े की सवारी सीखी थी। एक फोटो उपलब्ध है जिसमें 11 वर्ष की स्वरूप तथा 3 वर्ष की कृष्णा घोड़े की पीठ पर सवार हैं तथा वे स्वयं ब्रीचेज पहने हुए घोड़े पर हैं। निशानेबाजी और शिकार का उन्हें अच्छा शौक था। कुश्ती उनका प्रिय खेल था। उम्र के कारण जब वह खुद नहीं लड़ पाते थे तो अपने अखाड़े में नौकरों की कुश्ती लड़वाते थे। ऐसे नौकरों के भोजन के लिए विशेष व्यवस्था की जाती थी। सिविल लाइंस और आनंद भवन में डिनर पश्चिमी शैली में टेबल पर लिया जाता था तो कभी रसोई में फर्श पर बैठकर। पारंपरिक रस्मों की घर में जगह थी क्योंकि उनकी पत्नी छुरी कांटा और यूरोपियन शिक्षिकाएं स्वीकार कर सकती थी लेकिन उन्हें पूरी तरह से मेमसाहब नहीं बनाया जा सकता था। मोती लाल जी की बहन राजवती विधवा होने के बाद साथ रहने आ गई थी। उनकी दिनचर्या व्रत उपवास और सादगी वाली थी। इसी तरह की कठोर दिनचर्या उनके बड़े भाई नंदलाल की विधवा की भी थी। आनंद भवन में इस तरह से पारंपरिक हिंदू धर्म के दुर्ग का निर्माण हुआ था जिसे तोड़ने की कोशिश मोतीलाल जी ने कभी नहीं की। राजवती तो इतनी रूढ़िवादी थी कि मोतीलाल जी के लिए पश्चिमी ढंग से पकाए भोजन को छूती भी नहीं थी।

मोतीलाल जी का संकल्प अपने इकलौते पुत्र के लिए श्रेष्ठतम शिक्षा देने का था क्योंकि उन्हें फारसी और अरबी की ही शिक्षा मिली थी। वह जानते थे कि इस तरह की परंपरावादी शिक्षा में जकड़ बंदी होती है जिससे मुक्त होने में लंबे समय तक काफी ऊर्जा लगती है। श्रीमती एनी बेसेंट के सहयोग से फर्डिनेंड ब्रुक्स नामक थियोसॉफिस्ट ने घर पर पढ़ाना शुरू किया। यह व्यवस्था 1902 से 1904 के बीच चली।1905 में जवाहरलाल जी को अपने अंग्रेज मित्रों की सहायता से लंदन के प्रसिद्ध स्कूल हैरो में भर्ती करा दिया। मुंबई के एक व्यापारिक फर्म से इंतजाम किया गया की हैरो तक आम की सप्लाई जारी रहे। इसी के साथ उनके पास नियमित तौर पर भारतीय अखबार भी पहुंचाए जाते। उन्हें ट्रिनिटी कालेज भेजने का विचार किया गया ताकि वह स्नातक की शिक्षा पूरी कर आई सी एस की परीक्षा में बैठ सकें। 1908 में लाजपत राय ने इंग्लैंड का दौरा किया था। कैंब्रिज भी गए और मजलिस में बोले। उन्होंने जवाहरलाल के आईसीएस में जाने या वकील बनने के लक्ष्य को बहुत पसंद नहीं किया। मोतीलाल इस समय सार्वजनिक तौर पर विचार व्यक्त करते  कि यह संसार की महानतम नौकरियों में से एक है जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के सर्वाधिक उल्लेखनीय निर्माताओं को जन्म दिया। 1910 में वंशीधर नेहरू के पुत्र श्रीधर नेहरू इस परीक्षा में असफल हो गए। मोतीलाल जी को लगा कि इस परीक्षा में भारतीय युवकों के विरुद्ध धांधली की जाती है। श्रीधर नेहरु अपने अगले प्रयास में सफल हो गए।

