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हेमाद्रि संकल्प और ऋषि पंचमी

भारत की ऋषि संस्कृति में संस्कारों का बहुत महत्व है। वस्तुतः संस्कृति एवं संस्कार अन्योन्याश्रित होते है। संस्कारो से है संस्कृति का निर्माण होता है। सम् की आवृति करके सम्यक संस्कार से ही संस्कृति का निर्माण होता जाता है। संस्कारों से आत्मा और अंत:करण की शुद्धि होती है। सम्यक कृति ही संस्कृति है और सभा में साधुता ही सभ्यता है। वैदिक वांग्मय में कहा गया है-“जन्मना जायते, शूद्रः संस्कारैद्विज उच्यते।”अर्थात्- “मनुष्य जन्म से द्विज नहीं होता, द्विज तो वह संस्कारो द्वारा बनता है।” इसी हेतु स्मृत्युक्त उपनयनादि षोडश संस्कारो का भारतीय विधान शास्त्रों में किया गया है।

वैदिक संस्कृति में सर्व महत्वपूर्ण उपनयन संस्कार है जो गुरु द्वारा किया जाता है क्योंकि इसके बाद ही प्राप्त ब्रह्मचर्य और विद्यार्जन भी विवक्षित हैं। सार रूप में हम यही कह सकते है कि ऋषियो की वैज्ञानिक दृष्टिकोण में हिन्दू वांग्मय में मनुष्यादि के एतद्विषयक समग्र जीवन का निरूपण इस उदार दृष्टि को ध्यान में रख कर किया गया है कि स्वभावतः मनुष्य पशु अथवा पामर है और संस्कार द्वारा ही वह सच्ची मानवता वाला अर्थात् संस्कारी मनुष्य बनता है। आचार विचार, रहन सहन, बोलचाल आदि की साधुता का निर्णय शास्त्र से ही हो सकता है। वेदादि शास्त्रों द्वारा निर्णीत सम्यक एवं साधु चेष्टा ही सभ्यता है और वही हमारी संस्कृति भी है।इसीलिए हमारे शास्त्रों में सर्वत्र उद्घोषित किया गया है-“मनुर्भवः, मनुर्भवः!”

वैदिक वांग्मय के अनुसार ‘एकोहं बहुयस्याम्’ की ब्रह्म आकांक्षा के परिणामस्वरूप ही सृष्टि का निर्माण सम्भव हुआ। हेमाद्रि संकल्प एवम स्नान का सीधा सम्बन्ध ब्रह्मकर्म से है जो ब्राह्मणों के लिए अति आवश्यक कर्म विहित किया गया है। हेमाद्रि संकल्प को समझने से पूर्व कई गूढ़ बातो का सरलार्थ नही गूढार्थ हमे समझना आवश्यक है तभी इसका वास्तविक अर्थ हम समझ पाएंगे। क्योंकि यह ब्राह्मण वर्ग द्वारा ही किया जाना नियत है। आखिर इसका क्या प्रयोजन व अभीष्ट क्या है?

वस्तुतः ‘ब्राह्मण’ का अर्थ समझने पर ही ‘हेमाद्रि संकल्प’ को समझा जा सकता है।’मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना’-अतः ब्राह्मण की भी कई परिभाषाए गढ़ दी गई। मैं उन सब से इतर सिर्फ इतना कहूंगी कि वह वर्ग जो ब्रह्मतेज में सदालीन तपोमय ज्ञानमय जीवन व्यतीत करते हुए सर्वोपकारी सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए ब्रह्मज्ञान को सदा बिना अहंकार बांटे, वही ब्राह्मण है।

वाल्मीकि रामायण में कहा भी गया–“धिग बलम क्षत्रिय -बलम, ब्रह्म -तेजो बलम- बलम,एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वस्त्राणि हतानि मे!!”जो सदा निःस्वार्थभाव से ब्रह्मयजन करता है उसी ब्राह्मण वर्ग के लिए हेमाद्रि कर्म वेद विधान द्वारा सुनिश्चित किया गया है। वस्तुतः वेद के तीन भाग हैं,‘‘तीन कांड एकत्व शान – वेद। “-कर्मकांड, उपासना कांड, एवं ज्ञानकांड। वेदों के कुल एक लाख मंत्र हैं जिसमे से चार हजार ज्ञान कांड के, सोलह हजार उपासना कांड और सवार्धिक अस्सी हजार मंत्र कर्मकांड के हैं।

