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आओ हे घनश्याम

प्राण-पखेरु उड़ जाने पर,
क्या फिर दवा पिलाओगे ?
तोड़ प्रेम के कोमल धागे,
फिर क्या गाँठ लगाओगे ?

आओ हे घनश्याम हमारे,
पल-पल युग सा लगता है।
तुम्ही बताओ अपनों को भी,
कोई यूँ ही ठगता है।

शरणागत हम टेर लगाते,
फिर भी क्या ठुकराओगे ?
प्राण-पखेरु उड़ जाने पर,
क्या फिर दवा पिलाओगे ?

प्यासी धरती ,प्यासा अंबर,
अंबु नहीं क्यों बरस रहे।
मानव,पादप, जीव-जंतु सब,
बूँद बूँद को तरस रहे।
जलकर स्वाहा हो जाने पर,
फिर क्या आग बुझाओगे?
प्राण-पखेरु उड़ जाने पर,
क्या फिर दवा पिलाओगे ?

सूखी नदियाँ,कूप,ताल, नद,
हलधर की सूखी आशा।
हदय-पटल पर गहन अँधेरा,
फैली है घोर निराशा।
प्यासे ही मर जाएँगे तब,
फिर क्या नीर पिलाओगे?
प्राण-पखेरु उड़ जाने पर,
क्या फिर दवा पिलाओगे ?

सप्ताह के कवि

चोवा राम वर्मा ‘बादल’ हथबंद, छत्तीसगढ़

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One comment

  1. मनोज पाठक

    बहुत सुन्दर रचना👌

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