आईसीएस की सेवा का भारत में बहुत दबदबा था सत्येंद्र नाथ टैगोर पहले भारतीय थे जो इस सेवा में 1863 के वर्ष प्रवेश पा सके थे। 1869 में चार और भारतीय चयनित हुए थे जिनमें रमेशचंद्र दत्त तथा सुरेंद्रनाथ बनर्जी अत्यंत प्रसिद्ध है। दो अन्य अल्प ज्ञात व्यक्ति हैं श्री बीएल गुप्ता तथा एसबी ठाकुर। इस बड़े संदर्भ में समझा जा सकता है कि मोतीलाल जी में कैसी तेज भावना जग रही होगी कि जवाहर का चयन इस सेवा में हो जाए। उन्होंने जवाहरलाल को हरो से हटाकर कैंब्रिज भेजने का विचार कार्य रूप में परिणत कर दिया ताकि डिग्री लेने के बाद उनके पास आई सी एस की तैयारी के लिए समय रहे। जवाहरलाल इस सेवा में चयन हेतु ली जाने वाली परीक्षा की तैयारी के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं है। वह लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में प्रवेश लेना चाहते थे। आयरलैंड के सीन फिन आंदोलन से भी प्रभावित हो रहे थे।

जवाहरलाल जी ने स्वयं अपने बारे में लिखा है कि अंग्रेज अधिकारियों के बर्ताव को देखकर बड़ा रंज होता था और जब भी कोई हिंदुस्तानी पलट कर वार कर देता तो बड़ी खुशी होती। आगे उन्होंने लिखा कि वह बहादुरी के बड़े-बड़े मंसूबे बांधा करते कि कैसे हाथ में तलवार लेकर हिंदुस्तान को आजाद कराने के लिए लड़ेंगे।

अंततः यह तय हुआ कि उनके आईपीएस बनने की आशा छोड़ी जाए। कानून की डिग्री के लिए इनर टेंपल में प्रवेश लिया। इसी के साथ जवाहर लाल पर नफासत का असर बढ़ने लगा। हैरो के पुराने दोस्त मिले। उन्होंने हालैंड पार्क में रहने के लिए कमरे लिए। क्वींस क्लब जाने लगे। इन दिनों उन्होंने खुशहाल लेकिन खाली दिमाग वाले अंग्रेजों की नकल करने की कोशिश की। खर्च के लिए उनकी मांगअक्सर और जोरदार होने लगी। कभी इलाहाबाद उनका तार पहुंचता जिसमें एक शब्द लिखा होता खर्चा।

मोतीलाल जी समझते कि जवाहरलाल गलत जीवनशैली में चल रहे हैं। इस पर परेशानी यह भी थी कि जवाहरलाल ने पत्र लिखा कि शायद कानून की परीक्षा में पास नहीं कर सकेंगे। मोती लाल जी पर या तुषारापात था । एक मित्र के प्रकरण में भी जवाहरलाल ने 40 पौंड गंवा दिए थे। नाराज मोतीलाल ने 30 मई 1912 के पत्र में पिछले 6 महीने में खर्च की गई राशि का हिसाब मांगा। यह भी लिखा कि तुम ने अपने आप को ऐसे लोगों की संगति में डाल दिया है जो मेरे जैसे साधनों वाले व्यक्ति के पुत्र के लिए वांछित नहीं है। इसी तरह 1908 में भी जवाहरलाल से तंग आकर मोतीलाल उन्हें भारत वापस बुलाने की सोचने लगे थे। बहरहाल जवाहरलाल ने कानून की परीक्षा पास करने में सफलता प्राप्त की और भारत लौटे। अगस्त 1912 में मसूरी में परिवार के साथ उनका फिर से मिलन हुआ। राव महाराज सिंह नामक एक मुवक्किल से उन्हें फीस में 500 मनीआर्डर से प्राप्त हुआ। मोतीलाल जी को पहली फीस के रूप में 5 मात्र मिले थे। जवाहरलाल जी को इसका प्राप्त 100 गुना प्राप्त हुआ था। लेकिन यह समझने में कोई समस्या नहीं है कि या पिता की हैसियत का असर था। वकील के रूप में वे कभी सफलता नहीं प्राप्त कर सकें।

