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चरैवेति है मंत्र हमारा

जो बढ़ते जाते हैं प्रतिदिन, वे चरण हमारे हैं।
श्रम से हमने इस जगती के भाग सँवारे हैं।।

चरैवेति है मंत्र हमारा, यही है सुख का धाम।
सतकर्मों का लक्ष्य हमारा, रखे हमें अविराम।
मत समझो तुम राख हमें, जलते अंगारे हैं।

जो प्रतिदिन बढ़ते जाते,वे चरण हमारे हैं।
श्रम से हमने इस जगती के,भाग सँवारे हैं।।

विपदाओं से लड़े हमेशा, हार नहीं मानी।
लक्ष्य सर्वदा रहा हमारा, बनें नित्य ज्ञानी।
दुष्टों का संहार, सुजन के चरण पखारे हैं।

जो प्रतिदिन बढ़ते जाते,वे चरण हमारे हैं।
श्रम से हमने इस जगती के,भाग सँवारे हैं।।

जो है सुंदर उसको बढ़कर, सुंदरतम कर दें।
हर दुखिया की झोली जा कर खशियों से भर दें।
शरणागत के लिए हमेशा, खुले दुआरे हैं।

जो प्रतिदिन बढ़ते जाते,वे चरण हमारे हैं।
श्रम से हमने इस जगती के,भाग सँवारे हैं।।

जो भी कहा, किया हमने ये लक्ष्य रखा अपना।
पूरा किया उसे जो हमने, देखा था सपना।
मत समझो हम राजनीति के झूठे नारे हैं।

जो प्रतिदिन बढ़ते जाते,वे चरण हमारे हैं।
श्रम से हमने इस जगती के,भाग सँवारे हैं।।

सप्ताह के कवि

श्री गिरीश पंकज
वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि रायपुर, छत्तीसगढ़

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