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विराट भारत का महा संकल्प दिवस : श्रावणी पर्व

भारत की कृषिप्रधान और ऋषि परम्परा की संस्कृति में त्योहारों और पर्व उत्सवों का विशेष महत्वपूर्ण स्थान प्राचीन काल से ही रह है। यहां बाराहोमास ऋतु, तिथि, कर्म, धर्मानुसार पर्व और उपासना का विशेष महत्व रहा है ताकि जीवन मे रंग और उत्स बना रहे यद्यपि कुछ पर्वों के मनाने में अब कुछ आधुनिकता भी आ गई है लेकिन हमारे मूल सांस्कृतिक तत्व से जुड़ाव अभी भी टूटा नही है, यही सनातन संस्कृति की मूलभूत विशेषता रही है कि वह नव परम्पराओ को जोड़ते हुए भी अपनी प्राचीन मूल स्वरूप का निर्वहन अवश्य करती है।

कर्मानुसार चार वर्णों, चार पुरुषार्थों में विभक्त प्राचीन वैदिक व्यवस्था में भारतवर्ष में चार ही प्रमुख राष्ट्रीय पर्व हुआ करते थे, जिनमें प्रथम वर्ण ब्राह्मण द्वारा संयोजित श्रावणी रक्षाबंधन ब्राह्मी पर्व; जो राष्ट्र की आध्यात्मिक शक्ति को पूंजीभूत करने का पर्व था। द्वितीय विजया दशमी जो क्षत्रिय वर्ण द्वारा संयोजित राष्ट्र की सैन्य शक्ति को सुसज्जित करने का पर्व, तृतीय धन की देवी महालक्ष्मी पूजा दीपावली पर्व वैश्य वर्ण द्वारा राष्ट्र की अर्थशक्ति को समुन्नत करने का पर्व और चतुर्थ होली अंत्यज वर्ण के संयोजन में समग्र राष्ट्र की श्रम शक्ति को पूंजीभूत करने का समन्वयात्मक पर्व के रूप में प्रचलित था।

इन पर्वो में ऋतुओं का सुंदर समायोजन करते हुए उपर्युक्त परम्पराए सनातन धर्म का वैज्ञानिक पक्ष रहा है। इन मुख्य चारों पर्वोत्सव और वर्णों की आध्यात्मिक शक्ति, सैन्य शक्ति, अर्थशक्ति एवं पुरुषार्थ प्रधान शक्तियों को राष्ट्र को सुदृढ़ करने के लिए चतुष्ट्य समन्वयात्मक प्रयास ही इनका प्रमुख उद्देश्य थे और यही कारण था कि हमारी सनातन संस्कृति की मूल धारा इतनी अक्षुण्ण रही कि अनेकाबेक बार विदेशी आक्रांताओं द्वारा देश को छिन्न-भिन्न करने के क्रूर प्रयासों के बाद भी हम आज विश्व के समक्ष अपनी अस्मिता को सुरक्षित रख सके हैं और नवसृजन की ओर सतत अग्रसर हैं।

श्रावणी पर्व की ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, पौराणिक व्याख्या जानने से पूर्व यह जानना जरूरी है कि “श्रावण” के क्या मायने हैं?हिंदू कालगणना का आधार नक्षत्र, सूर्य और चंद्र की गति पर आधारित है। इसमें नक्षत्र को समसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। तारों के समूह को नक्षत्र कहते हैं। हमारे आकाश या अंतरिक्ष में सत्ताईस नक्षत्र होते हैं। नक्षत्र और नक्षत्र मास को सौर्य और चंद्र मास के आधार पर गिना जाता है।भारतीय गणना चंद्र मास पर आधारित है।अतः चंद्र महीनों के नाम पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में रहता है उसी नक्षत्र के नाम पर आधारित होता है,जैसे विशाखा के नाम पर वैशाख, चित्रा के नाम पर चैत्र आदि।