1916 में दिल्ली के व्यापारी पंडित जवाहर मल की पुत्री कमला कौल से 8 फरवरी को विवाह संपन्न हुआ। कमला जी का जन्म एक अगस्त 1899 को हुआ था। विशेष ट्रेन से नेहरू परिवार और उनके मित्र दिल्ली आए। एक सप्ताह तक नेहरू का विवाह मंडप खुशियों का संगम स्थल बना रहा। परिवार के भारतीय और यूरोपीय मित्र चाय डिनर बैडमिंटन और टेनिस पार्टियों मुशायरा और संगीत सभा में निमंत्रित किए गए। मोतीलाल जी के 55 वर्षीय जीवन में इकलौते पुत्र का विवाह अभिलाषाएं पूर्ण करने का अवसर था।

गर्मी की छुट्टियां नेहरू परिवार ने कश्मीर में इस बिताई। इस दौरान वे अपने पिता के जूनियर के रूप में काम करते रहे लेकिन वकालत में उनका मन नहीं लगा। होमरूल आंदोलन और प्रतापगढ़ के दौरों से वे सीधे तौर पर कांग्रेसी राजनीति में आ गए। इस सफलता में मोतीलाल जी की बड़ी भूमिका थी। कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस से असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पास कराने में महात्मा गांधी मोतीलाल जी पर बड़ी हद तक निर्भर थे। असहयोग आंदोलन से ही नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने अपना राजनैतिक जीवन प्रारंभ किया था लेकिन यहां तक उनका जीवन दूसरे अधिक गौरवपूर्ण पथ से आया था।

वंश वृक्ष के अनुसार सुभाष चंद्र बोस के परिवार में आदि पुरुष दशरथ बोस थे। 11 वीं पीढ़ी में महीपति हुए थे। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर बंगाल के नवाब ने उन्हें वित्त और युद्ध मंत्री के रूप में नियुक्त किया था। इसके अतिरिक्त उन्हें सुबुद्धि खान की भी उपाधि दी गई थी। इनके पड़ पोते भी वित्त मंत्री नियुक्त किए गए तथा बंगाल के नवाब ने पुरंदर खान की उपाधि दी। जागीर भी मिली जिसे आज पुरंदरपुर के नाम से जाना जाता है । ब्रिटिश शासन का असर आया तो नवाबों जागीरदारों का नया वर्ग उभरा । बोस परिवार की महत्ता में कमी हुई। सुभाष के दादाजी हरनाथ बोस कृषक थे। सुभाष के पिता जानकीनाथ बोस ने मुश्किलों में पढ़ाई की। छात्रवृत्ति प्राप्त की। स्कूली शिक्षा में हेड मास्टर के पद पर भी काम किया। वकालत की परीक्षा पास की। कलकत्ते में वकालत चलने में मुश्किल आती सो वे दूरस्थ स्थान कटक पहुंचे वकालत करने। तब कोलकाता से रेल भी नहीं जाती थी कटक के लिए। जानकी नाथ की वकालत चल निकली। सरकारी वकील भी बने। नगरपालिका के प्रथम गैर सरकारी अध्यक्ष भी चुने गए। घर से कोर्ट तक जाने के लिए घोड़ा गाड़ी रखी।

