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कोडाखड़का घुमर का अनछुआ सौंदर्य एवं शैलचित्र

बस्तर अपनी नैसर्गिक सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। केशकाल को बस्तर का प्रवेश द्वार कहा जाता है, यहीं से बस्तर की प्राकृतिक सुन्दरता अपनी झलक दिखा जाती है। बारह मोड़ों वाली घाटी, ऊँचे-ऊँचे साल के वृक्ष, टाटमारी, नलाझर, मांझिनगढ़ और कुएमारी जैसे अनेक मारी (पठार) हैं। मारी में अनेक शैलचित्र, झरने व जलप्रपात हैं। किन्तु दुर्गम होने के कारण ये बाहरी दुनिया से अनछुए, अज्ञात या अल्पज्ञात ही हैं।

ऐसे ही एक दुर्गम स्थान में कोडाखड़का नामक जलप्रपात है जो अपनी प्राकृतिक सुन्दरता से मानव मन को बरबस मोह लेता है। ग्राम बावनीमारी (लिंगदरहा) से 9 किलोमीटर एवं केशकाल से लगभग 27 किलोमीटर दूर ग्राम कुए स्थित है। कुए से एक किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में मिड़दे गाँव की सीमा में प्रकृति का अनछुआ सौन्दर्य बिखरा हुआ है। यहाँ पहुँचने के लिए पहले ग्राम कुमुड़ जाना पड़ता था तथा झाड़ियों के सहारे नीचे उतरना पड़ता था।

कोडाखड़का घुमर – झरना

अब ग्राम कुए तक कच्चा सड़क मार्ग बन गया है इसलिए प्रकृति के इस आह्लादकारी सौन्दर्य को नजदीक से निहारने के लिए पर्यटक सीधे जलप्रपात तक पहुँचने लगे हैं। झाड़ियों को काट कर पगडंडी बना दी गई है तथा रास्ते में रस्सी बांध दी गई है ताकि पर्यटक रस्सी के सहारे नीचे तक पहुँच कर जलप्रपात के विहंगम दृश्य और अनुपम सौन्दर्य को निकट से देख सकें।

इस जलप्रपात में पानी सीधे धारदार नही गिरता बल्कि चटटानों से फिसलता हुआ लगभग 50 फुट नीचे गिरता है। अन्य जलप्रपातों की तरह घोर गर्जना करने के बजाय यह मधुर स्वर में प्रकृति के गीत गाता प्रतीत होता है ।

कोडाकल – पत्थर का घोड़ा

जलप्रपात की ऊपर उत्तर दिशा में पत्थर का घोड़ा है, घोड़े को किसी शिल्पकार ने तराशकर नहीं बनाया है अपितु स्वयं प्रकृति ने इसे घोड़े का रुप दिया है। ग्रामीण इसे कोडाकल के नाम से जानते हैं। स्थानीय गोंडी बोली में घोड़ा को कोडा और पत्थर को कल कहते हैं, कोडाकल अर्थात पत्थर का घोड़ा।

कोडाकल के सम्बंध में यह किंवदन्ती प्रचलित है कि एक बार युद्ध के दौरान किसी घुड़सवार योद्धा को छतरी (बलशाली क्षत्रिय योद्धा) ने मारने दौड़ाया तो वह घुड़सवार दो पहाड़ियों के बीच नाले के किनारे-किनारे बहाव की विपरीत दिशा में बेतहाशा भागने लगा। अचानक घुड़सवार के सामने ऊँची खड़ी चट्टान आ गई।

दांयी ओर पहाड़ी और बांयी ओर भी पहाड़ी, पीछे दौड़ाते हुए काल का रूप धारण किए बलशाली योद्धा आ रहा है और सामने ऊँची चट्टान खड़ी है। किंकर्तव्यविमूढ़ घुड़सवार को समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। सभी ओर से घिरे मजबूर घुड़सवार ने घोड़े को ऐसा चाबुक मारा कि घोड़े ने लगभग पचास फुट ऊँची छलांग लगाई और घुड़सवार को दुश्मन से दूर चट्टान के ऊपर पहुँचा दिया।

आदिमानवों द्वारा निर्मित शैलचित्र

घुड़सवार की जान तो बच गई वह सुरक्षित स्थान में पहुंच गया किन्तु वफादार घोड़ा गिर कर वहीं ढेर हो गया। कालान्तर में वह मृत घोड़ा पत्थर बन गया, जिसे अब आस-पास के ग्रामीण श्रद्धा से कोडाकल कहते हैं। इस कोडाकल के कारण ही जल प्रपात को कोडाकल घुमर या कोडा खड़का घुमर के नाम से जाना जाता है।

पत्थर में परिवर्तित इस घोड़े से ग्रामीणों की आस्था भी जुड़ी हुई है। हरियाली अमावस्या हो, नया भाजी खाने का पर्व (भाजी जोगानी) हो या मड़िया जोगानी हो, मिड़दे एवं आस-पास के गांव के लोग यहां सामूहिक पूजा अर्चना करते हैं।

जलप्रपात के निचले भाग के पहाड़ी को लयाहमट्टा कहते हैं। (गोंडी जन बोली में युवती को लया तथा पहाड़ी को मट्टा कहते हैं) ग्राम कुमुड़ और घोड़ाझर के बीच स्थित इस मट्टा के पत्थरों पर हजारों वर्ष पूर्व आदि मानवों द्वारा बनाये गये गये शैलचित्र हैं। निश्चित तौर पर नही कहा जा सकता कि ये कितने हजार वर्ष पुराने हैं?

आदिमानवों द्वारा निर्मित शैलचित्र

यहां तक कोई अध्येता पुरातत्ववेत्ता या शैलचित्रों का विशेषज्ञ नहीं पहुंच पाया है। विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन और विश्लेषण के बाद ही इनका काल निर्धारण संभव हो सकता है। इन शैलचित्रों से भी जन आस्था जुड़ी हुई है।

घोड़ाझर गांव के ग्रामीण प्रतिवर्ष हरियाली अमावस्या के दिन शैलचित्रों की पूजा करने पहाड़ी पर आते हैं। ये नयनाभिराम जलप्रपात पर्यटकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। साथ ही इतिहास एवं पुरातत्व पर शोध करने वाले शोधार्थियों को भी आमंत्रित कर रहा है।

आलेख

घनश्याम सिंह नाग
ग्राम पोस्ट-बहीगाँव जिला कोण्डागाँव छ.ग.

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