श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र रहता है अतः इस मास का नाम श्रावण पड़ा। श्रवण नक्षत्र बाईसवें स्थान पर आता है। भचक्र में मकर राशि में दसवे अंश से तेइसवें अंश की बीसवीं कला तक का विस्तार इस नक्षत्र के अधिकार में आता है। श्रवण नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता विष्णु है और स्वामी ग्रह चंद्रमा होता हैं ।इस नक्षत्र में तीन तारे माने गए हैं जो भगवान विष्णु के तीन पद चिन्ह हैं जो वामन के तीन पगों का प्रतीक भी है। श्रवण नक्षत्र का अर्थ होता है श्रुति या सुनना, ख्याति, कीर्ति से लिया जाता है। श्रवण का एक अन्य नाम अश्वत्थ या पीपल के वृक्ष से भी लिया जाता है। तैतरीय उपनिषद में श्रावण को श्रोण भी कहते हैं। यही कारण है कि इस मास में विष्णुजी पूजन, अश्वत्थ या पीपल का पूजन आदि किया जाता है।

यह पूरा माह ही पर्व उत्सवों की क्रमबद्ध लड़ी ले कर आता है किंतु उन सब मे सर्व महत्वपूर्ण है ज्ञान का ब्राह्मी पर्व श्रावणी! वेदों में कहा गया है-“ब्रह्म जानयते इति ब्राह्मण:!”इस आधार पर ब्राह्मी विद्या को जानने वाले सभी ब्राह्मणों का यह पर्व सीधा वेदों से जुड़ता है। वेदों को ‘श्रुति’ भी कहते हैं क्योंकि यह श्रुति परम्परा से ही निर्बाध चले आए है और प्राचीन भारत मे इस वैदिक ज्ञान का आरम्भ इसी श्रावणी पर्व के दिन से होता था इसीलिए इसे कुछ विशिष्ट वैदिक रीति परम्पराओं के साथ मनाया जाता था और इसी दिन से जीवन मे कई नवीन चीजो का समावेश होता था–ब्रह्म ज्ञान पर्व, वेद पूजा विधान, श्रुति ज्ञान परम्परा, पुरोहित-यजमान परम्परा, गुरु -शिष्य परम्परा, पितृ और ऋषि-तर्पण परम्परा, उपनयन एवं विद्यारम्भ परम्परा, श्रावणी-उपाकर्म-दशविध स्नान व यज्ञोपवीत, हेमाद्रि संकल्प,रक्षासूत्र का बंधन, भुजरियों का आरोपण एवं वृक्षारोपण आदि विविध वैदिक परम्पराए वैदिककाल से ही चली आ रही है जिनमे से कुछेक में युगानुरूप परिवर्तन हो गया है तो कुछ की महत्ता ही लोग भूल गए है और वे लुप्त होती जा रही है या ज्ञान के अभाव में मात्र औपचारिकता बन कर रह गई है।

श्रावणी पर्व मूलतः ब्रह्म ज्ञान का पर्व है। जीवन के समुन्नयन के लिए सद्ज्ञान, विद्या, बुद्धि, विवेक और धर्म की बुद्धि के लिए इस दिन को हमारे पुरखो ने चुना था। ब्राह्मणों द्वारा इसी दिन से श्रावणी उपाकर्म के उपरांत वेदाध्ययन आरम्भ किया जाता था इसलिए इसे ब्राह्म पर्व भी कहते हैं। प्राचीन काल मे इस दिन से लेकर भाद्रपद बदी सप्तमी तक एक सप्ताह वेद प्रचार की प्रथा चिरकाल से प्रचलित है। प्राचीन काल में इस त्यौहार के अवसर पर गुरुकुलों में नये छात्र गुरुओं द्वारा विद्यारम्भ का उपनयन संस्कार किया जाता था तदोपरांत उन्हें गुरुकुल में विद्याध्ययन हेतु नव प्रवेश दिया जाता था। जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ होता था, उन्हें यज्ञोपवीत दिये जाते थे। यज्ञोपवीत में नौ तार होते हैं यह नौ सूत, नौ गुणों के प्रतीक हैं। तीन लड़ों से प्रत्येक में तीन तार होते हैं। यह तीन लड़ें जीवन के तीन प्रधान अंगों का संदेश देती हैं।