जानकीनाथ बोस और प्रभावती बोस की कुल 14 संतानों हुई जिनमें 8 पुत्र और 6 पुत्री थी। सुभाष नौवें क्रम पर 23 जनवरी 1897 को पैदा हुए थे। जानकीनाथ बोस ने उस दिन अपनी डायरी में लिखा कि प्रसव सामान्य रूप से हो गया और कोई परेशानी नहीं हुई। यह था नेताजी के सामान्य जीवन का प्रारंभ। बोस परिवार उन दिनों की परंपरा के अनुसार संयुक्त तौर पर चल रहा था और अन्य रिश्तेदारों के बच्चे भी पढ़ने के लिए कटक आ गए थे। सरल रूप में समझा जा सकता है कि बच्चों के इस विशाल समूह में सुभाष जी पर कोई विशेष ध्यान और लाड प्यार संभव नहीं था। सुभाष की शिक्षा प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल से शुरू हुई। 12 वर्ष की उम्र में रिवेन्शा कॉलेजिएट स्कूल में भर्ती हुए। यहां पर उनकी मातृभाषा का उनका अल्प ज्ञान शिक्षक और छात्र दोनों के लिए हास परिहास का सूत्र बन जाता था। सुभाष स्वयं भी हंसने लगते परंतु उन्होंने कमरतोड़ मेहनत की और पहली वार्षिक परीक्षा में ही सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। उन्होंने बड़ी उमंग से संस्कृत सीखना शुरू किया। स्कूल में शिक्षक और छात्र दोनों ही बंगाली भी थे और उड़िया भी। 15 वर्ष की उम्र तक आते-आते सुभाष विवेकानंद तथा रामकृष्ण को पढ़ने लगे। समान रुचि वाले छात्रों को मिलाकर युवजन सभा का गठन किया। सुभाष और मित्र छात्र साधु सन्यासी से मिलने में रुचि लेते। इस क्रम में घर से गायब हो जाते। परिवार और शिक्षक दोनों को सुभाष पूरी तरह से बेलगाम, झक्की और हठी लगते। माता-पिता नाराज रहते कि उनका होनहार बेटा रास्ते से भटक रहा है। मैट्रिक की परीक्षा हुई तो सुभाष का परिश्रम सार्थक दिखा। पूरे विश्वविद्यालय में उन्होंने द्वितीय स्थान प्राप्त किया था। उन दिनों परीक्षा लेने का काम कोलकाता विश्वविद्यालय द्वारा किया जाता था जिसका क्षेत्र बिहार बंगाल और उड़ीसा तक फैला था। इतने बड़े क्षेत्र में द्वितीय स्थान प्राप्त करना परिश्रम और मेधा का सूचक था। शिक्षक और परिवार दोनों के लिए अनुभव था कि भटका हुआ लड़का रास्ते पर आ गया है।

आगे के अध्ययन के लिए कोलकाता भेजा गया। जानकी नाथ जी ने एलगिन रोड पर जमीन लेकर मकान बनवाना शुरू किया था। इस प्रवास के दौरान भी सुभाष का जीवन फिर तूफानों से भर गया।

सुभाष में राजनीति की सीधी रुचि नहीं थी। क्रांतिकारी और हिंसक आंदोलन में भी रुचि नहीं थी। कोलकाता प्रवास के दौरान साधु सन्यासी, पीर-फकीर से मेलजोल जारी रहा। क्लास के अधिकांश लेक्चर उन्हें बोरिंग लगते। महाविद्यालय में वाद विवाद संबंधी कार्यक्रम तथा बाढ़ एवं अकाल राहत के लिए चंदा जमा करने तथा सैर सपाटे वगैरह पर बाहर जाने में उनकी रुचि अधिक बढ़ने लगी। इस तरह अंतर्मुखी प्रवृत्ति से पीछा छुड़ाने में उन्हें सहायता मिली। छुट्टियों में कटक गए तो वहां हैजा के मरीजों के लिए परिचर्या में लग पड़े। इस दौरान उन्होंने भारत की गरीबी -गांव की बेबसी देखी।