इसप्रकार कर्मकांड को प्रधान स्थान प्राप्त है क्योंकि वह सबसे सरल सहज सम्भाव्य है। हिन्दुओं में विभिन्न अवसरों पर की जाने वाली पारम्परिक पूजा-ऋचा का क्रियात्मक रूप ही कर्मकांड कहलाता है। कर्मकांड से उपासना और ततपश्चात औपनिषदिक आध्यात्मिक ज्ञान ब्रह्मज्ञान तक क्रमिक रूप से बढ़ा जाता है क्योंकि वह गूढ़ ज्ञान है। कर्मकांड के तीन विशेष अंग है। 1. कंडी 2. पिंडी व 3. चंडी। कंडी (कुष्कंडिका): हवन से पूर्व जो कर्म हैं वह कंडी हैं। पिंडी: श्राद्धादि में जो पिण्डादि क्रिया होती है उसको पिंडी कहते हैं। चंडी: भगवती दुर्गा जी की उपासना के जो अनुष्ठान व अन्य क्रियाएं हैं उनको चंडी कहते हैं।

जो साधक कर्मकांड के इन तीन अंगों से भली भांति परिचित है, गुरु परंपरा से दीक्षित ब्रह्मतेज से निष्ठ है वही ब्राह्मण कर्मकांड कराने व आचार्य कहलाने का अधिकारी हो सकता है। इसलिए नियमित रूप से सन्ध्या वन्दनादि करने वाले, वेदपाठी व नित्य ही अपने अनुष्ठान में रत ब्राह्मण द्वारा संपन्न की गई कर्मकांड क्रिया ही फलीभूत होती है। हेमाद्री भी वही ब्रह्म- कर्म है जो ब्राह्मणों द्वारा सामूहिक रूप से अवसरानुकूल उचित आचार्यो के नेतृत्व में किया जाता है।

जैसे ऋषि पंचमी, रक्षाबन्धन और बड़े अनुष्ठानिक उपाकर्म जैसे-भागवद पारायण वाचन या नवचंडी इत्यादि।अन्य कर्मो में यह वैकल्पिक विधान है परंतु ऋषि पंचमी और रक्षाबन्धन के श्रावणी उपाकर्म दो अवसरों पर यह ब्राह्मणों द्वारा अनिवार्यतः किया जाना सुनिश्चित वेद विधान है जिसका सीधा सम्बन्ध ‘ब्रह्मविद्या’ से होता है जो वैदिक काल मे षोडश संस्कारो में से एक उपनयन संस्कार से शुरू होता था जिसका वर्तमान में केवल मात्र अर्थ जनेऊ या यज्ञोपवीत से लिया जाता है।

वास्तविक अर्थो में उपनयन संस्कार अर्थात ब्रह्मविद्या के अभ्यास का आरम्भ जो नौ वर्ष में हिन्दू बालकों को आध्यात्मिक गुरु द्वारा शक्तिपात कर ब्रह्मचारी बना कर विद्याध्ययन के साथ साथ भ्रू मध्य में स्थित तृतीय नेत्र या दिव्य चक्षु को जागृत कर दी जाने वाली आचार संहिता थी जिसका वह उम्र भर पालन करता था और ब्रह्मतेज में लीन रह कर सांसारिक कर्म करता रहता था। वस्तुतः यज्ञोपवीत एक संकल्प का प्रतीक है जो किसी आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत ऋषि स्वरूप सद्गुरु द्वारा आध्यात्मिक विकास हेतु यम नियमो के पालन की संहिता को दर्शाता है।

हेमाद्री संकल्प उसी का दोहरान है।क्योंकि वैदिक काल मे स्त्रियां भी वेद अध्ययन व ब्रह्मज्ञान की अधिकारिणी थी उनका भी उपनयन संस्कार कर यज्ञोपवीत दिया जाता था और ऐसी स्त्रियां ब्रह्मवादिनी कहलाती थी।आज भी हेमाद्रि में ब्राह्मण वर्ग के पुरुषों के साथ साथ महिलाए भी हेमाद्रि संकल्प और स्नान कर उस संकल्प का प्रतिवर्ष दोहरान करती है।