जीवन तीन भागों में विभक्त है, क्रमशः- आत्मिक, बौद्धिक और सांसारिक पक्ष। यही यज्ञोपवीत की तीन लड़ें हैं। इनमें से हर एक में जो तीन-तीन तार हैं उनका तात्पर्य उन तीन-तीन गुणों से है जो इस प्रत्येक क्षेत्र के अंतर्गत होते हैं। आत्मिक क्षेत्र की तीन सम्पत्तियाँ होती है- विवेक, पवित्रता और शान्ति। बौद्धिक क्षेत्र की तीन सम्पत्तियाँ है- साहस, स्थिरता एवं कर्त्तव्य निष्ठा और सांसारिक क्षेत्र की तीन सम्पत्तियाँ होती है- स्वास्थ्य, धन व सहयोग। इस प्रकार यह सब गुण मनुष्य और सभ्य समाज के लिए नितांत आवश्यक हैं। जिस मनुष्य में यह नौ गुण नहीं होते है अथवा जीवन मे जो इन नौ गुणों को प्राप्त करने की इच्छा या कोशिश भी नहीं करता है वही शूद्र है।

जन्म से सभी मूर्ख, अज्ञानी, नासमझ, पशुतुल्य ही होते हैं पर बड़े होने पर जीवन के तीन क्षेत्रों में विकास करने और प्रत्येक क्षेत्र में तीन-तीन गुण प्राप्त करने के महत्व को समझ लेता है और उनकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न आरंभ कर देता है तो उसका नया जन्म होता है इसलिए उपनयन संस्कार और यज्ञोपवीत धारण करने को-दूसरा जन्म हुआ-समझा जाता है और यही द्विजत्व है। इस द्विजत्व की-नौ गुणों के विकास की जिम्मेदारी कंधे पर सदैव धारण किये रहने के चिह्न स्वरूप ही तीन तार का जनेऊ धारण किया जाता है। श्रावणी के दिन वैदिक रीति से उपाकर्म कर पुराना यज्ञोपवीत बदल कर नया धारण करते हैं अर्थात् उस जिम्मेदारी को नये सिरे से स्मरण करते हैं। तात्पर्य यह है कि हम ऐसे ज्ञान को ग्रहण करें जिससे मानव जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक इन परम पुनीत नौ दिव्य सम्पत्तियों की प्राप्ति हो सके।

श्रावणी को वेद पूजा होती है। वेद का अर्थ है-धर्म पूर्ण ज्ञान। चारों वेदों में जितना ज्ञान भरा पड़ा है वह सब धर्मपूर्ण है। उसको समझने और अपनाने से जीवन सब प्रकार की सुख शाँति से भर जाता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों जीवन फलों की प्राप्ति होती है। वेदों के मन्त्र-सद्ज्ञान के भण्डार हैं। उनके पढ़ने, सुनने, समझने और आचरण करने से सद्ज्ञान बढ़ता है। असद्ज्ञान तो चाहे जहाँ मिल सकता है पर सद्ज्ञान के लिए वेद का ही आश्रय लेना पड़ता है। वहाँ एक बात और भी स्मरण रखनी चाहिए कि वेद का ज्ञान परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य की आत्मा को दिया हुआ है। बिना पढ़े लोग भी अपने भीतर इस वेद की वाणी सुन सकते हैं इसलिए इसे श्रुति ज्ञान कहते है। वेद पूजा से, ज्ञान की महत्ता, प्रतिष्ठा और उपयोगिता को मनुष्य समझता है और उसकी श्रद्धा ज्ञान में बढ़ती है, इसीलिए श्रावणी पर्व के अवसर पर वेद पूजा का विधान है।