कोलकाता जाने पर फिर से साधु सन्यासी और आध्यात्मिक खोज में लग पड़े। अपने मित्र हेमंत कुमार सरकार के साथ बिना किसी को बताए तीर्थ यात्रा पर निकल गए। दोनों ने उत्तर भारत के कई तीर्थ स्थलों का भ्रमण किया। कई आश्रमों में गए और साधु सन्यासियों से मिले। अधिकांश जगह पर उन्होंने धार्मिक जिज्ञासा का स्वागत नहीं पाया। हिंदू धर्म के आधारभूत नियम की जगह अंधविश्वास और निरर्थक कर्मकांड हावी था। जातिवाद और आस्था का खेल सुभाष के लिए आंखें खोलने वाला था। वाराणसी में उनकी भेंट स्वामी ब्रह्मानंद से हुई जो उनके परिवार को अच्छी तरह जानते थे। गया के मठ में इन लोगों को पंक्ति से अलग बिठा कर खिलाया गया क्योंकि यह बंगाली थे और शाकाहारी नहीं हो सकते थे। जिस तरह चुपके से सुभाष धार्मिक खोज में निकले थे उतने ही चुपके से लौट आए। अब उनके पास बेहतर अनुभव था। लौटने के बाद बीमार पड़े। इस तरह की भागदौड़ वाली जीवन शैली के कारण इंटरमीडिएट की परीक्षा में उन्हें उच्च अंक नहीं प्राप्त हुआ। यह एक तरह से अच्छे भले लड़के का फिर से भटक जाना था। कम से कम परिवार ने तो यही सोचा। B A के लिए उन्होंने दर्शनशास्त्र का चयन किया और पूरी तरह से अध्ययन में कूद पड़े।

भारत में अंग्रेज अपने आप को श्रेष्ठ प्रजाति का समझते थे । भारतीयों को अपमानित करने का मौका नहीं जाने देते। टिकट रहने के बावजूद ट्रेन में भारतीयों को हायर क्लास में नहीं चढ़ने दिया जाता। टीचर के रूप में प्रोफेसर ऑटन भी भारतीय सभ्यता पर विपरीत टिप्पणी करने के लिए विख्यात थे। विषय भी उनका इतिहास था। विषय पढ़ाते हुए भारतीय सभ्यता पर अवांछित टीका टिप्पणी करते जाते। शरीर से शक्तिशाली थे। क्रीड़ा के प्रभारी भी थे। छात्रों को कभी कभार हाथ भी लगा देते। यह निर्णय किया गया कि प्रोफेसर  ओटन को युवा शक्ति का परिचय दिया जाए। परिचय दिया गया और वह पिट गए। इस कांड में सुभाष का भी नाम आया जांच पड़ताल हुई प्राचार्य निलंबित किए गए तथा छात्रों का पक्ष रखने के कारण सुभाष प्रेसिडेंसी कॉलेज से निष्कासित कर दिए गए। बंगाल के भद्रलोक में प्रश्न पूछा जाने लगा कि क्या गुरु को पीटा जा सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन में संबोधित करते हुए दिया कि “गुरु श्रेष्ठ है लेकिन यदि वह भारत माता का अपमान करता है तो फिर वह श्रेष्ठ गुरु नहीं रह जाता।“ उत्तर स्पष्ट था लेकिन सुभाष को इससे कोई लाभ नहीं हुआ। उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया।

एक वर्ष का समय उन्होंने कटक में बिताया और उसके बाद वापस कोलकाता लौटे। इस दौरान उन्होंने 49 बंगाल रेजीमेंट में भर्ती होने की भी कोशिश की लेकिन आंखें खराब होने के कारण असफल रहे। इसी समय विश्वविद्यालय ने उन्हें प्रेसिडेंसी कॉलेज छोड़कर किसी अन्य कालेज से बीए करने की सुविधा दे दी । उन्हें स्कॉटिश चर्च कॉलेज में फिर से प्रवेश मिल गया।

कॉलेज में टेरिटोरियल आर्मी की शाखा खोली गई थी। सुभाष प्रशिक्षण के लिए चुन लिए गए। फोर्ट विलियम के सैनिक मुख्यालय में हथियार लेने के लिए टीम को भेजा गया। सुभाष को ऐसा लग रहा था कि वह भविष्य की तैयारी कर रहे हैं। ऐसी जगह पर कब्जा कर रहे हैं जो सदा से उनकी है लेकिन अन्याय पूर्वक छीन ली गई है। सैनिक प्रशिक्षण एक वर्ष में पूर्ण हो गया। आखरी समय में उन्होंने फिर से अपने प्रिय विषय दर्शन शास्त्र और अध्यात्म पर लगाया। 1919 में उन्होंने प्रथम श्रेणी में द्वितीय स्थान प्राप्त करते हुए ऑनर्स पास किया । भविष्य के लिए उन्होंने सोचा था के मनोविज्ञान का अध्ययन करेंगे। उनके मन में अभिलाषा थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनोवैज्ञानिक के रूप में जाने जाए। परिवार में फिर लगने लगा था कि भटका हुआ पुत्र फिर से रास्ते पर आ गया है।