वस्तुतः हेमाद्रि संकल्प एक वैदिक प्रायष्चित विधान है ब्राह्मणों द्वारा सामूहिक रूप से जिसमे वर्ष भर हुए ज्ञात अज्ञात संपूर्ण पापों के लिए प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा अर्थात रक्षाबंधन के अवसर पर “हेमाद्रि संकल्प” एवं “श्रावणी उपाकर्म” वैदिक मंत्रोच्चार द्वारा हवन कर ब्रह्मतेज की साधना के संकल्प को दोहराया जाता है और ऋषि पंचमी को ब्राह्मण स्त्रियों व पुरुषो द्वारा सद्गृहस्थ के तपोवन में रहते हुए ब्रह्म आराधना में सपत्नीक रत रहने का संकल्प हेमाद्रि द्वारा किया जाता है। विशेष रूप से यह दोनों कर्म ब्राह्मणों के लिए अनिवार्य होते हैं और यह दोनों ही ब्रह्मज्ञान की साधना है।

हेमाद्रि के भी तीन चरण होते है–प्रथम- हेमाद्रि संकल्प,द्वितीय -दशविध स्नान व तृतीय वैदिक मंत्रोच्चार द्वारा हवन-तर्पण कर ऋषि व देव पूजन। हेमाद्रि संकल्प का सीधा सम्बन्ध जहाँ आध्यात्मिक रूप से ब्रह्मनिष्ठ होने के संकल्प का दोहरान है वहीं अन्य रूप में हेमाद्रि संकल्प का महत्व भारतीय कालगणना के लिए भी कम नही है। यह हमारी महान ऋषि परम्परा का वह महत्वपूर्ण हिस्सा है जो भारतीयों के समयमान की गणना के परिपक्व ज्ञान को दर्शाता है।

हेमाद्रि संकल्प का सीधा सम्बन्ध सृष्टि खण्ड से है। हेमाद्रि संकल्प में की गयी सृष्टि की व्याख्या केआधार पर इस समय स्वायम्भुव,स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष नामक छह मन्वन्तर पूर्ण होकर अब वैवस्वत मन्वन्तर के २७ महायुगों के कालखण्ड के बाद अठ्ठाइसवें महायुग के सतयुग, त्रेता, द्वापर नामक तीन युग भी अपना कार्यकाल पूरा कर कलयुग के चौथे युग अर्थात कलियुग के सम्वत्‌ का प्रारम्भ हो रहा है।

हिन्दू जीवन-दर्शन की मान्यता है कि सृष्टिकर्ता भगवान्‌ व्रह्मा जी द्वारा प्रारम्भ की गयी मानवीय सृष्टि की कालगणना के अनुसार भारत में प्रचलित सम्वत्सर केवल हिन्दुओं, भारतवासियों का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण संसार या समस्त मानवीय सृष्टि का सम्वत्सर है। इसलिए यह सकल व्रह्माण्ड के लिए नव वर्ष के आगमन का सूचक है।

व्रह्मा जी प्रणीत यह कालगणना निसर्ग अथवा प्रकृति पर आधारित होने के कारण पूरी तरह वैज्ञानिक है। अत: नक्षत्रों को आधार बनाकर जहां एक ओर विज्ञानसम्मत है वही ज्योतिषशास्त्र के लिए भी महत्वपूर्ण है। हेमाद्रि में स्त्री पुरुष पवित्र वस्तुओ कुशा, दर्भ इत्यादि को अंजुरी में ले कर काल या समय को साक्षी मान साधना की भूलो का प्रायश्चित और ब्रह्मतेज में निष्ठा का संकल्प करते है।