इसी दिन से गुरुकुल में प्रवेश के साथ गुरु शिष्य के परम पवित्र एवं अत्यन्त आवश्यक संबंध की स्थापना होती थी। वेद मन्त्रों से मंत्रित किया हुआ रक्षा सूत्र आचार्य लोग अपने शिष्यों के हाथ में बाँधते थे, यह सूत्र उनकी रक्षा करता था। और उन्हें धर्म प्रतिज्ञा के बंधन में बाँधता था। बहिनें अपने भाइयों के हाथों राखी बाँध कर या भुजरियाँ (गेहूँ या जौ के दिन बढ़े हुए अंकुर) देकर भाइयों को यह याद दिलाती थीं कि बहिनों की रक्षा के लिए उनका क्या कर्त्तव्य है? भाई उसके बदले में उन्हें आश्वासन के रूप में कुछ उपहार देते थे, मानों वे कहते हों कि हम पूरी तरह सावधान हैं और बहिनों के ऊपर, नारी जाति के ऊपर, कोई विपत्ति आवेगी तो हम प्राण देकर भी उसका निवारण करेंगे। उस दिन नये-नये लता, पुष्प, वृक्ष आदि लगाकर संसार की शोभा और समृद्धि बढ़ाने के लिए प्रयत्न किया जाता था।

आज भी ब्राह्मण वर्ग इस दिन श्रावणी उपाकर्म करता है। श्रावणी पर्व पर किए जाने वाले इस विधान में पुरोहित द्वारा विधिवत नदी, तालाबो एवं कुंडों पर सामुहिक रूप से दशविध स्नान करवाया जाता है जो मन, वचन और कर्म से शुचिता और दस इन्द्रयों की पवित्रता को इंगित करता है। ततपश्चात पितृ तर्पण करवाया जाता है, ऋषियों का पूजन किया जाता है और तब यज्ञोपवीत बदल जाता है तब पुरोहित द्वारा सभी को पहले रक्षासूत्र बांधा जाता है। इस सभी के दौरान हेमाद्रि संकल्प करवाया जाता है जिसका अर्थ होता है हिमालय जैसा संकल्प। वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाने वाला यह यज्ञोपवीत केवल तीन धागों का समूह ही नहीं है अपितु इसमें आत्मरक्षा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा के तीनों सूत्र संकल्प बद्ध होते हैं और यःहि हेमाद्रि संकल्प है। श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष होते हैं- प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय।

प्रायश्चित्त संकल्प को ही हेमाद्रि स्नान संकल्प कहते है। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी पंचगव्य (गोदुग्ध, दही, घृत, गोबर और गोमूत्र) तथा पवित्र कुशा से स्नानकर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित्त कर जीवन को सकारात्मकता दिशा देते हैं। स्नान के बाद ऋषिपूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन करने के विधान है।

द्विजत्व के नवीनीकरण का संस्कार या यज्ञोपवीत बदलना। उपरोक्त कार्य के बाद नवीन यज्ञोपवीत या जनेऊ धारण करना अर्थात आत्म संयम का संस्कार होना माना जाता है। इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है। वस्तुतः यह द्विजत्वं का नवीनीकरण है और संकल्पों का आकलन एवं दोहरान भी है।

अग्निहोत्र एवं स्वाध्याय उपाकर्म का तीसरा पक्ष है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घृत की आहुति से होती है। जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है। इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। श्रावणी उपाकर्म की यह यह प्रक्रिया वास्तव में हमारे ऋषि मुनियों द्वारा खोजी गई जीवन शोधन की एक अति महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक -आध्यात्मिक प्रक्रिया है। श्रावणी कर्म के उपरांत ही आज भी घरों में बहने भाइयो को रक्षा सूत्र बांधती है, यह हमारी प्राचीन परंपरा है जो आज तक चली आ रही है।