एक शाम उनके पिता ने उन्हें अपने कमरे में बुलाया। उनके बड़े भाई शरतचंद्र भी बैठे थे। जानकीनाथ जी ने पूछा कि क्या सुभाष इंग्लैंड जाकर आईसीएस की परीक्षा देना चाहेंगे। आईसीएस उन दिनों भी विशिष्ट वर्ग के लिए शक्ति और सत्ता का प्रतीक था। पिता की लालसा थी। वैसी ही जैसी मोतीलाल जी की थी ।

सुभाष ने कहा कि वह मनोविज्ञान का अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड जाना चाहते हैं। पिता ने कहा कि अध्ययन के लिए फिर कभी भेजा जा सकता है। अभी तो सिर्फ आईसीएस के लिए भेज पाऊंगा। सुभाष ने हामी भर दी। 8 महीने का समय था। इंग्लैंड पहुंचे। कैंब्रिज में प्रवेश हुआ। पढ़ाई शुरू की। परीक्षा की तैयारी भी।

सिविल सर्विस के लिए कई विषय पढ़ने होते थे जिनमें राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, ब्रिटिश इतिहास और यूरोप के आधुनिक इतिहास सहित 9 मुख्य विषय थे। 1920 की जुलाई में परीक्षा शुरू हुई और महीने भर चली। सितंबर महीने में रिजल्ट आया और एक मित्र ने तार से उन्हें बधाई दी। इंडियन सिविल सर्विस आईसीएस के सफल प्रत्याशियों की सूची में उनका चौथा स्थान था। अंग्रेजी लेखन में उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था और इस तरह उन्होंने आईसीएस की परीक्षा गर्वपूर्वक पास कर ली। परिवार में सब को आशा थी कि अच्छे दिन आ गए हैं। उन्हें सुभाष ने एक दूसरा झटका दिया, आईसीएस से इस्तीफा देकर। आर्थिक परेशानी हुई, पिता नाराज हुए।

मुंबई आए और महात्मा गांधी से पहली मुलाकात हुई। इस मुलाकात में सुभाष महात्मा गांधी से सहमत नहीं हो पाए थे पूरी तरह, लेकिन असहयोग आंदोलन में नेता जी शामिल हो गए। असहमति और विरोध की धारा आगे भी आने वाली थी।  

आईसीएस पास करना काफी मुश्किल था। लोग पास नहीं कर पाते थे। परीक्षा नहीं दे पाते थे। सुभाष ने परीक्षा भी पास की तथा उससे भी मुश्किल काम आई सी एस की नौकरी से इस्तीफा देने का, वह भी कर दिया। इस तरह उनका अंग्रेजों से लड़ने का रास्ता खुल गया।

आलेख

प्रो. डॉ ब्रजकिशोर प्रसाद सिंह, प्राचार्य शासकीय महाविद्यालय, मैनपुर जिला गरियाबंद

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One comment

  1. हरि सिंह क्षत्री

    इस आलेख में एक जगह तिथि में गलती है और वास्तविक तथ्य को स्पष्टरुप से कहने में झिझक किया गया है कि तथाकथित नेहरू परिवार शुरू से ही सक्षम नहीं थे जो देश को सही नेतृत्व नहीं दे सकते थे , न तब और न आज ही। इस आलेख को पढ़कर लगता है कि इस परिवार ने सही लोगों को दरकिनार कर व्यक्तिगत लाभ के लिए ही काम करने को ज्यादा महत्व दिया, उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि परिवार का हित ही सर्वोपरि है देश जाए भांड़ में।

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