द्वितीय चरण में दशविध स्नान होता है।भारतीय ऋषि परम्परा में देह के साथ मन के स्नान का भी सार्थक प्रयोजन किया गया है। स्नान भी कई तरह के कहे गए है जो साधना पूर्व के यम नियमो का अग्रणी हिस्सा है जिसे कालांतर में पतंजलि ने भी दोहराया है। हमारे द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली आरती और प्राचीन समय मे दीपक जला कर नज़र उतारने की प्रक्रिया भी एक प्रकार का स्नान है जो ‘अग्नि स्नान’ कहा गया है जो हमारी ‘औरा’ को शुद्ध करता है। क्योंकि हम अग्नि को देह पर नही ढो सकते है तो उसे देह के नज़दीक ले जा कर स्नान करते है तथा मलिनता से प्रभावित हमारी ओरा को आरती द्वारा शुद्ध करते है।प्रतिदिन की जाने वाली आरती का भी यही प्रयोजन होता है।

हेमाद्रि के दशविध स्नान में दस प्रकार की वस्तुओं से स्नान किया जाता है जिनका आयुर्वेद और आध्यात्मिक दृष्टि से अलग अलग महत्व होता है। ये स्नान है जिसमें क्रमशः भस्म स्नान, मृतिका स्नान, गोमय अर्थात गाय के गोबर से स्नान, पंचगव्य स्नान, गोरज स्नान, धान्य स्नान, फल स्नान, सर्वोषधि स्नान -हल्दी व आयुर्वेदिक जड़ीबूटियों इत्यादि से स्नान, कुशोदक स्नान अर्थात कुशा के जल से, हिरण्य अर्थात स्वर्ण स्नान महत्वपूर्ण होते है।

देह और मन की शुचिता से ही उपरत हो सरलता से मन और आत्मस्नान की प्रक्रिया अर्थात ध्यान को साधा जा सकता है अर्थात पहले तन की शुचिता फिर ध्यान द्वारा मन का स्नान किया जाता है। अतः यह पूरी श्रद्धा से स्नान द्वारा स्वयं को पवित्र करने का विधान है।स्नानोपरांत पितृ तर्पण व मिट्टी व बालू से पिंड रूप में षोडशोपचार द्वारा सप्तऋषियों का आवाहन व पूजन किया जाता है। इसके पश्चात नवीन जनेऊ धारण की जाती है अर्थात ब्रह्म साधना के संकल्प को दोहराया जाता है।

शास्त्रोक्त मत यह है कि वर्ष में कभी जनेऊ के अशुद्ध होने पर “श्रावणी उपाकर्म” के दौरान शुद्ध व अभिमंत्रित जनेऊ से ही पुराने-अशुद्ध जनेऊ का स्थानापन्न किया जाता है। यह कर्म ब्राह्मणों के लिए अनिवार्य बताया गया है। इसीको श्रावणी उपाक्रम कहा जाता है। वास्तव में यज्ञोपवीत एक तरह के संकल्प का प्रतीक है, जिसमें आदमी दूसरा जन्म लेने की प्रतिज्ञा करता है जिसे आध्यात्मिक भाषा मे द्विज होना कहते है जनेऊ उसी की प्रतीक है। यह एक प्रकार की विधुत तरंगिणी की भी प्रतीक है जो द्विजातम की सर्व पातक व अशुद्धताओ से रक्षा करती है।अर्थात कितने ही जन्म जन्मान्तरों से अपने साथ जन्मजात लाये गए कुसंस्कारो पर विजय प्राप्त कर पशुत्व से मनुष्यत्व व देवत्व की और बढ़ने का प्रण या संकल्प का दोहरान जो प्रतिवर्ष ऋषियों के साक्षित्व में काल को प्रमाण मांन कर किया जाता है। इसीको दूसरा जन्म या द्विज होना कहते है।

यज्ञोपवीत दूसरे जन्म का सर्टीफिकेट भी है और निर्धारित संकल्प का पूरा पाठ्यक्रम भी है जो चरम लक्ष्य की और ले जाने हेतु आवश्यक है। पशुवृतियो और चित्त की तमाम मलिनताओं के ऊपर उठ के ही चेतना के स्तर तक उठा जा सकता है अतः जगत की विक्षिप्तताओ के बीच संकल्प को न भूलने का प्रण ऋषि पंचमी पर प्रतिवर्ष दोहराया जाता है। हेमाद्री एक विशुद्ध परिष्करण प्रक्रिया है जो ऋषि परम्परा से वैदिक कर्मकांडो द्वारा सम्पन्न कराई जाती है जिसके कुछ चरण होते है।