प्राचीन काल से ही इस दिन घरों में जवारे उगाने की भी परम्परा रही है जो कृषि परम्परा का द्योतक है। यही ज्वारे रक्षासूत्र बांध कर शुभ शगुन के तौर पर पुरोहित एवं बहिने अपने भाइयों को भी देती है। श्रावणी के पुण्य पर्व पर वृक्षारोपण भी यज्ञ सम महात्म्य माना जाता है। खेतों पर, खाली भूमियों में, बंजरों में, घर में, द्वार पर, जहाँ भी सुविधाजनक स्थान मिल सके वहाँ फलों के वृक्ष, लकड़ी के वृक्ष, फूलों के पौधे, बेलें, औषधियाँ, तरकारियाँ होनी चाहिए या उनकी पौध लगानी चाहिए। वर्षा ऋतु का समय इस कार्य के लिए बहुत सुविधाजनक होता है। इसलिए जितनी अधिक वनस्पति उत्पन्न की जाए उतना ही श्रेष्ठ है, शुभ है, पुण्य है।

श्रावण का अर्थ ही होता है श्रवण या सुनना और सुना किसे जाए? जगत में सबसे अधिक महत्वपूर्ण ईश्वरीय ज्ञान वेद है। इसलिए इस मास में वेदों को सुना जाता है। श्रावण में गर्मी के पश्चात वर्षा आरम्भ हो चुकी होती है। वर्षा में मनुष्य को राहत होती है। चित वातावरण के अनुकूल होने के कारण शांत हो जाता है। मन प्रसन्न हो जाता है। वर्षा होने के कारण मनुष्य अधिक से अधिक समय अपने घर पर स्वाध्याय में व्यतीत कर सकता है। ऐसे अवसर को हमारे वैज्ञानिक सोच रखने वाले ऋषि मुनियों ने वेदों के स्वाध्याय, चिंतन, मनन एवं आचरण के लिए इसे सर्वाधिक अनुकूल माना। इसलिए श्रावणी पर्व को प्रचलित किया। वेदों के स्वाध्याय एवं आचरण से मनुष्य अपनी आध्यात्मिक उन्नति करे। यही श्रावणी पर्व का आध्यात्मिक प्रयोजन है। श्रावणी पर्व का एक वैज्ञानिक पक्ष भी है।

श्रावण में वर्षा के कारण कीट, पतंगे से लेकर वायरस, बैक्टीरिया सभी का प्रकोप बढ़ चुका होता हैं। इससे अनेक बीमारियां, व्याधियां फैलती है। इसलिए प्राचीन काल से अग्निहोत्र के माध्यम से बीमारियों को रोका जाता था। श्रावण मास में वेदों के स्वाध्याय के साथ साथ दैनिक अग्निहोत्र का विशेष प्रावधान किया जाता है। इसीलिए वेद परायण यज्ञ को इसमें सम्मिलित किया गया था। इससे न केवल श्रुति परम्परा को जीवित रखते वाले वेद-पाठी ब्राह्मणों का संरक्षण होता है अपितु वेदों के प्रति जनमानस की रूचि में वृद्धि भी होती है।

श्रावणी पर्व का वैज्ञानिक पक्ष पर्यावरण रक्षा के रूप में प्रचलित है। वास्तव में आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा के तौर पर श्रावणी विराट भारत का महा संकल्प दिवस है। ब्रह्म ज्ञान एवं वैदिक अध्ययन का पर्व होने से 1969 से इसे संस्कृत दिवस के रूप में भी मनाया जाने लगा है क्योंकि वेदों की भाषा संस्कृत है और इसे देव वाणी भी कहा जाता है। श्रावणी पर्व संस्कृत एवं भारतीय सनातन संस्कृति दोनो का प्रतिनिधित्व करता है।

आलेख

डॉ नीता चौबीसा,
लेखिका, इतिहासकार एवं भारतविद, बाँसवाड़ा,राजस्थान

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