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सिंधुघाटी की परंपराएं अभी शेष हैं बस्तर में

भारतीय सांस्कृतिक धुरी में सिंधुघाटी सभ्यता सर्वाधिक रोचक और रहस्य वाली है। यूं कहे कि वर्तमान भारतीय संस्कृति का मूल केंद्र सिंधुघाटी सभ्यता रही और पूरे भारत में उसका सांस्कृतिक विस्तार हुआ। सभ्यता का ह्रास भले ही विभिन्न कारणों से हुआ किंतु वहां के निवासियों ने आगे बढ़कर भारत के कोने कोने में अपना नया आश्रय बसाया और साथ ले आए अपने सांस्कृतिक विरासत, परंपरा पूजा पद्धति और देवता। सिंधु जैसे विशाल नदी के तट पर रहने वालों ने अपना नया ठिकाना भी नदियों से लगे वनों और तटों को ही बनाया क्योंकि नदी ही उनकी सभ्यता का केंद्र रहा जहां वे फले फूले। नदियां ही नदियों को पोषित करती हैं, आगे भी नदियों ने ही उनके परंपरा पथ को सिंचित रखा।

नदियों और पर्वतों के कारण भारत में लोगों के निवास की अपनी विशेषता रही है। वे स्थिर भी रहते हैं और गतिमान भी। उनकी इस तरह से वृद्धि भी होती है। मत्स्य पुराण में यही मत आया है :
भूतैरपि निविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च।
तेषां वृद्धिर्बहुविधा दृश्यते देवमानुषै:।। ( मत्स्य पुराण 114, 87) (संदर्भ श्री कृष्ण जुगनू जी)

जब लोग इधर उधर जाते हैं तो उनके साथ अपने अपने देवता भी और अपने मनुष्य जन भी होते ही हैं। सम्पूर्ण भारत में एक समय सिंधु के निवासी अपने पारंपरिक संस्कृति और देवताओं के साथ विराजित रहे किंतु विभिन्न बाहरी प्रभाव, विभिन्न विदेशी आक्रमण, सांस्कृतिक आक्रमण और सदियों की लंबी विकास यात्रा, जिसकी जैसी सत्ता उसका वैसा प्रभाव… आदि ने सब कुछ लुप्त कर दिया। सिंधु के निवासियों की जगह भारत में सीमित हो गई, अधिकांश नए सांस्कृतिक परिवेश में घुल मिल गए और अपने मूल संस्कृति और देवताओं को विस्मृत करते गए। लेकिन, क्षेत्रीय पहचान उनके अनुष्ठानों में बनी रही।

अब हजारों साल बाद जब सिन्धु सभ्यता के रहस्य उद्घघाटित हो रहे हैं तो उनकी व्याख्या भी नए सांस्कृतिक परिवेश से अधिक प्रभावित दिखलाई पड़ती है। इतिहासकारों और अन्वेषकों ने जो भी मान्यताएं दी, उसमें मूल संस्कृति से साम्यता की बजाय नवीन धार्मिक मान्यताओं को अधिक तरजीह देकर आरोपण किया गया। यह कहीं ना कहीं सिन्धु सभ्यता की मूल संस्कृति को विस्मृत करने की जुगत अधिक लगती है। इसके कई कारण हो सकते हैं किंतु अव्वल तो यही है कि सिन्धु सभ्यता की उपलब्धियों का कभी भारतीय संस्कृति के साथ कोई तुलनात्मक अध्ययन नहीं हुआ, कभी उन हजारों साल पुरानी परंपराओं को घने जंगलों में खोजने की कोशिश ही नहीं हुई। हमें याद रखना चाहिए कि पत्थर की तरह बदलाव ऊपर से हो सकता है लेकिन तात्विक संगठन वही रहेगा!

जंगलों में निवासरत जनजातियों की संस्कृति व परंपरा को यदि हकीकत में किसी ने बहुत बारीकी से देखा होता तो सिन्धुघाटी सभ्यता के बारे में दिए गए सारे तर्क अनुमान खारिज हो जाते। तब समझ आता कि सिन्धुघाटी सभ्यता की मूल संस्कृति जनजातीय संस्कृति रही। वहां की सारी परंपरा मूलक प्रवृत्तियों, मान्यता, देवी देवता, खान पान, रहन सहन सब कुछ जनजातियों ने आज भी जंगलों में सुरक्षित रखा। जनजातियों ने अपने अनुष्ठान सदियों तक नहीं बदले! वे पहनावों और रूप बनावों के सतत समर्थक रहे।

सिंधु निवासियों ने आगे बढ़कर भारत में अपने निवास के लिए वैसे ही क्षेत्र को चुना जैसा सिंधु का इलाका रहा, भरपूर जल, घने वन और सहचर जीव, जानवर। उन स्थलों में आज का बस्तर अधिक उपयुक्त रहा। छत्तीसगढ़ के सुदूर दक्षिण में घने जंगलों, नदी घाटियों से आच्छदित यह क्षेत्र आज अपने अंदर विश्व की सबसे पुरानी संस्कृति को आत्मसात किए हुए हैं।