‘हेम’ अर्थात ‘स्वर्ण से आच्छादित आत्मा’ जो इन्द्रियों से ढकी पड़ी है। हेमाद्रि में संकल्प द्वारा ऋषियों के मार्गदर्शन में सम्पूर्ण स्नान कर तमाम मलिनताओं का त्याग,भूलो का हवन कर किया जाता है ताकि साधना पथ पर अग्रसर हो कर जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। तीन चरणों मे होने वाली यह शुद्धिकरण प्रक्रिया आत्मबोध की और अग्रसर करती है। इसमें वैदिक मंत्रों के साथ सामूहिक रूप से दशविध स्नान हवन तर्पण इत्यादि कर जनेऊ बदला जाता है। ब्राह्मणों के लिए ऋषि पंचमी पर यह अनिवार्य वैदिक विधान है।

आध्यात्मिक स्तर पर दशविध स्नान का अलग अर्थ है। हमारे प्राण के दस रूप होते है। पाँच प्राण और पाँच उपप्राण। ये हमारी चेतना के दस हिस्से हैं। पाँच तत्वों के भी दो हिस्से हैं-पंच तन्मात्राएँ और पंचतत्व। पंचतन्मात्रायें-शब्द रस, रूप, गंध और स्पर्श हैं, और अग्नि, जल, वायु, आकाश और पृथ्वी ये पाँच तत्व हैं। अपनी देह की शुद्धि के साथ उनकी शुचिता भी जरूरी है जिससे ये निर्मित है, और मन की पवित्रता इससे ही सम्भव है जो कि प्राणों से बना हुआ है।

दस स्नान का यही उद्देश्य है कि प्रतीक रूप में ये इन प्राणो के परिष्करण की प्रक्रिया द्वारा सदप्रेरणा बन इच्छाधारा को प्रेत कर मनुज मन को ब्रह्मतेज की और ऊपर उठ सके।ऋषि तर्पण से तातपर्य है कि हमारे वह आत्मलीन पुरोधा जो चेतना के स्तर पर जागृत थे उनके साक्षित्व में यह शुद्धिकरण एव संकल्प का दोहरान हो क्योंकि ये ऋषि वो व्यक्ति जो प्रभावशाली दृति मेधा के रूप में आपकी चेतना का मार्गदर्शन कर सकते है। हमे अनुशासन में रखने में वही समर्थ है अतः ऋषि पंचमी पर उन्ही के मार्गदर्शन में यह प्रक्रिया की जाती है।

आप ऋषि का अनुशासन पाये बिना साधना पथ पर आगे नहीं बढ़ सकते, कुसंस्कारों से छुटकारा नहीं पा सकते। ऋषि का पूजन हम इसीलिए करते है कि जीवन में अनुशासन आये। ऋषि हमारे जीवन की महती आवश्यकता हैं इसिलए ऋषि पंचमी को सप्त ऋषियों का साक्षित्व व मार्गदर्शन में हेमाद्रि किया जाता है।-मनुर्भव की वैदिक संस्क्रति की ऋषि परम्परा का महत्वपूर्ण अवशेष धरोहर परम्परा का महती हिस्सा है -हेमाद्रि।

हेम से अर्थात स्वर्ण आच्छादित आत्मा को ,जो इन्द्रियगत तन्मात्राओं से ढकी हुई है के शुद्धिकरण की सम्पूर्ण प्रक्रिया ही ऋषियो की सनातन प्रक्रिया है जिसे ‘हेमाद्रि’ कहा गया है।अस्तु, हमे भारतीयों की हर परम्परा में आत्मबोध वआत्मनिर्माण की प्रक्रिया से समाज निर्माण का क्रम देखने को मिलता है क्योंकि स्वस्थ और पूर्ण व्यक्तिव से ही स्वस्थ समाज का निर्माण सम्भव है।हेमाद्रि भी उसी परिष्करण का सामुहिक संकल्प विधान है।ऋषियो की दूरदर्शी नज़र व समपूर्ण समाज निर्माण का हेतु हेमाद्रि आत्मपरिष्करण का विधान है क्योंकि स्व से ऊपर उठ कर ही हम वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से जुड़ सकते है।

आलेख

डॉ नीता चौबीसा,
लेखिका, इतिहासकार एवं भारतविद, बाँसवाड़ा,राजस्थान

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