बस्तर की धरती ने उजड़ी और बिखरी सिंधुघाटी सभ्यता और संस्कृति को आज तक सुरक्षित रखा है। सिन्धु सभ्यता की खुदाई में पुजारी और देवताओं के जैसे प्रमाण मिले हैं, वे यहां बस्तर में जस के तस अभी सजीव हैं और हर वर्ष दोहराए जाते हैं। यह प्रमाण आधुनिक भारत के अध्येताओं को चौंका सकता है कि बस्तर के परंपरा जीवी समुदाय की संस्कृति में सिन्धु सभ्यता की मूल संस्कृति परंपरा आज तक जस के तस मौजूद हैं। यहां की जनजातियों की संस्कृति का अन्वेषण किया जाए तो यह सच सामने दिखलाई पड़ता है कि सिन्धु सभ्यता में मिली एक मुहर जिसमें पक्षियों के पंखों से सज्जित सींगों के मुकुट धारण किए देवता, साथ ही शेर, गैंडा, भैंसा आदि जीवो का अंकन है, उसे कहीं योगी तो कहीं पशुपति शिव कहा गया। दरअसल इसका स्वरूप आजकल जैसा धार्मिक नहीं है।

ये जनजातियों के देव हैं जो सदियों से अपनी परंपरा में जीवित है किंतु सिन्धु सभ्यता की उस मुहर को कभी इस दृष्टिकोण से देखा ही नहीं गया कि वे जनजातीय देव है उनकी अपनी विरासत है, जो आज बस्तर में जनजातीय संस्कृति के संवाहक है। बस्तर में सिन्धु सभ्यता का यह सांस्कृतिक दृष्टिकोण अपने आप में प्रमाणित है कि सिन्धु सभ्यता की वह मुहर पशुपति शिव की नही वरन किसी जनजातीय देव की है जो आज तक स्मृतियों की अपेक्षा अनुष्ठान में सजीव है।

उस तरह की देव परंपरा बस्तर की जनजातियों में आज भी विद्यमान है। पंखों से सज्जित सिंग वाला मुकुट, सारे अस्त्र शस्त्र, माला आदि से सज्जित देव और उनके, सिंहासन में उन सभी पशु पक्षियों का अंकन यह सब आज सिन्धु सभ्यता के हजारों साल बाद भी जीवित प्रतिमान है। बस्तर के मंडई मेले में ऐसे देव सम्मिलित होते हैं, जनजाति उनको आदर सहित भ्रमण कराते है, उनको भेंट देते है, अपने श्रद्धा उनमें प्रकट करते हैं, बदले में वे देव उन्हें सुख, समृद्धि, साता, शांति और ऐश्वर्य का आशीर्वाद देते हैं।

सिंधु सरस्वती सभ्यता एवं बस्तर की संस्कृति के बीच समरूपता

प्रसिद्ध इतिहासकार और भारतविद श्रीकृष्ण “जुगनू” जी मानते हैं कि भारत की विशालता और वैभव उस खेत की तरह है जहां कभी बीज खत्म नहीं होता। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसने के साथ ही अपनी परंपराओं का पालन करना जनजातीय संस्कृति का सबसे सुंदर उदाहरण है और महिलाएं अपने कुल की रीतियों को हमेशा बढ़ावा देकर बचाती है। पुरुष अनुगामी होते हैं। यह कई मायने में बस्तर में सच साबित हुई है।

एक पक्ष और, जिस पुरोहित की प्रतिमा सिन्धु सभ्यता में प्राप्त हुई, उस तरह का अंग वस्त्र पहनकर पूजा करने, अर्जी देने की परंपरा आज भी बस्तर के देवी देवताओं के पुजारियों में दिखलाई पड़ती है। देवी दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी से लेकर बस्तर के समस्त देव गुड़ियों के पुजारियों का वही तरीका है वही पहनावा है जो कभी सिन्धु सभ्यता में रहा।

सिन्धु सभ्यता की जितनी भी चीजें सामने आईं, उन सभी का जनजातीय संस्कृति के साथ यदि तुलनात्मक अध्ययन हो तो स्वयंमेव प्रमाणित हो जाता है कि सिन्धु सभ्यता एक विशुद्ध जनजातीय संस्कृति रही जिस पर विभिन्न मान्यताओं का ऐसा आवरण चढ़ाया गया कि उसकी मूल थाती, संस्कृति को विस्मृत सा कर दिया। नवीन जानकारियों के आलोक में धीरे – धीरे ही सही, लेकिन सारे व्यर्थ के आवरण हटते जायेंगे और मूल संस्कृति के छुपे हुए आयाम पुरी तरह से स्थापित होते जायेंगे।

चित्र सिंग वाले देव सुकमा राज मंडई सुकमा, आरती करते पुजारी फागुन मंडई दंतेवाड़ा और सिंधु सभ्यता की मुहर और पुरोहित के चित्र एनसीईआरटी पुस्तक।

लेखक

ओम प्रकाश सोनी

लेखक शासकीय शहीद बापुराव स्नातकोत्तर महाविद्यालय सुकमा में इतिहास विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर है और बस्तर के संस्कृति के युवा अध्येता है।

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